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Tuesday, 5 February 2013

संघी समर्थन से जारी अध्यादेश से समझ लें कि क्या कयामत आने वाली है!


संघी समर्थन से जारी अध्यादेश से समझ लें कि क्या कयामत आने वाली है!

एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास​


मोदी को प्रधानमंत्री बनाने की तैयारी और राममंदिर बनाने के संकल्प के साथ संघ परिवार ने कांग्रेस को उग्रतम हिंदुत्व के रास्ते ार्थिक सुधार के ्श्वमेध यज्ञ को तेज करने के लिे मजबूर कर दिया है।नरेंद्र मोदी ही संघ परिवार की ओर से भावी प्रधानमंत्रित्व का चेहरा होंगे, इस बारे में कोई शक की गुंजाइश है नहीं। मोदी के मुकाबले ​​युवराज राहुल गाधी की जीत पक्की करने के लिए भाजपा से  भी ज्यादा उग्र हिंदुत्व का विकल्प चुनने के अलावा कांग्रेस के पास कोई ​​विकल्प नहीं है। मोदी को ग्लोबल हिंदुत्व और वैश्विक कारपोरेट युद्धक व्यवस्था का पूरा समर्थन है। आर्थिक सुधारों के प्रति संघ परिवार ने अपनी प्रतिबद्धता दोहरा दी है, इसके मद्देनजर कारपोरेट संघी राज को टालने के लिए जनसंहार की नीतियों को लागू करने में और ज्यादा निर्मम होने के अलावा कोई चारा नहीं है। दिल्ली सामूहिक बलात्कार कांड के बहाने जो उग्रतम धर्म राष्ट्रवाद का आवाहन हुआ, उसकी पहली कामयाबी तो पदोन्नति में आरक्षण को टालना रहा, जो वर्चस्ववादी मनुस्मृति शासन के लिए अनिवार्य था। गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर सत्ता वर्ग के युवा आक्रोश का जो महिमामंडन राष्ट्रपति, धर्म राष्ट्रवाद आधारित सैन्य राष्ट्र के प्रमुख धर्माधिकारी चंडी पुजारी प्रणव मुखर्जी ने किया, उसीको आज महिलाओं पर अत्याचार रोकने के बहाने तुरत फुरत वर्मा आयोग की विशेष सैन्य कानून संबंधी और बलात्कारी राजनेताओं पर पाबंदी संबंधी सिफारिशों ​​को कचरा पेटी में डालकर यौन अपराध विरोधी कानूनों में बदलावों को प्रभावी बनाने के लिए आपराधिक कानून (संशोधन) अध्यादेश-2०13 को रविवार को अपनी मंजूरी देते हुए बखूबी अंजाम तक पहुंचाया। कल शाम सरकार ने महिला संगठनों की आपत्ति के मद्देनजर इस अध्यादेश पर जो पुनर्विचार का इरादा जताया था, वह संघी खुला समर्थन और अन्ना ब्रिगेड की तरफ से किरण बेदी के स्वागत वक्तव्य से एकदम बदल गया। एक ओर​​ राष्ट्रपति ने अपनी ही जनता के खिलाफ युद्ध जारी रखने के लिए इस विधेयक पर दस्तखत किये तो दूसरी ओर ओड़ीशा में पारादीप में पास्को के इस्पात कारखाने के लिए जबरन भूमि अधिग्रहण शुरु हो गया। खबर आयी कि वालमार्ट ने भारतीय खुदरा बाजार पर कब्जा करने के लिए अमेरिका में लाबिंग तेज कर दी। जयपुर कारपोरेट साहित्य उत्सव में आशीष नंदी ने जो ओबीसी और अनुसूचितों के खिलाफ आरक्षणविरोधी वक्तव्य दिया, उसको इसी श्रृंखला की कड़ी मानकर देखे तो समझ में आयेगा कि क्या कयामत आने वाली है!महाकुंभ में संतों की पीएम पद के लिए मोदी की लॉबीइंग से नाराज जद-यू को भाजपा ने करारा जवाब दिया है। भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने जद-यू पर पलटवार करते हुए कहा है कि अगर भाजपा और संत समाज देश का पीएम तय नहीं करेंगे तो क्या आतंकी हाफिज सईद करेगा।

यौन हिंसा संबंधी अध्यादेश को लेकर आलोचना का सामना कर रही सरकार ने अब अपने बचाव में कहा है कि अध्यादेश में सुझाए गए प्रावधानों पर सर्वसम्मति नहीं बन पाई है और आने वाले संसद सत्र में सभी पार्टियों के साथ इस पर चर्चा की जाएगी। केंद्रीय कैबिनेट द्वारा मंज़ूर किए गए इस अध्यादेश पर हाल ही में राष्ट्रपति ने हस्ताक्षर किए थे. कई महिला संगठनों ने राष्ट्रपति से आग्रह किया था कि वे इस अध्यादेश पर हस्ताक्षर न करें क्योंकि इसमें जस्टिस वर्मा आयोग की सिफ़ारिशों को पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया गया है।वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने कहा है कि न्यायमूर्ति वर्मा समिति की कोई सिफारिश अस्वीकृत नहीं की गई है। चिदंबरम ने महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा पर अध्यादेश लाने का फैसला सही ठहराते हुए कहा कि इस तरह का कानून जल्द से जल्द लाने की सार्वभौमिक मांग के मद्देनजर ही यह कदम उठाया गया। सरकार ने कहा कि यह अध्यादेश ज्यादा से ज्यादा लोगों की सहमति के फलस्वरूप आया है। चिदंबरम ने कहा कि अध्यादेश अपराधियों के लिए निवारक का काम करेगा।


महिला संगठनों के एतराज के बावजूद राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने महिला सुरक्षा से जुड़े अध्यादेश को मंजूरी दे दी है। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद ये अध्याधेश तत्काल प्रभाव में आ जाएगा और सरकार को इसी महीने शुरु हो रहे बजट सत्र में इसे संसद में पारित कराकर कानून का रूप देना होगा। अध्यादेश में महिलाओं के खिलाफ जघन्य अपराध के मामलों में मौत की सजा तक का प्रावधान है।बलात्कारी के लिए मौत की सजा की मांग क्या पूरी हो पाएगी, क्या देश में महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर लगाम कस पाएगी, पिछले कुछ दिनों से देश भर में गूंज रहे इन सवालों के जवाब 21 फरवरी से शुरु होने जा रहे संसद के बजट सत्र में तलाशे जाएंगे। दरअसल राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने महिला सुरक्षा से जुड़े अध्यादेश को मंज़ूरी दे दी है। इस अध्यादेश में महिला के खिलाफ जघन्य यौन अपराध के मामले में सज़ा-ए-मौत की सिफारिश है।दिल्ली गैंगरेप कांड के बाद लोगों ने डेढ़ महीने तक सरकार को हिलाकर रखा। यही वजह थी कि सरकार ने 1 फरवरी को आनन फानन में कैबिनेट की बैठक बुलाकर अध्यादेश को मंजूरी दे दी। सरकार इस संजीदा मसले पर ढिलाई नहीं देना चाहती हैं।महिला अध्यादेश को राष्ट्रपति का हस्ताक्षर करना कानून बनाने की दिशा में पहला कदम है। अध्यादेश को कानून में बदलने के लिए सरकार के पास बजट सत्र के पहले चरण की मियाद यानी 22 मार्च तक का वक्त है।महिला संगठनों के साथ वाम दलों जैसी कुछ सियासी पार्टियां भी महिला सुरक्षा से जुड़े अध्यादेश पर एतराज जता चुकी हैं। उनका कहना है कि अध्यादेश में जस्टिस वर्मा कमेटी की कई सिफारिशों को नहीं माना गया है। इनमें वैवाहिक बलात्कार और वर्दीधारियों के हाथों बलात्कार को कानून के दायरे में लाने की मांग खास है।लेफ्ट की आपत्ति संसद में बहस के बगैर अध्यादेश जारी करने को लेकर भी है। लेकिन हाल ही में प्रधानमंत्री ने खत लिखकर जस्टिस वर्मा को भरोसा दिलाया था कि उनकी रिपोर्ट को जल्द अमलीजामा पहनाया जाएगा। अध्यादेश जारी होने के अगले ही दिन सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने दिल्ली गैंगरेप पीड़ित के परिवार वालों से मिलकर सरकार की संजीदगी को जाहिर किया था।

अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को भाजपा का 'स्थायी मुद्दा' बताते हुए पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कलराज मिश्र ने आज इस बात से इंकार किया कि उनका दल आगामी आम चुनावों में सियासी फायदे के लिये इस मसले को फिर गरमाने की कोशिश कर रहा है।मिश्र ने इंदौर में संवाददाताओं से कहा, 'अयोध्या में राम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर का निर्माण भाजपा की प्रतिबद्धता है। यह हमारा चुनावी विषय नहीं, बल्कि स्थायी मुद्दा है। यह पूरे राष्ट्र का मुद्दा है। यह मुद्दा तब तक जीवंत बना रहेगा, जब तक अयोध्या में भगवान राम का भव्य मंदिर नहीं बन जाता।' भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ने जोर देकर कहा, 'जब तक अयोध्या में भगवान राम का भव्य मंदिर नहीं बन जाता, तब तक हम चैन की सांस नहीं लेंगे।' मिश्र ने 'हिंदू आतंकवाद' को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे के बयान पर जोरदार विरोध जताया और उनके इस विवादास्पद कथन को 'भारतीयता पर हमला' और 'देशद्रोह का कृत्य' बताया।  इसीके मध्य प्रधानमंत्री पद के राजग उम्मीदवार के रूप में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के नाम पर बार-बार होने वाली चर्चा को समाप्त करने की पहल करते हुए भाजपा अध्यक्ष राजनाथसिंह ने पार्टी कार्यकर्ताओं को इस मुद्दे पर कोई बयान नहीं देने की नसीहत दी और सहयोगी जदयू ने भी ऐसे ही विचार व्यक्त किए, लेकिन भाजपा नेता सीपी ठाकुर और शत्रुघ्न सिन्हा इसका उल्लंघन करते दिखे। मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए राजग का उम्मीदवार घोषित करने के मुद्दे पर राजग में एकमत नहीं होने से चिंतित भाजपा अध्यक्ष राजनाथसिंह ने पार्टी नेताओं से अंतिम अपील में इस मुद्दे पर कोई बयान नहीं देने को कहा।

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने यौन अपराध विरोधी कानूनों में बदलावों को प्रभावी बनाने के लिए आपराधिक कानून (संशोधन) अध्यादेश-2०13 को रविवार को अपनी मंजूरी दे दी। यह अध्यादेश न्यायमूर्ति जेएस वर्मा की रपट पर ज्यादातर आधारित है, और इसे केंद्रीय मंत्रिमंडल ने शुक्रवार को मंजूरी दे दी थी।इस अध्यादेश में महिलाओं के खिलाफ अपराधों के मामलों में जघन्य अपराध के लिए मृत्युदंड सहित दंड बढ़ाए जाने के प्रस्ताव हैं। इन अपराधों में दुष्कर्म, तेजाब हमले, ताकझांक और तस्करी शामिल हैं। महिला संगठनों ने अध्यादेश के खिलाफ सोमवार को जंतर मंतर पर विरोध प्रदर्शन आयोजित करने की योजना बनाई है।महिला संगठनों का मानना है कि महिला अपराधों से निपटने के लिहाज से यह अध्यादेश दंतविहीन है और संगठनों ने राष्ट्रपति से आग्रह किया था कि वह इस पर हस्ताक्षर न करें।तो दूसरी ओर,गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को बीजेपी अपने प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के तौर पर पेश करने वाली है। सूत्रों के मुताबिक इलाहाबाद के महाकुंभ में 7 फरवरी को साधु संतों के जरिए इस मांग को उठाया जा सकता है। इसके बाद जल्द ही बीजेपी मोदी के नाम का ऐलान भी कर सकती है। भाजपा पर नरेन्द्र मोदी को अगले चुनाव के लिए प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी बनाने के लिए संघ परिवार की ओर से दबाव डाला जा रहा है। विश्व हिन्दू परिषद ने इस पद के लिए गुजरात के मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा करने की मांग की है। बहरहाल, जदयू जैसे राजग के घटक दलों ने संकेत दिया है कि मोदी का नाम उन्हें स्वीकार्य नहीं है। पिछले हफ्ते राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एवं भाजपा के शीर्ष नेताओं से मुलाकात के बाद विहिप नेता अशोक सिंघल ने आज खुलकर कहा कि पार्टी को मोदी का नाम प्रधानमंत्री प्रत्याशी के लिए घोषित कर देना चाहिए। गुरुवार को बीजेपी और आरएसएस के दिग्गज नेताओं के बीच बैठक हुई थी। अब तक हवा में यही खबर तैर रही थी कि 2014 चुनावों के लिए बीजेपी हिंदुत्व के मुद्दे पर वापस लौट रही है। लेकिन उसका सारथी कौन होगा इसका जवाब कहीं से नहीं मिल रहा था। बीजेपी के ही कई नेता ये भी इशारा कर रहे हैं कि मोदी के नाम का ऐलान जल्द ही हो सकता है।मोदी की खबर से जेडीयू में बेचैनी बढ़ती नजर आईं। एक तरफ जहां जेडीयू के अध्यक्ष शरद यादव कह रहे हैं कि पीएम उम्मीदवार पर एनडीए फैसला करेगा वहीं जेडीयू के ही देवेश चंद्र ठाकुर का कहना कि नाम तय होने से पहले एनडीए की बैठक हो। मोदी के नाम की राह में सबसे बड़ा रोडा एनडीए सहयोगी जेडीयू ही है। नीतीश कुमार नरेंद्र मोदी के पक्ष में कभी नहीं रहे।बीजेपी के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा ने कहा है कि सहयोगी आते और जाते रहते हैं। उधर एनडीए की ही एक और सहयोगी अकाली दल ने साफ कर दिया है कि बीजेपी का जो भी फैसला होगा उसे उनका समर्थन होगा। दो दिन पहले तक शिवसेना बीजेपी के पीएम पद के उम्मीदवार के तौर पर सुषमा स्वराज के नाम की रट लगाए हुई थी। लेकिन अब मोदी के सवाल पर उसका कोई भी नेता कैमरे पर आने के लिए तैयार नहीं है। शिवसेना का कहना है कि पहले बीजेपी बैठक कर नाम तय करे, फिर वो कुछ कहेंगे।

मनमोहन सरकार का कार्यकाल भले 2014 तक हो। लेकिन समाजवादी पार्टी सुप्रीमो मुलायम सिंह ने चुनाव की डेडलाइन तय कर दी है। सोमवार को लखनऊ में पार्टी कार्यकर्ताओं की बैठक में मुलायम ने कहा कि सितंबर में चुनाव हो सकते हैं। लिहाजा कार्यकर्ता जुट जाएं। मुलायम ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार चार सालों तक जन विरोधी नीतियां लागू करती रही है। लेकिन अब बजट का मौके पर वो चालाकी दिखा सकती है।मुलायम सिंह यादव ने कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि केन्द्र सरकार कोई भी चालाकी कर सकती है। चार वर्ष तक जन विरोधी नीतियों के जरिए देश को बर्बाद करने के बाद, चुनावी वर्ष के आम बजट में वो तथाकथित जनहित बजट के नाम पर जनता को गुमराह करने की रणनीति अपनाएगी। इससे आम जनता को सावधान रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि दिल्ली में गैंगरेप की शिकार युवती की मौत से ध्यान हटाने के लिये केन्द्र की सरकार मुद्दे से भटकाकर जनता को भ्रमित कर रही है। बलात्कार की घटनाएं राष्ट्रीय शर्म की बात है। उन्होंने कहा कि लोकसभा चुनाव सितम्बर तक कभी भी हो सकते हैं। सच्चाई जनता के सामने आनी चाहिए।

आशीष नंदी की गिरफ्तारी पर सुप्रीम कोर्ट की रोक,बीबीसी  रपट

सुप्रीम कोर्ट ने प्रसिद्ध समाजशास्त्री आशीष नंदी की गिरफ़्तारी पर रोक लगा दी है.

इसके साथ ही उच्चतम न्यायालय ने आशीष नंदी को सलाह दी है कि उन्हें उस तरह की टिप्पणियों से बचना चाहिए जैसी कि उन्होंने जयपुर साहित्य महोत्सव के दौरान की थी.


छिहत्तर साल के आशीष नंदी के ख़िलाफ़ अनुसुचित जाति/जनजाति क़ानून के तहत जयपुर में पुलिस ने मुक़दमा दर्ज किया था.

इसी तरह का मुक़दमा साहित्य महोत्सव के आयोजनकर्ता संजॉय रॉय के ख़िलाफ़ भी दर्ज किया गया था.

'संभलकर बोलूंगा'

"मैं सावधानी से बात करूंगा और जो भी बोलना होगा वो हिंदुस्तान से बाहर और घर के भीतर बोलूंगा"
आशीष नंदी

आशीष नंदी ने अदालत के फ़ैसले का स्वागत किया और कहा कि इसके लिए वो कोर्ट और अपने क़ानूनी सलाहकारों के शुक्रगुज़ार हैं.

जब उनसे अदालत की उन्हें दी गई सलाह के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, "मैं सावधानी से बात करूंगा और जो भी बोलना होगा वो हिंदुस्तान से बाहर और घर के भीतर बोलूंगा."

सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें अपने बयान को लेकर सावधान रहने की सलाह दी है.

उन्होंने इस मामले पर और अधिक कुछ कहने से इनकार किया और कहा कि ये मामला अदालत के विचाराधीन है इसलिए वे इस पर कुछ नहीं कहेंगे.

जब नंदी से कमल हासन और फ़िल्म विश्वरूपम पर जारी विवाद के बार में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि ये ग़लत है.

उन्होंने कहा, "ये फ़िल्म जो कुछ अफ़ग़ानिस्तान में हो रहा है उसके बारे में है, इसका हिंदुस्तान से ताल्लुक़ नहीं, इसलिए मैं मुस्लिम भाईयों से अनुरोध करना चाहता हूं कि वो इसे लेकर उत्तेजित न हों."

अपील

नंदी के अपने वकील अमन लेखी के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट से अपील की थी कि वो उनके ख़िलाफ़ दर्ज प्राथिमिकी यानी एफआईआर को रद्द करने का निर्देश जारी करे.

मुख्य न्यायाधीश अलतमस कबीर की एक खंडपीठ ने सुनवाई की तारीख़ शुक्रवार को तय की थी.

जयपुर साहित्य महोत्सव के दौरान बोलते हुए आशीष नंदी ने भ्रष्टाचार और दलितों पर अपने बयान को कुछ इस ढंग से पेश किया था कि कुछ लोगों को लगा था कि वो कह रहे हैं कि भ्रष्ट्राचार के मामलों में सबसे अधिक दलित ही शामिल होते हैं.

2009-11 में रेप के 68000 केस, सिर्फ 16000 दोषी

देश में वर्ष 2009-11 के दौरान बलात्कार के लगभग 68 हजार मामले दर्ज किए गए लेकिन इनमें से सिर्फ 16 हजार बलात्कारियों को कैद की सजा मिली।

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार वर्ष 2011 के दौरान देश भर में बलात्कार के 24 हजार 206 मामले दर्ज हुए, लेकिन मात्र पांच हजार 724 लोगों को दोषी ठहराया जा सका।

वर्ष 2010 में देश भर में बलात्कार के 22 हजार 172 मामले दर्ज हुए, लेकिन मात्र पांच हजार 632 लोगों का दोष साबित हो पाया। वहीं वर्ष 2009 में देश भर में बलात्कार के 21 हजार 397 मामले दर्ज हुए, लेकिन मात्र पांच हजार 316 लोगों को दोषी ठहराया गया।

इस अवधि में (2009-11) बलात्कार के सबसे अधिक नौ हजार 539 मामले मध्य प्रदेश में दर्ज किए गए लेकिन इस दौरान सिर्फ दो हजार 986 लोगों का दोष साबित हो पाया।

वर्ष 2009-11 के दौरान पश्चिम बंगाल में बलात्कार के सात हजार 10 मामले दर्ज हुए लेकिन सिर्फ 381 लोगों को दोषी ठहराया गया।

उत्तर प्रदेश में इस अवधि के दौरान बलात्कार के पांच हजार 364 मामले दर्ज हुए और तीन हजार 816 लोगों का दोष साबित हो पाया।

असम में इस अवधि के दौरान बलात्कार के पांच हजार 52 मामले दर्ज हुए लेकिन सिर्फ 517 लोगों को दोषी ठहराया गया।
गृह मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया, 'दोष साबित होने की दर इतनी खराब होने की प्राथमिक वजह अपर्याप्त पुलिस जांच के बाद अभियोजन पक्ष की ओर से पर्याप्त सबूत जुटा पाने की अक्षमता है।'

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2009-11 के दौरान छेड़खानी के एक लाख 22 हजार 292 मामले दर्ज हुए, लेकिन इनमें से सिर्फ 27 हजार 408 लोगों का दोष साबित हो पाया।

इस अवधि में मध्य प्रदेश में छेड़खानी के कुल 19 हजार 618 मामले दर्ज हुए, लेकिन सिर्फ छह हजार 91 लोगों को दोषी ठहराया जा सका। महाराष्ट्र में छेड़खानी के कुल 10 हजार 651 मामले दर्ज हुए, लेकिन सिर्फ छह 595 लोगों का दोष साबित हो पाया।

उत्तर प्रदेश में छेड़खानी के कुल नौ हजार 30 मामले दर्ज हुए और सात हजार 958 लोगों का दोष साबित हुआ। वहीं केरल में छेड़खानी के कुल नौ हजार 232 मामले दर्ज हुए, लेकिन सिर्फ 718 लोगों का दोष साबित हो पाया।

रेप पीड़िता की मौत पर मृत्युदंड-चिदंबरम

बलात्कार पीड़िता के जख्मी होने और फिर मौत होने या कोमा जैसी स्थिति में पहुंचने के मामलों में बलात्कारी को सजा-ए-मौत सुनाई जा सकती है। बलात्कार निरोधक कानूनों को अधिक कठोर बनाने के लिए लाए गए अध्यादेश में यह प्रावधान किया गया है।

आपराधिक कानून (संशोधन) अध्यादेश 2013 में अलगाव के दौरान किसी व्यक्ति द्वारा अपनी पत्नी के साथ की गई यौन हिंसा के लिए भी दंड बढ़ाया गया है और अब इस अपराध के लिए सात साल तक की कैद हो सकती है। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने रविवार को ही इस अध्यादेश को मंजूरी दी है।

अध्यादेश की जानकारी देते हुए वित्तमंत्री पी चिदंबरम और सूचना प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने बताया कि धारा-376 (बलात्कार) की उपधारा-1 या उपधारा-2 के तहत दंडनीय अपराध करने वाले व्यक्ति, जिसके अपराध के फलस्वरूप कोई जख्मी होता है और बाद में उसकी मौत हो जाती है या फिर वह कोमा जैसी स्थिति में पहुंचता है तो उसे कड़े कारावास की सजा होगी।

यह सजा 20 साल से कम नहीं होगी, लेकिन इसे आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है यानी उसके स्वाभाविक जीवन के शेष बचे हिस्से के दौरान उसे कारावास में ही रहना होगा या फिर उसे सजा-ए-मौत हो सकती है।

ऐसे मामलों में जहां किसी व्यक्ति के साथ एक या अधिक लोग यौन हिंसा करते हैं तो हर अपराधी को कम से कम 20 साल के कड़े कारावास की सजा हो सकती है। इसे बढ़ाकर आजीवन कारावास भी किया जा सकता है यानी उसके शेष बचे जीवन के हिस्से के दौरान उसे जेल में रहना होगा और पीड़िता को मुआवजा भी देना होगा।

अध्यादेश के मुताबिक तेजाब फेंकने से यदि किसी को स्थाई या अस्थाई नुकसान पहुंचता है या वह गंभीर रूप से जख्मी होता है तो ऐसे अपराध के लिए अपराधी को कम से कम दस साल और अधिकतम उम्र कैद की सजा हो सकती है। इसके अलावा इस अपराध के लिए उस पर जुर्माना भी लगाया जा सकता है, जो अधिकतम दस लाख रुपए हो सकता है।

इस मुद्दे पर आज मीडिया संबंधी मंत्री समूह की बैठक में चर्चा हुई, जिसके अध्यक्ष चिदंबरम हैं। यौन हिंसा का अपराध बार-बार करने वाले को आजवीन कारावास होगा। इसका मतलब है कि उसे स्वाभाविक जीवन का शेष हिस्सा जेल में गुजारना पड़ सकता है या फिर उसे मौत की सजा हो सकती है।

यदि कोई पुलिस अधिकारी या सरकारी कर्मचारी या सशस्त्र सेनाओं का कोई कर्मी यौन हिंसा का दोषी पाया जाता है तो उसे कम से कम दस साल के सश्रम कारावास की सजा मिलेगी। इस सजा को आजीवन कारावास में तब्दील भी किया जा सकता है। इस अपराध के लिए जुर्माने का भी प्रावधान है।

किसी का पीछा करना, गलत नीयत से घूरना या महिलाओं के प्रति अन्य किस्म के अपराधों के लिए भी दंडात्मक प्रावधान किए गए हैं। अवांछित शारीरिक संपर्क, यौन अनुग्रह या मांग या इस इरादे से किसी की ओर बढ़ना भी अपराध की श्रेणी में रखा गया है और इसके लिए पांच साल की कैद या जुर्माना या दोनों का प्रावधान किया गया है।

अश्लील टिप्पणी या अश्लील फिल्म दिखाना, मौखिक या गैर मौखिक रूप से कोई यौन दुराचरण करने की स्थिति में सजा का प्रावधान है, जिसे बढ़ाकर एक साल किया जा सकता है या जुर्माना भी हो सकता है या फिर दोनों का प्रावधान है।

गलत नीयत से किसी को घूरने की स्थिति में कम से कम एक साल की कैद का प्रावधान है जिसे तीन साल तक बढ़ाया जा सकता है। ऐसे मामलों में पहली बार अपराध के लिए जुर्माना किया जाएगा। दूसरी बार या इसके बाद कई बार इस तरह का अपराध करने की स्थिति में सात साल का कारावास हो सकता है और जुर्माना लगाया जाएगा।

पीछा करने के लिए कम से कम एक साल के कारावास का प्रावधान है, जिसे बढ़ाकर तीन साल किया जा सकता है और ऐसे मामलों में दोषी को जुर्माना भी देना होगा। नाबालिग की तस्करी में यदि कोई व्यक्ति एक से अधिक बार दोषी पाया जाता है तो ऐसे अपराध के लिए कम से कम 14 साल और अधिकतम आजीवन कारावास की सजा होगी।

मानव तस्करी कर लाए गए किसी बच्चे को रोजगार देने वाले को कम से कम पांच साल की सजा का प्रावधान किया गया है। इसे बढ़ाकर सात साल किया जा सकता है और इसमें जुर्माने का भी प्रावधान है। एक से अधिक व्यक्ति की तस्करी करने वाले को कम से कम दस साल का कारावास हो सकता है, जिसे बढ़ाकर आजीवन कारावास किया जा सकता है।

इस अपराध के लिए जुर्माने का भी प्रावधान होगा। मानव तस्करी में लिप्त होने के दोषी पाए गए सरकारी कर्मचारी या पुलिस अधिकारी के लिए अध्यादेश में आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान किया गया है।

नाबालिग की परिभाषा फिर होगी तय, एक्‍ट की समीक्षा करेगा सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने किशोर न्याय कानून में 'किशोर' की परिभाषा की सांविधानिक वैधता के सवाल पर गौर करने का निश्चय किया है। इसमें अपराध की संगीनता के बावजूद 18 साल से चंद सप्ताह कम आयु का होने पर भी ऐसे अपराधी को नाबालिग ही माना गया है।

न्यायमूर्ति केएस राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की खंडपीठ ने कहा कि हम इस मामले पर गौर करेंगे क्योंकि यह आयु निर्धारण से संबंधित है। न्यायाधीशों ने कहा कि यह कानून का सवाल है और गंभीर अपराध में आरोपी पर बालिग के रूप में मुकदमा चलाने का निर्णय करते समय उसकी आयु के निर्धारण का अपराध की गंभीरता से कुछ तो तालमेल होना चाहिए। न्यायालय ने इसके साथ ही इस मामले में उठाए गए मसलों पर विचार के लिए अटार्नी जनरल गुलाम वाहनवती से सहयोग करने का आग्रह किया है। इस याचिका में किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) कानून में प्रदत्त किशोर की परिभाषा को निरस्त करने का भी अनुरोध किया गया है।

न्यायालय ने अटार्नी जनरल को इस मामले में विधि मंत्रालय और गृह मंत्रालय की ओर से हलफनामा तथा संबंधित रिपोर्ट 29 मार्च तक दाखिल करने का निर्देश दिया है। इस मामले में अब तीन अप्रैल को आगे सुनवाई होगी। यह याचिका कमल कुमार पांडे और सुकुमार नाम के वकीलों ने दायर की है। याचिका में किशोर न्याय कानून की धारा 2 (एल), धारा 10 और 17 के प्रावधानों के तर्कहीन, मनमाना और असंवैधानिक होने का दावा किया गया है। अटार्नी जनरल ने कहा कि न्यायमूर्ति जेएस वर्मा समिति की रिपोर्ट ने सभी बिंदुओं पर गौर किया है लेकिन उसने किशोर का वर्गीकरण करने के लिए उसकी उम्र कम करने की सिफारिश करने से परहेज किया है। इस पर न्यायाधीशों ने कहा कि वे न्यायमूर्ति वर्मा समिति की रिपोर्ट पर गौर नहीं करेंगे क्योंकि उसके समक्ष शुद्ध रूप से कानून का मसला था।

अटार्नी जनरल वाहनवती ने कहा कि केन्द्र सरकार इस मामले में न्यायालय के साथ सहयोग के लिए तैयार है और राज्य सरकारों से भी इस विषय पर गौर करने के लिए कहा जा सकता था। उन्होंने कहा कि कुछ गैर सरकारी संगठन भी इस विषय पर काफी सक्रिय हैं। न्यायाधीशों ने इस पर कहा कि राज्यों की इसमें कोई भूमिका नहीं है और हम गैर सरकारी संगठनों को नहीं सुनेंगे। न्यायालय ने कहा कि चूंकि यह मामला आयु निर्धारण से संबंधित है और किशोर न्याय कानून अंतरराष्ट्रीय कंनवेन्शन पर आधारित है। ऐसे भी कई देश हैं, जिन्होंने किशोर की उम्र परिभाषित करने के इरादे से इसे 16 साल निर्धारित किया है तो कुछ ने 18 साल ही रखा है।

न्यायाधीशों ने कहा कि हम सिर्फ संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के संदर्भ में ही इस पर विचार कर रहे है। इससे पहले, जनहित याचिका में आरोपी व्यक्ति को 'किशोर' के रूप में वर्गीकृत करना विधि के विपरीत है और किशोर न्याय कानून में प्रदत्त संबंधित प्रावधान नागरिकों के मौलिक अधिकारों के खिलाफ है। याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा कि इस कानून में प्रदत्त किशोर की परिभाषा कानून के प्रतिकूल है। उनका तर्क है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 82 और 83 में किशोर की परिभाषा में अधिक बेहतर वर्गीकरण है। धारा 82 के अनुसार सात साल से कम आयु के किसी बालक द्वारा किया गया कृत्य अपराध नहीं है जबकि धारा 83 के अनुसार सात साल से अधिक और 12 साल से कम आयु के ऐसे बच्चे द्वारा किया गया कोई भी कृत्य अपराध नहीं है जो किसी कृत्य को समझने या अपने आचरण के स्वरूप तथा परिणाम समझने के लिये परिपक्व नहीं हुआ है।

न्‍यायालय का यह निश्चय दिल्ली में पिछले साल 16 दिसंबर को 23 साल की लड़की से सामूहिक बलात्कार की घटना में शामिल छह आरोपियों में से एक के नाबालिग होने की बात सामने आने के बाद से अधिक महत्वपूर्ण है। इस वारदात के बाद से ही किशोर न्याय कानून के तहत किशोर की आयु का मामला चर्चा में है। वाहनवती ने कहा कि इस मसले पर गौर करते समय यह ध्यान रखना होगा कि यह किशोर के कृत्य का सवाल नहीं है बल्कि यह भी सोचना होगा कि उसने ऐसा क्यों किया और यह भी संबंधित तथ्य है कि समाज ने उसे विफल घोषित कर दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि किशोर को वर्गीकृत करते समय उसकी उम्र सीमा कम करके 16 साल की जाये या फिर इसके 18 साल रखा जाये या इस मसले पर निर्णय का सवाल अदालत के विवेक पर छोड़ना होगा।

याचिकाकर्ताओं के अनुसार राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो की वर्ष 2011 की रिपोर्ट के अपराध के आंकड़ों से पता चलता है कि 18 साल से कम आयु के किशोरों द्वारा किए गए अपराधों में कुल मिलाकर करीब दो फीसदी का इजाफा हुआ है। यही नहीं, 2011 में किशोरों ने 33887 अपराध किये जिसमें से 4443 अपराध करने वाले किशोरों ने उच्चतर माध्यमिक तक शिक्षा प्राप्त की थी और 27577 किशोर अपराधी अपने परिवारों के साथ रह रहे थे जबकि सिर्फ 1924 किशोर ही बेघर थे।

याचिका के अनुसार इन किशोर अपराधियों में से लगभग दो तिहाई किशोर 16 से 18 आयु वर्ग के हैं। याचिका में कहा गया है कि 2010 की तुलना में 2011 में किशोरों द्वारा किए गए अपराधों में 34 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

पॉस्को परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण, पुलिस-प्रदर्शनकारी भिड़े

ओड़िशा में पॉस्को की बहुप्रचारित इस्पात परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण का काम प्रशासन की एक साल से अधिक समय तक की चुप्पी के बाद आज पुलिस तथा प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प के बीच फिर शुरू हो गया।

दक्षिण कोरिया की इस्पात कंपनी पॉस्को की ओड़िशा के जगतसिंहपुर में 52,000 करोड़ रुपये की लागत से इस्पात परियोजना लगाना चाहती है। इसके लिए जमीन अधिग्रहण का एक साल से भी अधिक समय से ठप्प था।

अधिग्रहण प्रक्रिया कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच शुरू हुई लेकिन इस दौरान हिंसा को लेकर दावे व प्रतिदावे किए गये हैं। आरोप है कि पुलिस ने परियोजना का विरोध कर रहे लोगों पर लाठियां चलाईं जिसमें कुछ गांव वाले घायल हो गए।

जिला कलेक्टर एस के मलिक ने कहा, ेपारादीप के निकट गोबिंदपुर में भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हुई। पान की खेती करने वाले जो किसान जमीन देना चाहते हैं उनके जमीन के हस्तांतरण तक यह काम चलता रहेगा। े अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट सुरजीत दास ने कहा, ''जिन लोगों ने पहले ही सहमति दे दी है उनकी भूमि का अधिग्रहण किया जा रहा है।''
सूत्रों का कहना है कि पॉस्को परियोजना का विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों ने पथराव किया जिसमें पुलिस प्रशासन के पांच वाहन क्षतिग्रस्त हो गए। उन्होंने कहा कि पुलिस ने गोबिंदपुर को जाने वाले सभी रास्ते बंद कर दिए हैं। पुलिस ने गोबिंदपुर-धिनकिया सड़क को भी बंद कर दिया। पड़ोसी इरसामा, कुजांग तथा जगतसिंहपुर के लोग आगे की कार्रवाई के लिए इकट्ठे हो रहे हैं।

परियोजना के खिलाफ 2005 से आंदोलन चला रही पॉस्को प्रतिरोध संग्राम समिति के नेताओं का आरोप है कि पुलिस ने उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जो अधिग्रहण टीम के गोबिंदपुर में प्रवेश का विरोध करने की कोशिश कर रहे थे। लाठीचार्ज में महिलाओं सहित छह लोग घायल हुए हैं। जबकि दास ने पुलिस बल के इस्तेमाल के आरोप का खंडन किया है।

दास ने कहा कि काम शांतिपूर्ण ढंग से चला और दावा किया कि घटना में किसी को चोट नहीं पहुंचे। बालीटिकिरा, गोबिंदपुर में पॉस्को परियोजना के विरोधी बीते 20 दिन से धरने पर बैठे हैं। उस इलाके में लगभग 400 पुलिसकर्मी तैनात हैं। भूमि अधिग्रहण के समय ओड़िशा औद्योगिक ढांचा निगम तथा पोस्को इंडिया के अधिकारी मौजूद थे।

स्विट्जरलैंड लाया नया 'सेफ हेवन'

मुल्क कोई हो, अमीर कोई हो, बात जब सेफ हेवन की आती है तो दिमाग में सबसे पहले स्विस बैंकों का नाम आता है। ऐसा माना जाता है कि दुनिया भर के अमीरों की काली कमाई स्विट्जरलैंड के बैंकों में सुरक्षित है। इस कमाई को रेग्युलेटरों और टैक्स अथॉरिटी की निगाहों से बचाने के लिए स्विस बैंकों ने अमीरों के सामने नई पेशकश की है। वह उनके लिए ऐसे खाते लाया है जिनमें सोने की छड़ें और ऊंची कीमत वाले स्विस फ्रैंक वाले नोट रखे जा सकते हैं।

हाल ही में दावोस में हुई वर्ल्ड इकॉनमिक फोरम की सालाना बैठक में मौजूद कई स्विस बैंकरों ने पहचान न जाहिर करने की शर्त पर बताया कि इन गोल्ड अकाउंट्स और कैश वॉल्ट को दुनियाभर में मौजूद उनके क्लाइंट्स ने हाथोंहाथ लिया है। इसमें भारत के क्लाइंट भी शामिल हैं।

एक टॉप स्विस बैंकर के मुताबिक, इसके चलते कई बड़े बैंकों ने इन गोल्ड अकांउट्स और सुरक्षित डिपॉजिट बॉक्स की फीस बढ़ा दी है। इन्हें गोल्ड, डायमंड और पेंटिंग्स आदि रखने के लिए भी इस्तेमाल किया जा रहा है। बैंकर्स ने दावा किया कि इन सेफ डिपॉजिट बॉक्सों के विदेशी सरकारों की निगाह में आने का कम खतरा है, यही वजह है कि इन्हें हाथोंहाथ लिया जा रहा है। कई विदेशी सरकारों ने बैंकिंग इन्फर्मेशन के आदान-प्रदान के लिए संधियां की हैं।

बैंकर अपने अमीर ग्राहकों को यह बता रहे हैं कि भारत और दूसरे देशों के साथ स्विट्जरलैंड की टैक्स और सूचनाओं के आदान-प्रदान से जुड़ी संधियां कस्टमर्स सेविंग्स, डिपॉजिट और इन्वेस्टमेंट अकाउंट में डाली जाने वाली राशि तक सीमित हैं। ये सेफ डिपॉजिट बॉक्सों पर लागू नहीं होतीं।

विदेशी चंदे पर कांग्रेस, भाजपा से जवाब तलब

दिल्ली उच्च न्यायालय ने दो प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियों- कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से विदेशी चंदा प्राप्त करने को लेकर जवाब तलब किया है। न्यायालय ने सोमवार को दोनों पार्टियों को नोटिस जारी कर तीन सप्ताह के भीतर जवाब मांगे हैं।

न्यायालय ने एक याचिका की सुनवाई करते हुए दोनों पार्टियों को नोटिस जारी किए, जिसमें आरोप लगाया गया है कि दोनों दल ब्रिटेन के वेदांता समूह की सहायक कम्पनियों से कथित तौर पर चंदा प्राप्त करते हैं। याचिका में इस मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो या विशेष जांच दल (एसआईटी) से करवाने की मांग की गई है। न्यायमूर्ति संजय किशन कौल तथा न्यायमूर्ति इंदरमीत कौर की खंडपीठ ने दोनों राजनीतिक दलों से तीन सप्ताह के भीतर जवाब मांगा और मामले की सुनवाई के लिए अगली तारीख 19 मार्च तय की।

न्यायालय ने इससे पहले केंद्रीय गृह मंत्रालय और मुख्य निर्वाचन आयोग से इस मामले में जवाब मांगा था। न्यायालय ने कहा था कि वह उनके जवाब सुनने के बाद कांग्रेस और भाजपा से जवाब मांगेगी। निर्वाचन आयोग ने न्यायालय को बताया कि इसने इस बारे में दो बार केंद्रीय गृह मंत्रालय को लिखा, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। इस पर केंद्र सरकार ने कहा कि कांग्रेस और भाजपा से जवाब दाखिल करने के लिए कहा गया है।

गैर-सरकारी संगठन एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स और केंद्र सरकार में सचिव रह चुके ई. ए. एस. सरमा की ओर से दायर याचिका में आरोप लगाया गया है कि दोनों दलों ने लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 तथा विदेशी अनुदान (नियमन) अधिनियम (एफसीआरए) का उल्लंघन किया है। याचिका में कहा गया है कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम राजनीतिक पार्टियों को सरकारी कम्पनियों तथा विदेशी स्रोतों से अनुदान लेने से मना करता है। इसी तरह एफसीआरए भी किसी विदेशी स्रोत या कम्पनी को भारत में पंजीकृत राजनीतिक पार्टी को चंदा देने से रोकता है।

एयरटेल के बाद अब आइडिया से कॉल करना हुआ महंगा

टेलिकॉम कंपनियों द्वारा दरें बढ़ाने का सिलसिला जारी है। एयरटेल के बाद अब देश की तीसरी सबसे बड़ी कंपनी आइडिया से भी बात करना महंगा हो गया है।आइडिया के मुंबई के प्रीपेड ग्राहकों को वॉयस कॉल के लिए 20 फीसदी ज्यादा कीमत चुकानी होगी। यही नहीं कंपनी ने 2जी डेटा की दरें भी दोगुनी कर दी है। 1 केबी के लिए 1 पैसे के बजाय 2 पैसे देने होंगे।पिछले महीने एयरटेल ने भी 2जी डेटा प्लान की दरें 25 फीसदी बढ़ाई थी। साथ ही, कंपनी ने वॉइस कॉल दरें बढ़ाने के भी संकेत दिए हैं।

भारत आने के लिए वालमार्ट की लॉबिंग जारी

अमेरिकी कंपनी वॉलमार्ट के भारत में प्रवेश के लिये लॉबिंग किए जाने की जांच के बावजूद कंपनी अमेरिकी सांसदों और अन्य के साथ लॉबिंग को जारी रखे हुये है.

कंपनी ने 2012 के दौरान इस मद पर लगभग 61.3 लाख डॉलर खर्च किए.

अमेरिकी संसद में लॉबिंग संबंधी खुलासे की नयी रिपोर्ट में यह जानकारी सामने आई है.

इसके अनुसार अमेरिकी वालमार्ट स्टोर्स ने 31 दिसंबर 2012 में विभिन्न मुद्दों पर लॉबिंग के लिए 14.8 लाख डॉलर 'लगभग आठ करोड़ रुपये' खर्च किए.

इसमें भारत में एफडीआई से जुड़े मुद्दे पर विचार विमर्श पर खर्च शामिल है.

आंकड़ों के अनुसार कंपनी ने 2012 में कुल मिलाकर इस मद में 61.3 लाख डॉलर 'लगभग 33 करोड़ रुपये' खर्च किए.
अमेरिका में कंपनियों द्वारा लॉबिंग मद में किए जाने वाले खर्च का खुलासा करना जरूरी है.

उल्लेखनीय है कि भारत सरकार ने इस बात की जांच शुरू की है कि वालमार्ट ने भारतीय बाजार में प्रवेश के लिए अमेरिका में किस तरह की लॉबिंग की. इस मुद्दे को लेकर भारत में खासा विवाद हुआ था.

वालमार्ट बरसों से भारत में सुपर मार्केट खोलने के लिए अनुमति का इंतजार कर रही है और वह इस मुद्दे पर 2008 से ही लॉबिंग कर रही है.

तब से लेकर अब तक लॉबिंग गतिविधियों पर उसका कुल खर्च 3.40 करोड़ डॉलर '180 करोड़ रुपये' से ऊपर निकल गया है. हालांकि, वालमार्ट के लॉबिंग खर्च में वर्ष 2011 के मुकाबले कमी आई है और इस दौरान यह 78 लाख 40 हजार डॉलर से घटकर 2012 में 61 लाख 30 हजार डॉलर रह गया. इससे पहले कंपनी ने 2010 में कुल 73 लाख 90 हजार डॉलर लॉबिंग पर खर्च किये थे.

फिर बढ़ सकता है रेल किराया : बंसल

रेल सफर और महंगा हो सकता है। रेल मंत्री पवन कुमार बंसल ने किराया बढ़ाने के संकेत दिए हैं। जबकि अभी 21 जनवरी को ही रेल किराया बढ़ाया गया है। रेलमंत्री पवन कुमार बंसल ने चंडीगढ़ में शनिवार को कहा कि 'घाटे की भरपाई के लिए रेल किराया बढ़ाना हमारी मजबूरी है।पिछले महीने बढ़े किराए से एक साल में 6600 करोड़ रुपए की आमदनी होती। लेकिन डीजल महंगा होने के कारण इसमें से करीब 3300 करोड़ रुपए ईंधन पर ही खर्च हो जाएगा। इससे रेलवे पुराने प्रोजेक्ट ही पूरा कर पाएगा। नए प्रोजेक्ट शुरू करने के लिए और पैसों की जरूरत है।' 21 जनवरी को किराए में दो से 30 पैसे प्रति किलोमीटर तक का इजाफा किया गया था।

बैंकों ने की हड़ताल की घोषणा, दो दिन रहेंगे बंद

केंद्रीय ट्रेड यूनियनों की 20 फरवरी से दो दिन की हड़ताल को बैंक कर्मचारी यूनियनों ने भी समर्थन देने का फैसला किया है। बढ़ती महंगाई की वजह से मजदूरी में वृद्धि की मांग को लेकर इस हड़ताल का आह्वान किया गया है।

यूनाइटेड फोरम आफ बैंक यूनियंस (यूएफबीयू) के तहत नौ बैंक यूनियनों ने भी 20 और 21 फरवरी को हड़ताल पर जाने का फैसला किया है। नेशनल आर्गेनाइजेशन आफ बैंक वर्कर्स (एनओबीडब्ल्यू) ने यह जानकारी दी।

भारतीय राष्ट्रीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (इंटक), अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक), भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस), सेंटर आफ इंडियन ट्रेड यूनियंस (सीटू) और आल इंडिया यूनाइटेड ट्रेड यूनियन सेंटर (एआईयूटीयूसी) सहित सभी केंद्रीय 11 ट्रेड यूनियनों ने हड़ताल पर जाने की धमकी दी है।

एनओबीडब्ल्यू ने कहा कि बैंक यूनियनें कर्मचारियों के वेतन संशोधन को जल्द से जल्द लागू करने की मांग कर रही हैं। यह नवंबर, 2012 से किया जाना है। इसके अलावा बैंक द्वारा बैंकिंग क्षेत्र सुधारों का विरोध किया जा रहा है। साथ ही वे बैंकों के विलय की किसी भी योजना का विरोध कर रहे हैं।

पिछले महीने बैंकिंग नियमन कानून और बैंकिंग कंपनीज कानून में संशोधन के विरोध में चार बैंक यूनियनें हड़ताल पर गई थीं। इसके तहत सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में विदेशी पूंजी लाने का प्रावधान है।

`संविधान के अंगों को सीमाओं का सम्मान करना चाहिए`

खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति देने के सरकार के फैसले पर उच्चतम न्यायालय द्वारा सवाल उठाये जाने के कुछ ही दिनों बाद कानून मंत्री अश्विनी कुमार ने कहा है कि न्यायपालिका, कार्यपालिका एवं विधायिका को एक दूसरे के अधिकार क्षेत्र की सीमाओं का सम्मान करना चाहिए तथा एक दूसरे के साथ सामंजस्य के साथ काम करना चाहिए।

उन्होंने एक नये विधेयक के उस विवादास्पद उपबंध का बचाव किया जिसमें न्यायाधीशों को खुली अदालत में लोगों के खिलाफ मौखिक टिप्पणी करने से रोका गया है। कानून मंत्री ने कहा कि इस प्रावधान के पीछे मजबूत तर्क है क्योंकि न्यायाधीशों को टिप्पणी को संदर्भ से हटाकर पेश किया जाता है, जिससे लोगों की छवि प्रभावित होती है।

अश्विनी कुमार ने कहा, ''मैं केवल यही कहना चाहता कि शासन के तीनों अंगों :कार्यपालिका, न्यायपालिका एवं विधायिका: को आपसी सामंजस्य के साथ काम करना चाहिए तथा अपने अधिकार क्षेत्र की सीमाओं का सम्मान करना चाहिए।'' उन्होंने पीटीआई को दिये साक्षात्कार में कहा, ''मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि प्रत्येक अंग को दिये गये अधिकार क्षेत्र के संवैधानिक मानकों ने संविधान की योजना के अनुरूप ही कमोबेश काम किया है। न्यायाधीशों ने भी स्वयं यह बात कई बार कही है कि वह नीति निर्माण के क्षेत्र में नहीं जाना चाहते।'' उन्होंने यह बात इस सवाल के जवाब में कही कि ऐसी धारणा है कि न्यायपालिका अपने कार्यक्षेत्र से बाहर आ रही है। इसी संबंध में उन्हें पिछले माह उच्चतम न्यायालय द्वारा खुदरा क्षेत्र एफडीआई को मंजूरी देने के सरकार के निर्णय पर उठाये सवाल का भी हवाला दिया गया।

उच्चतम न्यायालय ने सरकार से पूछा था कि क्या खुदरा क्षेत्र में एफडीआई एक ''राजनीतिक तमाशा'' है। शीर्ष न्यायालय ने सरकार से यह भी जानने का प्रयास किया है कि वह खुदरा क्षेत्र को खोलने के बाद छोटे व्यापारियों के हितों की रक्षा कैसे करेगी। उच्चतम न्यायालय के सवालों पर कोई टिप्पणी किये बिना अश्विनी कुमार ने कहा कि उच्चतम न्यायालय के हालिया फैसले ''न्यायिक अधिकार क्षेत्र के संबंध में संवैधानिक दायरों के उल्लेख के जरिये आये हैं।'' शीर्ष न्यायालय के सवालों के मद्देनजर वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री आनंद शर्मा ने हाल में कहा था, ''सभी संस्थानों को कार्यपालिका, विधायिका एवं न्यायपालिका के बीच के संवैधानिक विभाजन का सम्मान करना चाहिए।'' शर्मा कह चुके हैं, ''यह महत्वपूर्ण है कि सभी संस्थान कार्यपालिका, विधायिका एवं न्यायपालिका के बीच संवैधानिक विभाजन का सम्मान करें। इस संतुलन में ऐसा कोई भी बदलाव जिससे भारत में निवेश करने को उत्सुक लोग भ्रमित हों, बचा जाना चाहिए। ऐसे निवेश से नौकरियों का सृजन, प्रौद्योगिकी उन्नयन तथा आधारभूत सुविधाओं का विकास होगा।'' संसद में विचाराधीन न्यायिक मानक एवं जवाबदेही विधेयक की चर्चा करते हुए कानून मंत्री ने उस विवादास्पद उपबंध का बचाव किया जो खुली अदालतों में लोगों के खिलाफ मौखिक टिप्पणियां करने से न्यायाधीशों को रोकता है। पिछले साल दिसंबर में सरकार ने न्यायिक मानकों संबंधी विधेयक पर इस उपबंध को बरकरार रखने का निर्णय किया था। उन्होंने कहा कि सरकार नहीं बल्कि स्वयं न्यायाधीशों को तय करना होगा कि अदालत में की गयी टिप्पणी अनिवार्य थी या नहीं।

अश्विनी कुमार ने कहा, ''अंतत: न्यायिक प्रणाली के भीतर उनके वरिष्ठ न्यायाधीशों को ही यह निर्णय करना पड़ेगा कि कोई विशेष व्यवस्था या टिप्पणी जरूरी थी या नहीं..किसी भी तरह से निर्णय करने के न्याय क्षेत्र के अधिकार में घुसपैठ की कोई भी मंशा नहीं है।'' उन्होंने कहा कि प्रावधान के पीछे एक मजबूत तर्क है क्योंकि कई अवसरों पर देखा गया है कि न्यायाधीशों की टिप्पणियों को संदर्भ से हटा दिया जाता है। इससे उनके समक्ष पेश कारण को नुकसान पहुंचता है या उनके समक्ष पेश व्यक्ति की छवि प्रभावित होती है।

केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने न्यायिक मानक एवं जवाबदेही कानून में संशोधनों को मंजूरी दी है। यह विधेयक लोकसभा में पारित हो चुका है और राज्यसभा में विचाराधीन है। सूत्रों ने बताया कि सरकार ने विवादास्पद उपबंध को बरकरार रखते हुए कुछ बदलाव किये हैं ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि यह संविधान के अनुच्छेद 14 की भावना के अनुरूप हो। इस अनुच्छेद के अनुसार कानून के समक्ष सब समान हैं।

इससे पूर्व के अनुबंध में न्यायाधीशों को किसी संवैधानिक या सांविधिक प्राधिकार या सांविधिक निकाय या सांविधिक संस्थान या किसी अध्यक्ष या किसी सदस्य या किसी अधिकारी के आचरण, किसी लंबित मामले अथवा न्यायिक निर्धारण के लिए उठने वाले संभावित मामलों में अवांछित टिप्पणी करने से रोका गया था। संशोधित उपबंध में न्यायाधीशों को किसी संवैधानिक निकाय या अन्य व्यक्तियों के खिलाफ अवांछित टिप्पणी करने से रोका गया है।

अश्विनी कुमार ने इस बात पर बल दिया कि सरकार कानून के जरिये यह स्पष्ट करने का प्रयास करना चाहती है कि ''न्यायिक प्रणाली में आत्म अनुशासन का तत्व निहित है। लिहाजा किसी को भी, उच्च न्यायपालिका के सभी सदस्यों सहित, कोई आपत्ति क्यों होनी चाहिए।'' उन्होंने यह बात इस सवाल के जवाब में कही कि क्या उपबंध से न्यायापालिका अप्रसन्न हो सकती है। यह विधेयक पिछले साल लोकसभा में बजट सत्र के दौरान तेलंगाना मुद्दे पर हंगामे के बीच पारित हुआ था।

प्रख्यात न्यायविदों एवं उच्च न्यायपालिका के कड़े विरोध के बाद सरकार ने उपबंध पर पुनर्विचार करने पर सहमति जतायी और उसे मानसून सत्र में राज्यसभा में पारित होने के लिए नहीं रखा गया। विधेयक में नागरिकों को अधिकार दिया गया है कि वे भ्रष्ट न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायत कर सकते हैं। विधेयक के इस उपबंध की आलोचना हो रही है कि इसमें खुली अदालत में न्यायाधीशों के बोलने पर पाबंदी लग जायेगी। उच्च सदन में पारित होने के बाद इस विधेयक को फिर से लोकसभा में मंजूरी के लिए भेजा जायेगा।

महज कम्युनिज्म की ओर आकृष्ट होने से कोई आतंकवादी नहीं हो जाता: कोर्ट

बंबई उच्च न्यायालय ने प्रतिबंधित कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) के चार कथित सदस्यों को जमानत देते हुए कहा कि सिर्फ कम्युनिस्ट विचारधारा की ओर आकृष्ट होना किसी व्यक्ति को आतंकवादी समूह का सदस्य घोषित करने का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता।

न्यायमूर्ति अभय थिप्से ने पिछले सप्ताह धवल धेंगेल, सिद्धार्थ भोंसले, मयूरी भगत और अनुराधा सोनुले प्रत्येक को 30-30 हजार रुपये के मुचलके पर जमानत दी थी।

चारों को आतंकवाद निरोधक दस्ते ने अप्रैल 2011 में भाकपा (माओवादी) का सदस्य होने के आरोप में गिरफ्तार किया था। भाकपा (माओवादी) को केंद्र सरकार एक आतंकवादी संगठन घोषित कर चुकी है।

अधिवक्ता मिहिर देसाई ने इनके लिए जमानत मांगते हुए दलील दी कि प्रथम दृष्टया आरोपियों के खिलाफ कोई मामला नहीं बनता और अभियोजन पक्ष की कहानी भरोसेमंद नहीं है क्योंकि यह कम्युनिस्ट दर्शन पर आधारित कुछ साहित्य और सीडी की आरोपियों के पास से बरामदगी पर आधारित है।

न्यायमूर्ति थिप्से ने कहा, ''ऐसा कोई आरोप नहीं है कि आवेदकों ने हिंसा की किसी घटना को अंजाम देने की साजिश रची थी। उनकी दिलचस्पी सामाजिक मुद्दों को उठाने में लगती है। इन सामाजिक मुद्दों को उठाने और सामाजिक व्यवस्था में बदलाव की जरूरत है इस बात को उठाने में कुछ भी गलत नहीं है।'' उन्होंने कहा कि इसी तरह की राय कुछ राष्ट्रीय और प्रमुख नेताओं ने जाहिर की। इस तरह के नजरिए की अभिव्यक्ति किसी व्यक्ति को भाकपा :माओवादी: जैसे किसी आतंकवादी संगठन का सदस्य नहीं घोषित कर सकती।

अदालत ने कहा, ''ऐसा लगता है कि आवेदक कम्युनिस्ट दर्शन की ओर आकृष्ट हैं लेकिन महज इतने से ही वे आतंकवादी या अपराधी नहीं हो जाएंगे।'' अदालत ने कहा, ''भ्रष्टाचार, सामाजिक विषमता और गरीबों के शोषण का विरोध करना और बेहतर समाज की आकांक्षा रखना हमारे देश में प्रतिबंधित नहीं है। हमारे समाज में ये खामियां हैं इनको उजागर करने को प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता और न ही दंडनीय बनाया जा सकता है।'' अदालत ने इन मुद्दों में आवेदकों की दिलचस्पी और सामाजिक जागरूकता पैदा करने के उनके प्रयासों को सराहनीय बताया।

पुणे से गिरफ्तार किए गए सात आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता, आपराधिक साजिश और गैर कानूनी गतिविधि निरोधक अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था।

FII ने जनवरी में किया 22,000 करोड़ रु का निवेश

विदेशी निवेशकों ने जनवरी में भारतीय शेयर बाजारों में 22,000 करोड़ रुपए (4 अरब डॉलर) से अधिक का निवेश किया।

सेबी के आंकड़ों के मुताबिक, विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) ने जनवरी में 77,859 करोड़ रुपए मूल्य के शेयरों की लिवाली की, जबकि इस दौरान उन्होंने 55,800 करोड़ रुपए मूल्य के शेयर बेचे। इस तरह से उनका शुद्ध निवेश 22,059 करोड़ रुपए रहा।

यह लगातार सातवां महीना रहा जब एफआईआई ने भारतीय शेयर बाजारों में निवेश किया। एफआईआई जुलाई, 2012 से ही घरेलू शेयर बाजारों में निवेश कर रहे हैं।

बाजार विश्लेषकों ने कहा कि सरकार द्वारा गार का क्रियान्वयन दो साल तक के लिए टालने और डीजल मूल्यों को आंशिक रूप से नियंत्रण मुक्त करने सहित विभिन्न उपायों से शेयर बाजार में एफआईआई का निवेश प्रवाह बना हुआ है।

इसके अलावा, रिजर्व बैंक द्वारा मौद्रिक नीति में नरमी का रुख अपनाने से भी विदेशी निवेशक भारत की ओर आकषिर्त हो रहे हैं।

एफआईआई ने शेयर बाजारों के अलावा जनवरी में ऋण बाजार में 2,947 करोड़ रुपए का निवेश किया।

समाज में बढ़ती असहिष्णुता को दर्शाता है नंदी-हसन विवाद: थरूर

केंद्रीय मंत्री शशि थरूर ने कहा है कि कमल हासन की फिल्म 'विश्वरूपम' या समाजशास्त्री आशीष नंदी की कथित दलित विरोधी टिप्पणी को लेकर हुआ हालिया विवाद समाज का बिंब है जो लगता है कि प्रतिस्पर्धी असहिष्णुता की संस्कृति बनता जा रहा है।

उन्होंने लेखक सलमान रुश्दी को पिछले हफ्ते कोलकाता में प्रवेश की अनुमति नहीं दिए जाने पर भी खेद प्रकट किया।

किसी व्यक्ति की भावना आहत न हो और हिंसा न भड़के इसके लिए व्यक्ति की अभिव्यक्ति में सतर्क संतुलन स्थापित करने पर जोर देते हुए थरूर ने कहा कि देश अब तक उस स्थिति तक नहीं पहुंचा है जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में ठेस पहुंचने के अधिकार को शामिल किया जाना चाहिए।

एक समाचार चैनल पर थरूर ने कहा, 'मेरी राय में यह कहने के अधिकार को शामिल किया जाए जो किसी को ठेस पहुंचा सकता है और उससे विरोधी दलील चर्चा तथा वाद-विवाद पैदा होता है लेकिन इस बिंदु तक नहीं जहां कोई सरकार या न्यायाधीश इस बात को निर्धारित करे कि यह जन व्यवस्था के लिए खतरा है।'

उन्होंने कहा, 'एक समाज के तौर पर हमारे लिए सही संतुलन ढूंढना चुनौती है जिसका पलड़ा स्वतंत्रता की ओर अधिक भारी हो, न कि दमन की ओर।'

नंदी की कथित दलित विरोधी टिप्पणी के बारे में पूछे जाने पर थरूर ने कहा, 'समाजशास्त्री ने जो कहा उससे असहमत होने के वैध आधार थे लेकिन राजनैतिक वर्ग के एक तबके की ओर से उनकी गिरफ्तारी की मांग करना बिल्कुल अनावश्यक था।'
हालांकि, उन्होंने महसूस किया कि नंदी किसी को ठेस पहुंचाने से बचने के लिए अपनी बात बेहतर तरीके से रख सकते थे।

उन्होंने यह भी कहा कि सेंसर बोर्ड की अनुमति मिलने के बाद कमल हासन की फिल्म विश्वरूपम पर प्रतिबंध नहीं लगाया जाना चाहिए था।

उन्होंने कहा, 'एक बार फिल्म को सेंसर बोर्ड का प्रमाण पत्र मिल जाने के बाद उसे दिखाया जाना चाहिए और अगर फिल्म में कही गई बात को आप नहीं समझते हैं तो आप फिल्मकार से संवाद करें, जरूरत पड़ने पर दलील दें, प्रदर्शन करें लेकिन फिल्म का प्रदर्शन न रोकें।'

इन तमाम मुद्दों की समीक्षा करते हुए थरूर ने कहा कि पिछले हफ्ते जो अशांति देखने को मिली वो इसलिए थी 'क्योंकि हम प्रतिस्पर्धी असहिष्णुता की संस्कृति बनते जा रहे हैं।'

ब्लैक मनी पर चुप तो नहीं बैठी है सरकार

नवभारत टाइम्स | Sep 20, 2012, 09.00AM
अवधेश कुमार

काले धन और भ्रष्टाचार को लेकर जो तूफान खड़ा है उसमें सच और झूठ के बीच निर्णय करना कठिन हो गया है। खासकर विदेशों में जमा काले धन के बारे में ऐसे-ऐसे आंकड़े दिए जा रहे हैं, जिनको सुनने वाला पहली बार में ही अचंभित हो जाता है। पहले विपक्षी दलों ने इन आंकड़ों को आधार बनाकर सरकार पर हमला आरंभ किया, फिर स्वामी रामदेव और अन्ना हजारे के अभियानों से इन पर बहस चरम तक पहुंच गई। इन दोनों अभियानों तथा विपक्षी दलों का आरोप यही है कि सरकार जानबूझकर काले धन को बाहर निकालने के लिए कठोर उपाय नहीं कर रही है, क्योंकि सरकार में शामिल लोगों का ही अवैध धन विदेशों में पड़ा हुआ है। राजनीति के लिए यह इतना बड़ा मुद्दा है कि इसके आधार पर विपक्षी दल अगले आम चुनाव में अपनी जीत की उम्मीद करने लगे हैं। लेकिन क्या सच भी यही है? क्या वाकई सरकार काले धन के मामले में हाथ पर हाथ धरे बैठी है?

पांच सूत्री रणनीति
अगर आप तटस्थ होकर तथ्यों का विश्लेषण करेंगे तो इसका उत्तर आएगा, नहीं। सच यह है कि वर्तमान राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय ढांचे में इस सरकार ने जितने कदम उठाए हैं, उतने इसके पूर्व कभी नहीं उठाए गए। अगर आप उनकी संक्षिप्त सूची भी बनाएंगे तो विपक्ष के हमले और बाबा-अन्ना अभियानों के कारण बने वातावरण से अलग तस्वीर नजर आने लगेगी। सरकार ने इस मामले में पांच सूत्री रणनीति बनाई है। ये हैं- आंतरिक कानूनी ढांचों में बदलाव, उसके अनुरूप कुशल मानव संसाधन का विस्तार, देश-विदेश में स्थित काले धन का वास्तविक आकलन, अंतरराष्ट्रीय संधियों से जुड़ना, द्विपक्षीय संधियां करना और उनके क्रियान्वयन पर तत्काल आगे बढ़ना। मार्च 2011 में काले धन का मूल्यांकन करने की जिम्मेदारी तीन संस्थानों को दी गई, जिन्हें 18 महीने में अपनी रिपोर्ट देनी थी।

बहु स्तरीय सक्रियता
केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड के अध्यक्ष की अध्यक्षता में एक समिति 27 मई 2011 को गठित की गई, जिसका मकसद काले धन को जब्त करने, उसे राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करने तथा कठोर सजा के प्रावधान सुझाना है। मनी लॉन्ड्रिंग कानून में 1 जून 2009 को किए गए संशोधन के बाद अवैध धन को वैध बनाने के घोषित क्षेत्र का विस्तार हुआ है और कार्रवाई ज्यादा आसान हुई है। काले धन के लिए विशेष तौर पर अपराध छानबीन संबंधी निदेशालय का गठन किया जा चुका है। अंतरराष्ट्रीय कर एवं मूल्य हस्तांतरण निदेशालय को मजबूत किया गया है और भ्रष्टाचार के मामलों की सुनवाई के लिए विशेष न्यायालयों की संख्या 71 करने का निर्णय हो चुका है। मौजूदा वित्त वर्ष के बजट प्रावधानों के अनुरूप घरेलू स्तर पर वित्त कानून 2012 के तहत विदेशों की परिसंपत्तियों की घोषणा अनिवार्य की गई है और विदेशी संपत्ति संबंधी मामलों में पिछले 16 वर्ष तक के मूल्यांकन का प्रावधान किया गया है।

वैदेशिक मोर्चे पर आएं तो भ्रष्टाचार से संबंधित संयुक्त राष्ट्रसंघ व्यवस्था को भारत ने अनुमोदित कर दिया है। 26 जनवरी 2012 को भारत ने कर मामलों पर परस्पर प्रशासनिक सहायता बहुपक्षीय अंतरराष्ट्रीय समझौते (एएएमए) पर हस्ताक्षर किया। इसमें कर दावों से संबंधित सूचनाओं के स्वयमेव आदान-प्रदान, पूर्व सूचनाओं के आदान-प्रदान और वसूली में सहायता का प्रावधान है। 1 जून 2012 से इसे लागू किया जा चुका है। कर उद्देश्यों के मूल्यों से संबंधित सूचना के आदान-प्रदान के लिए कार्यरत वैश्विक मंच पीयर रिव्यू ग्रुप का उप सभापति पद भारत के पास है।

भारत मनी लॉन्ड्रिंग विरोधी कार्रवाई एवं आतंकवाद के वित्त पोषण पर रोक (सीएफटी) को बल प्रदान करने के लिए उत्तरदायी फाइनैंशल एक्शन टास्क फोर्स का सदस्य बन चुका है। वित्तीय शुचिता और आर्थिक विकास संबंधी टास्क फोर्स, मनी लॉन्ड्रिंग के विरुद्ध एशिया पैसिफिक ग्रुप (एपीजी) और दुनिया भर की वित्तीय खुफिया इकाइयों के बीच संपर्क, संचार और अंत:क्रिया को बढ़ावा देने संबंधी तंत्र (एग्मॉन्ट) से भी भारत जुड़ चुका है।

द्विपक्षीय वैश्विक मोर्चे पर देखें तो दोहरे कराधान से बचने वालों को पकड़ने से संबंधित समझौता डबल टैक्सेशन एवॉएडेंस एग्रीमेंट्स यानी डीटीएए पर हस्ताक्षर हो रहे हैं। कर सूचना विनिमय समझौता टीआईईए उन देशों के साथ किया गया है जो डीटीटीए नहीं चाहते। आज की स्थिति में 65 देशों के साथ संधि पर बातचीत पूरी है तथा दोनों मिलाकर 33 संधियों पर हस्ताक्षर हो चुके हैं। स्विस बैंकों के लिए बदनाम स्विट्जरलैंड सहित ऐसे कई देश इसमें शामिल हैं जिन्हें टैक्स हैवन कहा जाता है। टीआईईए के तहत हमें संबंधित व्यक्ति की पहचान बतानी होती है, जिसे टाले जाने की संभावना मौजूद रहती है। स्विट्जरलैंड के साथ सूचना विनिमय के लिए पहचान बताने की व्यवस्था की उदार व्याख्या लिबर इंटरप्रिटेशन ऑफ आइडेंटिटी संबंधी समझौता हुआ जो 1 अप्रैल 2011 से लागू है।

पकड़े लाख करोड़
इन कदमों से भारतीय नागरिकों द्वारा विदेशों में संपत्तियों एवं भुगतान संबंधी 12 हजार 500 सूचनाएं मिलीं जिनकी समीक्षा और छानबीन जारी है। जर्मनी और फ्रांस से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर 600 करोड़ रुपए की कर चोरी पकड़ी गई, जिसमें 200 करोड़ की वसूली की जा चुकी है। देश के अंदर संदिग्ध लेनदेन की 30, 765 सूचनाएं मिली जिनकी जांच संबंधित एजेंसियों द्वारा की जा रही है। काले धन के प्रवाह में सबसे बड़ा योगदान गलत मूल्य का है। मूल्य हस्तांतरण निदेशालय ने गत वित्तीय वर्ष 67, 768 करोड़ रुपए और इस वर्ष 43, 531 करोड़ के गलत मूल्य के मामले पकड़े हैं।

अंतरराष्ट्रीय कर निदेशालय ने गत दो वित्तीय वर्ष में 48, 951 करोड़ रुपए सीमापार लेनदेन से कर में प्राप्त किया। गत तीन वर्षों में केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड की अन्वेषण इकाई ने 32 हजार करोड़ रुपए की अघोषित आय पकड़ी है तथा 2600 करोड़ की अघोषित संपत्ति जब्त की है। आयकर विभाग ने व्यवसायी कंपनियों की छानबीन में 17, 325 करोड़ रुपए की अघोषित आय पकड़ी है। इतने सब के बाद भी देश भरोसा क्यों नहीं कर पा रहा है कि यह सरकार काला धन बाहर ला सकेगी?
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