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Saturday, 18 February 2012

नैनीताल पर रहम करो

नैनीताल पर रहम करो

लेखक : राजीव लोचन साह :: अंक: 08 || 01 दिसंबर से 14 दिसंबर 2011:: वर्ष :: 35 : December 16, 2011  पर प्रकाशित
ऐसा लगता है कि नैनीताल में तमाम असामाजिक तत्व संगठित हो गये हैं और यहाँ के स्थायी निवासियों ने अपनी बिखरती ताकत से हताश होकर चुप्पी साध लेना बेहतर समझ लिया है। किसी समाज के लिये आत्मघाती खामोशी से खतरनाक बात और कोई नहीं हो सकती।nainital-shani-dev-mandir
वर्ष 2010 में अनेक शिकायतें प्राप्त होने के बाद प्राधिकरण का एक दल रईस अहमद नामक एक अतिक्रमणकारी का अवैध निर्माण तोड़ने पहुँचा तो रईस अहमद ने अपने गुंडों के साथ उस पर हमला कर वापस खदेड़ दिया। दूसरे प्रयास में प्राधिकरण ने वह निर्माण ध्वस्त भी किया तो उसी रात से वह दुबारा बनने लगा और पूरा काम हो जाने के बाद ही उसका काम थमा। ताजा उदाहरण ठंडी सड़क पर अवैध रूप से बन रहे शनि मंदिर का है। 21 नवम्बर के दिन प्राधिकरण का एक दल मंदिर को तोड़ने पहुँचा तो बजरंग दल, शिव सेना और ग्वल सेना के कार्यकर्ताओं ने उसे खदेड़ दिया। रईस अहमद को तो, सम्भवतः मुसलमान होने के कारण, अपने दुष्कृत्य के लिये हवालात की हवा भी खानी पड़ी। मगर भारतीय जनता पार्टी के शासन में हिन्दुत्व का मुखौटा डाले असामाजिक तत्वों पर कार्रवाही होने के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता।
नैनीताल का प्राधिकरण कोई दूध का धुला नहीं है। वर्ष 1984 में अपनी स्थापना के बाद से ही उसने नगर में अवैध निर्माणों का सिलसिला शुरू करवाया और इस वक्त भी वह अवैध निर्माण करवा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय के तमाम निर्देशों की अवमानना हो रही है, ब्रजेन्द्र सहाय समिति की संस्तुतियाँ धूल खा रही हैं और विशेष झील परिक्षेत्र विकास प्राधिकरण नैनीताल की खूबसूरती का मर्सिया लिखने पर तुला है। इसके पिछले सचिव की कारगुजारियों की कहानियाँ तो बिल्डर और अवैध निर्माणकारी चटखारे ले-लेकर सुनाते हैं। प्रख्यात फोटोग्राफर और वन्यमित्र अनूप साह के साथ टहलते हुए एक दिन मैंने मल्लीताल पर्दाधारा के ऊपर प्लास्टिक की शीटों से ढँक कर अवैध रूप से बनता हुआ एक तिमंजिला मकान देखा। चर्चा होने लगी तो अनूप ने बताया कि एक दिन ऐसे ही एक अवैध निर्माण की ओर उन्होंने प्राधिकरण के एक अधिकारी का ध्यान खींचा तो उसका त्वरित जवाब था, ‘‘यहाँ पर पहले ही एक मकान था। उसी का जीर्णोद्धार करने की अनुमति दी गई है।’’ अर्थात् जीर्णोद्धार के नाम पर एक छोटे से टिन शेड को भव्य तिमंजिला मकान बनने की अनुमति दे दी गई थी। मजेदार बात यह हुई कि अगले ही दिन वह अतिक्रमणकारी अनूप के सामने हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया, सर! मैंने आपका क्या बिगाड़ा है ? अनूप कहते हैं कि उस दिन से उन्होंने नैनीताल की बदहाली पर कुछ न बोलने की कसम खा ली। उधर रिटायर्ड डी.एफ.ओ. गिरिजा शरण सिंह खाती, जो अपनी वृद्धावस्था और तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद नैनीताल को बचाने के लिये कुछ न कुछ करने के लिये व्याकुल रहते हैं, को यह प्राधिकरण सूचना का अधिकार कानून के तहत अवैध निर्माणों की सूची उपलब्ध करवाने को भी तैयार नहीं है।
नैनीताल में तीन-चार पीढि़यों से रह रहे लोग अब अपने परिवार का विस्तार होने के कारण हल्द्वानी विस्थापित हो रहे हैं। क्योंकि न यहाँ जमीन मिलना आसान है और न कड़े कानूनों के चलते मकान बना पाना सम्भव है। मजबूरी में उन्हें अपने पुरखों की भूमि को अलविदा कहना पड़ रहा है। अब यहाँ वे लोग आ रहे हैं, जो पैसे की ताकत या बाहुबल या किसी राजनीतिक दल में होने की दबंगई से नियम-कानूनों को ठेंगा दिखा कर मकान बना सकते हैं। इन मकानों को बेचना बेहद फायदे का धन्धा है। क्योंकि जहाँ मकान बनाना संभव ही न हो, वहाँ उसकी कीमत आकाश छूती है। नैनीताल में मकान होना किसी भी धन्नासेठ के लिये गौरव की बात हो सकती है, अतः उसे मनमानी कीमत पर बेचा जा सकता है। इस बीच यहाँ मकानों की ऊँचाई 25 फीट से 35 फीट करने का मसला फिर उठा है। दरअसल भुवन चन्द्र खंडूरी के पिछले कार्यकाल में 2009 के लोकसभा चुनाव से पूर्व उनसे भाजपा के धंधेबाज नेताओं ने यह घोषणा करवा ली थी। फिर खंडूरी के सत्ता से बाहर होने के दौरान यह मामला भी ठंडे बस्ते में पड़ा रहा। अब खंडूरी दुबारा सत्ता में लौटे हैं और विधानसभा चुनाव सामने हैं। ऐसे में ये लोग नये सिरे से खंडूरी को समझाने में जुटे हैं कि मकानों की ऊँचाई 25 फीट से 35 फीट करने पर भाजपा को चुनाव में बहुत फायदा होगा। इस दूसरी पारी में खंडूरी ज्यादा व्यावहारिक और समझदार लग रहे हैं। सुशासन और पारदर्शिता पर उनका जोर है। देखना है कि वे अपनी पार्टी के इन धंधेबाजों के झाँसे में आते हैं या नहीं। 25 फीट से 35 फीट ऊँचाई करने का कोई तर्क तो समझ में आता नहीं। यदि चट्टानी जमीन है तो उस पर गगनचुम्बी इमारत भी बनायी जा सकती है और यदि भराव वाली भुरभुरी जमीन है तो उस पर एकमंजिला मकान भी क्यों बने ? नगरपालिका के पुराने बाइलॉज में तो 30 डिग्री से अधिक की ढलान पर भवन निर्माण सर्वथा निषिद्ध था।
प्राधिकरण कभी-कभी ज्यादा शिकायतें मिलने या अधिक दबाव पड़ने पर अवैध निर्माण तोड़ने की खानापूरी करने पहुँच भी जाता है तो उसे रईस अहमद अथवा शनि मंदिर की तरह का प्रतिरोध झेलना पड़ता है। सामान्य लोग चुपचाप रहते हैं तो इसलिये क्योंकि उन्हें नैनीताल का हितैषी कहने वाले लोगों ने ही खूब धोखा दिया है। सच को जिन्दा रखने वाले एक पत्रकार ने पहले शहर के एक मुख्य स्थान पर जगह घेरी, फिर उसे नगरपालिका के खातों में अपने नाम करवाया और फिर फ्रीहोल्ड करवा लिया। फिर भी पेड़ होने के कारण मकान बनाने में कठिनाई सामने आयी तो पेड़ों को आबादी के लिये खतरा बतलाते हुए उन्हें कटवाने की बाकायदा अनुमति प्राप्त कर ली। फिर दूसरी जगह गैराज बनाने के नाम पह जगह हासिल की और उस पर तिमंजिला मकान बना डाला। ताल की सफाई के लिये अपने को समर्पित घोषित करने वाले एक पर्यावरणविद ने शेर का डाँडा में एक छोटे से खंडहर के जीर्णोद्धार के नाम पर उसके चौगुने क्षेत्रफल पर तिमंजिला मकान खड़ा कर डाला। एक न्यायमूर्ति ने अदालत की ताकत का इस्तेमाल कर ग्रीन बेल्ट के बीच में से अपने घर तक के लिये सड़क बनवा ली। हिन्दुस्तान में आम जनता को अपने गुस्से का इजहार करने के लिये एक अदद अण्णा हजारे की दरकार होती है, मगर यदि अण्णा हजारे ही धोखा दे दें तो…..