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Wednesday, 13 February 2013

'पीसफुल' कश्मीर By एम ए सराफ


'पीसफुल' कश्मीर

कश्मीर घाटी में कर्फ्यू का यह चौथा दिन था। जहांगीर चौक के पास खड़ा एनडीटीवी का रिपोर्टर चैनल को लाइव दे रहा था। वह दावा कर रहा था कि पिछले चौबीस घण्टे से कश्मीर में हालात पीसफुल हैं। इस रिपोर्टर के दावे को सुनकर कोई भी कश्मीरी हैरान हो सकता है कि इसके लिए पीस का मतलब क्या होता है? कब्रगाह दुनिया में सबसे पीसफुल जगह होती है। मुर्दा अपनी जगह से न तो हिलते डुलते हैं और न ही उन्हें एक दूसरे से बात करने की जरूरत होती है। अगर पीस का मतलब ऐसा ही है तो कब्रगाह से ज्यादा शांति और कहां मिलेगी? हो सकता है एनडीटीवी का रिपोर्टर जिस पीस की दुहाई दे रहा था उसका मतलब भी कुछ ऐसी ही हो क्योंकि पिछले चार दिनों से कश्मीर घाटी में शांति व्यवस्था बनाये रखने के नाम पर 80 लाख लोगों को उनके घरों में कैद कर दिया गया है।
पुलिस और अर्धसैनिक बलों के जवान सिर्फ सड़कों पर ही गश्त नहीं लगा रहे हैं बल्कि गलियों और मुहल्लों तक में घुसकर इस बात की तस्दीक कर रहे हैं कि कर्फ्यू का असर कमतर न होने पाये। सड़कों, गलियों और चौराहों को कंटीले तारों से घेर दिया गया है। जिन लोगों ने यू ट्यूब और इंटरनेट पर ऐसे हालातों का जायजा लिया हो उन्हें हालात समझने में ज्यादा मुश्किल नहीं होगी। धरती के स्वर्ग को पूरी तरह से कैद कर लिया गया है। सख्ती और पहरा इतना कड़ा कि दक्षिण अमेरिका, सोवियत यूनियन और नाजी जर्मनी के शासक भी धरती पर लौटकर आयेंगे तो कश्मीर में सरकार की सख्ती से बहुत कुछ सीखकर जाएंगे। कम से कम उन्होंने भी बीमार, बेजार और बच्चों को बख्स दिया होगा। यहां सब सरकार के निशाने पर हैं।
और उस पर भी सख्ती से शांति के नियमों को पालन का आलम यह कि संचार सेवाएं पूरी तरह से रोक दी गई हैं। दिल्ली में बैठी सरकार को शायद महसूस हो गया है कि कोई भी समाचार अच्छा समाचार नहीं होता है इसलिए इंटरनेट और केबल टीवी न्यूज चैनलों के तार काट दिये गये हैं। जो लोकल न्यूज चैनल थे वे तो 2010 से ही न्यूज बताने के अधिकार से वंचित किये जा चुके हैं। हमारे मुख्यमंत्री भी कह ही चुके हैं कि समाचार में मिलावट नहीं होनी चाहिए। समाचार में मिलावट करने से भ्रम की स्थिति पैदा होती है और लोग भटक जाते हैं। लेकिन दिल्ली की सरकार हमारे मुख्यमंत्री से भी ज्यादा समझदार है। उसने जो समाधान निकाला है उसमें शायद उसका मानना है कि समाचार का न होना ही समाचार का सबसे अच्छा होना होता है। लेकिन इक्कीसवीं सदीं की ये सरकारें इस बात को शायद अभी भी नहीं समझती हैं कि अब समाचार से दूर रख पाना उतना भी आसान नहीं है जितना सरकार समझती है। अब इंटरनेट के इस युग में ढेरों ऐसे रास्ते हैं जिनके जरिए समचारों तक पहुंच बनाई जा सकती है और अपनी बात भी पहुंचाई जा सकती है। लेकिन सवाल तो उस मानसिकता है जो भ्रम रोकने के लिए ऐसे उलुल जुलूल उपाय करती है। इन उपायों का सीधा असर कश्मीरी आवाम पर हुआ है वे सचमुच एक दूसरे से पूरी तरह से कट गये हैं। ऐसी स्थिति में भ्रम फैलने से रूकेगा या और तेजी से फैलेगा इसे समझना क्या ज्यादा मुश्किल है?
कश्मीर में यह सब क्यों किया गया है? कश्मीर में यह सब इसलिए किया जा रहा है क्योंकि स्वयं को आतंकवादी मान चुके अफजल गुरू को न्यायिक प्रक्रिया के बाद सजा के बतौर फांसी दे दी गई। अफजल गुरू की फांसी पर अपना बयान देते हुए गृहमंत्री जी ने कहा कि सभी न्यायिक प्रक्रियाओं को पूरा करते हुए अफजल गुरू को फांसी दी गई। अगर ऐसा है तो फिर पूरे कश्मीर को बंधक क्यों बनाकर रखा गया है? कहीं ऐसा तो नहीं है कि प्रशासन को पता है कि उन्होंने कुछ ऐसा कर दिया है जिसमें सबकुछ सही नहीं है? या फिर उन्हें यह डर है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की सबसे बड़ी संस्था पर हमला करनेवाले आतंकवादी को कश्मीर में हीरो घोषित कर दिया जाएगा? इन इंतजामों के बाद भी वह सब होगा। कश्मीरी लोगों के बारे में लंबे चौड़े दावों के बाद भी सच्चाई यही है कि यहां के लोग भारत से नफरत करते हैं। उनके मन में पहले से ही भारत के खिलाफ नफरत भरी है, ताजा हालात उस नफरत को क्लाइमेक्स तक पहुंचाने में मदद ही करेंगे। अगर भारतीय अधिकारियों को यह लगता है कि कश्मीरी लोगों को उनके घरों में नजरबंद करके वे उस नफरत और गुस्से पर काबू पा लेंगे तो उन्होंने गंभीर चूक कर दी है। कश्मीरी आदमी का स्वभाव बिल्कुल दूसरी का होता है। वह बहुत तेज दिमाग होता है। अति से अति का अत्याचार भी वह बर्दाश्त करता रहता है। वह अपने गुस्से पर काबू रखता है, लेकिन कभी कुछ भूलता नहीं है और मौका मिलने पर सारा हिसाब बराबर करता है। कश्मीरी तात्कालिक तौर पर प्रतिक्रियावादी नहीं होता है।
कश्मीर में जो नयी पौध उभरकर सामने आयी है उसने आतंक और हिंसा का वह दौर नहीं देखा है जो कभी कश्मीर का अतीत रहा है। लेकिन वह भी ऐसी नजरबंदी और विरोध प्रदर्शनों का गवाह तो है ही जो कश्मीर में कभी खत्म नहीं होते। उन्हें इस तरह की नजरबंदी बहुत परेशान नहीं करती है क्योंकि वे इसके अभ्यस्त हैं। इसलिए इस तरह की नजरबंदी से प्रशासन को तात्कालिक तौर पर जो हासिल हुआ है वह वही पीस है जो किसी कब्रगाह में जाने  पर महसूस होती है। लेकिन उन्हें नहीं पता कि लावा भीतर ही भीतर सुलग रहा है। जिस दिन मौका आयेगा बिना किसी पूर्व चेतावनी के ज्वालामुखी फट जाएगा। यह सब तत्काल नहीं होने जा रहा है। खुद मुख्यमंत्री भी यह मानते हैं कि ऐसी घटनाओं का असर दीर्घकालिक होता है। 90 के दशक में मकबूल भट कश्मीरियों के रोल मॉडल थे। 11 फरवरी 1984 को मकबूल भट को तिहाड़ जेल में फांसी दी गई थी। फांसी के तत्काल बाद कश्मीर में कोई खास प्रतिक्रिया नहीं हुई थी और भट के समर्थकों के एक छोटे से समूह ने उन्हें याद रखा था। लेकिन छह साल बाद 1990 में अचानक ज्वालामुखी फट पड़ा और मकबूल भट कश्मीरियों के लिए रोल मॉडल हो गया। अफजल गुरू भी उन्हीं नौजवानों में शामिल था जिसके लिए मकबूल भट एक हीरो थे।
हम बहुत अतीत में न भी जाएं तो जो ताजा हालत हैं उसमें अफजल गुरू की फांसी के बाद देश के हर हिस्से में कश्मीरी नौजवानों द्वारा विरोध प्रदर्शन की छुटपुट खबरें अभी से मिल रही हैं। खुद घाटी में भी लाख बंदिशों के बाद नौजवानों को घरों में कैद रख पाने में सरकार नाकाम रही है। लेकिन इन सबके बीच मीडिया की भूमिका भी परेशान करनेवाली है। भारत के टीवी चैनल जनता के सामने वह सच्चाई नहीं ला रहे हैं कि उनके द्वारा की जानेवाली गलतियों की क्या क्या सजा कश्मीरियों को भुगतनी पड़ती है। उन्होंने जनभावना का ध्यान रखते सामूहिक भावना से एक फांसी जरूर दे दी है। लेकिन अभी भी मौका पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है। दिल्ली की सरकार नजरबंदी को खत्म करके कम से कम इतना कर दे कि अफजल गुरू की लाश उसके परिवारवालों को लौटा दे ताकि वे उसका विधिवत अंतिम संस्कार कर सकें। निश्चित रूप से इसका एक नतीजा यह सामने आया कि अफजल गुरू की मजार पर कोई बड़ा सा गुंबद खड़ा हो जाएगा लेकिन यह गुंबद उतना खतरनाक नहीं होगा जितना तिहाड़ जेल के भीतर खुदी कब्र जो घाटी में उसे "शहीद" का दर्जा दिला रही है।
(एम ए सराफ ने यह लेख जम्मू कश्मीर के अंग्रेजी अखबार ग्रेटर कश्मीर में लिखा है जिसका प्रिंट संस्करण कर्फ्यू के कारण बाजार में भले ही न आ रहा हो लेकिन इंटरनेट संस्करण नियमित प्रकाशित हो रहा है।)


देखो “बांग्ला देश” जाग रहा है भारत को फिर कुछ सिखा रहा है


देखो "बांग्ला देश" जाग रहा है भारत को फिर कुछ सिखा रहा है



शमशाद इलाही शम्स
"बांग्ला देश" में आजकल एक बहुत महत्वपूर्ण इतिहास रचा जा रहा है। 1970-71 में मात्र नौ माह के दौरान हुए गृह युद्ध में वहाँ 30 लाख लोगों की जानें गयीं, दो लाख महिलाओं का बलात्कार हुआ और अपर संपत्ति की नुक्सान हुआ। मानव जाति ने ऐसे घिनौना घटनाक्रम यूं तो कई बार देखे हैं लेकिन बर्रे सगीर में इतने कम समय में इतना बड़ा काण्ड भारत विभाजन (जिसमें दस लाख लोग मरे) के बाद पहली बार हुआ। आजकल एक ट्रिब्यूनल "बांग्ला देश" सरकार ने बनाया है जो 1971 की घटनाओं की जाँच कर रहा है और गुनाहगारो को सजा दे रहा है।
जमात-ए-इस्लामी ने (जिसे पाकिस्तान में कुछ लोग जमात-ए-हरामी भी कहते बताये जाते हैं) इस दौरान बांग्लादेश में सबसे विध्वंसकारी रोल अदा किया जिसने पाकिस्तानी सेना के साथ मिलकर रजाकारअल बद्रअल शम्स जैसी मिलिशिया बनायी और बांग्लादेश की राष्ट्रवादी ताकतों को बेरहमी से कुचला। जमात नेता अब्दुल कलाम आज़ाद उर्फ़ बच्चू रजाकार को 21 जनवरी 2013 को उसकी गैरहाजिरी में (वह पाकिस्तान भाग चुका है) सजा-ए- मौत दी जा चुकी है।
हस्तक्षेप.कॉम के कनाडा में सहयोगी शमशाद इलाही "शम्स" यूं तो किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के छोटे से कस्बे 'मवाना' में पैदा हुए 'शम्स' ने मेरठ कालिज मेरठ से दर्शनशास्त्र विषय में स्नातकोत्तर किया है। पी०एच०डी० के लिये पंजीकरण तो हुआ पर किन्ही कारणवश पूरी न हो सकी। उनका परिवार भारतीय गंगा-जमुनी सँस्कृति का साक्षात जीवंत उदाहरण है। छात्र जीवन से ही वाम विचारधारा से जुड़े तो यह सिलसिला आगे बढ़ता ही गया।
जमात के दूसरे बड़े नेता अब्दुल कादिर मोल्ला को 5 फरवरी 2013 को उनके गुनाहों के लिए (जिसमे एक गाँव में जाकर 344 लोगों की हत्या करने का आरोप साबित हुआ है) आजीवन कारावास की सजा जब सुनाई गयी तब उसका जबरदस्त विरोध हुआ। 'मीरपुर का कसाई' नाम से कुख्यात अब्दुल कादिर मोल्ला को फांसी की सजा दिए जाने की मांग को लेकर पूरे बांग्लादेश में तीव्र प्रदर्शन हुये।
मज़हबी ताकतों का सियासत में दखल और उसके परिणाम को "बांग्ला देश" के अवाम से बेहतर और कौन जान सकता है ? ऐसा नहीं कि वहां धर्म का सियासत में दखल बंद हो गया हो लेकिन 1971 उनके लिए ऐसा ज़ख्म है जिसे वह जब-जब याद करेंगे तब-तब सियासत में धर्म के तड़के को भी याद करेंगे।
भारत में सियासत को धर्म से महरूम करने की कवायद शायद इसलिए नहीं हो सकती क्योंकि अभी तक भारत में रामजन्म भूमि आन्दोलन-बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद आधे भारत में हुए दंगों, गुजरात में हुए नरसंहार आदि की जांच करने के लिए कोई ट्राईब्यूनल बनाने और मानवजाति के प्रति किये गये गुनाह की विवेचना करने की न तो कोई सोच है न कोई आन्दोलन। जब तक ऐसी घटनाओं के जिम्मेदार लोगों को अब्दुल कादिर मोल्ला की भांति सजायें नहीं होतीं तब तक राजनीति में धर्म के प्रचार प्रसार और उसके दुष्परिणामों से मुक्ति नहीं मिल सकती। जब तक यह नहीं होगा तब तक भारत के समाज और उसकी राजनीति का मानावीयकरण जैसा ऐतिहासिक कार्यभार भी अधूरा रहेगा।
दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान हिटलर ने 60 लाख यहूदियों की हत्याएं कीं लेकिन यहूदियों ने हार नहीं मानी। आज भी प्रचार माध्यमों, फिल्मों और किताबों में उस कत्लेआम का जिक्र अक्सर होता है लेकिन भारत के विभाजन में 10 लाख लोग मरेएक आध कहानीकार मंटो आदि को छोड़ दें तो एक कातिलाना खामोशी के सिवा हमारे बुजुर्गो ने हमें कुछ नहीं दिया। इस आपराधिक चुप्पी से किसी भी इंसानी हकूक से हमदर्दी रखने वाले को नफ़रत होगी। "बांग्ला देश" का यह कदम इस आपराधिक चुप्पी का जवाब है।
माईक्रो बैंकिग की महान उपलब्धि के बाद "बांग्ला देश" ने पूरे खित्ते को एक माकूल तोहफा देने की कोशिश की है, एक राष्ट्र की तरफ बढ़ते हुए इस विश्वास के लिए बांग्लादेश की तारीफ़ की जानी चाहिए और मानवताविरोधी मज़हबी जनूनी ताकतों को भी इस बात का अहसास होना चाहिए कि जिस दिन कौमें जाग जाती हैं तब वह अपने मुजरिमों की कब्रें खोद कर भी इन्साफ लेना जानती हैं। आज नहीं तो कल भारत जैसी कितनी भी गहरी निद्रा में सोया हुआ राष्ट्र हो, वह जागेगा जरूर और तब चाहे कोई राष्ट्र पिता हो या माता अथवा ह्रदय सम्राट या विकास पुरुष उसे अपनी करनी का फल भुगतना होगा। जैसा बांग्लादेश जाग रहा है, भारत भी एक दिन जागेगा।


विलुप्ति के कगार पर झारखंडी चित्रकला




विलुप्ति के कगार पर झारखंडी चित्रकला


पिछले बारह वर्षों में झारखंड की आठ सरकारें अपने ही राज्य के लोकरंग एवं लोकसंस्कृति से बेखबर बाजारवादी शक्तियों की चाकरी करने में व्यस्त रहीं. बाजारबाद अपनी तथाकथित आधुनिक संस्कृति द्वारा झारखंड की लोक संस्कृति को नष्ट करने पर उतारू है...
राजीव

झारखंड आदिवासी बहुल इलाका है. लगभग तीस आदिवासी समुदाय राज्य के विभिन्न जिलों में निवास करते हैं, जिनकी संख्या 2011 जनगणना के अनुसार लगभग 80 लाख है. झारखंड में लोक चित्रकला की परम्परा सदियों पुरानी है.
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भारत में मानव सभ्यता जिसे सिन्धु घाटी सभ्यता के नाम से जाना जाता है, में चित्रकला की उत्पति सर्वप्रथम हुयी. झारखंड जंगलों और पहाड़ों से भरा-पूरा क्षेत्र है इसलिए आदिवासियों का प्रिय क्षेत्र रहा है. असुर, बिरहोर, बिरजिया एवं खडि़या झारखंड की प्राचीनतम जनजातियां है जिनमें असुर सबसे प्राचीन या आदिम जनताति है.
कोरबा जनजाति भी काफी प्राचीन है. मुंडा, उरांव जनजातियां बाद की हैं. क्षेत्रीय राजवंशों को समृद्ध इतिहास मिलता है. जैसे छोटानागपूर का नाग, पलामू को रक्सेल तथा सिंहभूम का सिंह वंश. क्षेत्रीय राजवंशों की छत्रछाया में कला और संस्कृति का विकास ऐतिहासिक रहा है झारखंड में.
झारखंड में चित्रकला खासकर लोक चित्रकला की समृद्ध परम्परा पायी जाती है, जिसमें आदिवासी समुदायों की जीवन शैली, सामाजिक, धार्मिक व सांस्कृतिक मान्यताएं परिलक्षित होती हैं. आदिवासियों का प्रकृति प्रेम जगजाहिर है. इनका जन्मजात जुड़ाव जल, जंगल और जमीन से रहा है. आदिवासी प्राकृतिक सौंदर्य के उपासक माने जाते हैं, इसलिए उनके आसपास का प्राकृतिक वातावरण चित्रकला का प्रेरणास्रोत रहा है.
प्रकृति की विविधताओं की तरह झारखंड की चित्रकला में काफी विविधता पायी जाती है. चित्रकला का सहज रूप उनके घरों की सजावट में आज भी देखा जा सकता है. घर की दीवारों पर चिकनी मिट्टी और गोबर का लेप लगाकर स्त्रियां विशेषकर अविवाहित लड़कियां वनस्पतियों से प्राप्त रंगों से विभिन्न प्रकार की आकृतियां एवं ज्यामितिक कलाकृतियां बनाती हैं.
झारखंड के आदिवासियों द्वारा कपड़ा या कागज के छोटे-छोटे टुकड़े को जोड़कर बनाये जाने वाले चित्रफलक को जादोपटिया चित्रकारी कहते हैं. चित्रकार यानी जादो तथा कपड़ा या कागज के छोटे-छोटे टुकड़ों को जोड़कर बनायी गयी पट्टियों पर की जाने वाली चित्रकारी को जादोपटिया चित्रकारी कहते हैं. यह चित्रकारी झारखंड-बंगाल की सीमा क्षेत्र के संथालों में विशेष रूप से प्रचलित है. प्रत्येक पट्टी लगभग पंद्रह से बीस फीट तक चौड़ी होती है और एक पट्टी पर लगभग दस से पंद्रह चित्र संथाल समाज के मिथकों पर आधारित लोक गाथाओं, धार्मिक व सामाजिक रीति-रिवाजों तथा नैतिक मान्यताओं को दर्शाया जाता है.
जादोपटिया चित्रकला में चित्रकार कपड़े पर सुई-धागे से सिलाई कर लगभग पंद्रह से बीस फीट तक चौड़ा पट तैयार करता है तथा कपड़े पर कागज को बेल के गोंद से चिपकाया जाता है. एक पट में प्रचलित मिथकों पर आधारित पांच से दस चित्रों को संयोजित किया जाता है, जिसे दिखाने में लगभग आधे घंटे का समय लिया जाता है. प्राकृतिक रंगों का प्रयोग किया जाता है तथा रंगों को भरने के लिए बकरी के पूंछ से लिए गए बालों से बनायी गयी कूंची का प्रयोग किया जाता है.
प्रत्येक पट्टी में बार्डर का प्रयोग लगभग अनिवार्य होता है. रंगों में प्रायः काला, पीला और हरा का प्रयोग किया जाता है. इन चित्रों को चित्रकार घूम-घूम कर दिखाते हैं तथा दिखाने का तरीका कथा वाचन के रूप में किया जाता है. चित्रकारों का जीवनयापन इसी चित्रकारी द्वारा कथा वाचन से ही चलता है. हालाँकि तेजी से वैश्वीकरण और बाजारवाद से आए आदिवासी समाज में बदलाव से जादोपटिया चित्रकला का ह्रास होने लगा है. चित्रकार या जादो अब सिर्फ चित्रकला के माध्यम से अपना जीवनयापन नहीं कर पा रहे हैं. आर्थिक तंगी के कारण दो जून की रोटी भी जुगाड़ने में भी ये असमर्थ हैं और दूसरे पेशों की तरफ उम्मुख होते नजर आ रहे हैं.
ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखें तो पूर्व में चित्रकला की विषय वस्तु रामायण, महाभारत, कृष्णलीला, यमराज द्वारा दिए जाने वाले दंड, सिद्दू-कान्हू, तिलका मांझी, बिरसा मुंड़ा की शौर्य और विद्रोह गाथा से ली जाती थी, लेकिन वर्तमान में चित्रकला के विषय कम होते जा रहे हैं. आजकल यमराज द्वारा दिए गए दंड़ तक ही यह चित्रकला सीमित होकर रह गयी है.
जादोपटिया चित्रकारी हर पीढ़ी को अपने पिछली पीढ़ी से विरासत में मिलती रही है. परंतु दुर्भाग्य से वर्तमान में विरासत को पीढ़ी दर पीढ़ी ले जाने की प्रवृति में जबरदस्त ह्रास हुआ है, परिणामस्वरूप जादोपटिया विलुप्त होने के कगार पर है. अगर राज्य सरकार जादोपटिया चित्रकारी को संरक्षण देते हुए कला समाज के वृहतर लोगों के साथ जोड़ने एवं अलग से अकादमी बनाने का कार्य नहीं करेगी तो जादोपटिया चित्रकला का नामोनिशान मिट जाएगा.
आदिवासी समाज में प्रचलित दूसरी प्रसिद्ध चित्रकला है सेहराय चित्रकला. सोहराय का त्योहार दीपावली के एक दिन बाद पशुओं को श्रद्धा अर्पित करने के लिए मनाया जाता है. सोहराय चित्रकारी वर्षा ऋतु के बाद घरों की लिपाई-पुताई से आरंभ होता है. आदिवासी महिलाओं के परम्परागत हुनर के कारण ही सोहराय चित्रकारी आज भी अस्तित्व में है. कोहबर चित्रकारी की तरह सोहराय चित्रकारी भी आदिवासी महिलाओं द्वारा फरवरी से जून महीने तक कतिपय प्रटीकों को अपने घरों में चित्रित किया जाता है. प्रतीक चयन ही दोनों चित्रकलाओं यथा सोहराय और कोहबर में अंतर स्थापित करता है.
कोहबर चित्रकारी में आदिवासियों के धार्मिक देवी अर्थात सिकी को चित्रित किया जाता है, जबकि सोहराय चित्रकारी में कला के देवता पशुपति या प्रजापति को चित्रित किया जाता है. कोहबर चित्रकारी में सबसे प्रचलित चित्रकारी है पशुपति को सांड की पीठ पर खड़ा चित्रित करना. कोहबर चित्रकारी में जहां स्त्री-पुरुष संबंधों के विभिन्न आयामों को चित्रित किया जाता है, वहीं सोहराय चित्रकारी में पेड़-पौधे, जीव-जंतुओं एवं पशु-पक्षियों को चित्रित किया जाता है.
चित्रण शैली के दृष्टिकोण से सोहराय चित्रकला की दो प्रमुख शैलियां यथा मंझू सोहराय एवं कुर्मी सोहराय प्रचलित है. चित्रों में प्रायः सखुआ पेड़ की टहनी से बनाए गए दातुन के आकार की कूंची से रंग भरने का कार्य किया जाता है. कोहबर शब्द की उत्पति फारसी भाषा के 'कोह' अर्थात गुफा तथा हिन्दी भाषा के 'वर' शब्द अर्थात दूल्हा या विवाहित जोड़ा से हुआ है. इसका अर्थ हुआ 'गुफा में विवाहित जोड़ा'.
प्रत्येक विवाहित महिला अपने पति के घर 'कोहबर' कला का चित्रण विवाह के मौसम जनवरी से जून महीने तक करती है. इसमें घर-आंगन में विभिन्न ज्यामितीय आकृतियों में फूल-पत्ती, पेड़-पौधे एवं स्त्री-पुरुष प्रतीकों की चित्रकारी की जाती है. कोहबर चित्रकला शैली बिरहोर जनजाति में विशेष रूप से प्रचलित है, जो अपने कुम्बास यानी घरों की दीवारों पर मिट्टी का लेप चढ़ाकर कोहबर चित्रकारी करते हैं. आज भी हजारीबाग व गिरिडीह जिले के बगोदर प्रखंड एवं आसपास के क्षेत्रों में निवास कर रहे बिरहोर जनजाति के घरों में कोहबर चित्रकारी को देखा जा सकता है. बिरहोर जनजाति ही विलुप्ति के कगार पर है, तो उनका चित्रकारी की दशा का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है.
बिड़म्बना है कि संस्कृति के आधार पर बिहार से अलग हुआ झारखंड राज्य आज आदिवासी संस्कृति के पतन का कारण बन गया है, क्योंकि पिछले बारह वर्षों में राज्य की आठ सरकारें अपने ही राज्य के लोकरंग एवं लोकसंस्कृति से बेखबर बाजारवादी शक्तियों की चाकरी करने में व्यस्त रहीं. बाजारबाद अपनी तथाकथित आधुनिक संस्कृति द्वारा झारखंड की लोक संस्कृति को नष्ट करने पर उतारू है.
अगर संस्कृति नष्ट हो गयी तो अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा. समय आ गया है कि राज्य के कलाप्रेमी एक हो जाएं और सरकार को कोसने के बजाए एक बृहद सांस्कृतिक क्रांति की तैयारी करें. एक मंच का निर्माण करें और उस मंच पर एकत्रित होकर सांस्कृतिक चेतना को जगाएं. तभी हमारी संस्कृति, लोककलाएं, अस्मिता बचेगी. जब ये बचेंगी. तभी हम लोगों का अस्तित्व बचेगा.


अफज़ल गुरू से एक मुलाकात


अफज़ल गुरू से एक मुलाकात



हिंदी मीडिया में पहली बार प्रकाशित 
तिहाड़ जेल से अफ़ज़ल गुरू का लिया गया पहला साक्षात्कार 
अफज़ल गुरु से विनोद के जोसे की विशेष बातचीत
आप पेशेवर रूप से पूछेंगे तो मैं कहूंगा कि मेरा बेटा एक डॉक्टर बने, क्योंकि यह मेरा अधूरा सपना है. लेकिन मैं अपने बच्चे के लिए जो सबसे जरूरी मानता हूं वो यह कि वो निर्भय हो. मैं चाहता हूं कि वो अन्याय के खिलाफ बोले और मुझे उम्मीद है कि वो ऐसा करेगा. आखिर मेरे बेटे और बीबी से बेहतर अन्याय को कौन जान सकता है...अनुवाद- अजय प्रकाश और विश्वदीपक
तिहाड़ जेल में करीब 4.30 बजे मेरी मुलाकात की बारी आई. एक वर्दीधारी ने मेरा ऊपर से नीचे तक परीक्षण किया. जब मेटल डिटेक्टर चीं-चीं की आवाज करने लगा तब मुझे बेल्ट, स्टील की घड़ी और चाबियों को निकालने के लिए कहा गया. उस वक्त ड्यूटी में तैनात तामिलनाडु स्पेशल पुलिस का वह जवान मेरी जाँच के बाद संतुष्ट लग रहा था. अब मुझे अंदर जाने की इजाजत दे दी गई थी. ये चौथी बार था जब तिहाड़ सेंट्र्ल जेल के अति खतरनाक वार्ड के जेल नंबर तीन में जाने के लिए सुरक्षा जांच की गई थी. मैं उस वक्त मोहम्मद अफजल से मिलने जा रहा था, जो उस दौर की चर्चाओं में सर्वाधिक था. 

मैं एक ऐसे कमरे में दाखिल हुआ, जहां कई क्यूबिकल बने हुए थे. एक मोटा कांच और लोहे की सलाखें कैदियों को मुलाकातियों से अलग करती थीं. दीवार पर चस्पा एक माइक्रोफोन के जरिए मुलाकाती और कैदी एक दूसरे के संपर्क में आते थे. हालांकि माइक्रोफोन की आवाज घटिया थी. मुलाकाती और कैदी को एक दूसरे की बात समझने के लिए दीवार से कान लगाना पड़ता था. मैंने देखा कि क्यूबिकल से दूसरी ओर मोहम्मद अफजल पहले से ही खड़ा था. उसके चेहरे पर गरिमा और शांति की झलक थी. दुबली पतली काया, नाटे कद और जेब में रेनाल्ड का पेन रखे हुए अफजल की उम्र उस वक्त पैंतीस के आसपास रही होगी. अफजल ने उस दिन सफेद कुर्ता पायजामा पहन रखा था.
बेहद विनम्रता से भरी हुए एक सपष्ट आवाज ने मेरा स्वागत किया- कैसे हैं श्रीमान. 

मैंने कहा, "अच्छा हूं". क्या मुझे बदले में मौत के दरवाजे पर खड़े उस इंसान से भी यही सवाल पूछना चाहिए. कुछ देर के लिए मैं सोच में पड़ गया, लेकिन अगले ही पल मैंने पूछ ही लिया. "शुक्रिया! मैं एकदम ठीक हूं"-- उसने जवाब दिया.

अफजल से मेरी ये मुलाकात उस दिन करीब एक घंटा और (पंद्रह दिन के अंतराल के बाद) दूसरी मुलाकात तक चली. हम दोनों को पूछने और जानने की जल्दी थी. मैं लगातार अपनी छोटी डायरी में लिखता रहता था. उसे देखकर ऐसा लगा जैसे वो दुनिया से बहुत कुछ कहना चाहता था. लेकिन वो बारंबार वो लोगों से अपनी बात न कह पाने की असहायता जाहिर करता था. पेश है उससे बातचीत के अंश—

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एक अफजल के कई चेहरे हैं. मैं किस अफजल से मिल रहा हूं?
क्या वाकई ऐसा है. जहां तक मेरा सवाल है मैं एक ही अफजल को जानता हूं. और वो मैं ही हूं. दूसरा अफजल कौन है. (थोड़ी चुप्पी के बाद) अफजल एक युवा है, उत्साह से भरा हुआ है, बुद्धिमान और आदर्शवादी युवक है.नब्बे के दशक में जैसा कि कश्मीर घाटी के हजारों युवक उस दौर की राजनीतिक घटनाओं से प्रभावित हो रहे थे वो (अफजल) भी हुआ. वो जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट का सदस्य था और सीमा पर दूसरी ओर चला गया था. लेकिन कुछ ही सप्ताह बाद वो भ्रम का शिकार हो गया और उसने सीमा पार की और वापस इस तरफ आ गया. और एक सामान्य जिंदगी जीने की कोशिश करने लगा, लेकिन सुरक्षा एजेंसियों ने उसे ऐसा नहीं करने दिया. वो मुझे बार-बार उठाते रहे. प्रताड़ित करके मेरा भुर्ता बना दिया, बिजली के झटके दिए गए, ठंडे पानी में जमा दिया गया, मिर्च सुंघाया गया...और एक फर्जी केस में फंसा दिया गया. मुझे न तो वकील मिला, न ही निष्पक्ष तरीके से मेरा ट्रायल किया गया. और आखिर में मुझे मौत की सजा सुना दी गई. पुलिस के झूठे दावों को मीडिया ने खूब प्रचारित किया और सुप्रीम कोर्ट की भाषा में जिसे देश की सामूहिक चेतना कहते हैं वो मीडिया की ही तैयार की हुई है. देश की उसी सामूहिक चेतना को संतुष्ट करने के लिए मुझे मौत की सजा सुनाई गई. मैं वही मोहम्मद अफजल हूं, जिससे आप मुलाकात कर रहे हैं.
(फिर थोड़ी देर की चुप्पी के बाद बोलना जारी) मुझे शक है कि बाहर की दुनिया को इस अफजल के बारे में कुछ भी पता है या नहीं. मैं आपसे ही पूछना चाहता हूं कि क्या मुझे मेरी कहानी कहने का मौका दिया गया? क्या आपको भी लगता है कि न्याय हुआ है? क्या आप एक इंसान को बिना वकील दिए हुए ही फांसी पर टांगना पसंद करेंगे?बिना निष्पक्ष कार्रवाई के, बिना ये जाने हुए कि उसकी जिंदगी में क्या कुछ हुआ? क्या लोकतंत्र का यही मतलब है?

क्या हम आपकी उस जिंदगी के बारे में बात करें जो केस शुरू होने से पहले थी?
वो दौर कश्मीर में भयानक उथल पुथल का था, जब मैं बड़ा हो रहा था. मकबूब भट्ट को सूली पर चढ़ाया जा चुका था. स्थिति काफी विस्फोटक थी. कश्मीर के लोगों ने शांति के रास्ते से चुनाव लड़कर कश्मीर का मसला सुलझाने की कोशिश की थी. कश्मीर मसले के अंतिम समाधान के लिए, कश्मीर के लोगों की भावनाओं को बयान करने के लिए मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट बनाया गया था. लेकिन दिल्ली में बैठी सरकार एमयूएफ को मिल रहे समर्थन से भयभीत हो गई थी. और इसका अंजाम ये हुआ कि लोगों ने चुनाव में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया. लेकिन जिन नेताओं ने चुनाव में भारी मतों से जीत हासिल की उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. उनका अपमान किया गया और उन्हें जेल में डाल दिया गया. इसी घटना के बाद उन्हीं नेताओं ने हथियार बंद संघर्ष का आह्वान किया. हजारों युवाओं ने हथियार बंद विद्रोह का रास्ता चुना. झेलम मेडिकल कॉलेज, श्रीनगर में मैंने अपनी डॉक्टरी की पढ़ाई छोड़ दी. मैं उन लोगों में से भी था, जिन्होंने जेकेएलएफ के सदस्य के तौर पर सीमा पार की थी, लेकिन जब मैंने देखा कि पाकिस्तान के नेता भी कश्मीर के मसले पर उसी तरह का (दोहरा) रवैया रखते हैं जैसे भारत के तो मैं भ्रम का शिकार हो गया. कुछ सप्ताह बाद मैं वापस आ गया. मैंने सुरक्षा कर्मियों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया. मुझे बीएसएफ ने आत्मसमर्पण किए हुए आतंकी का सर्टिफिकेट भी दिया. मैंने अपनी सामान्य जिंदगी शुरू कर दी. मैं डॉक्टर तो नहीं बन सका लेकिन मैं दवाओं का डीलर जरूर बन गया. इसके बदले में मुझे कमीशन मिलता था. (हंसी)
अपनी छोटी सी ही कमाई के सहारे मैंने एक स्कूटर खरीद ली और मैंने शादी भी कर ली. इस दौरान एक भी दिन ऐसा नहीं बीता जब राष्ट्रीय राइफल्स और एसटीएफ के जवानों ने मुझे प्रताड़ित न किया हो. अगर कश्मीर में कहीं भी आंतकी हमला होता तो वो नागरिकों को पकड़ते और उन्हें प्रताड़ित करते. मुझ जैसे आतंकवादियों ने जिसने समर्पण कर दिया था, उनकी स्थिति तो और भी खराब थी. वो हमें कई हफ्तों के लिए बंद कर देते, झूठे केस में फंसा देने की धमकी देते और हम तभी छूटते जब हम उन्हें घूस के रूप में मोटी रकम देते. मेरे साथ तो ऐसा कई बार हुआ है. 22 राष्ट्रीय राइफल्स के मेजर राम मोहन रॉय ने तो मेरे गुप्तांगों तक में करंट लगवाया. कई बार मुझसे वो लोग उनके पखाने और कैंपस तक साफ करवाते थे. हुमहामा में मौजूद एसटीएफ के प्रताड़ना शिविर से बचने के लिए तो मैंने बकायदा एक बार सुरक्षा कर्मियों को घूस तक दिया था. डीएसपी विनय गुप्ता और दविंदर सिंह की देख रेख में मुझे प्रताड़ित किया गया. प्रताड़ित करने में माहिर इंस्पेक्टर शांति सिंह ने एक बार मुझे तीन घंटे तक प्रताड़ित किया. और वो तब तक ऐसा करता रहा जब तक मैं एक लाख बतौर घूस देने के लिए तैयार नहीं हो गया. रकम पूरी करने के लिए मेरी पत्नी ने अपने जेवर बेच दिए. मुझे अपनी स्कूटर भी बेचनी पड़ी. जब मैं प्रताड़ना शिविर से बाहर निकला तब तक मैं मानसिक और आर्थिक रूप से टूट चुका था. छह महीने तक मैं घर के बाहर नहीं निकल सका क्योंकि मैं अंग भंग हो गया था. मैं अपनी पत्नी के साथ बिस्तर पर भी नहीं जा सकता था क्योंकि मेरे गुप्तांगों को बिजली के झटके दिए गए थे. इसके इलाज के लिए मुझे दवाईयां खानी पड़ी...
(जब अफजल ये सब बता रहा था तो उसके चेहरे की शांति भंग हो चुकी थी. ऐसा लगता था जैसे उसके पास मुझे बताने के लिए ज्यादा से ज्यादा बातें हैं, लेकिन मेरे टैक्स के पैसे से चलने वाली सुरक्षा एजेंसियों की प्रताड़ना की इतनी कहानियां सुनने मैं असमर्थ था. मैंने बीच में ही उसे टोक दिया...)

अगर आप केस के बारे में बात कर सकें तो बताएं...वो कौन सी घटनाएं थीं, जिनके बाद संसद पर हमला हुआ ?
आखिरकार एसटीएफ कैंप में (प्रताड़ना के बाद) मैं ये सीख चुका था कि आप चाहे एसटीएफ का सहयोग करें या विरोध आप या आपके परिवार वालों को परेशान होना ही है. मेरे पास शायद ही कोई विकल्प था. डीसीपी दविंदर सिंह ने मुझसे एक छोटा सा काम करने को कहा. ये उसके लिए "छोटा सा काम" था. दविंदर सिंह ने मुझे कहा कि मुझे एक आदमी को दिल्ली लेकर जाना है और उसके लिए किराए का ठिकाना खोजना था. मैं उस आदमी से पहली बार मिला था. चूंकि वो कश्मीरी नहीं बोल हा था, इसलिए मुझे लगा कि वो आदमी बाहरी था. उसी ने मुझे बताया कि उसका नाम मोहम्मद था. (पुलिस ने मोहम्मद की पहचान संसद पर हमला करने वाले पांचों आतंकिवादियों के नेता के अगुवा के तौर पर की है. पांचों आतंकवादी हमले में मारे गए थे.) जब हम दिल्ली में थे, तब मुझे और मोहम्मद दोनों को दविंदर सिंह फोन करता था. मैंने नोटिस किया कि मोहम्मद दिल्ली में कई लोगों से मिलता था. जब उसने एक कार खरीद ली तब उसने मुझे उपहार के तौर पर 35 हजार रुपये दिए. इसके बाद मैं ईद का त्यौहार मनाने कश्मीर चला गया. जब मैं श्री नगर बस स्टैंड से सोपोर रवाना होने वाला था तब मुझे गिरफ्तार कर लिया गया और परिमपोरा थाने ले जाया गया. वहां मुझे प्रताड़ित किया गया. इसके बाद वो लोग मुझे एसटीएफ हेडक्वार्टर ले गए और वहां से मुझे दिल्ली लाए. दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल के प्रताड़ना शिविर में मैंने उन लोगों को वो सब कुछ बताया जो मोहम्मद के बारे में मुझे पता था. लेकिन वो लोग मुझे ये मनवाने पर अड़े थे कि मेरा चचेरा भाई शौकत, उसकी पत्नी नवजोत और एसएआर गिलानी के साथ मैं ही संसद हमले का जिम्मेदार था.
वो चाहते थे कि ये बात मैं पूरी दृढ़ता से मीडिया के सामने कहूं. हालांकि मैंने इसका विरोध किया. लेकिन मेरे पास कोई विकल्प ही नहीं था. मेरा परिवार उन लोगों की गिरफ्त में था. मुझसे सादे कागज में दस्तखत कराए गए और कहा गया कि मुझे मीडिया से बात करनी है. मुझसे जबरन वही बातें कहलवाई गईं जो पुलिस मुझे पहले से ही रटा चुकी थी. इसमें संसद पर हमले की जिम्मेदारी लेना भी शामिल था. जब एक पत्रकार ने मुझसे एसएआर गिलानी के बारे में पूछा तो मैंने कहा कि वो निर्दोष है. तब एसीपी राजबीर सिंह भरी मीडिया के सामने चिल्ला उठा. वो लोग मुझसे इस बात के लिए नाराज थे कि मैंने उनकी सिखाई हुई बातों से अलग भी कुछ कह दिया था. उस वक्त राजबीर सिंह ने पत्रकारों से गिलानी को निर्दोष ठहराने वाली मेरी बाइट न चलाने के लिए भी कहा था. 
अगले दिन राजबीर सिंह ने मुझे मेरी बीबी से बात करने की इजाजत दी. साथ ही उन्होंने धमकी भी दी कि अगर तुम अपनी बीबी का जीवित देखना चाहते हो तो हम जैसा कहते हैं वैसा करो. ऐसे में मेरे सामने एक ही विकल्प था कि मुझपर लगाये गये आरोपों को मैं स्वीकार कर लूं. दिल्ली स्पेशल सेल की टीम ने मुझसे यह भी कहा कि जैसा हम चाहते हैं तुम आरोपों को उसी तरह स्वीकार कर लेते हो तो तुम्हारे मुकदमे को हम कमजोर कर देंगे और मुझे जल्द ही रिहा कर दिया जायेगा. उसके बाद वे मुझे कई उन जगहों और बाजारों में ले गये जहां से मोहम्मद ने सामान खरीदे थे. इन सबको बाद में पुलिस ने सबूत बतौर पर पेश किया. 
मैं कह सकता हूं कि जब दिल्ली पुलिस संसद हमले के मुख्य साजिशकर्ता को पकड़ने में नाकाम रही, तो उसने अपना मुंह छुपाने के लिए मेरा इस्तेमाल किया और मैं बलि का बकरा बना. पुलिस ने लोगों को मूर्ख बनाया. लोगों को आज भी नहीं पता कि संसद पर हमले की योजना किसकी थी. मैं पहले एक मामले में कश्मीर एसटीएफ की जाल में फंसाया गया और फिर उसी का दोहराव दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल ने किया. 
मीडिया लगातार उस टेप को प्रसारित कर रहा है, पुलिस अधिकारी पुरस्कृत हो रहे हैं और मैं मौत का सजायाफ्ता. 

आपको अबतक कानूनी मदद क्यों नहीं मिल सकी?
मुझे कभी मौका मिलता तब तो. मैंने ट्रायल के छह महीने तक अपने परिवार वालों को नहीं देखा. और जब एक बार सुनवाई के दौरान पटियाला कोर्ट में देखा भी, तो बहुत कम समय के लिए. मुझे कोई नहीं मिला जो मेरे लिए एक अदद वकील का इंतजाम करता. इस देश में किसी को भी कानूनी अधिकार पाने का मौलिक हक है, इस उम्मीद से मैंने चार वकीलों को नाम बताया, जिनसे मुझे उम्मीद थी कि वह मेरा केस लड़ सकते हैं. लेकिन एसएन ढिंगरा ने बताया कि सभी चार वकीलों ने मेरा मुकदमा लड़ने से इनकार कर दिया है. मेरे लिए अदालत ने जो वकील नियुक्त किया, वह मुकदमे की सुनवाई के दौरान कुछ पेंचीदे दस्तावेज पेश करने लगीं, वह भी मुझसे पूछे बिना कि मामले का सच क्या है? उन्होंने मेरे मुकदमे की ठीक से पैरवी नहीं की और मेरी पैरवी छोड़ इस मामले के दूसरे आरोपी का मुकदमा लड़ने लगीं. फिर अदालत ने एक एमीकस क्यूरी (अदालत का मददगार) की नियुक्ति की, जो मेरा बचाव नहीं करते थे, बल्कि इस मामले में अदालत को मदद देते थे. मेरे लिए नियुक्त एमीकस क्यूरी मुझसे कभी नहीं मिले. उन्होंने मुझसे हमेशा एक दुश्मन की तरह बर्ताव किया, वे बेहद सांप्रदायिक थे. मैं कह सकता हूं कि ट्रायल की स्थिति में मेरा पक्ष सिरे से रखा ही नहीं गया. 
इस मामले की सच्चाई यही है कि ऐसे संवदेनशील केस में पैरवी के लिए एक वकील नहीं था. किसी मुकदमे में वकील के न होने का क्या मतलब होता है, यह कोई भी समझ सकता है. अगर सरकार मुझे फांसी पर ही लटकाना चाहती है तो ऐसे लंबी उबाऊ कानूनी प्रक्रिया का मेरे लिए कोई मतलब नहीं है. 

आप दुनिया से क्या अपील करना चाहते हैं?
मेरे पास कुछ खास अपील करने को नहीं है. मुझे जो कहना है वह भारत के राष्ट्रपति को भेजी याचिका में कह दिया है. मैं सिर्फ सीधी सी बात यह कहना चाहता हूं कि अंधराष्ट्रवाद और गलत समझदारी के फेर में पड़कर अपने ही देश के नागरिकों के बुनियादी अधिकारों को नहीं छीनना चाहिए. इस मामले के दूसरे आरोपी एसएआर गिलानी (अब बरी) की उस बात को मैं याद दिलाना चाहता हूं, जब उन्हें ट्रायल कोर्ट ने फांसी की सजा मुकर्रर की. उन्होंने कहा था, शांति, न्याय से बहाल होती है. जहां न्याय नहीं है वहां शांति नहीं होगी.' कुल मिलाकर मैं भी यही कहना चाहता हूं. अगर वह चाहते हैं तो मुझे फांसी पर लटका दें, लेकिन याद रखें कि यह भारतीय न्यायिक और राजनीतिक तंत्र पर एक काला धब्बा होगा. 

जेल में आपकी क्या स्थिति है?
मुझे अत्यधिक निगरानी के बीच अकेले एक कालकोठरी में रखा गया है. मैं अपनी कालकोठरी से दोहपर में बहुत कम समय के लिए बाहर आ पाता हूं. रेडियो, टेलीविजन की मेरे लिए मनाही है. यहां तक कि मुझे अखबार फाड़कर पढ़ने को दिया जाता है. अखबारों में मेरे बारे में जो खबर छपती है, उसे पूरे तौर पर फाड़ दिया जाता है. 

भविष्य की अनिश्चितता के बीच समाज को लेकर आपकी मुख्य चिंताएं क्या हैं?
हां, बहुत सारी चीजों से मेरे सरोकार जुड़े हुए हैं. भारत की विभिन्न जेलों में कश्मीर से ताल्लुक रखने वाले लोग बिना वकीलों के, बगैर ट्रायल के बंद हैं. उन्हें कोई कानूनी संरक्षण प्राप्त नहीं है. कश्मीरी नागरिकों की हालत भी इससे अलग नहीं है. घाटी अपने आप में एक खुली जेल है. हर रोज फर्जी मुठभेड़ की खबरें आती रहती हैं, लेकिन यह सिर्फ कुछेक उदाहरण भर हैं. कश्मीर के पास सबकुछ है, मगर आप उसे एक शिष्ट समाज के रूप में देखना ही नहीं चाहते. कश्मीरी नागरिक यंत्रणाओं-प्रताड़नाओं के बीच जीते हैं, उन्हें मुश्किल से न्याय मिल पाता है. 
इन सबके अलावा और भी बहुत सारी बातें मेरे दिगाम में आती हैं. विस्थापित हो रहे किसानों की समस्या और दिल्ली में सील कर दिये गये दुकानदारों की हालत भी मुझे परेशानन करती हैं. देश में बहुत तरीके से अन्याय हो रहे हैं, जिन्हें देखा जा सकता है, चिन्हित किया जा सकता है, लेकिन इसके खिलाफ कुछ किया नहीं जा सकता. कल्पना नहीं कर सकते कि कितने हजारों लोगों की जिन्दगी, उनके परिवार इसकी जद में आ रहे हैं. ये तमाम चीजें मुझे परेशान करती हैं. 
थोड़ा सोचते हुए-
दुनिया में हो रहे भूमंडलीय विकास के बारे में भी मैं सोचता हूं. मैंने सद्दाम की फांसी के बारे में सुना तो मुझे बहुत दुख हुआ. ये सोचकर स्तब्ध रह गया कि क्या अन्याय इतना सरेआम और बेशर्मी से किया जा सकता है. दुनिया की महान सभ्यता 'मेसोपोटामिया' की भूमि ईराक, जिसने हमें साठ मिनट का घंटा दिया, चौबीस घंटे और 360 डिग्री का ज्ञान दिया उसे अमेरिका ने धूल-धूसरित कर दिया. अमेरिका तमाम सभ्यताओं और मूल्यों को नष्ट कर रहा है. आतंकवाद के खिलाफ अमेरिका का यह तथाकथित युद्ध सिर्फ नफरत फैलाने और तबाही के लिए है. 

आजकल आप कौन सी किताबों को पढ़ रहे हैं?
मैंने हाल ही में अरूंधति रॉय की किताब पढ़ी हैं. अब में सात्र का अस्तित्ववाद का सिद्धांत पढ़ रहा हूं. जेल की लाइब्रेरी में बहुत कम और साधारण किताबें हैं. इसलिए मैंने एसपीडीपीआर (सोसायटी फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ़ डिटेंनिज एंड प्रिजनर्स राइट) के सदस्यों से किताबों के लिए अपील की है. 

एसपीडीआर आपके समर्थन में एक अभियान है न?
जी हाँ. उन हजारों लोगों का मैं तहेदिल से शुक्रिया अदा करना चाहता हूं जो मुझ पर हो रहे अन्याय के खिलाफ खड़े हैं. इनमें वकील, छात्र, लेखक, बुद्धिजीवी और समाज के अन्य तबकों के तमाम लोग शामिल हैं. मेरी गिरफ्तारी दिसंबर 2001 के कई महीनों बाद तक मुझे लगता रहा कि शायद मेरे मामले में न्यायप्रिय लोग खड़े नहीं होंगे. लेकिन जब एसएआर गिलानी को इस मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने बरी कर दिया तो लोगों ने पुलिसिया कहानी पर सवाल उठाने शुरू कर दिये. जैसे-जैसे लोगों को इस कहानी का झूठ पता चला वे न्याय के पक्ष में खड़े हो आवाज उठाने लगे. अब लोग मेरे पक्ष में खुलकर आ रहे हैं और कह रहे हैं कि अफजल के साथ अन्याय हुआ है. यही सच भी है.

आपके परिजन मुकदमे को लेकर विरोधाभासी बयान दे रहे हैं?
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अफज़ल की पत्नी तबस्सुम

मेरी बीबी लगातार कह रही है कि मुझे गलत ढंग से फंसाया गया है. उसने बहुत नजदीक से देखा है कि एसटीएफ मुझे किस तरह यंत्रणा देती थी. एसटीएफ ने मुझे कभी चैन से जीने नहीं दिया. मेरी बीबी यह भी अच्छी तरह जानती है कि इस मामले में मुझे किस तरह फंसाया गया. वह चाहती है कि मैं अपने बेटे गालिब को अपनी आंखों के सामने बढ़ते हुए देखूं. मेरे एक बड़े भाई भी हैं जो बखूबी जानते हैं कि एसटीएफ ने किस तरह मुझे दबाव में रखा और वे लगातार इसका विरोध करते रहे हैं. लेकिन अब वो मेरे मामले में कोई अलग बयान दें तो मैं क्या कह सकता हूं? 
देखिये, कश्मीर में जो काउंटर इनसर्जेंसी के नाम पर ऑपरेशन किये जा रहे हैं उसने बहुत गंदा स्वरूप ले लिया है, जो भाई को भाई और पड़ोसी को पड़ोसी के खिलाफ खड़ा कर रहा है. अपने गंदे इरादों से वे एक समाज को तोड़ रहे हैं. जहां तक मेरे समर्थन में किये जा रहे अभियानों का सवाल है तो मैंने सिर्फ एसपीडीपीआर से ही सहयोग की अपील की है और उन्हें ही अधिकृत मानता हूं. यह संस्था एसएआर गिलानी और कार्यकर्ताओं के एक समूह द्वारा चलायी जाती है. 

अपनी बीबी तबस्सुम और बेटे गालिब के बारे में सोचते हैं तो दिमाग में क्या ख्याल आते हैं?
हमारी शादी का यह दसवां साल है, जिसमें से आधा मैंने जेल में बिताया है. इससे पहले भी कई बार भारतीय सुरक्षाबलों ने कश्मीर में मुझे उठाया और पीड़ित किया. तबस्सुम मेरी शारीरिक और मानसिक यंत्रणाओं से बखूबी वाकिफ है. यंत्रणा कैंपों से लौटने के बाद कई बार मेरी हालत खड़े होने लायक नहीं रहती थी. शारीरिक प्रताड़ना के दौरन मेरे लिंग पर तक बिजली के झटके दिये जाते थे. तबस्सुम ने हमेशा मुझे जीने का साहस दिया. हम लोग एक दिन भी चैन से नहीं रहते थे. हालांकि यह कहानी सिर्फ मेरी नहीं, तमाम कश्मीरी जोड़ों की है. कश्मीरी घरों में भय का बने रहना जीवन का सबसे प्रभावी अहसास है. बच्चा हुआ तो हम बहुत खुश थे. हमने अपने बच्चे का नाम महान गजलकार मिर्जा गालिब के नाम पर रखा. हमारा सपना था कि हम गालिब को बढ़ता हुआ देखें. मैं बहुत कम समय उसके साथ बिता पाया. गालिब के दूसरे जन्मदिन के बाद मुझे पुलिस ने फंसा लिया. 

अपने बेटे को आप किस रूप में बढ़ता हुआ देखना चाहते हैं?
अगर आप पेशेवर रूप से पूछेंगे तो मैं कहूंगा कि वो एक डॉक्टर बने, क्योंकि यह मेरा अधूरा सपना है. लेकिन मैं अपने बच्चे के लिए जो सबसे जरूरी मानता हूं वो यह कि वो निर्भय हो. मैं चाहता हूं कि वो अन्याय के खिलाफ बोले और मुझे उम्मीद है कि वो ऐसा करेगा. आखिर मेरे बेटे और बीबी से बेहतर अन्याय को कौन जान सकता है. 

अगर कश्मीर समस्या के बारे में पूछें तो आप इसका क्या हल देखते हैं?
सबसे पहले सरकार को कश्मीरी आवाम के प्रति संवेदनशील होना होगा और कश्मीर का वास्तविक प्रतिनिधित्व करने वालों के साथ वार्ता करनी चाहिए. भरोसा कीजिये कश्मीर का वाजिब प्रतिनिधित्व करने वाले ही समस्या का हल निकाल सकते हैं. लेकिन अगर सरकार काउंटर इनसर्जेंसी के टैक्टिस के तौर पर शांति वार्ता का नाटक करेगी तो इस समस्या का कोई समाधान नहीं है. अब समय आ गया है कि इस मामले को गंभीरता से लिया जाये.

कौन हैं कश्मीर के वास्तविक प्रतिनिधि?
मैं किसी एक का नाम नहीं लेना चाहता. इनका चुनाव कश्मीरी आवाम की भावनाओं के मद्देनजर किया जा सकता है. साथ ही मैं भारतीय मीडिया से अपील करना चाहता हूं कि वो इस मामले में दुष्प्रचार न करे, आवाम को सच से परिचित कराये. गलत तथ्य, आधी-अधूरी खबरें, राजनीतिक प्रभाव वाले समाचार ये कुछ ऐसी चीजें हैं जो क'मीर में कट्टरपंथी और आतंकी ताकतों को खड़ा कर रहे हैं. इस तरह के पत्रकार खुफिया एजेंसियों के खेल में आसानी से शामिल हो जाते हैं और ऐसी असंवेदनशील पत्रकारिता आखिरकार समस्याओं को बढाती ही है. इसलिए सबसे जरूरी है कि मीडिया क'मीर के बारे में गलत सूचनायें देनी बंद करे. भारतीय नागरिकों को कश्मीरी संघर्ष का इतिहास का सच जानने दिया जाये जिससे वे वहां की जमीनी हकीकत से रू-ब-रू हो सकें. अगर भारत सरकार क'मीरी आवाम की इच्छा अनुरूप समस्याओं के हल की पहल नहीं करती है तो यह क्षेत्र हमेशा संघर्षों के हवाले रहेगा.
दूसरा, जब भारतीय न्यायतंत्र जेलों में बंद सैकड़ों कश्मीरियों को बिना वकील और बगैर फेयर ट्रायल के फांसी देने पर आमादा है तो क'मीरी आवाम के बीच इसका क्या संदेश जायेगा. बुनियादी हकों को बहाल किये बगैर कश्मीर समस्या का समाधान कैसे संभव है? इसका एकमात्र उपाय है कि भारत-पाकिस्तान दोनों की ही लोकतांत्रिक संस्थायें मसलन संसद, न्यायपालिका, मीडिया, बुद्धिजीवी और राजनीतिज्ञ इस मसले पर गंभीरता से पेश आयें. 

संसद हमले में नौ सुरक्षाबलों के जवान मारे गये, आप उनके परिजनों से क्या कहना चाहेंगे?
जिन्होंने अपने परिजनों को गंवाया है, मैं उनकी तकलीफ को महसूस कर सकता हूं. लेकिन मैं यह भी महसूस करता हूं कि उन्हें बहकाकर मुझ जैसे एक निर्दोष आदमी की फांसी से संतुष्ट करने की कोशिश की जा रही है. मुझे एक मोहरे के बतौर राष्ट्रवाद के नाम पर बलि का बकरा बनाया जा रहा है. मैं अपील करूंगा कि वे इससे बाहर निकलें और मेरे नजरिये से भी सोचें. 

आप अपने जीवन में अब तक की क्या उपलब्धि देखते हैं?
मेरी अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धि मेरे मुकदमे से जुड़े अन्याय के खिलाफ चले अभियान की है, जिसके जरिये एसटीएफ का खौफ उजागर हो पाया. मुझे ख़ुशी है कि सुरक्षाबलों द्वारा नागरिकों पर किये जा रहे अत्याचार, फर्जी मुठभेड़ों, उनके गायब होने, उन्हें प्रताडि़त किये जाने आदि पर अब लोगों के बीच चर्चा हो रही है. कश्मीरी इन्हीं सब सच्चाइयों के बीच बढ़े-पले हैं. कश्मीर के बाहर के लोगों को कतई नहीं मालूम है कि भारतीय सुरक्षाबल वहां क्या कहर ढाते हैं. अगर बिना अपराध के वो हमें मार भी दें तो यह कोई सवाल नहीं है. एक क'मीरी को बिना वकील की पैरवी के फांसी पर भी लटका दिया जाये तो यह कोई बड़ी बात नहीं होगी. 

आप खुद को किस रूप में याद किया जाना पसंद करेंगे?
कुछ देर सोचने के बाद-
अफजल के रूप में, मोहम्मद अफजल के रूप में. मैं कश्मीरी आवाम के लिए भी अफजल हूं और भारतीयों के लिए भी, लेकिन दोनों की निगाह में अलग-अलग. मैं कश्मीरी लोगों के न्याय पर पर सहज विश्वास कर सकता हूं. सिर्फ इसलिए नहीं की मैं उनके बीच से हूं बल्कि इसलिए कि वे सच से बखूबी वाकिफ हैं. उन्हें कभी भी इतिहास या पुरातन में गलतबयानी के जरिये बहकाया नहीं जा सकता है.

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विनोद के जोसे अंग्रेजी पत्रिका 'कारवां' के कार्यकारी संपादक हैं. वर्ष 2006 में अफज़ल गुरू का यह साक्षात्कार सबसे पहले रीडिफ़-कॉम में प्रकाशित हुआ था. अब आप इस साक्षात्कार कारवां की वेबसाइट पर अंग्रेजी में देख सकते हैं.


Caste might be cast in stone judging from the way the dominant discourse gets conducted in India


Welcome to closet illiberalism
Vidya Subrahmaniam, Opinion>>Lead, The Hindu, February 11, 2013
 
Caste might be cast in stone judging from the way the dominant discourse gets conducted in India
 
"Caste is the most overwhelming factor in Indian life. Those who deny it in principle also accept it in practice. Life moves within the frontiers of caste and cultured men speak in soft tones against the system of caste, while its rejection in action just does not occur to them..." Socialist thinker Ram Manohar Lohia said this in 1964 but the words might be as relevant today as they were five decades ago.
 
The Ashis Nandy controversy illustrates the paradox of India's opinion makers preaching caste equality while instinctively, reflexively, articulating positions that bunch them up on one side of the caste divide, thus reinforcing the very order that they have rejected. K. Satyanarayana exposes this contradiction with devastating examples in his article in The Hindu (editorial page, "The question of casteism still remains," February 5, 2013). Mr. Nandy's defenders have made the untenable legal claim that he should be judged not by what he said at the Jaipur Literature Festival but by his past record and scholarship. But worse, gradually the defence, which was originally grounded in Mr. Nandy's right to free expression, has deteriorated into a free-for-all against Dalits and Other Backward Classes (OBC) — who are presumed to have become "sacred cows" protected by "draconian" laws. If to question Mr. Nandy is intolerance, what does one call this rant?
 
Mr. Nandy's initial statement was a qualified one: he said the Indian Republic was saved because the corrupt of today were from the "Scheduled castes, OBCs and now the tribals." But the nuances went for a toss with his stunning insistence that West Bengal was free from corruption because "in the last hundred years, nobody from the OBCs, SCs and STs has come to power there. It is an absolutely clean State." Forget the backhanded compliment to the Left Front leadership which has been deemed to be clean for being upper caste. The inescapable inference from this is that upper caste means no corruption regardless of the period of reference — today or a 100 years ago.
 
Nandy's statement as peg
Per se this is indefensible. Yet if for no other reason than to make the caste debate meaningful, we also need to look at Mr. Nandy's subsequent clarification — more so because contained in the clarification is an uncomfortable truth that the Indian intelligentsia has tiptoed around for too long. To quote Mr. Nandy: "What I meant was that most of the people getting caught for corruption are people from OBC, SC and ST communities, as they don't have the means to save themselves unlike people from upper castes who can hide their corruption."
 
The Nandy episode would have been well served if this statement had become the peg on which to examine the persisting caste prejudices and double standards that allow one kind of corruption to be exposed and the other to be hidden. However, it is important to understand that exposés and blackouts happen not only because one section is smarter than the other, which surely it is, but because the dominant discourse in India – as is evident from l'affaire Nandy itself — continues to be shaped by the socially advantaged classes. The media, as surveys have established, are a classic example of this stranglehold but upper caste dominance is as much a reality in academia and other key policymaking institutions. This collective is superficially progressive. Yet at a subconscious level, its members harbour all the entrenched biases, resulting in the backward castes being censured far more severely than their "twice-born" counterparts for the same alleged crime — be it ostentation, self-promotion, a specific legal violation or patronage of a particular caste group.
 
Mayawati and the Gandhis
A case in point is the differential treatment extended to Mayawati and the Nehru-Gandhis. This difference endures despite xenophobic intolerance of the First family by right-wing sections of the middle class. The Bahujan Samaj Party (BSP) chief's wealth and her self-projection — creating parks and monuments, naming projects after herself and celebrating lavish birthdays — have been obsessively written about by a media that ignored her political achievements until she compelled attention by forming in 2007 the first majority government in Uttar Pradesh in 17 years. The star of that watershed election was Ms Mayawati but the media ignored her, choosing instead to be embedded with Rahul Gandhi whose party finished last and is still stuck there.
 
Compare the relentless focus on Ms Mayawati's financial assets with the easy ride given to Robert Vadra. The Vadra real estate papers were avidly consumed in private, they had been available for years with the principal Opposition party, but the veil on the Gandhi son-in-law's vast business empire was lifted only after Arvind Kejriwal made bold to mention the unmentionable. Today, while Ms Mayawati finds the law chasing her, there seem to be no such anxieties for Mr. Vadra. In Prime Minister Vajpayee's time, similar deference was shown to his foster son-in-law Ranjan Bhattacharya.
 
Tracking the BSP
I had my first real brush with deep-seated caste attitudes in 1988 when I was in Allahabad for a Lok Sabha by-election contested by Rajiv (Gandhi) challenger V.P. Singh. His opponents were Sunil Shastri from the Congress and Kanshi Ram from the BSP. Singh was the media darling and Mr. Shastri derived his importance from being his principal opponent. The BSP faced a near media blackout, and as it turned out, the party was equally contemptuous of the "manuwadi" press. BSP volunteers blocked me off from their meetings, saying they knew what I would write. Over the years, as I tracked the BSP's astonishing growth, I could not help but notice the unfailingly skewed media coverage of the party, whose rallies would be reported, not for their content but for the traffic chaos they caused.
 
As a part-time journalism teacher in 2005, I would discover the same unconscious bias in the essays turned in by my students. Writing on Ms Mayawati's birthday, they left out the political aspects of the event, concentrating instead on her diamonds, her "flashy" clothes and the size of the cake she cut. They would accept later that diamonds and silks were worn by other women politicians too but that somehow, these outward manifestations hit the eye more in the BSP chief's case. There is an ironic reality here that must be understood in its proper context. What people saw as distasteful flamboyance was a political tool that Ms Mayawati consciously employed, especially in the formative years when it was important for her to raise the self-esteem of her constituency. This was explained to me by the part Hindutva, part OBC Uma Bharti. The Dalit girls in her village were forbidden from crossing the threshold into even OBC homes. But they would rebel in their own way, wearing Mayawati hair clutches and imitating her mannerisms, thereby signalling that they would not be kept down by force. The handbag, symbolising status and accomplishment, is similarly a deliberate presence in the much-criticised Mayawati statues. Admittedly, the showmanship can get excessive, as it did in 2010 when the then Uttar Pradesh Chief Minister wore a gigantic garland of currency notes, estimated to add up to several crores of rupees. This kind of extravagant cash display undoubtedly raises questions about source and accountability. However, in all the outrage over this incident, the media missed mentioning that Indian politicians have traditionally been weighed against coins. At election time this becomes a means of adding to the party coffers without the bother of disclosing the source.
 
There is equal duplicity around the perceived caste consciousness of parties such as the BSP and the Samajwadi Party (SP). As a journalist posted in Lucknow in the late 1980s, I was witness to the transfer of power in Uttar Pradesh from the Congress's Narain Dutt Tiwari to the Janata Dal's Mulayam Singh Yadav (now with the SP.) The latter took charge to immediate accusations of Yadavisation of government and bureaucracy. Nobody cared to find out which castes ruled in the previous regime. In 1984, 93.8 per cent of the principal secretaries and secretaries to the U.P. government were from the upper castes and 78.6 per cent of the District Magistrates were from the upper castes, including 41 per cent of Brahmins (Christophe Jaffrelot, India's Silent Revolution).
 
Political empowerment of the backward castes is a dramatic reality today. But social attitudes have stayed frozen. Why else would 50 per cent of all Central schemes and projects be named after the Nehru-Gandhis? Why would there be a chorus of protests over Mayawati statues but not over the renaming of the Borivali National Park after that champion of democracy, Sanjay Gandhi? In her outstanding book, The Grammar of Caste, Ashwini Deshpande cites evidence from four pioneering studies on the Indian urban labour market to conclude that employers discriminate between equally meritorious candidates on the basis of their caste identities. "Employers talk the language of merit and confess a deep faith solely in the merit of the applicant. However, they also believe that merit is distributed along lines of caste, religious and gender divisions. Nowhere do employers see this as discrimination. It is as if they were describing a neutral and unbiased state of the world." Back to 1964 and Ram Manohar Lohia?
 
 
 
 
 
 
My final words of advice to you are educate, agitate and organize; have faith in yourself. With justice on our side I do not see how we can lose our battle. The battle to me is a matter of joy. The battle is in the fullest sense spiritual. There is nothing material or social in it. For ours is a battle not for wealth or for power. It is battle for freedom. It is the battle of reclamation of human personality. 
B.R.Ambedkar


The Unconquered People The Liberation Journey of an Oppressed Caste John O’Brien


The Unconquered People
The Liberation Journey of an Oppressed Caste
John O'Brien
 
This book explores the history, ethnography and liberation journey of an aboriginal, forest-dwelling hunting tribe, which was reduced to servitude by the Aryan conquest of the Indian subcontinent. They were called Chandala in classical Brahmanic literature and are designated as Chuhra in the censuses of India (1868–1931). In contemporary Pakistan, they are known as Punjabi Christians. The book explores their primarily tribal rather than occupational nature, their homeland, and their spread through the Indian subcontinent. It traces how the construction of their religiously-endorsed inequality and degradation came about. Furthermore, it cautions against the suppression of the 'memory' of oppression and argues that, by defining themselves as a lineage of belief and praxis, these resilient people can give meaning to their past and present, as well as purposefully construct a more humane future for themselves. Their very history is proof that culturally they are not easily contained, much less, dominated.
 
The book also covers their rites of passage, eclectic structure, mental universe, and the evolution of their religious sensibilities—from animism to the development of the cult of Bala Shah-Balmik. The movement to Christianity of the Chuhras was the defining moment in the creation of a new social identity. It delves into how upward mobility of agricultural workers and tenants widened the social gap between the 'rural' and the 'urban' sweeper; and in the cities between the 'dry' and the 'wet' sweeper. It also provides an insight into the Punjabi Christian's system of beliefs in the world of hidden spirits, propitiation, and superstition, and traces their growing exclusion from Pakistan's mainstream in the face of accelerating 'Islamisation' in the country.
 
This work is a study of memory. In his attempt to narrate the story of these people John O'Brien has not made any encyclopaedic pretence. Hence, it should be considered as an invitation to an ongoing dialogue rooted in further research.
 
About the Author
John O'Brien was born in Ireland, where he studied Science, Education and Theology. His doctoral thesis at the Gregorian University Rome was entitled 'The Hermeneutical Privilege of the Poor'. He has worked as a teacher in Sierra Leone and as a community activist in inner-city Dublin. He has lectured widely on Religious Studies and conducted workshops in several countries in Africa, Asia, Europe and Latin America. John O'Brien first came to Pakistan in 1977 and has spent twenty-five years working among its minorities in a variety of educational and development projects, while engaging in a dialogue with Islam. At present, he is involved in community development in Sindh, Pakistan, while also conducting research on Sufism.
 
THE UNCONQUERED PEOPLE — The Liberation Journey of an Oppressed Caste: John O' Brien; Oxford University Press, No. 38, Sector 15, Korangi Industrial Area, P.O. Box 8214, Karachi-74900. Rs. 995.
 
A minority in search of liberation
Meena Menon, The Hindu, January 07, 2013
 
 
 
 
In what can be argued as one of the most detailed expositions on the origins of the Punjabi Christians in Pakistan, the book undertakes an arduous journey. It "explores the history, ethnography and liberation journey of the aboriginal, forest dwelling hunting tribe reduced to servitude by the Aryan conquests, who are called Chandala in classical Brahminic literature, designated as Chuhra in the census of India (1868-1931) and in contemporary Pakistan as Punjabi Christians."
 
With a population of 2.8 million, Christians are the largest minority in Pakistan and with limited material or studies on some aspects of their history the author has undertaken this venture to fill some much-needed gaps.
 
Another important reason for taking up this study, he says, is the history of the community which is one of oppression and dehumanisation and the tendency among the upwardly among them to regard this history as something best forgotten and buried.
 
The author has lived and worked with the community and grew to acquire great respect for their "resilience and sheer unconquerability."
 
Tracing the origins
The book goes about tracing the origins from Chandala, originally aboriginal rulers but now a crushed tribe, which some argue were the forerunners of the Chuhra. O'Brien uses material from the three volume Legends of the Punjab to showcase stories by the people themselves, for instance, the standard origin legend — "when Satan tempted Adam and Eve he was thrust down from heaven. Blood gushed from his nose and each drop became a pig. Allah-Talah brushed the sweat from his forehead and each drop became a dog. Filth multiplied upon the earth. Then: the Lord created the sons of Balmik to be scavengers on earth and created Lalbeg to clean the steps of the throne of heaven."
 
The myths are used by the author for a specific purpose. "Myths reveal a region of ontology inaccessible to superficial logic. These myths reveal what the oppressed appear to society to be is very different from what they really are. …Subjugated but not silenced, they "remember" what the official narrative has suppressed."
 
Genealogies or kursiinamas, funeral songs, wedding songs, songs relating to the homing of the bride, ballads, prayers, poems are presented in the book as a sort of counter narrative of the oppressed people, as a literature of resilience and survival.
 
A first attempt was made to study the psycho social life of the community in 1933 in Martinpur, a Christian village in which 55 families were settled around 1902. The researcher was struck by what he came to term, "the range of subtle antipathies" present in their relationships and he sought to analyse this in terms of chronic inferiority complex.
 
Quest for identity
The origin of the Pakistani Christians has been a controversial topic and the book says that in 1961 one activist proposed that they should stop denying their origins in oppression and work to express their faith from within the social reality in which they all lived. He was denounced as a social radical and his message was rejected with the sophism that the Christians wanted to be known by the sign of the Cross and not by the sign of the broom.
 
The Chuhras had to battle for religious identity as well. In terms of religion too, the Chuhras resisted Hinduism but they were always included as Hindus in the census. The book speaks of the Hinduisation of the urban dwelling Chuhra sweepers masterminded by Pandit Ami Chand which reinvented the cult of Balmik as one of the Hindu dharma. It took Dr Bhimrao Ambedkar to remark that the reinvented Valmik was a one-man advertising agency for "Ram Raj". The Balmikis were also subjected to the Shuddi programme by the Arya Samaj in 1930.
 
The book touches on the quest for religion by the Chuhras and their forays into Sikhism with mixed experiences. While for Guru Nanak there were no Hindus or Muslims and he rejected caste and the social inequality it stood for, his largest followers came from the Jats. For the Chuhras, who joined the Sikh faith along with Chamars, they could occupy the lowest positions in Sikh villages, as studies have shown, according to the author. Even in army, the Chuhras who served with the Sikh army were neither allowed to become a separate force nor to be numerous in any one battalion.
 
Finally, the quest for a new identity ended when the United Presbyterian Church began its work in Punjab in 1855. Within 11 years, over 500 Chuhras had become Christians and by "1900 more than half of our people in the Sialkot district had become baptized by different groups and by 1915 all but about 300 of them. From 3823 adherents in 1881, the number of Protestants in undivided Punjab rose to 493,081 in 1947." The reasons for conversion were much the same as anywhere else in the world.
 
The book gives a solid understanding into several aspects of the community's origin and journey, if you can wade through it, and modestly confesses it is an invitation to an ongoing dialogue. Reports of the Christian community from Pakistan are not encouraging and perhaps a more contemporary analysis is also needed to understand their current situation.
 
 
 
 
 
 
 
My final words of advice to you are educate, agitate and organize; have faith in yourself. With justice on our side I do not see how we can lose our battle. The battle to me is a matter of joy. The battle is in the fullest sense spiritual. There is nothing material or social in it. For ours is a battle not for wealth or for power. It is battle for freedom. It is the battle of reclamation of human personality. 
B.R.Ambedkar