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Monday, 22 April 2013

बंगाल की आर्थिक बदहाली के पीछे चिटफंड कंपनियों का भारी योगदान!



बंगाल की आर्थिक बदहाली के पीछे चिटफंड कंपनियों का भारी योगदान!

एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास​

बंगाल की आर्थिक बदहाली के पीछे चिटफंड कंपनियों का भारी योगदान है। दशकों से यह सिलसिला सत्तावर्ग के खुले संरक्षण से चल रहा है। मंत्री एमएलए  एमपी नगरपालिका प्रधान पंचायत प्रधान नगरनिगम प्रशासन सारे लोग इस गोरखधंधे में शामिल रहे हैं। वे बेनकाब भी होते रहे तो इससे उनके राजनीतिक जीवन  पर कोई असर हुआ हो, ऐसा कोई उदाहरण नहीं है।मीडिया, खेल और मनोरंजन जगत में तो चिटफंड का बोलबाला है ही। प्रोमोटर​​ बिल्डर जो निरंकुश हुए , उसके पीछे भी चिटफंड का बेहिसाब पैसा है। राज्य सरकारों की भूमिका तो कटघरे में है ही, पर गैरबैंकिंग संस्थाओं में निवेश के नियमन में फेल देश के वित्त प्रबंधन को भी इसके लिए कम जिम्मेवार नहीं माना जा सकता। पहली पहली बार जब संचयनी का कारोबार बंद हुआ, उस वक्त वह अव्वल नंबर की चिटफंड कंपनी थी। लेकिन संचयनी के बदले दूसरी और बड़ी कंपनियां आम लोगों की जमा पूंजी बेखटके लूट रही है, भारतीय रिजर्व बैंक और सेबी के दिशा निर्धेशों की धज्जियाँ उड़ाते हुए और तमाम लोग पांचसितारा जीवनशैली में चांदी काट रहे हैं, चप्पे चप्पे में फैले आयकर विभाग के तंत्र को भी यह मालूम नहीं पड़ा। अब श्रद्धा जिसे सारडा और शारदा भी कहा जा रहा है, की बारी है। इंतजार कीजिये दूसरी और बड़े ठग और बारी कंपनी की। रिरफ्तारी और कुर्की से आखिर कुछ नहीं होना, लाखों करोड़ हड़पने के बाद अभियुक्त सीधे खाता बही निकलाकर दिखा देंगे कि उनकी संपत्ति तो बमुश्किल पांच​​ करोड़ ही है।आम लोग इस हकीकत से वाकिफ है और राज्यभर में गुस्सा फट पड़ा है। सुरक्षा बंदोबस्त चाकचौबंद करने से इस बवाल को रोकना असंभव है। बंगाल कभी देश भर में अल्पसंचय के मामले में पहले नंबर पर था। अब हालत यह है कि केन्द्रीय सूत्रों ने बताया कि पश्चिम बंगाल में अल्पबचत योजनाओं में पिछले दो सालों में काफी कमी आई है और इसी के चलते पश्चिम बंगाल की क्रेडिट लिमिट भी 160 करोड़ से कम हो गई है।यदि हालात यही रहे तो कोई भी नेशनल या इंटरनेशनल ऐजेंसी पश्चिम बंगाल को विकास कार्यों के लिए लोन तक नहीं देगी। इसीके साथ साथ ग्रामीण बैंकिंग पर चिटफंड के वर्चस्व के चलते इसका भारी असर हुआ है। कारोबार चलाना ही मुश्किल है।

राज्य बचत 2010 बचत 2011
आंध्रप्रदेश 5747 11267
बिहार 8398 7728
दिल्ली 9591 5566
गुजरात 16412 12701
कर्नाटक 8623 6234
महाराष्ट 20113 14198
पंजाब 9361 7340
राजस्थान 9677 7425
तमिलनाडु 11433 8789
उत्तर प्रदेश 20009 16808
पश्चिम बंगाल 28554 19540
कुल 202482 154945
(नोट : बचत करोड़ रूपए में, आंकड़े जनवरी 2011 व जनवरी 2012 तक)

यह सिलसिला वर्षों से चला आ रहा है। अभियुक्त पूरी राजनीतिक जमात है। केंद्र और राज्य सरकारों को पूरी रपट मिलती रही है। पर आंखें होते हुए जो अंधे बने रहे, उनका क्या इलाज कीजिये। ममता बनर्जी सरकार ने उस विधेयक को पास कराने के लिए कसरत शुरू कर दी है जो 2010 में पामपं​थी सरकार द्वारा तय किया गया था परंतु राष्ट्रपति के यहां मंजूरी के लिए पेंडिंग पड़ा हुआ है। बनर्जी सरकार के आते ही यह विधेयक ठंडे बस्ते में चला गया था।ममता बनर्जी इस विधेयक की मंजूरी के लिए सुदीप्त की तलाश और पीड़ितों की आत्महत्याओं, गुमशुदगी , बढ़ते हुए जनाक्रोश के मध्य फिर राष्ट्रपतिसे अपील की है कि विदेयक को कानून बना दें। पर कानून कोई जादू की छड़ी नहीं है कि फौरन हालाते बदल जायेंगे। कानून सख्त करने के बाद देश भर में बलात्कारकांडों की बाढ़ के बाद नये कानून से क्या उम्मीद की जासकती है। फिर जो प्रभावशाली बड़े लोग, मंत्री सांसद और दूसरे लोग इस पूरे खेल में है एक सुदीप्त और कुछ दूसरे लोगो की बलि लेकर साफ बच निकलते हैं तो कानून बन जाने के बाद फिर वे नया खेल शुरु कर देगें। मसलन अब तो बिना किसी नियमन, देखरेख और फैकल्टी​​ के गली गली गांव गांव रोजगार दिलाने के कारोबार में जो लाखों करोड़ हड़पे जाते हैं, जो कोचिंग गोरखधंधा है, उसकी स्थिति चिटफंड से कम भयावह नहीं है।

माकपा नेता निरुपम सेन ने कहा कि राज्य सरकार बेरोजगारों को रोजगार दिलाने की बड़ी बड़ी बातें कर रही थे। जो सिर्फ घोषणाओं में ही सिमट कर रह गयी है। चिटफंड व्यवसाय के नाम पर लोगों से वसूली गयी करोड़ों रुपयों का घोटाले में राज्य सरकार को जिम्मेदारी लेनी होगी।चिटफंड में हुए करोड़ों रुपये के घोटाले की जिम्मेवार राज्य सरकार है। कंपनी के लोगों ने राज्य सरकार के मंत्री, नेताओं का फोटो छापकर करोड़ों रुपये घोटाले किया है। राज्य सरकार के लोग चिटफंड कंपनियों के कार्य में सक्रिय रुप से भाग लेते आए हैं। अब सरकार को ही लोगों के रुपये वापस दिलाने की व्यवस्था करनी होगी।

पश्चिम बंगाल में सरकार पर लगातार आरोप लग रहे हैं कि वह फर्जी चिटफंड कंपनियों को संरक्षण दे रही है। इसी के चलते अल्पबचत के विकास अधिकारियों की ऐसोसिएशन ने भी सरकार के खिलाफ आवाज उठाते हुए चिटफंड कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।एसोसिएशन के अध्यक्ष नबकुमार दास ने पिछले २८ जनवरी को कहा कि राज्य सरकार को चाहिए कि वो फर्जी चिटफंड कंपनियों की सूची अखबारों में प्रकाशित कराएं, ताकि लोगों में जागरुकता आए। उन्होंने कहा कि इन चिटफंड कंपनियों के कारण अल्प बचत योजनाएं बुरी तरह से प्रभावित हुईं हैं और लोगों का रुझान अल्प बचत योजनाओं की तरफ नहीं रह गया है।उन्होंने बताया कि एक फाइनेंस ऐजेंसी ने भी अपने सभी जिला स्तर के अधिकारियों को यहां चिटफंड कंपनियों की सूची तैयार करने के निर्देश दिए है।

अल्प बचत परियोजनाओं में बुनियादी फेरबदल हो जाने से आम लोगों को वहा निवेश से कुच मिलता नहीं दिकाता। इसी वजह से अल्पवधि में दस गुणा तक वृद्धि की लालच में फंस जाना उनके लिए आसान है। न राज्य  सरकार और न केंद्र सरकार ने बदलते हालात को मुताबिक अल्प संचय प्रणाली को बदलने और समयोपगी बनाने की कोई पहल की। इसके उलट पूरी राजनीतिक व्यवस्था अल्प संचय की कामत पर चिटफंड को बढ़ावा देने में लग गयी। सत्ता परिवर्तन के बाद भी नीति निर्धारण और वित्त प्रबंधन में कोई बुनियादी अंतर नहीं आया। इसीलिए आम लोगों की दुर्गति की निरंतरता बनी हुई है।राष्ट्रीय अल्प बचत प्रणाली अब उस रूप में नहीं रह गई है जिसमें उसकी स्थापना की गई थी। इसका मकसद था उन लोगों की वित्तीय बचत को आकर्षित करना जो बाजार अर्थव्यवस्था के हाशिए पर थे और उस बचत को केंद्र और राज्य सरकारों को ऋण के रूप में देना। इसमें ग्रामीण बचत का बड़ा हिस्सा पहले भी और अब भी डाक घरों के जरिए नियंत्रित होता है। इसकी पहुंच उन स्थानों और लोगों तक है जहां व्यावसायिक बैंक नहीं पहुंच पाते हैं। लेकिन बैंकों के राष्ट्रीयकरण, शाखाओं के विस्तार, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के उद्भव और सार्वजनिक भविष्य निधि तथा राष्ट्रीय बचत पत्र जैसी कर बचत योजनाओं ने ग्रामीण बचत और डाक घर दोनों की भूमिका को सीमित कर दिया है। इसके अलावा वित्त आयोगों द्वारा लगातार संसाधन संबंधी राज्यों की समस्या निपटाए जाने से अल्प बचत आधारित ऋणों पर उनकी निर्भरता कम हो गई है। कोष के भविष्य को अधिक व्यवहार्य और सार्थक बनाने की राह तलाशने के लिए बनाई गई समिति ने अपनी रिपोर्ट में कई अनुशंसाएं की हैं लेकिन उसने कोष के अस्तित्व की सार्थकता पर कोई सवाल नहीं उठाया है।  रिपोर्ट में अनुशंसा की गई है कि इस कोष के एक हिस्से को आधारभूत संरचना क्षेत्र की संस्थाओं को ऋण के रूप में दिया जाना चाहिए। ये संस्थाएं कोष के लिए ऐसी प्रतिभूतियां जारी कर सकती हैं जो मौजूदा 10 वर्षीय सरकारी प्रतिभूति के द्वितीयक प्रतिफल के इर्दगिर्द हों।



BJP MAY BRING BACK NEPALESE MONARCHY SHOULD IT WIN 2014 ELECTIONS





BJP MAY BRING BACK NEPALESE MONARCHY SHOULD IT WIN 2014 ELECTIONS

Posted by The Himalayan Voice: 
[Welcoming the visiting King Mahendra of Nepal into the White House in November 1967 President Lyndon B. Johnson had said, " Nepal has carried its good influence and example into the great forums of the world".  But the country  does not 'carry any good influence and example into the great forums of the world' at all today . President Carter is hopeful that the Interim Election Commission  will  be able to hold Constituent Assembly elections finally. But  Palash Biswas, the author of the article below fears that  Bharatiya Janata Party may reinstall  the monarchy should it win the general elections in 2014. The Maoist Chairman Prachand seems to have received  grand reception in Beijing recently. China may not cherish the dethroned King's come back. - Editor ]


मुक्त बाजार भारत की राजनीतिहिंदुत्व और धर्मनिरपेक्षता !

(मसलन नेपाल में राजतंत्र के अवसान के बाद भारतकी हिंदुत्ववादी राजनीति के मात्र एजंडा वहां राजतंत्र की बहाली है। इस वक्त नेपाल में बड़े जोर शोर से प्रचार अभियान चल रहा है कि भारत में नरेंद्र मोदी के अमेरिकी समर्थन से प्रधानमंत्री बन जाने से भारत हिंदू राष्ट्र बन जायेगा और इसीके साथ नेपाल में एकबार फिर राजतंत्र की स्थापना हो जायेगी। फिर शांति और संपन्नता का युग वापस आ जायेगा।)

लेखक पलाश विश्वास

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The Himalayan Voice
Skype: thehimalayanvoice
[THE HIMALAYAN VOICE does not endorse the opinions of the author or any opinions expressed on its pages. Articles and comments can be emailed to: himalayanvoice@gmail.com, © Copyright The Himalayan Voice 2013]




बांग्लादेशी हिन्दुओं की कोई परवाह नहीं हिन्दुत्व के ठेकेदारों को…


बांग्लादेशी हिन्दुओं की कोई परवाह नहीं हिन्दुत्व के ठेकेदारों को…


विकास का हिन्दुत्व मॉडल पर क्या कॉरपोरेट वर्चस्व नहीं है..
भारत का राजनय, मुक्त बाजार,हिन्दुत्व और धर्मनिरपेक्षता!…
 जब हमें बांग्लादेश या नेपाल या भूटान के हितों का ख्याल नहीं रखना है तो हम क्यों अपेक्षा करते हैं कि चीन हमारे हितों का ख्याल रखेगा!…
 पलाश विश्वास
अब विश्वबैंक और अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के दिशा निर्देशों से मुक्त बाजार भारत की राजनय तय होता है। भारत चीन सीमा विवाद और जल संसाधन के बंटवारे पर पड़ोसी देशों से द्विपक्षीय वार्ता तो होती नहीं है पर व्हाइट हाउस और पेंटागन से विदेश नीति तय होती है। ईरान में भूकम्प के बाद चीन में मची भूकम्पीय तबाही से ब्रह्मपुत्र के उत्स पर परमाणु धमाके से पहाड़ तोड़कर बाँध बनाने के उपक्रम पर भारत ऐतराज करने की हालत में भी नहीं है क्योंकि भारत चीन जल समझौता जैसी कोई चीज नहीं है। हिमालयी क्षेत्र में उत्तराखंड, हिमाचल, बंगाल का पहाड़ी क्षेत्र, सिक्किम भूगर्भीय दृष्टि से अत्यन्त संवेदनशील है। कुमायूँ गढ़वाल में भूकम्प के  इतिहास की निरन्तरता बनी हुयी है। भूस्खलन तो रोजमर्रे का जीवन है। पर भारत सरकार को न तो हिमालय की चिंता है और न जल संसाधनों की सुरक्षा की और न ही वहाँ रहने वाली आम जनता के जानमाल की। हिमालय के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन और हिमालयी जनता का अमानवीय दमन ही राजकाज है।
जब अपने देश में पर्यावरण कानून, समुद्री तट सुरक्षा कानून , वनाधिकार कानून, सम्विधान की पाँचवी और छठीं अनुसूचियों, धारा 39 बी, 39 सी, स्थानीय निकायों की स्वायत्तता, मौलिक अधिकारों, नागरिक और मानव अधिकारों की धज्जियाँ उड़ाकर विकास के नाम पर मूलनिवासी बहुजनों को कॉरपोरेट हित में निजी कम्पनियों के लाभ के लिये नित नये कानून पास करके संशोधन करके जल जंगल जमीन से बेदखल किया जा रहा हो, सेज और परमाणु संयंत्र की बहार हो, बड़े बाँध और ऊर्जा प्रदेश बन रहे हैं, जनान्दोलनों का सैनिक राष्ट्र निरँकुश दमन कर रहा हो, तो भारतीय विदेश नीति को बांग्लादेश में जनप्रतिरोध की क्या परवाह होगी? जब हमें बांग्लादेश
palashji, Palash Vishwas, पलाश विश्वास
पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं। आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के पॉपुलर ब्लॉगर हैं। "अमेरिका से सावधान "उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना।
या नेपाल या भूटान के हितों का ख्याल नहीं रखना है तो हम क्यों अपेक्षा करते हैं कि चीन हमारे हितों का ख्याल रखेगा!
भारत में हिन्दुत्व और हिन्दू राष्ट्रवाद का उन्माद बड़े ही वैज्ञानिक और बाजार प्रबन्धन के बतौर राजनीतिक विकल्प और विकास के वैकल्पिक चमत्कारिक मॉडल के रूप में नये सिरे से पेश किया जा रहा है। भारत की अल्पमत सरकार बाबरी विध्वंससिख नरसंहारगुजरात नरसंहार और भोपाल गैस त्रासदी के युद्ध अपराधियों को सजा दिलाने के बजाय केन्द्र में साझे तौर पर दुधारी दो दलीय सत्ता में न सिर्फ उनके साझीदार है, बल्कि हिन्दू राष्ट्र के ध्वजावाहकों के साथ मिलीभगत के तहत विदेशी निवेश,विनिवेश, अबाध पूँजी प्रवाह, विकासदर, वित्तीय घाटा, निवेशकों की आस्था, बुनियादी ढाँचा के नारों के साथ नागरिकता संशोधन कानून पास करके आधार कार्ड परियोजना के तहत देश की आधी आबादी के नागरिक मानवाधिकार संवैधानिक रक्षाकवच को निलम्बित करके जनसंहार अभियान चला रही है। खुदरा कारोबार में विदेशी निवेश का पुरजोर विरोध करने वाले संघ परिवार को विमानन क्षेत्र से लेकर रक्षा क्षेत्र तक में विदेशी पूँजी के अबाध वर्चस्व से कोई आपत्ति नहीं है। रेलवे और राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं को बलात्कार विरोधी स्त्री उत्पीड़नविरोधी कानून के प्रावधानों में जैसे पुलिस और सेना को, सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून , आतंकवाद निरोधक आईन को छूट दी गयी, उसी तरह की छूट देकर जनहित में पुनर्वास और मुआवजा के दिलफरेब वायदों के साथ बिना भूमि सुधार लागू किये भूमि अधिग्रहण संशोधन कानून पास कराने की तैयारी है तो पेंशन और भविष्यनिधि तक को बाजार के हवाले करने के लिये,पूरे बैंकिंग सेक्टर को कॉरपोरेट के हवाले करके जीवन बीम निगम के साथ साथ भारतीय स्टेट बैंक के विध्वंस के जरिये आम जनता की जमा पूँजी पर डाका डालने की तैयारी है। कालेधन की यह अर्थव्यवस्था चिटफण्ड में तब्दील है और कोयले की कोठरी में सत्तावर्ग के सभी चेहरे काले हैं।
ऐेसे में नेपाल हो या बांग्लादेशकहीं भी धर्मनिरपेक्षता व लोकतन्त्र की लड़ाई हिन्दुत्व के लिये बेहद खतरनाक है।
मसलन नेपाल में राजतन्त्र के अवसान के बाद भारत की हिन्दुत्ववादी राजनय के एकमात्र एजेण्डा वहाँ राजतन्त्र की बहाली है। इस वक्त नेपाल में बड़े जोर शोर से प्रचार अभियान चल रहा है कि भारत में नरेन्द्र मोदी के अमेरिकी समर्थन से प्रधानमन्त्री बन जाने से भारत हिन्दू राष्ट्र बन जायेगा और इसीके साथ नेपाल में एकबार फिर राजतन्त्र की स्थापना हो जायेगी। फिर शांति और संपन्नता का युग वापस आ जायेगा। जाहिर है कि भारत का हिन्दुत्ववादी सत्तावर्ग उसी तरह लोकतन्त्र के विरुद्ध है जैसे कि जायनवादी कॉरपोरेट साम्राज्यवाद। भारतीय सत्तावर्ग कम से कम अपने अड़ोस पड़ोस मे लोकतन्त्र और धर्मनिरपेक्षता बर्दाश्त कर ही नहीं सकता और कट्टरपंथ को बढ़ावा देने के लिये हर कार्रवाई करता है। वरना क्या कारण है कि पाकिस्तान से अभी-अभी आनेवाले हिन्दुओं को नागरिकता दिलाने की मुहिम तो जोरों पर होती हैवहीं विभाजन पीड़ित हिन्दू शरणार्थियों की नागरिकता छीने जाने परउनके विरुद्ध देशव्यापी देशनिकाले अभियान के खिलाफ कोई हिन्दू आवाज नहीं उठाता। बांग्लादेश, पाकिस्तान और बाकी दुनिया में बाबरी विध्वंस के बाद क्या हुआ, सबको मालूम है, लेकिन इस वक्त बांग्लादेश में लोकतन्त्र और धर्मनिरपेक्षता के जीवन मरण संग्राम के वक्त उनका समर्थन करने के बजाय संघ परिवार की ओर से सुनियोजित तरीके से रामजन्मभूमि आन्दोलन ने सिरे से जारी किया जाता है। यहीं नहीं,संघ परिवार की ओर से पेश प्रधानमन्त्रित्व के दो मुख्य दावेदारों में से एक बाबरी विध्वंस तो दूसरा गुजरात नरसंहार मामले में मुख्य अभियुक्त है। इस पर मजा यह कि धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद का झंडा उठाये लोगों को गुजरात नरसंहार का अभियुक्त तो साम्प्रदायिक लगता हैलेकिन बाबरी विध्वंस का अभियुक्त नहीं। वैसे ही जैसे सिखों को हिन्दू मानने वाले संघ परिवार ने ऑपरेशन ब्लू स्टार में न सिर्फ काँग्रेस का साथ दिया,बल्कि सिखों के जनसंहार के वक्त भी काँग्रेस का साथ देते हुये वह हिन्दू हितों का राग अलापता रहा और बाद में अकाली दल के साथ पंजाब में सत्ता का साझेदार हो गया।दंगापीड़ित सिखों को न्याय दिलाने का कोई आन्दोलन न संघ परिवार ने छेड़ा और न अकाली सत्ता की राजनीति की इसमें कोई दिलचस्पी रही।
पिछले दिनों राजधानी नयी दिल्ली में बांग्लादेश के  धर्मनिरपेक्ष लोकतान्त्रिक शाहबाग आन्दोलन के समर्थन में देश भर के शरणार्थियों ने निखिल भारत शरणार्थी समन्वय समिति के आह्वान पर धरना दिया और प्रदर्शन किया। इस कार्यक्रम में हिन्दुत्व का कोई सिपाहसालार नजर नहीं आया और न अराजनीति और राजनीति का कोई मसीहा। जबकि बांग्लादेश में अब भी एक करोड़ हिन्दू हैं। रोज हिन्दुओं पर हमले हो रहे हैं, पर अयोध्या के रथी महारथियो को रोज बांग्लादेश में ध्वस्त किये जा रहे असंख्य हिन्दू धर्मस्थलों, रोज हमले के शिकार होते हिन्दुओं की कोई परवाह नहीं है। बुनियादी सवाल तो यह है कि क्या उन्हें भारतीय हिन्दुओं की कोई परवाह है? हिन्दुत्व के नाम पर जो बहुसंख्य मूलनिवासी बहुजन संघपरिवार की पैदल सेना हैंसमता और सामाजिक न्यायसमान अवसरों और आर्थिक सम्पन्नता के उनके अधिकारों की चिंता हैउसके प्रति समर्थन हैदेवभूमि और पवित्र तीर्थ स्थलों,चारो धामोंपवित्र नदियों पर कॉरपोरेट कब्जा के खिलाफ वे कब बोले? वास्तव में वे रामरथी नहीं, बल्कि जनसंहार और बेदखली के शिकार इस अनन्त वधस्थल पर जारी अश्वमेध अभियान के ही वे रथी महाऱथी हैं। बहुसंख्य आम जनता के हक हकूक के खिलाफ आर्थिक सुधारों का हिन्दुत्व राष्ट्रवादियों ने कब विरोध कियाबताइये! विकास का हिन्दुत्व मॉडल पर क्या कॉरपोरेट वर्चस्व नहीं है और क्या इस मॉडल की कॉरपोरेट मार्केटिंग नहीं हो रही है,जिसे विश्व व्यवस्था और कॉरपोरेट साम्राज्यवाद का बिना शर्त समर्थन हासिल है?
इस कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुये भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में पूर्वी बंगाल के स्वतन्त्रता सेनानियों की मार्मिक याद दिलाते हुये शरणार्थी नेता सुबोध विश्वास ने सवाल खड़े किये कि पाकिस्तान से आये हिन्दू शरणार्थियों पर बहस हो सकती है तो क्यों नहीं पूर्वी बंगाल के विभाजन पीड़ित शरणार्थियों को लेकर कोई सुगबुगाहट है। इस आयोजन का कॉरपोरेट मीडिया में क्या कवरेज हुआ, हमें नहीं मालूम। सभी कोलकातिया अखबारों के दफ्तर नई दिल्ली में मौजूद हैं और इस कार्यक्रम में करीब-करीब सभी राज्यों से प्रतिनिथधि मौजूद थेजो बोले भी,पर कोलकाता में किसी को कानोंकान खबर नहीं है। हम अपनी ओर से अंग्रेजी और हिन्दी को छोड़ बांग्ला में भारत में शरणार्थियों का हालत और बांग्लादेश के ताजा से ताजा अपडेट दे रहे हैं, पर यहाँ के नागरिक समाज में कोई प्रतिक्रिया , कोई सूचना नहीं है। आम जनता तो सूचना ब्लैक आउट के शिकार हैं ही। बहरहाल शाहबाग आन्दोलन के प्रति समर्थन जताया जा रहा है, वहाँ अल्पसंख्यक उत्पीड़न रोकने के लिये आवाज उठाये बिना। उधर जमायते है तो इधर भी जमायत है और इसी के साथ वोट बैंक हैं। राजनीति के कारोबारी जाहिर है कि मुँह नहीं खोलने वाले। लेकिन अराजनीति वाले कहाँ हैं? उनकी हालत तो एक मशहूर पत्रकार नारीवादी धर्मनिरपेक्ष आइकन की जैसी हो गयी है जो गुजरात के नरसंहार के विरुद्ध निरन्तर लड़ने वाले लोगों के विरुद्ध नरेन्द्र मोदी की हत्या की साजिश का आरोप लगा रही हैं या फिर बहुजन आन्दोलन के उन मसीहाओं की तरह जो मोदी के प्रधानमन्त्रित्व के लिये यज्ञ महायज्ञ में सामाजिक बदलाव और आजादी के आन्दोलन को निष्णात करने में लगे हुये हैं। जिस वैकल्पक मीडिया के लिये हमने और हमारे अग्रज साथियों ने पूरा जीवन लगा दियावहाँ भी हिन्दुत्व का वर्चस्व है। `हस्तक्षेप' को छोड़कर सोशल मीडिया में हर कहीं इस मामले में चुप्पी है।
बांग्लादेश में ब्राह्मणवाद विरोधी दो सौ साल पुराना मतुआ आन्दोलन का दो सौ साल से निरन्तर चला आ रहा बारुणि उत्सव बंद हो गया है और मौजूदा हालात में न वहाँ इस साल कोई तीज त्योहार और न ही दुर्गापूजा मनाने की हालत में हैं एक करोड़ हिन्दू। इस तरह हमले जारी रहे तो वे तसलीमा के लज्जा उपन्यास के नायक की तरह एक न एकदिन भारत आने को मजबूर हो जायेंगे। जिस शरणार्थी समस्या के कारण भारतीय सेना को बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में दखल देना पड़ा, वह फिर मुँह बाएं खड़ी है। क्या भारतीय राजनय के लिये यह चिंता की बात नहीं है और हिन्दुत्व के ध्वजावाहकों के लिये लोकतन्त्र और धर्मनिरपेक्षता के स्वयंभू रथि महारथियों के लिये!

कुछ पुराने महत्वपूर्ण आलेख



Video Of Tamerlan Tsarnaev NAKED, Handcuffed,Walking Alive! So How Did His Body End Up Like This?



Tamerlan Tsarnaev NAKED walking alive.
This UNCONFIRMED video which we are told appeared on Brazilian TV earlier today appears to have been shot at the scene of the Boston Police Dept's arrest of suspect bomber Tamerlan Tsarnaev – the video clearly shows the 26 year old being escorted to BPD vehicle whilst handcuffed and not wounded, which in total contradiction to official reports which claim the suspect was shot by police and then run-over by his younger brother in a stolen SUV in Sommerville, MA. Please bookmark and share this video, and do continue to ask questions about what happened on the evening April 18th and the morning of April 19th, 2013, so the public can better determine the truth of all that really happened. 
Eye witness account of the suspect being ordered to take off all his clothes.
Why did they release this Picture? Would they be trying to create more hatred? How does this benefit anyone?
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My apologies for the very graphic photo, but I was watching CNN when a correspondent was saying he had witnessed the suspe ct (no 1) being captured and made to get naked. To my fellow journalists, esp those on mainstream networks in the U.S., why isn't the question being asked, if the alleged suspect was captured healthy and alive, then how did he end up like this, and why???? by Abbas Mirza
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