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Monday, 4 February 2013

'शोषण-भूख की एक भाषा नहीं होती'



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'शोषण-भूख की एक भाषा नहीं होती'

MONDAY, 04 FEBRUARY 2013 16:19



नुक्कड़ नाटकों के जरिये दलित मुक्ति के सवाल को आगे बढाने वाले महाराष्ट्र के प्रसिद्ध दलित रंगकर्मी संजय जीवने से विशेष बातचीत
किसानों की आत्महत्या के लिए देश-दुनिया में चर्चित विदर्भ की एक ख्याति रंगमंच की समृद्ध परंपरा के कारण भी रही है. कभी विदर्भ में करीब दो दर्जन से ज्यादा रंगमंच की संस्थाएं सक्रिय रहीं, लेकिन जैसे-जैसे समाज बदला रंगमंच के रंग काफूर होते चले गए. कुछ कलाकार समाज की बदलती नब्ज को भांप कर मुंबई जा कर चकाचौंध की दुनिया में खो गए. अब कागजों में सिर्फ दो चार संस्थाएं सक्रिय हैं. लेकिन विदर्भ के सूखाग्रस्त इलाके में अभी भी कुछ जीवट कलाकार हैं, जो लोक और रंगमंच को सहेजे हुए हैं. इन्ही में एक नाम है लेखक-निर्देशक संजय जीवने का, जो पुरे परिवार के साथ इस काम में जुटे हैं. बीते चार दशकों से संजय जीवने समाज के शोषित और वंचित वर्ग की समस्याओं को विषयवस्तु बनाकर नुक्कड़ नाटकों से समाज में अलख जगा रहे हैं. नुक्कड़ नाटकों से जुड़े अनुभवों, चुनौतियों और उम्मीदों पर संजय जीवने से हुई बातचीत के प्रमुख अंश : 
नुक्कड़ नाट्य रंगकर्मी संजय जीवने से संजय स्वदेश की बातचीत
sanjay-jiwane
संजय जीवने : नुक्कड़ नाटकों की आदर्श परंपरा
 देश में नुक्कड़ नाटकों की क्या स्थिति है ?
आज नुक्कड़ नाटक बचे कहाँ हैं ? जो हैं, उन्हें सरकार ने हाईजैक कर रखा है. जो लोग नुक्कड़ नाटकों से जुड़े हैं, उनमें अधिकतर सरकार के लिए काम कर रहे हैं. वे अधिकांश समय इसी गुणा-गणित में व्यस्त रहते हैं कि किस विषय वस्तु पर नुक्कड़ नाटक की परियोजना बने और सरकार उसे मंचन के लिए प्रायोजित करे और पैसा मिले. कई बार सरकारी परियोजनाओं के मुताबिक नाटक तैयार किया जाता है. यही कारण है कि आज किसी नुक्कड़ पर कोई नाटक दिखता है तो उसकी विषय वस्तु इतनी सहज होती है कि दर्शक उसे मनोरंजन की तरह लेते हैं. दूसरी तरफ स्वतंत्र रूप से नुक्कड़ नाटक करने की बंदिशें बहुत हैं. महाराष्ट्र में नुक्कड़ पर नाटक का मंचन करने से पहले सेंसर बोर्ड से अनुमति लेनी पड़ती है. सेंसर बोर्ड में आवेदन जाते ही वहां स्क्रीप्ट में तरह-तरह की खामियां निकाली जाती हैं और कई बार नाटक की आत्मा को ही छांटने के लिए कहा जाता है, जिससे अंर्तवस्तु बहुत कमजोर पड़ जाती है और नाटक उद्देश्य से भटक जाता है. 

तो क्या नुक्कड़ नाटक अपनी विरासत और परम्परा से भटक रहा है?
जब सरकार किसी नाटक को प्रायोजित करेगी तो विषय वस्तु भी सरकार नियंत्रित होगी. नुक्कड़ नाटकों का ठेका लेने वाले उसी विषय वस्तु को तय करते हैं, जिससे केवल सरकार का उद्देश्य पूरा हो सके. ऐसे नाटकों में विषय समग्रता के साथ साकार नहीं हो पाते, प्रस्तुति गंभीर नहीं होती और हल्के से चुटिले अंदाज में नाटक की इतिश्री हो जाती है. थोड़े समय में चुनौतिपूर्ण अभिनय के माध्यम से जनता को जगाने के का नाम है 'नुक्कड़ नाटक', जो कमाई का साधन बनने से खत्म हो रहा है. प्रायोजित नाटकों से महान उद्देश्यों की पूर्ति नहीं हो सकती है.

कई बार कलाकार कहते हैं कि समुचित सुविधा उपलब्ध कराई जाए तो मृत होती इस कला में नई जान आ सकती है?
मैं 1978 से इस विधा से जुड़ा हूँ, लेकिन मुझे लगा नहीं कि नुक्कड़ नाटकों के लिए किसी तरह के विशेष साधन और सुविधा की जरूरत है? क्या इसके मंचन के लिए संगीत और रोशनी के तकनीकी साधनों से लैस प्रेक्षागृह की आवश्यकता है या अभ्यास के लिए किसी जगह की? यह सब बहाने हैं. जगह और साधन की बात छोड़िए, अंदर आग है तो स्पेस अपने आप मिल जाता है. समाज बदल चुका है. लोगों की सोच बदल चुकी है. यह समाज स्वयं आगे आकर कोई स्पेस और साधन नहीं देगा. यदि साधन मिल भी जाए तो इस बात की क्या गारंटी है कि नुक्कड़ नाटकों में धार आ जाएगी.

साधन के अभाव में आज नुक्कड़ नाटकों की सफलता कैसे संभव है?
आप सार्थक उद्देश्य से नाटक का मंचन करना चाहते हैं तो आपको न फंड की जरूरत है और न ही किसी साधन की. इसका जीता जागता उदाहरण मैं स्वयं हूं. 1978 से भूखे-प्यासे नुक्कड़ पर समाज को जगाने का अभियान जारी है. यह संभव इसलिए हुआ कि मैंने सोए हुए समाज को जगाने के लिए अपनी जिम्मेदारी समझा. लेकिन सबमें जज्बा नहीं होता. जैसे-जैसे लोगों के जीने का तरीका बदला, आदर्श बदले इसका असर इस कला पर भी पड़ा. 

आपके अधिकतर नाटक दलित समस्याओं के इर्द-गिर्द घुमाते हैं. क्या आपने सुनियोजित तरीके से रंगमंच में दलित सवालों को चुना?
उत्तर- देश में जब कम्युनिस्ट आए, तब उन्होंने बड़े ही जोर-शोर से शोषितों के दर्द को मुद्दा बनाया. लेकिन वे यह नहीं समझ सके कि भारत की असली समस्या क्या है? मूल्यों पर खूब थिएटर हुए. वे कहने के लिए प्रोग्रेसिव रहे हैं, पर वास्तविक विषय से दूर रहे. यहां अंतिम आदमी का कोई सरोकार नहीं था. हमारी बात ही नहीं, सवाल नहीं, विषय नहीं, संघर्ष नहीं. तभी मन में यह दृढ़ता आई कि हम लोग दलित नुक्कड़ नाटकों को अलग से खड़ा करें. हमने समाज के समस्या को स्वयं भोगा था. दर्द को महसूस किया था. इसलिए लगा कि इस समाज के विषयों को लेकर उनके बीच ही जाना चाहिए और उनके मन का भ्रम तोड़ना चाहिए, जिससे कि वे सार्थक जीवन जी सकें. जब दलित मुद्दे को उठाया तो लोग हंसते थे. लेकिन आज सीरियस हैं. आज पीठ पीछे भले ही कुछ भी कहते हों, लेकिन सामने नहीं हंस सकते हैं. यही कारण है कि दलित नुक्कड नाटकों को अलग करना पड़ा.

नुक्कड़ नाटकों से जुड़ने की प्रेरणा कैसे मिली?
उत्तर- 1978 में महाराष्ट्र के मराठा विश्वविद्यालय का नाम बदल कर बाबा साहब के नाम पर करने का संघर्ष चला. इसके लिए हजारों लोग सड़ पर उतर गए. दलित तबके ने संघर्ष किया. गोली खाई. शहीद हुए. बलिदान दिए. अनेक युवाओं की शिक्षा गई. नौकरी छूटी. उसी वक्त लगा कि दलित समाज को जगाने के लिए नुक्कड़ नाटक को माध्यम बनाने का यह सही वक्त है. यही प्रभावकारी शस्त्र है. तब से जो सिलसिला शुरू हुआ वह आज भी जारी है.

नुक्कड़ नाटकों का आज समाज पर क्या असर है? इस कला से पूर्णकालीन जुड़ने के कारण आपके निजी जीवन पर क्या असर पड़ा?
नुक्कड़ नाटकों का प्रभाव बहुत धीमी गति से पड़ता है, पर यह प्रभावी ढंग से काम करता है. शोषित वर्गों के लिए यह काम आ सकता है. पूरे परिवार के साथ इसमें जुड़े हुए हैं. बिना बलिदान दिए कुछ नहीं मिल सकता है.

अब तक कितने नुक्कड़ नाटक लिखे. कितने मंचन किए. दूसरे क्षेत्रों में मंचन में भाषा की कितनी समस्या हुई?
देश के हर राज्यों के अलावा विदेशों में भी हजारों नाटक का मंचन किया. करीब 100 से ज्यादा नाटक लिखा. देश और देश के बाहर तक मंचन किया. एशिया के अलावा यूरोपिय देशों में भी मंचन का मौका मिला. लेकिन हमें भाषा को लेकर कभी कोई समस्या नहीं आई. हमारा विषय है पीड़ित, वंचित और शोषित वर्ग और इस वर्ग के लिए भाषा कभी बाधा नहीं हो सकती कि शोषण और भूख की कोई भाषा नहीं होती है.

आपको इन नाटकों के लिए सामजिक और आर्थिक रूप से मजबूत लोगों से कितनी अपेक्षा होती है और कितना सहयोग मिलता है?
समाज के जिन लोगों ने मूवमेंट देखा है, वे स्वयं इसमें हिस्सा ले रहे हैं. जो लोग समाज और शासन में कोई पद या प्रतिष्ठा प्राप्त की है, वे सतर्क हैं. मीडिया और हमारे समाज के ही अपर क्लास से बस इतनी अपेक्षा है कि वे हमे कुछ दे नहीं सकते तो बस सपोर्ट भर करें. 

जो लोग दलित नुक्कड़ नाटकों से जुड़े हैं, उनके लिए क्या कहना चाहेंगे?
ग्लोबलाजेशन, निजीकरण के परिणाम सार्थक उद्देश्य को निगल रहे हैं. जो इससे जुड़ें हैं, वे थोड़ा और गंभीर हो जाएँ.
sanjay-swadeshसंजय स्वदेश समाचार विस्फोट के संपादक हैं.