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Saturday, 9 February 2013

हिंदुत्व का उत्सव सत्ता समीकरण कम है, नरसंहार का सुनियोजित रणकौशल ज्‍यादा है



हिंदुत्व का उत्सव सत्ता समीकरण कम है, नरसंहार का सुनियोजित रणकौशल ज्‍यादा है



हिंदुत्व का उत्सव सत्ता समीकरण कम है, नरसंहार का सुनियोजित रणकौशल ज्‍यादा है

♦ एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास
संसद के बजट सत्र से पहले आहुत इस अंध धर्मराष्ट्रवाद का असली मकसद तो दूसरे चरण के आर्थिक सुधारों के एजंडे को लागू करना है!
संकेत अगर समझे नहीं तो हिंदुत्व का यह खेल मैंगो जनता को खा पी जायेगा।हिंदुत्व का यह उत्सव आर्थिक सुधारों के लिए सर्वदलीय सहमति बनाने का काम करेगी, ऐसी ही रणनीति है। महिलाओं पर अत्याचारों के लिए आनन फानन में जारी अध्यादेश, युवी आक्रोश, सिविल सोसाइटी आंदोलन, आशीष नंदी का अकादमिक बयान और प्रवाम तोगड़िया की हेट स्पीच इसी रणनीति का हिस्सा है। राम मंदिर के संघी संकल्प और जनसंहार नीतियों के कारपोरेट राज में कोई बुनियादी अंतर तो है ही नहीं।ऑयल इंडिया और एनएमडीसी के बाद एनटीपीसी का ऑफर फॉर सेल सफल रहा है। विनिवेश सचिव के मुताबिक एनटीपीसी ओएफएस 1.7 गुना भरा और 132.8 करोड़ शेयरों के लिए बोलियां मिलीं।विनिवेश सचिव का कहना है कि एनटीपीसी के ओएफएस को एफआईआई से अच्छा रिस्पॉन्स मिला है। एनटीपीसी के विनिवेश से सरकार को 11500 करोड़ रुपये से थोड़ा ज्यादा रकम मिलेगी।एनटीपीसी के ओएफएस का फ्लोर प्राइस 145 रुपये प्रति शेयर रखा गया था। ओएफएस के जरिए सरकार कंपनी की 9.5 फीसदी हिस्सेदारी बेची।विनिवेश सचिव का कहना है कि बाजार में सरकारी कंपनियों के हिस्से के लिए मांग बाकी है। नाल्को, सेल, एमएमटीसी और आरसीएफ के विनिवेश को मंजूरी मिल चुकी है।
प्रवीण तोगड़िया के घृणास्पद बयान और विख्यात समाजशास्त्री आशीष नंदी के ओबीसी और अनुसूचित जातियों व जनजातियों के विरुद्ध जयपुर साहित्त्य उत्सव में दिये गये बयान का चरित्र एक ही है, जिसे राम चंद्र गुहा जैसे विद्वान नजरअंदाज कर रहे हैं। ओबीसी की गिनती की मांग​ ​ सके साथ नंदी के बयान के आलोक में जनसंख्यावार भ्रष्टाचार और विकास की न्यायिक जांच की मांग को भटकाने के लिए मंगलवार को​​ जहां बुद्ददेव के साक्षात्कार के जरिये ममता बवनर्जी की ईमानदारी पर सवाल उठाये गये, वहीं आज सबसे बड़े बांग्ला अखबार में नंदी को तेली यानि ओबीसी बताकर सत्तावर्ग अपने वर्चस्ववादी मनुस्मृति एकाधिकार के लिए उत्पन्न अभूतपूर्व खतरे को रफा दफा करने में लगा है।यह तो रहा प्रगतिशील बंगाल की तस्वीर। दूसरी ओर, आदिवासी भूगोल में विकास के बहाने दमनतंत्र के मजबूत करने के पुख्ता इंतजाम किये जा रहे​​ हैं। एनटीपीसी के शेयर बेचकर बिजली का पूरा निजीकरण करके बिजली दरें बढ़ाकर आम जनता को अंधेरे में डुबोने का इंतजाम किया है। नंदी से लेकर तोगड़िया तक के उद्गार से आरक्षणविरोधी हिंदुत्व का अभूतपूर्व माहौल पैदा हो गया है, जो बहुसंख्यक जनता के अस्तित्व के लिए अत्यंत खतरनाक है। कारपोरेट मीडिया और सोशल मीडिया में भी बुनियादी मुद्दों, समता और सामाजिक न्याय की जगह हिंदुत्व का उत्सव​​ मनाया जा रहा है।संसद के बजट सत्र से पहले आहुत इस अंध धर्मराष्ट्रवाद का असली मकसद तो दूसरे चरण के आर्थिक सुधारों के एजंडे को लागू करना है।भारतीय जनता पार्टी एकबार फिर हिंदुत्व के मुद्दे पर केंद्रित होने जा रही है। सत्ता से इतने साल बाहर रहकर पार्टी को यही लगा है कि हिंदुत्व के मुद्दे पर चले बिना उसका बेडा पार लगना दुष्कर है। इसीलिए भाजपा मोदी के विकास व विहिप-आरएसएस के हिंदूवाद के एजेंडे का बेहतर समि्मश्रण तैयार करने में जुटी है। आज महाकुंभ में विश्व हिंदू परिषद की धर्म संसद का दूसरा दिन है। बुधवार के दिन जहां बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने हिंदुत्व के एजेंडे पर लौटने का साफ साफ संकेत दिया, तो आज बारी संघ प्रमुख मोहन भागवत की है। खबर है कि आज का एजेंडा केंद्र सरकार पर हमलावर रुख अख्तियार करने का है। इसके अलावा यहां नरेंद्र मोदी पर भी मंथन की संभावना है। आज सुबह संघ प्रमुख मोहन भागवत महाकुंभ में पहुंच गए। इलाहाबाद में बुधवार के दिन बीजेपी ने राम मंदिर के नाम पर संतों का आशीर्वाद मांगने में बिताया, लंबी चर्चा हुई। राजनाथ सिंह और मोहन भागवत के धर्मसंसद में पहुंचने का एजेंडा अब आइने की तरह साफ है। पहले दिन आशीर्वाद मांगा और आज एजेंडा है हमलावर होने का। कांग्रेस को घेरने के लिए शिंदे के बयान का इस्तेमाल करने का मकसद यही है की कांग्रेस को पूरी तरह से संत-महात्मा विरोधी घोषित किया जा सके।महाकुंभ में इसके अलावा राम मंदिर पर पारित प्रस्ताव धर्मसंसद में रखा जाएगा। वीएचपी का दावा है कि आज खुले सत्र में तकरीबन 10 हजार साधु-संत अपनी राय रखेंगे। गौ हत्या के खिलाफ और गंगा की शुद्धि के लिए प्रस्ताव भी रखा जाएगा। इसके अलावा जो प्रस्ताव बुधवार को पास किए गए उसे भी संत समाज के सामने रखा जाएगा। बुधवार को बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने साफ कर दिया कि 2014 के लिए राम मंदिर अर्से बाद फिर से उनके अहम एजेंडे में है।
इसी बीच,गुजरात में साल 2002 में हुए गुलबर्गा सोसाइटी दंगा केस में सीएम नरेंद्र मोदी को झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने एसआईटी को जकिया जाफरी को दस्तावेज सौंपने का आदेश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एसआईटी की बाकी रिपोर्ट भी जकिया जाफरी को दी जाए। जकिया ने मांग की थी कि निचली अदालत में विरोध अर्जी के लिए उन्हें पूरी रिपोर्ट दी जाए।दस्तावेज मिलने के बाद जकिया निचली अदालत में अपना पक्ष रख पाएंगी। दस्तावेज मिलने के बाद जकिया 8 सप्ताह में निचली अदालत में याचिका दायर कर दलीलें पेश सकती हैं। कोर्ट के इस आदेश को नरेंद्र मोदी के लिए झटका माना जा रहा है। माना जा रहा है कि निचली अदालत में एसआईटी की पूरी रिपोर्ट पेश होने के बाद मोदी के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं।
बतौर नक्सली ब्रांडेड आदिवासी बहुल दंडकारण्य में विकास के लिए सड़के बनाने की घोषणा के साथ स्वास्थ्य सेवा विदेशी एजंसियों के हवाले कर दी गयी है, जिसकी आड़ में सीआईए और मोसाद जैसी खुफिया एजंसियां आंतरिक सुरक्षा सुनिश्चित करेंगी।केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाकों में बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं न उपलब्ध होने पर नाराजगी जताई है। उन्होंने कहा कि राज्यों की ओर से स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराया जाना संवैधानिक दायित्व है, लेकिन विदेशी एजेंसियां स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया करा रही हैं। रमेश ने कहा कि वह इस मसले को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सामने उठाएंगे।रमेश ने पिछले 12 महीने के दौरान हाल ही में बीजापुर जिले का दूसरी बार दौरा किया था। उन्होंने पाया कि स्त्री रोग विशेषज्ञ, बाल रोग विशेषज्ञ या हड्डी के डॉक्टर पूरे जिले में नहीं हैं। रमेश नियमित रूप से इंटीग्रेटेड ऐक्शन प्लान (आईएपी) वाले जिलों का दौरा कर रहे हैं, जिससे वे नक्सल प्रभावित इलाकों में हो रहे काम के बारे में जमीनी हकीकत जान सकें। अब तक वह 82 आईएपी जिलों में से 41 का दौरा कर चुके हैं। मंत्री यह हकीकत जानकर कमोबेश नाराज नजर आए कि ऐसे कठिन इलाकों में रेडक्रॉस और मेडिसिन सैंस फ्रंटियर एमएसएफ नाम की दो विदेशी एजेंसियां स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया करा रही हैं। जिले में स्वास्थ्य सेवा का कोई सरकारी कर्मचारी नहीं है और राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) के तहत मिल रही सेवाएं अपर्याप्त हैं। यहां मलेरिया आपदा की तरह है और संवेदनशील इलाकों में जमीनी हकीक त बहुत बुरी है। बिजनेस स्टैंडर्ड से बातचीत करते हुए रमेश ने कहा, 'हमने पहले ही यह मुद्दा राज्यपाल और मुख्यमंत्री के सामने उठाया है और मैं इसे प्रधानमंत्री के संज्ञान में भी लाऊंगा।'छत्तीसगढ़ सरकार के मुताबिक इन माओवाद प्रभावित इलाकों में सरकार के लिए स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराना चुनौतीपूर्ण काम है, क्योंकि वहां पर स्वास्थ्य कर्मी जाना नहीं चाहते। ऐसे में प्रतिष्ठित एनजीओ यहां स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया करा रहे हैं और स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर वे पूरक का काम कर रहे हैं। इस मसले पर बिजनेस स्टैंडर्ड ने राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह से संपर्क किया तो उन्होंने कहा कि यह मसला पहले ही केंद्रीय गृह मंत्रालय के पास भेजा जा चुका है और अब यह गृह मंत्रालय पर निर्भर करता है कि वह इस मसले पर नीतिगत फैसला करे।
Pravin Togadia
जयपुर साहित्य सम्मेलन में पिछड़ों-दलितों के भ्रष्टाचार पर टिप्पणी कर फंसे साहित्यकार आशीष नंदी को सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी राहत दी है।नंदी ने सौ साल से बंगाल मेंपिछड़ों और अनुसूचितों को सत्ता में भागेदारी न मिलने से वहां भ्रष्टाचार सबसे कम बताया। फर बहस इस बुनियादी मुद्दे पर नहीं हो रही है। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी गिरफ्तारी पर फिलहाल रोक लगा दी है। साथ ही कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार और राजस्थान, महाराष्ट्र, बिहार व छत्तीसगढ़ की राज्य सरकारों को नोटिस जारी कर उनसे जवाब मांगा है। इन राज्यों में आशीष नंदी के खिलाफ मामले दर्ज किए गए हैं।आशीष नंदी ने अदालत से अपने खिलाफ चार शहरों में दर्ज मामलों को खत्म करने की मांग की है। नंदी के खिलाफ जयपुर, जोधपुर, नासिक और पटना में एफआईआर दर्ज कराई गई हैं। नंदी चाहते थे कि उनकी गिरफ्तारी पर फौरन रोक लगाई जाए। सुप्रीम कोर्ट ने नंदी की जल्द सुनवाई की अर्जी पहले ही स्वीकार कर ली। नंदी के वकील अमन लेखी के मुताबिक आप बयान से सहमत या असहमत हो सकते हैं, लेकिन किसी को थाने में नहीं घसीट सकते।कोर्ट ने नंदी को राहत देने के साथ-साथ उनके बयान पर कड़ा ऐतराज भी जताया है। कोर्ट ने कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब ये नहीं है कि आप कुछ भी कह दें। आप की मंशा चाहे जो भी हो आप इस तरह का बयान नहीं दे सकते।मालूम हो कि आशीष नंदी ने पहले ही अपनी सफाई में कहा था कि उनके बयान को तोड़ मरोड़कर पेश किया गया है। वो दरअसल दलितों के हित की बात कर रहे थे, लेकिन उसे दलित विरोधी समझ लिया गया। नंदी के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट की जिन धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है, उसमें उन्हें दस साल तक की सज़ा हो सकती है।
खास गौरतलब है कि आम चुनाव से पहले संप्रग सरकार के आखिरी बजट की तैयारियों में जुटे वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ऐसे कई सुधारों को लेकर चिंतित होंगे जिनके अमल की चाबी राज्यों के पास है। चाहे वह वैट को बदल देश में जीएसटी लागू करने का सवाल हो या फिर मल्टी ब्रांड रिटेल में एफडीआइ या महंगाई को काबू करने वाले मंडी कानून में बदलाव के प्रस्ताव। इन सभी आर्थिक सुधारों पर बिना राज्यों की सहमति के आगे बढ़ना बेमानी है। वित्त मंत्री को अपने बजट में आर्थिक सुधारों का खाका तैयार करते वक्त राज्यों के साथ उलझी इस गुत्थी से जूझना होगा।
मल्टी ब्रांड रिटेल में 51 फीसद प्रत्यक्ष विदेशी निवेश [एफडीआइ] को केंद्र सरकार भले ही मंजूरी दे चुकी है लेकिन देश के कई बड़े राज्य इसे लागू करने के हक में नहीं हैं। सरकार ने इसके विरोध को देखते हुए ही राज्यों को इसे लागू करने या न करने का अधिकार नीति के तहत दिया है। मगर अब यह जाहिर हो गया है कि उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्यों के राजी हुए बिना देश में बड़ी मल्टीब्रांड कंपनियों को लाना संभव नहीं होगा।
इससे भी खराब हालत वस्तु व सेवा कर [जीएसटी] को लेकर है। वैट को बदल सभी अप्रत्यक्ष करों के स्थान पर पूरे देश में जीएसटी को अप्रैल 2010 से लागू होना था। मगर बिक्री कर के मुआवजे के भुगतान से लेकर टैक्स की दरों पर राज्यों से सहमति नहीं बनने की वजह से अभी तक इस पर अमल की स्थिति नहीं बन सकी है। हालांकि, वित्त मंत्री ने नए सिरे से राज्यों के साथ बातचीत शुरू की है और इसके संकेत भी अच्छे दिख रहे हैं। इसके बावजूद अप्रैल 2013 से इसे लागू कर पाने की स्थिति में सरकार नहीं है।
पिछले डेढ़ साल से महंगाई केंद्र सरकार के सामने सबसे बड़ा मुद्दा रही है। आर्थिक विकास की रफ्तार को धीमा करने में महंगाई एक बड़ी वजह रही है। बावजूद इसके केंद्र राज्यों को मंडी कानून में बदलाव के लिए नहीं मना पाया है। इससे खाद्य उत्पादों समेत तमाम आवश्यक वस्तुओं की पूरे देश में एक समान आपूर्ति सुनिश्चित की जा सकेगी। ऐसे सभी मुद्दों पर राज्यों का आरोप है कि केंद्र उनकी सहमति तो चाहता है लेकिन विकास के लिए आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराने में हमेशा राज्यों के साथ भेदभाव बरतता है। चुनावी साल का बजट होने के नाते वित्त मंत्री को इन सब मुद्दों पर ध्यान देना होगा। साथ ही सुधारों पर राज्यों की सहमति के लिए एक संतुलित नजरिया अपनाना होगा।
सरकार ने चालू वित्त वर्ष में देश की आर्थिक वृद्धि दर घटकर 5 फीसदी रह जाने का अनुमान जताया है, जो पिछले एक दशक में सबसे निचला स्तर है। पिछले वित्त वर्ष में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्घि दर 6.2 फीसदी रही थी। विनिर्माण, कृषि और सेवा क्षेत्र के खराब प्रदर्शन के कारण केंद्रीय सांख्यिकी संगठन ने वृद्धि दर का अनुमान वित्त मंत्रालय और भारतीय रिजर्व बैंक के अनुमान से भी कम कर दिया है। मौद्रिक नीति की तिमाही समीक्षा में पिछले महीने रिजर्व बैंक ने 5.5 फीसदी वृद्घि दर का अनुमान लगाया था। मध्यावधि समीक्षा में सरकार ने भी वृद्धि दर 5.7 से 5.9 फीसदी के दायरे में रहने का अनुमान जताया था। पूरे वित्त वर्ष के लिए 5 फीसदी वृद्धि दर का सीधा मतलब है कि चालू वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में आर्थिक वृद्धि और सुस्त हो गई। अप्रैल से दिसंबर 2012 के बीच इसकी रफ्तार 5.4 फीसदी रही थी। यस बैंक के विश्लेषकों ने दूसरी छमाही में 4.6 फीसदी आर्थिक वृद्घि का अनुमान जताया है जबकि रॉयटर्स को वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही में 4.8 फीसदी वृद्घि का अनुमान है। अग्रिम अनुमान में कृषि और इससे जुड़े क्षेत्रों की वृद्धि दर घटाकर 1.3 फीसदी कर दी गई है, जो 2011-12 में 3.6 फीसदी थी। विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि दर भी 1.9 फीसदी रहने का अनुमान है। हालांकि वित्त मंत्रालय ने उम्मीद जताई कि अंतिम आंकड़े शुरुआती अनुमान से बेहतर होंगे। वित्त मंत्रालय ने कहा, 'स्थिति पर हमारी नजर है। अर्थव्यवस्था की स्थिति में सुधार लाने के लिए हमने कई कदम उठाए हैं और आगे भी उठाएंगे।' डेलॉयट इंडिया में अर्थशास्त्री अनीश चक्रवर्ती ने कहा, 'वृद्घि दर का अनुमान घटाया गया है क्योंकि सुधारों के बाद जितने विकास की उम्मीद थी, उतना नहीं दिखा है।'
राजकोषीय स्थिति सुदृढ़ करने का मकसद ध्यान में रखते हुए सरकार शायद 2013-14 के बजट में प्रतिभूति लेनदेन कर (एसटीटी) को हटाने का निर्णय नहीं करेगी। हालांकि शेयर बाजार के विकास के लिए लंबे समय से एसटीटी हटाने की मांग की जा रही है। वित्त मंत्रालय के एक शीर्षस्थ सूत्र ने बताया कि सरकार द्वारा इस बार के बजट में एसटीटी हटाने की गुंजाइश कम ही है। हालांकि उन्होंने कहा कि वित्तीय स्थिति एसटीटी हटाने के अनुकूल नहीं है लेकिन इस बारे में अंतिम निर्णय वित्त मंत्री पी चिदंबरम को करना है। 2013-14 के लिए राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद के 4.8 फीसदी तक रखने की बात कही गई है। लेकिन जीडीपी की नरम विकास दर और अगले वर्ष लोकसभा चुनावों को देखते हुए अतिरिक्त राजस्व के उपाय करने के लिए सरकार के हाथ बंधे हुए हैं। ऐसी स्थिति में 8,000 करोड़ रुपये तक का राजस्व देने वाले एसटीटी को हटाना उचित नहीं होगा। हालांकि अंतरराष्ट्रीय बाजारों की तर्ज पर सरकार ने चालू वित्त वर्ष में नकद डिलिवरी वाले सौदों पर एसटीटी दर 0.125 फीसदी से घटाकर 0.1 फीसदी कर दी है। बाजार में सुस्ती के कारण अप्रैल-दिसंबर के दौरान एसटीटी संग्र्रह पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 12.46 फीसदी घटकर 3,294 करोड़ रुपये रहा। पिछले दो माह से बाजार में तेजी को देखते हुए राजस्व विभाग एसटीटी संग्रह में सुधार की उम्मीद कर रहा है। एसटीटी को पहली बार 2004-05 में लगाया गया था।
दूसरी ओर,केंद्र सरकार के प्रेशर के बाद, 'हेट स्पीच' देने के मामले में विश्व हिंदू परिषद के नेता प्रवीण तोगड़िया पर केस दर्ज कर लिया गया है। तोगड़िया के खिलाफ आईपीसी की धारा 295ए और 505 के तहत महाराष्ट्र में मामला दर्ज हुआ है।तोगड़िया ने भड़काऊ भाषण महाराष्ट्र के नांदेड में एक सभा के दौरान दिया था। तोगड़िया ने यह हेट स्पीच मजलिस-ए-एत्तेहादुल के विधायक अकबरुद्दीन को केंद्र में रख कर दी थी। ओवैसी ने कुछ दिन पहले जो हेट स्पीच दी थी, उसी के जवाब में तोगड़िया ने कई दंगों का बखान करते हुए कहा था, 'एक ने कहा कि पुलिस हटा लो, मैंने कहा 20 साल में जब-जब पुलिस हटी है, तब का देश का इतिहास देख ले।' तोगड़िया ने अपने भाषण से इस आरोप को में पुष्ट करने का काम किया है कि दंगों के दौरान पुलिस निष्क्रिय रहती है।यू-ट्यूब पर तोगड़िया के भाषण का यह विडियो खूब चल रहा है। इसमें तोगड़िया अकबरुद्दीन ओवैसी का नाम लिए बिना उन्हें कुत्ता भी करार दे रहे हैं। ओवैसी ने हैदराबाद के पास निर्मल में पिछले साल भड़काऊ भाषण दिया था।गृह मंत्रालय ने महाराष्ट्र सरकार से कहा था कि वह इस बात की जांच करे कि क्या तोगड़िया पर लगे आरोप सही हैं। अगर आरोप सही पाए जाते हैं तो उन पर मामला दर्ज कर कार्रवाई की जाए। गृह मंत्रालय ने राज्य सरकार को निर्देश दिए थे कि इस बात की जांच करे कि क्या तोगड़िया ने किसी खास समुदाय के खिलाफ हेट स्पीच दी थी।
२०१४ के लोकसभा चुनाव में भाजपा हिंदुत्व और विकास के गठबंधन के सहारे सत्ता में आने की कोशिश करेगी। इसका भी पूरा ध्यान रखा जाएगा कि हिंदू आस्था से जुड़े मुद्दों से पार्टी दूर होती न दिखे। बुधवार को कुंभ नगर में पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का संकल्प दोहराकर व दिल्ली में नरेंद्र मोदी ने विकास का एजेंडा दिखाकर इसका संकेत दे दिया है। विहिप के मार्गदर्शक मंडल की बैठक में साधु संतों ने अयोध्या मंदिर निर्माण का आह्वान किया और इसके लिए प्रस्ताव पारित किया तो राजनाथ ने भी कहा कि भाजपा भी यही चाहती है।नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार प्रोजेक्ट किया जाना अंदरखाने तय है। ऎसे में पार्टी पर गुजरात दंगों को लेकर नरेंद्र मोदी पर लगे सांप्रदायिकता के धब्बों को ढांपने के लिए कवायदें तेज हुई हैं। नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के बीच भारत के बहुसंख्य युवावर्ग को अपने पक्ष में करने की जद्दोजहद शुरू हो चुकी हैं। भाजपा-आरएसएस-विहिप तीनों मिलकर अलग-अलग भाषा में जनता को यकीन दिलाने में लग गए हैं कि राम मंदिर बनाएंगे, विकास की गंगा बहाएंगे और गुजरात दंगों का कहीं जिक्र नहीं आने देंगे। गुजरात राज्य के विधानसभा चुनावों में मिली सफलता को संघ परिवार एक मॉडल की तरह देख रहा है और उसे लगता है कि इसका 2014 के आम चुनाव में लाभ मिल सकता है। हम घटनाक्रम पर नजर डालें तो इसे संयोग नहीं कहा जा सकता कि जिस दिन महाकुंभ में संगम तीरे भाजपाध्यक्ष राजनाथ सिंह संघ परिवार के बीच अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का संकल्प जता रहे थे उसी दिन दिल्ली के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में नरेंद्र मोदी अपने सुशासन और विकास के मॉडल की पैकेजिंग पेश कर रहे थे। ये दोनों घटनाएं भाजपा के अंतर्विरोधों के साथ उसकी भावी रणनीति का हिस्सा हैं।
यह सभी जानते हैं कि एक समय भाजपा को हिंदुत्व के मुद्दे ने ही सत्ता नसीब करवाई थी लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री तभी बने जब पार्टी ने राम मंदिर निर्माण,समान आचार संहिता लागू करने और कश्मीर में अनुच्छेद-370 की समाçप्त जैसे अहम मुद्दों को दरकिनार रखा। अब देखने वाली बात ये भी है कि पिछले 25-30 साल में भारत आगे निकल चुका है। आज करीब 50 फीसदी मतदाता युवा हैं,उद्यमशील लोग मंदिर-मस्जिद के फेर में नहीं पडने वाले हैं। युवाओं को हिंदुत्व जैसे भावनात्मक मुद्दे के बजाय विकास के सपने दिखाकर लुभाया जा सकता है।
विडियो में तोगड़िया कह रहे हैं, 'मु्स्लिम वोट बैंक के आधार पर देश में लूट मची है। तभी तो कुत्ता अपने आप को शेर समझने लगता है। एक हैदराबाद में कुत्ता है, वह अपने आप को शेर समझने लगा। एक ने कहा, पुलिस हटा लो, मैंने कहा 20 साल में जब-जब पुलिस हटी है, तब का देश का इतिहास देख ले। अगर तुझे पता नहीं है, तो आईने में इतिहास दिखा दूं।' वीएचपी नेता ने पिछले 20-25 सालों में हुए दंगों का हवाला देते हुए कहा कि हमें चुनौती न दें।
तोगड़िया ने आगे कहा, 'एक बार असम में पुलिस हट गई। उस स्थान का नाम है नेड़ी। अरे मेरे भाइयो, फिर क्या हुआ… लाशों का ढेर लग गया था… गिनी तो 3 हजार लाशें गई थीं… उनमें हिंदू की लाश एक भी नहीं थी.. अरे मेरे भाइयो ऐसा 20 साल पहले बिहार के भागलपुर में हुआ… फिर तो क्या हुआ… भागलपुर के नजदीक गंगा बहती है… गंगा में लाशें ही लाशें दिखाई देने लगीं… गिन नहीं पाए.. सागर तक बह गईं। उनमें एक भी लाश हिंदू की नहीं थी।'
तोगड़िया यहीं नहीं रुके। उन्होंने गुजरात दंगों का जिक्र करते हुए कहा, 'ऐसा ही यूपी के मेरठ, मुरादाबाद में हुआ… अरे गुजरात में पुलिस खड़ी थी, देखो क्या हुआ। इसलिए पुलिस को हटा दो कहने वाले सपने भूल जाओ।'
तोगड़िया ने आक्रामक शैली में दंगों का जिक्र करते हुए कहा, 'जिनके पुरखों की रक्त शिराओं में शौर्य का लहू बह रहा था, उनके ही वंशज आज हिन्दू के नाते खड़े हैं। जो कायर थे, डरपोक थे, वे ही हमारे धर्म में नहीं हैं। जिनको हल्दी घाटी खेलना था, जिनको सरहिंद के किले की दीवार में गुरु गोविंद सिंह का पुत्र बनकर मरना था, जिनको पानीपत का मैदान अपने रक्त से भरना था, उनके वंशज आज हिन्दू के नाते धरती पर जिंदा हैं। कायर हमारा साथ छोड़कर चले गए। तुम क्या हमें चुनौती दोगे। हिन्दू धर्म कोई कायरों का धर्म नहीं है, वह अपने हाथ में तलवार धारण करने वाली मां भवानी का धर्म है।'
(एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास। स्‍वतंत्र पत्रकार। इतिहास और सामाजिक आंदोलनों में रुचि। ब्‍लॉग लिखते हैं और मुंबई में रहते हैं। उनसे xcalliber_steve_biswas@yahoo.co.in पर संपर्क किया जा सकता है।)


Pain of a celebrity being an Indian Muslim



My Name is Khan and…
Pain of a celebrity being an Indian Muslim
 
Ram Puniyani
 
Shah Rukh Khan is no ordinary celebrity. Being the lead actor with a very vibrant presence on big and small screen makes him to be very much on the top. Recently the communal elements asked him to produce his patriotism certificate. Khan in one of his articles in The New York Times-Outlook Turning Points ((January 2013) suggested that India has a bias against Muslims and goes on to say that "Political leaders have made me a symbol of all that they think is wrong and unpatriotic about Muslims in India." He also writes "There have been occasions when I have been accused of bearing allegiance to our neighboring country-this even though I am an Indian, whose father fought for freedom of India. Rallies have been held where leaders have exhorted me to leave and return (to Pakistan) when they refer to my original home land."
 
In response to this the Pakistan foreign minister Rahman Malik was quick to ask the Indian Government to provide security to Khan. Hafiz Sayeed went to the extent of inviting Khan to Pakistan with a promise to provide him with security. Both these are sort of pinpricks which are usually dished out by the neighbors to each other. When Hindu minorities suffer in Pakistan the immediate chorus comes up here in India is to ask to take steps for security of Hindus in Pakistan. Malik and Sayeed were just trying to put some salt in to the wounds of Indian psyche, not that they are concerned about Indian Muslims as such. They belong to a country where large section of Muslims themselves is struggling to live the life of dignity. A section of Muslims is being called Mohajirs and is denied most of the privileges of citizens. In Pakistan currently the Shia Muslims and Ahmadiyas are an object of wrath. So lesser said about Rahman Malik and Hafiz Sayeed Company the better.
 
The criticism directed against Khan was that he is giving ammunition to the elements across the border to criticize India. But can we keep the wounds of Indian Muslims under wraps, with no smell polluting the air? As far as Khan's statement that there are biases against Indian Muslims is concerned, it is a painful reality. Muslims have been demonized; the strong streak of Islamophobia persists all over. The myths, stereotypes and biases against Indian Muslims were heightened with the partition tragedy, when the communal forces propagated that it is due to Muslims that India had to be partitioned. This is a total misreading of recent history as majority of Indian Muslims neither supported the idea of Partition nor were behind the Muslims League. Muslim League cut a sorry figure in 1937 assembly elections as majority of Indian Muslims did not vote for Jinnah party. And after the Jinnah's resolution demanding Paksitan in 1940, majority of Indian Muslims took out processions opposing the demand of Pakistan.
The other biases against Muslim community started intensifying through the propaganda by the communal forces, the biases about the Muslims related to the atrocities committed by Muslim kings, the biases related to polygamy, number of children, beef eating and their loyalty to Pakistan. The parallel process of communal violence started marginalizing them from social scene, the violence against them (Muslims are 13.4% as per 2001 census; Muslims are close to 90% amongst the riot victims). These stereotypes against Muslims are currently at peak and hatred resulting from these biases is leading to repeated communal violence and polarization.
 
While the average Muslim has been living with these biases pasted on his/her forehead, after 9/11, 'All terrorists are Muslims' has also been popularized through various mechanisms, section of media, words of mouth, SMS chains through mobile phones and the social media. While in the regular channels Muslims are too few, in the offbeat channels of social life, they do excel as in sports, music and films. At the same time the Muslims, who by mistake reach the top slots in position of authority have to be more careful for obvious reasons. Here the communal parties and outfits pick up some pro-Pakistan label against Muslim celebrities. Dilip Kumar, Yusuf Khan, was initially given the same abuse of being for Pakistan and he had to face lot of music when he was awarded the highest civilian honor by the government of Pakistan, Nishan-e-Pakistan. Lot of demonstrations was held in front of his house by these outfits to humiliate him. That may be one of the reasons for him not being awarded the highest civilian honor, which he deserves many times over. Mohammad Azaruddin, the outstanding cricketing talent and ex-Indian cricket Captain was mocked that he plays poorly when playing against Pakistan, to enable Pakistan to win!.
 
Shah Rukh Khan is another such celebrity. He had to face the double flak. Being a Khan, twice he was detained and stripped at the US entry points. Interestingly when he was detained many of his fans were approaching him for his autographs right there. In India the Shiv Sena, claiming to be a patriotic organization, holding on to Hindu Nationalism not Indian nationalism, has meted similar treatment to Shah Rukh Khan. Khan is from Peshawar and it is an enlightening point to know that his father was the follower of Khan Abdul Gaffer Khan, Frontier Gandhi, and participated in freedom struggle.
 
Shah Rukh Khan knows he is too secure; he is not talking as a victim, it is not from the angle of victimhood. He is expressing the anguish of being a Muslim at a time when in India the anti Muslim sentiments are at a peak and these get a boost from global Islamophobia created by American propaganda. Imagine the pain of an Indian when he is looked down to be owing allegiance to the neighboring country? Only those seeped in the values of Indian freedom struggle and those respecting the values of Indian Constitution can feel the anguish of Shah Rukh Khan and many more Muslims, celebrity or not, who have to keep producing loyalty and patriotism certicates time and over again, and that too to those belonging to the politics based on the ideology, which was not a part of freedom movement and has little respect for values of Indian Constitution.
 
In popular psyche the identification of Indian Muslims with Pakistan has been cultivated with vehemence by communal forces. Muslims are more loyal to Pakistan is a standard propaganda. How can we judge patriotism of an individual? By cheering for the cricket teams or by allegiance to Indian Constitution? The matter of fact is that some disgruntled Muslims may be showing their anguish by cheering for Pakistan, in cricket matches, but that's where the matters rest. A lot has been made of this deliberately and this falsehood has become part of social common sense. Shah Rukh Khan has been made a deliberate target by the communal forces and it is a part of their game of manufacturing biases against Muslim community as a whole. His expression in the said article is expression of what many Muslims suffer in India, celebrities included.


Police officers run human trafficking cartel



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FOR IMMEDIATE RELEASE
 AHRC-STM-036-2013
February 7, 2013

 A Statement from the Asian Human Rights Commission

INDIA: Police officers run human trafficking cartel

28 police officers from the Kerala State police are accused of
running a human trafficking cartel in the state. This felonious
syndicate run by police officers is linked with international
criminal cartels that supply women, children, and men. It is
estimated that about 300 victims have been trafficked out of
India by this criminal gang.
 
Officers directly linked with human trafficking belong to all
ranks, like Superintendent of Police, Deputy Superintendents,
Circle Inspectors, Sub Inspectors and constables. This gang
has been in operation for at least the past six years and many
among them were stationed at the Kochi International Airport,
exclusively responsible for immigration clearance of travellers.

The Asian Human Rights Commission (AHRC) has consistently opined
that the single largest impediment to internal security in India is the
country's police unless drastic measures are taken to refine the police.
The above incident is the latest proof to AHRC's assertion, in the form
of confession of one of the police officers charged with the offence,
Mr. A. P. Ajeeb.

The Kerala state police have been adamant so far that it must be the
agency entrusted with the responsibility of immigration control at the
Kochi International Airport. This important airport in India, is one
of the exceptional places where the state police runs the immigration
processes. In most other international terminals in India, the Central
Intelligence Bureau (IB) operates the immigration wing. Police
officers accused of criminal activities in the international terminal
at Kochi airport is not a new phenomenon.

For instance, there have been cases in the past where police
officers stationed in immigration counters at Kochi are
accused of allowing persons to enter or exit the country
without recording it in their travel documents.
 
On each such occasion, even if the matter was reported in the local
media, it would soon be internally hushed up and nothing heard
any further. Not surprisingly, Deputy Superintendent of Police,
Mr. N. V. Somarajan, who investigated the human trafficking case
initially, is also part of the criminal syndicate. This too is revealed
in Ajeeb's confession.

This case has all the footprints of the decayed policing system
in India. It is a practice in India for the police officers to be
entrusted with jobs that they are not expected, equipped, or trained
to do. One may argue that the police in India is neither equipped nor
trained to undertake law-enforcement as required in a fast developing
democracy. In fact, such performance is not expected of the police,
since the national policing policy, is to forcefully impart the writ
of those in power, for which the police is encouraged to use brute
force with impunity.

For this, rules are negated, even at the risk of national security,
just as it is reported in the Kochi incident. It is nothing less
than a sign of anarchy in governance and polices, that today,
police is the least accountable and its policies absolutely
non-transparent in the country.

An additional symptom of the anarchy is in the practice of the police
investigating allegations against the police. With what figment of
trust could Indians expect their police, notorious for committing
crimes, to be honest and professional in investigating crimes
alleged against them? The very concept lacks both honesty and
is unprofessional. It is just that both the police and the government
fail to admit it. The statement by one of the linchpin in the human
trafficking network that operated in Kerala affirms this assumption.

That be so, the additional question that is to be asked is why did then
the government, and the then Director General of Police allow the
case to be investigated by a relatively low-ranking officer, a Deputy
Superintendent of Police? What prevented the state government from
requesting for assistance from the central government or of its
agencies to undertake an investigation? On the other hand, is it so
that both the governments as well as the police are complicit in
allowing the police to get away with crimes they commit? The logical
answer to these questions should be nothing less than an emphatic yes.

The Kochi human trafficking incident brings forth the following
questions:

(i) Persons of questionable backgrounds, unsafe to be entering or
leaving India could have passed through the Kochi International
Airport with the knowledge of police officers who were stationed
at the airport, with no other mandate, but to prevent it. The state
government, its police or the central government have no means
to know who these people are and when and where they have went,
irrespective of whether they travelled into the country or out of it;

(ii) There is no way to trace the victims of human trafficking, since
many must have left on fake documents. So far, the government has
not attempted to trace the victims. The government is extremely
handicapped in this since it has no trustworthy records to depend upon
to trace the victims' identities internally, nor can the government
request any foreign governments for information since it does not know
who came from where and went where;

(iii) The investigations so far have revealed huge sums of money
being transferred between accounts of private individuals, police
officers of various ranks, and their relatives. Will the government be
able to recover this money from the officers? So far, there has been
no attempt in this direction;

(iv) Above all, what immediate action has the government done, now
that such a serious crime has been unearthed? Would there be actions
taken by the government to bring accountability in police actions?;

(v) Are the officers named, their actions specified in the confession
statement placed on suspension?

Unfortunately, in India none of this is possible. This is why it is
justified in saying that law enforcement in India is nothing more than
uniformed anarchy. No state or its people will be secure with such a
police force. India is no exception.

 Read this statement online
<http://www.humanrights.asia/news/ahrc-news/AHRC-STM-036-2013>
 # # #

About AHRC: The Asian Human Rights Commission is a regional
non-governmental organisation that monitors human rights in Asia,
documents violations and advocates for justice and institutional
reform to ensure the protection and promotion of these rights. The
Hong Kong-based group was founded in 1984.

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सारी चिंता बंगाल को अखंड बनाये रखने की! धर्म राष्ट्रवाद से क्षेत्रीय अस्मिता प्रबल हुईं!


सारी चिंता बंगाल को अखंड बनाये रखने की! धर्म राष्ट्रवाद से क्षेत्रीय अस्मिता प्रबल हुईं!

पलाश विश्वास


दार्जीलिङ पहाडमा लेप्चा बिकाश परिषद आखिरमा ममता सरकारले गठन गर्ने निर्णयमा सिलमोहर लगाएको छ।दिर्घ दिनदेखि लेप्चा जातिको भाषा, संस्कृति आदिको बिकासको निम्ति लेप्चा बिकास परिषद गठन गर्ने माग गर्दै।

आमरा बंगाली का कहना है :गोरखालैंड का मांग करने वाले रोशन गिरी और विमल गुरूंग का मन बढ़ाने में पिछली और वर्तमान सरकार, दोनों जिम्मेदार है।1977 में वाम को सत्ता मिलते ही विधान सभा में उनके स्वायत्त शासन का मांग करने लगी। 1950 में भारत -नेपाल समझौते के अनुसार नेपालियों को व्यवसाय का अधिकार है, लेकिन नागरिकता का नहीं.हमने उच्च न्यायलय में जीटीए को असंवैधानिक बताकर मामला दर्ज किया। यह कहना है आमरा बांगाली के जिला सचिव बासुदेव साहा का।वें शुक्रवार को पत्रकारों को संबोधित कर रहें थे। बासुदेव साहा ने कहा कि 10 फरवरी को मोरचा रक्त रंजित आंदोलन पर उतरेगी। हम भी उसका जवाब देंगे.लेकिन गणतांत्रिक तरीके से। बंगाल का विभाजन के हम कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे। उन्होंने आगे बताया कि जिस तरह लेप्चा और बुद्धिस्ट के लिए उन्नयन परिषद का गठन किया गया। उसी तरह गोरखाओं का भी उन्नयन परिषद बनाकार मामला निपटारा करना चाहिए था।


हिमालयी क्षेत्र के बारे में समाजशास्त्री और अर्थशास्त्री टिप्पणी करने से बचते हैं। वहां सत्ता में भागेदारी और विकास के यथार्थ के बारे में किसी आशीष नंदी की बवंडरी टिप्पणी का अभी इंतजार है। सिविल सोसाइटी के नजरिये से पूर्वोत्तर और कश्मीर तो इस देश के भूगोल से बाहर के जनपद​​ हैं। प्रगतिशील बांग्ला मीडिया और सुशील समाज अखंड बंगाल के नारे के साथ गोरखालैड आंदोलन का मूल्यांकन करता रहता है। सारी चिंता बंगाल को अखंड बनाये रखने की है, लेकिन जो लोग आंदलन करके पृथक राज्य की मांग कर रहे हैं, उनकी शिकायतों और तकलीफों पर गौर ​​करने की जरुरत कतई नहीं समझी जाती। वैसे अखंड बंगाल का दावा तो ऐतिहासिक तौर पर गलत हो गया। प्रेसीडेंसी जोन के अंतर्गत उत्तर बारत के बड़े इलाके भी बंगाल के अंतर्गत थे।लार्ड कर्जवन ने ही बंगाल से असम को अलग किया। पूर्वी बंगाल और पश्चिमी बंगाल का एकीकरण हुआ  बंगभंग विरोधी आंदोलन की वजह से। लेकिन असम तो अलग हो ही गया।१९४७ को बंगाल में बहुजन स्ता की संभावना को खारिज करने के लिए जो लोग बंग भंग का विरोध कर रहे थे, उन्हीं लोगों की पहल पर बंगाल और भारत का विभाजन हो गया। बंगाल की बात छोड़ें तो राज्यों का पुनर्गठन कोई नयी बात नहीं है। गुजरात अलग राज्य बना तो पंजाब और हरियाणा का विभाजन हुआ। पंजाब से अलग हो गया हिमाचल तो उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्यप्रदेस का भी विभाजन हो गया। भविष्य में महाराष्ट्र और आंध्र के भी विभाजन की तैयारी है। गोरखालैंड कोई असंभव मांग नहीं है भारतीय गणतंत्र​ में। जो लोग अलग राज्य की मांग कर रहे हैं, वे हमेशा राजनीति करते होंगे और बाकी राज्यों के विभाजन के वक्त भी ऐसा होता रहा है। लेकिन​​ आंदोलन से राजनीतिक तरीके से निपटने के खेल में राजनीति इतनी प्रबल हो जाती हैं कि बुनियादी समस्याएं जस की तस रह जाती है। हम लोग बचपन से उत्तराखंड में देखते रहे हैं कि कुमायूं और गढ़वाल के बिभाजित समाज जीवन को आधार बनाकर कैसे कैसे इस विभाजन को​​ अलंघ्य बनाकर बुनियादी मुद्दों की लगातार उपेक्षा करते हुए बाहरी लोग राज करते रहे हैं। अलग राज्य बन जाने के बाद भी यह राजनीति बदस्तूर जारी है।यह भी समझने की बात है कि धर्म राष्ट्रवाद से इन समस्याओं के  समाधान करने की हर कोशिश से क्षेत्रीय अस्मिता प्रबल हुई हैं।

कुमायूंनी गढ़वाली राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई के मध्य पूरा उत्तराखंड भूमाफिया  उत्तराखंड पर राज कर रहा है।कुमायूं गढ़वाल के विभाजन की लाइन पर गोरखालैंड आंदोलन का समाधान कर देने का दावा करने वाली बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने गोरखा विकास परिषद के ​​मुकाबले लेप्चा विकास परिषद की घोषणा कर दी है। अब अगर इसे गोरखा आंदोलनकारी गोरखा ौर ल्प्चा समुदायों में विभाजन कराने का खेल बता रहे हैं, तो गलत नहीं बता रहे हैं। जनता की तकलीफें दूर करने के बदले राजनीतिक भष्मासुर पैदा करने का खेल ही सर्वत्र होता रहता है।​

जीजेएम प्रमुख विमल गुरूंग के गोरखालैण्ड के लिए उग्र आंदोलन शुरू करने की धमकी देने के एक दिन बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एकीकृत बंगाल का आह्वान किया और गुरूंग के उन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें उन्होंने कहा था कि मुख्यमंत्री पर्वतीय प्रदेश में 'बांटो और राज करो' की नीति पर चल रही हैं।दार्जिलिंग जिला तृणमूल कांग्रेस के सदस्यों की बैठक के बाद ममता बनर्जी ने संवाददाताओं से कहा, 'सरकार का रुख पूरी तरह से स्पष्ट है। हम राज्य को एकजुट रखने के लिए काम कर रहे हैं। हम एकीकृत बंगाल के पक्ष में हैं।' लेप्चा और बौद्ध के लिए अलग विकास परिषद के गठन के मुख्यमंत्री के प्रस्ताव पर गुरुंग द्वारा मुख्यमंत्री पर पर्वतीय क्षेत्र में बांटो और राज करो की नीति को आगे बढ़ाने के गुरूंग के आरोपों पर उन्होंने कहा, 'हम दार्जिलिंग का सम्पूर्ण विकास चाहते हैं। हम बांटो और राज करो के आधार पर काम नहीं करते। हम मानते हैं कि जीजेएम इस हद तक नहीं जायेगी।'गुरूंग के उग्र आंदोलन छेड़ने की धमकी को कमतर बताते हुए उन्होंने कहा, 'हम देखेंगे कि यह कब होता है। हमने संविधान के तहत राज्य की बागडोर अपने हाथों में ली। उन्होंने (जीजेएम) ने भी संविधान के अनुरूप जीटीए की शपथ ली। यह जवाबदेही की भावना है।'



गोरखालैंड के मसले पर 2008 से कुल चार दौर की बातचीत हो चुकी है, पर गतिरोध जस का तस है। दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल पंगु बनी हुई है।इलाक़े को छठीं अनुसूची में शामिल करने की पहल विमल गुरुंग ने बहुत पहले ही ठुकरा दी और गोरखालैंड राज्य बनाने पर अड़े हुए हैं।गोरखा जनमुक्ति मोर्चा द्वारा 'स्वशासन' शुरू करने की घोषणा के साथ ही दार्जिलिंग की शांत पहाड़ियों में उबाल आ गया है।तेलंगाना राज्य के लिए केंद्र सरकार और आंध्र प्रदेश के क्षेत्रीय नेताओं के बीच चल रही रस्साकशी के बीच गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) ने पश्चिम बंगाल से अलग गोरखालैंड राज्य की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर मंतर पर प्रदर्शन कर रहे हैं।प्रदर्शन में पश्चिम बंगाल विधानसभा के तीन जीजेएम सदस्यों के अलावा संगठन की महिला, छात्र व युवा इकाइयों के सदस्य भी शामिल हैं।



दार्जीलिङ पहाडमा लेप्चा बिकाश परिषद आखिरमा ममता सरकारले गठन गर्ने निर्णयमा सिलमोहर लगाएको छ।दिर्घ दिनदेखि लेप्चा जातिको भाषा, संस्कृति आदिको बिकासको निम्ति लेप्चा बिकास परिषद गठन गर्ने माग गर्दै

।लेप्चा परिषद गठन से तिलमिलाए गोजमुमो ने सरकार के निर्णय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने की चेतावनी दी है। परिषद गठन के विरोध में शनिवार को हिल्स बंद की घोषणा की भी। गोजमुमो प्रमुख ने जीटीए के प्रधान सचिव डॉ. सौमित्र मोहन को हटाने की घोषणा की। वहीं, कोलकाता में अभागोली के अध्यक्ष भारती तमांग ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मुलाकात की।भानुभक्त भवन में गोजमुमो प्रमुख ने संवाददाताओं को बताया कि जीटीए गठन के बाद लेप्चा परिषद का गठन सरकार का षडयंत्र है। सरकार के आदेश के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय जाएंगे।षडयंत्र में जीटीए सचिव व दार्जिलिंग डीएम की संलिप्तता की वजह से उन्हें जीटीए प्रधान सचिव के पद से हटाया गया है। जीटीए प्रधान सचिव का दायित्व डॉन बॉस्को लेप्चा को सौंपा गया। बैठक में जीटीए उप प्रमुख सेवानिवृत्त कर्नल रमेश आले व जीटीए सदस्य विनय तमांग भी उपस्थित थे। विनय तमांग ने राज्य सरकार के जीटीए में हस्तक्षेप के विरोध में शनिवार को 12 घंटे हिल्स बंद का एलान किया। उन्होंने कहा कि अलोकतांत्रिक हस्तक्षेप को सहन नहीं किया जाएगा। जीटीए समझौते का मुख्यमंत्री खुलेआम उल्लंघन कर रही है।उधर, अभागोली के अध्यक्ष भारती तमांग ने कहा कि अपने पति मदन तमांग की हत्या की जांच के सिलसिले में वे मुख्यमंत्री से मिली। इस मुलाकात को हिल्स की वर्तमान राजनीति से जोड़ा नहीं जाना चाहिए।

जीटीए प्रधान सचिव सह जिलाधिकारी डॉ. सौमित्र मोहन को गोजमुमो समर्थकों ने लालकोठी स्थित कार्यालय में घुसने से गुरुवार को रोक दिया। जीटीए में कार्यरत अस्थाई कर्मचारी अपनी सेवा नियमित करने की मांग पर अड़े थे।गोजमुमो के एक प्रवक्ता ने कहा कि जबतक हमारी मांगे पूरी नहीं की जाती प्रधान सचिव को कार्यालय घुसने नहीं दिया जाएगा। आरोप लगाया कि प्रधान सचिव जीटीए को दरकिनार कर काम कर रहे हैं। प्रधान सचिव की प्रतिक्रिया नहीं ली जा सकी। गोजमुमो ने बुधवार को ही नौ फरबरी के दिन हिल्स में 12 घंटे बंद का आह्वान किया था। लेप्चा परिषद के गठन के बाद गोजमुमो ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। विमल गुरुंग मुख्यमंत्री पर जीटीए में दखलअंदाजी का आरोप लगा चुके हैं। जीटीए में विभाग हस्तांतरण को लेकर भी गुरुंग नाराजगी जता चुके हैं।विवाद की शुरुआत उत्तर बंग उत्सव के दौरान गोजमुमो कार्यकर्ताओं द्वारा नारेबाजी व प्रदर्शन से हुई थी। मुख्यमंत्री ने सभा के दौरान ही कहा था इस मामले में मैं सख्त हूं।



अकाली आंदोलन से निपटने के लिए श्रीमती इंदिरा गांधी ने जरनैल सिंह भिंडरावालां को खड़ा किया, उसका क्या नतीजा हुआ, इतिहास ​​सामने है। सिखों को न सिर्फ आपरेशन ब्लू स्टार का सामना करना पड़ा, बल्कि सिखों का नरसंहार भी हुआ, जिसका आज तक न्याय नहीं​​ हुआ।इस्लामी राष्ट्र पर नियंत्रण के लिए सुपर पावर अमेरिका ने तालिबान और अल कायदा को खड़ा किया, इसका क्या नतीजा हुआ, ​​आतंकवाद के विरुद्ध अमेरिका के युद्ध में शामिल हर भारतीय को इसका अंदाज हो, तो इतिहास की पुनरावृत्ति की नौबत नहीं आती। जनता को इतिहास कितना मालूम है, यह जानने का कोई तरीका  नहीं है।पर सत्ता में बैठे लोगों का इतिहास बोध निःसन्देह संदिग्ध है। बंगाल के पहाड़ी ​​इलाके और उत्तराखंड के पहाड़ी इलाके नेपाल के अधीन थे, यह इतिहास बताता है। सिक्किम और भूटान तक पर नेपाल का आधिपात्य था। यह ऐतिहासिक सच है। इसे झुठलाकर गोरखा जनसमुदाय की अस्मिताकी लड़ाई को लेप्चा परिषद जैसे हास्यास्पद हथकंडे से सुलझाने की ​​कोशिश इतिहास के पुनरूत्थान की स्थितियां ही पैदा कर सकती हैं।हमें मालूम है कि उत्तराखंड आंदोलन के दमन से क्या हालात पैदा हुए थे। तेलंगाना का वर्तमान सामने है। पंजाब और हरियणामका विवाद अभी धुंधला हुआ ही नहीं है। लेकिन झारखंड, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ के निर्माण को लेकर वैसी अप्रिय स्थितियां नहीं बनी, यह भी सच है। गोरखालैंड में आज जो हो रहा है, वैसी ही स्थितियां उत्तराखंड में भी तेजी से बन रही थी। यह अलग सवाल है कि अलग राज्य बन जाने से ही जनता की समस्याओं का समादान नहीं हो जाता।

कम से कम झारखंड और छत्तीसगढ़ के आदिवासीबहुल इलाकों में इसे साबित करने की कोई जरुरत नहीं है,जहां से देश का नक्सली और माओवादी भूगोल की शुरुआत होती है। असम के कितने ही टुकड़े हो गये, पर पूर्वोत्तर में न विकास हुआ और जनता को सत्ता में समता और सामाजिक न्याय के सिद्धेांतो की बुनियाद सही हिस्सा मिला। नतीजा सामने है। पूरा उत्तरपूर्व अशांत है, सशस्त्र बल विशेष कानून के अंतर्गत है।​
​​

​यह भी समझने की बात है कि धर्म राष्ट्रवाद से इन समस्याओं के  समाधान करने की हर कोशिश से क्षेत्रीय अस्मिता प्रबल हुई है। तमिलनाडु का विभाजन तो नहीं हुआ। तमिल अस्मित भी अटूट अभेद्य है। पर बाकी देश से तमिलनाडु का अलगाव अगर हमारी नजर में नहीं है, तो हम अपने देश क समजते ही नहीं है। धर्म राष्ट्रवाद को हवा देने की वजह से ही पूरा का पूरा अस्सी का दशक रक्त रंजित हो गया। असम और त्रिपुरा से लेकर पंजाब समेत समूचे उत्तर भारत और यहां तक कि परदेस श्रीलंका तक हमारे अपनों के खून की नदियां बहती रहती हैं। गुजरात नरसंहार और असम के दंगे हमारे सामने ज्वलंत सच हैं । धर्म राष्ट्रवाद से अंध हम कश्मीर हो या मणिपुर या फिर दंडकारण्य मूलनिवासी भूगोल की कथा व्यथा समझते ही नहीं हैं और नतीजतन राजनीति को सलवा जुड़ुम जैसा खतरनाक खेल खेलते रहने की छूट मिलती है। आंतरिक सुरक्षा के बहाने राष्ट्र लोकतांत्रिक व्यवस्था के बदले एक युद्धरत सैन्य प्रणाली में तब्दील हो जाता है। अपनी ही जनता के विरुद्ध युद्धरत। विकास के बहाने, जनकल्याण की फर्जी योजनाओं के बहाने सीआईए और मोसाद तक को आंतरिक सुरक्षा का कार्यभार सौंप दिया जाता है। अभी सड़कें बनाय़ी जांयेंगी आदिवासी भूगोल में। किसलिए? नहीं, आदिवासियों के हित में नहीं, उन्हें माओवादी नक्सलवादी गोषित करके उनके दमन के लिए। उनकी चिकित्सा का जिम्मा भी विदेशी एजंसियों के हवाले है। आशीष नंदी के बयान पर विवाद को लेकर यह धर्मराष्ट्रवाद वाक् स्वतंत्रता की बात तो करता है पर समता और सामजिक न्याय के यथार्थ की पड़ताल नहीं करता। बंगाल में जब पिछड़ों और  अनुसूचितों को पिचले सौ सालों में सत्ता में हिस्सेदारी नहीं मिली, तो गोरखा और और लेप्चा जैसी पर्वतीय जनगोष्छियों की जो अनुसूचित जातियां भी हैं,के साथ क्या सलूक हुआ होगा, अल्लाह ही जानें!

वामपंथियों ने लंहबे अरसे तक राज्य में ओबीसी के अस्तित्व से ही इंकार किया। हालत यह है कि आशीष नंदी को पहले कायस्थ या बैद्य बताया जा रहा था। बाद में जब ओबीसी की गिनती की मांग जोर पकड़ने लगा है और जनसंख्यावर विकास और सत्ता में हिस्सेदारी की पड़ताल के लिए सच्चर कमीशन की तर्ज पर न्यायिक आयोग की मांग लेकर पिछड़े और अनुसूचित बंगालभर में सड़क पर उतरने लगे हैं तो अचानक सबसे बड़े बांगाला अखबार ने बाकायदा संपादकीय आलेख लिखकर यह पर्दाफास किया कि आशीष नंदी तो तेली, नवसाख हैं​। यानी ओबीसी। नवसाख बंगाल ​​में बौद्धमत से जबरन धर्मांतरित समुदाय को भी कहा जाता है जो शूद्र या अशूद्र है। हमें पहली बार पता चला कि प्रीतीश नंदी और आशीष ​​नंदी का पुश्तैनी पेशा शंखकार की है। वैसे ओबीसी मुसलमानों को दस प्रतिशत और पहले से बुद्धदेव घोषित सात फीसद ओबीसी आरक्षण के बावजूद, मंडल कमीशन घोषित १७७ ओबीसी जातियों में से ६४ को सरकारी मान्यता मिल जाने के बावजूद बंगाल में ओबीसी बतौर कोई आरक्षण​​ नहीं मिलता। कृपया वर्चस्ववादी इस शासकीय आधिपात्य के आलोक में गोरखालैंड की समस्या का अवलोकन करें और फिर समझे अलग लेप्चा परिषद बनाये जाने का आशय क्या है।

'गोरखालैंड पर समझौते से बढ़ेगी समस्याएं'

पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य ने राज्य की मौजूदा सरकार को दार्जीलिंग के मुद्दे पर आड़े हाथों लेते हुए कहा कि वह इस मुद्दे को गलत तरीके से निपटा रही है, जिसके कारण गम्भीर समस्याएं पैदा होंगी।

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) की पोलित ब्यूरो के सदस्य बुद्धदेब ने मंगलवार को एक बांग्ला समाचार चैनल के साथ बातचीत में कहा कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पश्चिम बंगाल सरकार ने गोरखा जनमुक्ति मोर्चा द्वारा अपनी मांगें नहीं छोड़ने के बावजूद गोरखालैंड प्रादेशिक प्रशासन (जीटीए) समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए, जो गलत है। इससे राज्य के लिए समस्याएं पैदा होंगी।

बुद्धदेब ने कहा कि गोरखालैंड के मुद्दे के साथ समझौता कर जीजेएम के साथ राज्य सरकार द्वारा बातचीत करना अनुचित है। अंतिम मसौदे में इसका जिक्र है कि समझौते पर हस्ताक्षर जीजेएम द्वारा गोरखालैंड की मांग छोड़े जाने के बगैर किया जा रहा है। यह भारी भूल है।

कालिम्पोंग:लेप्चा विकास परिषद की मंजूरी मिलते ही यहां बुधवार को दीवाली का आलम दिखा। लेप्चाओं ने जमकर आतिशबाजी की और सीएम ममता बनर्जी को धन्यवाद दिया। देरतक समुदाय के लोग सड़क पर जमे रहे। वहीं, लेप्चा राईट्स मूवमेंट के मुख्य संयोजक व इल्टा के संयुक्त सचिव एनटी लेप्चा ने कहा इसका अर्थ यह नहीं कि हम गोरखालैंड के विरोधी हैं। हिल्स के हित में अलग राज्य गठन हो। परिषद हमारी राजनीतिक मांग नहीं है, और न हीं सीमांकन का मामला समुदाय ने उठाया है। उन्होंने बताया कि बंगाल के लेप्चाओं के विकास के लिए ही हमने परिषद मांगा था, ताकि समुदाय का विकास हो सके। यह समुदाय की पुरानी मांग थी जो मुख्यमंत्री ने पूरा कर दिया। इससे समुदाय का विकास हो सकेगा। हमने कभी समुदाय के लिए अलग राज्य की मांग नहीं की है। पहले बातचीत के दौरान तय हुआ था कि पिछड़ा कल्याण मंत्रालय के तहत की परिषद संचालित होगा। इससे समाज में विभेद नहीं समुदाय का विकास होगा। जातपात के विभाजन के लिए नहीं समुदाय की उन्नति के लिए ही ऐसा किया गया है। अब परिषद के गठन से विकास की उम्मीद बंधी है।

पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ने दरियादिली दिखाते हुए अरसे से जारी मांग को पूरा कर दिया। इसके लिए वे धन्यवाद के काबिल हैं। समुदाय की दशा किसी से छिपी नहीं है। समुदाय को संरक्षण की आवश्यकता है। इससे समुदाय के विकास की संभावना तलाशी जाएगी। हिल्स के प्राथमिक विद्यालयों में लेप्चा भाषा में पढ़ाई शुरू करने सहित कई समस्याओं का समाधान हो सकेगा।

कालिम्पोंग: क्रांतिकारी कम्युनिस्ट पार्टी के उपाध्यक्ष जेबी राई ने लेप्चा परिषद के गठन को सरकार का सराहनीय प्रयास बताया। कहा कि आदिम जनजाति की सुरक्षा के लिए परिषद की मंजूरी से समुदाय को सुरक्षा मिलेगी। परिषद के विरोध को गैरवाजिब करार दिया। साथ हीं, उन्होंने गोजमुमो पर हिल्स में अशांति फैलाने का आरोप लगाया। गोजमुमो व सरकार के बीच तानातानी से यहां का माहौल आशांत हो गया। यहां के निवासियों में विभेद होना शुभ लक्षण नहीं है। यहां आशांति के बादल मंडरा रहे हैं। इसके लिए सरकार व गोजमुमो दोनों को जिम्मेदार ठहराया। यहां बंद बुलाकर घर में हीं लकीर खीचने का काम गोजमुमो ने किया है। यह मतभेद खत्म होने वाला नहीं है।

आरोप लगाया कि गोजमुमो ने डुवार्स में भी आदिवासियों व गोरखाओं के बीच दूरी उत्पन्न की थी। अब हिल्स में इसी गलती को दुहाराया गया है। आमरण अनशन पर बैठे लेप्चा समुदाय के लोगों को कहना है कि परिषद का गठन राजनीतिक नहीं है। यह समुदाय के विकास से संबंधित है। गोरखालैंड आंदोलन में शामिल होने पर वे सहमत हैं। परिषद कोई राजीतिक संस्था नहीं है।

फिर लेप्चा परिषद का विरोध करना समझ से परे है। परिषद के गठन से पिछड़ापन हद तक दूर होगा। लेप्चा संगठन का बयान विश्वनीय है।

राई ने कहा कि सबसे बड़ी बात समुदाय की एकता को कायम रखना है। इस चुनौती पर गोजमुमो खरा नहीं उतरा। गोरखालैंड के लिए सभी को एकजुट होकर आंदोलन करने की आवश्यकता है।

वहीं, एक राजनीतिक घटनाक्रम में अनशन स्थल पर गोरखालीग के महाचिव प्रताप खाती व गोटोफो प्रतिनिधि पहुंचे। उन्होंने अनशनकारियों से मुलाकात कर गहरी मंत्रणा की। यह मुलाकात राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है।


Friday, 8 February 2013

Retracing history at Chauri-Chaura By Vidya Bhushan Rawat


Retracing history at Chauri-Chaura
By Vidya Bhushan Rawat
 
Chauri Chaura town came into folk lore on February on February 4th, 1922 when 26 people were killed in police firing who were demanding fair prices for their product. The people in retaliation burnt the police station resulting in death of 21 persons inside the Thana. Shocked with the incident Gandhiji suspended his non-cooperation movement condemning the violence against the policemen. Many Congressmen did not like the suspension of the movement though Gandhi himself became more credible with this. But a visit to this place and a careful analysis of events throws some uncomfortable questions.
It is said that non-cooperation movement attracted a large number of people in Gorakhpur and Avadh. It is because of the movement in 1920s that people started raising difficult questions to the authorities particularly on the issues of prices as Chauri Chaura and Sahjanwa were two growing market of cloths which were highly influenced because of British policies. It had resulted in deep resentment among the common people particularly artisans and farmers. It is also true that the police and administration always connived with big landlords and Zamindars who exploited the landless people.  A majority of people who participated in the non-cooperation movement actually hailed from Dalit, OBCs and Muslim communities while the police officer were mostly the upper castes except for the chowkidars and guards.

A visit to the site reveals some interesting fact. The monument in the memory of the martyrs was built in 1972 by the people but later Prime Minister Narsimha Rao inaugurated the monument on July 19th, 1993. It was shocking that before that no efforts were made by the government and the people of Chauri Chaura actually built the monument themselves. There is a small library and a museum adjacent to the monument but a visit to it will reflect the condition of the memorial. The paintings are lying scattered and there is dust all over. The museum which could have been a great source of inspirations to people to learn about this movement is lying in shambles. The state of such an important monument and the museum adjacent to it is a shame.  A three member office staff by UP government has not received its salaries since inception even when they open it for public on time but the state of affair of the museum is shocking.

In all, 228 people were arrested for this in which 6 had died in the police custody while 172 were sentenced to death. The trial was perhaps done through a fast track court in 8 month. Later a higher court finally sentenced 19 people to death and 110 to life imprisonment. All the others were given different sentences but the death sentence was commuted. The most surprising thing is the attitude of presentation of this incident in our text books and why has that been so. The Chauri Chaura incident is presented that the people burnt the police station and 21 one 'innocent' policemen were killed and hence pained with the incident Gandhi suspended his movement. Was Gandhi pained at the death of policemen? Did he condemn the death of the people too who were killed in police firing? Why was Gandhi worried about killing of policemen and condemned it as brutal but not seen how brutally people were killed? Why the incident is not spoken in the school in its entirety.

There are many mischiefs that our ideological slants try to kill a real incident.  Most of the 19 people who went to gallows on April 23rd, 1923 belong to Dalit and backward communities. They are:
1.     Abdullah s/o Gobar Julaha ( weaver)
2.     Bhagwan s/o Ramnath Ahir
3.     Vikram s/o Shiv Charan Ahir
4.     Dudhai s/o Ram Sujhawan,
     5. Kali Charan s/o Nirgun Kahar
    6. Lal Mohammad s/o Hakim Fakir
    7. Ram Swaroop s/o Ram Tahal
    8. Rudli s/o Ram Kewat
    9. Sahdev Kahar
    10. Sampat Chamar
    11. Shyam Sunder Mishra
   12. Sita Ram s/o Ram Fal
   13. Nazar Ali s/o Hussein
   14. Raghuvir s/o Jaddu Sunar
   15. Ram Lagan S/o Shiv Tahal Sunar,
   16. Lotu s/o Shiv Nandan Kahar
 17. Mahadev s/o Kunk Bihari
 18. Meghu Tiwari
19. Sampat Ahir

It is good to make analysis of the caste and communities of these people. Though it is also true that the movement that time cut across the caste lines as freedom of the country was more important and people were fed up of the oppression but there seems to be some other harsher factors too. Most of the police personnel came from high caste background particularly landed peasantry of Brahmins and Thakurs. The Thana in charge that time was Gupteswar Singh and his subordinate was Prithvi Singh. It is said that both of them had connived with Badri Tiwari, an associate of feudal Zamindars and therefore fired at the innocent people who were returning. It is not true that people were just fed of British Raj but the fact is that the oppression of the feudal landlords and caste oppression in the Poorvanchal region was very high and people had been revolting against the same. In fact whenever the movement against the local feudal grew they played the 'nationalist' card and the movement was crushed by using the bigger cause of 'India's freedom. The huge success of the farmer's movement against big Zamaindari and caste oppression in Avadh is well document yet the same facts have been hidden from the people as how that movement too was foiled by Gandhi.

The Chauri Chaura incident is an eye opener. Its presentation is shocking in our text books. We are not reminded of the killing of 26 innocent Satyagrahis or people but informed more about the killings of 21 policemen were burnt inside the Thana. And then Gandhi is lauded for his heroic for 'Ahimsa' but was the suspension of the Non-cooperation movement after Chauri Chaura incident was that simple as has been made out and presented to us. The fact which should have been investigated in this region was the land relations. It is clear that Badri Tiwari, a middlemen with Zamindars instigated police who hailed mostly from the powerful upper castes, to fire at these protesters mostly from the backward and Dalit communities. In the entire Poorvanchal, aggression against the caste oppression by the small and marginal farmers grew up during the non-cooperation movement but that was completely thwarted by the leaders like Moti Lal Nehru who were actually the advocates for these Zamindars. Gandhi's spiritualism came handy to divert their attention from the internal issues for the big cause of 'nationalism'. At the end of the day, it was gain for Gandhi and Congress both the way. The movement was suspended and hence the anger of people was subsided. Gandhi basically made the mockery of those who were sentenced to death for allegedly killing but could not say that people will revolt and protest against such firing on innocent.  There is another fact which is important that since the policemen hailed from the upper caste background, it was important for Gandhi and his congress to show more sympathy towards their killings. It is disgusting and shameful to see how the historians have rarely analyzed this incident in true sense which made Gandhi a hero, a man of moral conviction, who suspended the Non Cooperation Movement when it was growing up. It did not come to the minds of the people that this non-cooperation was also resulting in non-cooperation towards the upper caste Zamindars but since they were leading the Congress movement, it was impossible for the party to ignore their interest.

Today, there are two 'Memorials' at Chauri Chaura. One is for the martyrs who were hanged to death by the British regime and shamefully Gandhi and his Congress could do nothing to save them. The Martyrs memorial came from a combined funds of people who wanted to remember them and there is a memorial at the police station too in which names of the police personnel are placed who were killed in the in that subsequent burning the police station. Both the memorials have named them as ' Amar Shaheed Smarak'.  How can the two people be equated together? One who died for the country asking for their rights and the others who showed brutality on people and got killed as people burnt the police station when they returned to their barracks as their ammunition ran out. How can the killers be accorded the status of Shaheed who were killed because of people's resentments? Was it because all these killers were actually upper caste feudal who were looking down upon the poor people in utter contempt? Was the movement stopped to keep the upper caste sentiments in mind? These are important questions which were hidden and not investigated but one is sure if they are looked properly we will find deception and hidden agenda of the caste forces underneath.

There is no issue if policemen on duty are killed and are given honor for the same. The Chauri Chaura incident shows that policemen only retreated as their ammunition was over otherwise they would have killed more people. It is also a fact that people burnt the police station only when their patience ran out and they realize it is time to avenge. I do not remember if the Congress Party demanded a fair investigation into the case so that truth is unveiled. Chauri Chaura incident was mythicized but it was another blow to people's struggle when it was growing simply because the power elite that time belonged to high caste Hindus and antagonizing them would have been detrimental for the caste interest of our political leadership and that seems to be the only region why facts were hidden and the movement was stopped and nothing was said much about the people and their struggle but more on policemen and their 'innocence'.  We can learn a lot from history provided it is written and analyzed free from caste bias. Chauri Chaura also explodes the myth that Dalits did not participate in the freedom movement but it reinforces their role even when they were not in the leadership in the Congress Party. It is time our historians investigate history through caste angle and we will find the greater role of most marginalized people in the struggle for freedom of India.

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Vidya Bhushan Rawat
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