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Tuesday, 14 February 2012

विध्वंसकारी को भावी प्रधानमंत्री बताना शर्मनाक



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विमर्श  बहस  विध्वंसकारी को भावी प्रधानमंत्री बताना शर्मनाक
विध्वंसकारी को भावी प्रधानमंत्री बताना शर्मनाक

    Sunday, 12 February 2012 10:13

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मोदी ने गुजरात दंगों के दौरान पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया। हज़ारों लोग
लगभग एक महीने तक चली  सांप्रदायिक हिंसा में मारे गए और 600 धर्मस्थलों
को ध्वस्त कर दिया गया, आग के हवाले कर दिया गया. नरेंद्र मोदी स्वयं
नियंत्रण कक्ष में बैठकर लोगों को जि़ंदा जलाए जाने, बस्तियां व गांव
उजाड़े जाने का खेल देखते रहे...

तनवीर जाफरी

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को देश का सबसे विवादित नेता कहा जाए
तो यह गलत नहीं होगा। उन्हीं विवादित नेता को  भारतीय जनता पार्टी का एक
वर्ग भावी प्रधानमंत्री के रूप में पेश ज़रूर कर रहा है। मोदी ने  फरवरी-
मार्च 2002 में गुजरात दंगों को बड़े ही सुनियोजित ढंग से भडक़ाया और
दंगों के बाद ऐसा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कराया जिससे कि आज भाजपा
बहुसंख्य मतों के साथ राज्य की  सत्ता पर अपनी पकड़ मज़बूत बनाए हुए हैं।

मोदी की राजनैतिक व संगठनात्मक कार्यक्षमता व योग्यता का जहां तक प्रश्र
है तो गुजरात के मुख्यमंत्री बनने से पहले वे भाजपा संगठन में रहते हुए
हरियाणा के पार्टी पर्यवेक्षक थे। हरियाणा में भाजपा की स्थिति को देखकर
भली भांति इस बात का अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि पार्टी को मज़बूत करने
की कितनी क्षमता है।

मोदी समर्थक भाजपाई व इनके सहयोगी सांप्रदायिक संगठनों के लोग उसी
नरेंद्र मोदी में देश का भावी प्रधानमंत्री तलाश रहे हैं जिसपर कि
अमेरिका ने अपने देश में आने पर प्रतिबंध लगा रखा है। मोदी देश के पहले
ऐसे मुख्यमंत्री हैं जिनपर अमेरिका में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा हुआ है।
निश्चित रूप से यह हमारे देश विशेषकर गुजरातवासियों के लिए अपमानजनक
स्थिति है। ज़रा सोचिए, कि  दुर्भाग्यवश यदि मोदी देश के प्रधानमंत्री बन
भी गए और तब भी यदि अमेरिका ने उन्हें अपने देश में प्रवेश करने की
इजाज़त नहीं दी तो हमारा देश दुनिया को क्या मुंह दिखाएगा?

narendra-modi

वैसे यह वाक्य 2002 में तत्कालीन भाजपाई  प्रधानमंत्री अटल बिहारी
वाजपेयी के मुंह से भी उस समय निकला था जबकि फरवरी-मार्च 2002 के दंगों
में नरेंद्र मोदी की भूमिका व उनके मुख्यमंत्री रहते प्रशासनिक पक्षपात
के चलते उन्हें पीड़ा पहुंची थी। वाजपेयी उस समय विदेश यात्रा पर जाने
वाले थे, तब उन्होंने भी यही कहा था कि मैं गुजरात दंगों को लेकर दुनिया
को क्या मुंह दिखाऊंगा.

भारतीय जनता पार्टी व उसके सहयोगी संगठन अपने सांस्कृतिक राष्ट्रवादी
होने का दम भरते रहते हैं। हमारे देश का संविधान धर्मनिरपेक्ष  है तथा
यहां सभी धर्मों व समुदायों के लोगों को स्वतंत्रता से रहने, अपने
धार्मिक रीति-रिवाजों व परंपराओं को अंजाम देने आदि का पूरा उल्लेख है।
परंतु दक्षिणपंथी संगठनों के लोग देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को, देश की
धर्मनिरपेक्षता और उसके  पैरोकारों को हर समय कोसते रहते हैं।
धर्मनिरपेक्ष संविधान होने के बावजूद यह वर्ग हिंदू राष्ट्र का पैरोकार
है तथा इसी राह पर चलते हुए इन लोगों ने सर्वप्रथम तो केंद्र सरकार व देश
की अदालतों को गुमराह कर 6 दिसंबर 1992 को सत्ता का दुरुपयोग करते हुए
अयोध्या विध्वंस में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उसके बाद  गुजरात दंगों के दौरान पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया।  हज़ारों
लोग लगभग एक महीने तक चली अनियंत्रित सांप्रदायिक हिंसा में मारे गए और
लगभग 600 धर्मस्थलों को ध्वस्त कर दिया गया या उन्हें आग के हवाले कर
दिया गया. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और  निचली अदालतों ने  नरेंद्र मोदी
सरकार से 2002 के सांप्रदायिक दंगों में तहस-नहस किए गए धर्मस्थलों को
मुआवज़ा देने को कहा गया तो मोदी सरकार  तर्क दिया कि राज्य के पास इस
प्रकार के खर्च के लिए कोई फ़ंड नहीं है। अभी हाल में गुजरात उच्च
न्यायालय ने मोदी सरकार को पुन: यह निर्देश दिया कि सरकार दंगों के दौरान
क्षतिग्रस्त हुए 572 धर्मस्थलों को मुआवज़ा दे।

अकेले नरेंद्र मोदी ही नहीं बल्कि देश में रामराज्य लाने की बात करने
वाले व स्वयं को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के अलमबरदार कहने वाले मोदी सरकार
के दो मंत्री अमित शाह व माया कोडनानी जेल की हवा खा चुके हैं। अमित शाह
पर सोहराबुद्दीन व तुलसीराम प्रजापति के फर्जी  मुठभेड़ में मारे जाने की
साजि़श रचने व इस मुठभेड़ के मास्टर माइंड होने का आरोप था। अमित शाह
नरेंद्र मोदी के सबसे विश्वासपात्र सहयोगी थे। राज्य के इस पूर्व
गृहमंत्री को जिस समय गुजरात हाईकोर्ट ने ज़मानत भी दी थी उस समय उसे
राज्य से बाहर रहने का आदेश दिया गया था।

राम राज्य की दूसरी अलमबरदार माया कोडनानी राज्य की महिला एवं शिशु विकास
मंत्री थीं यह आज भी जेल में हैं। इनके पिता राष्ट्रीय स्वयं संघ के
सक्रिय कार्यकर्ता व अध्यापक थे। कोडनानी भी बाल्यकाल से ही संघ की महिला
शाखा राष्ट्रीय सेविका समिति से जुड़ गईं थीं। गोया सांप्रदायिक आधार पर
नफरत होना इनके संस्कारों में समा चुका था।

कोडनानी ने मंत्री पद पर रहते हुए गुजरात दंगों के दौरान नरोदा पाटिया
नामक नरसंहार में 98 लोगों को जि़ंदा जलाए जाने के अमानवीय घटनाक्रम में
दंगाई भीड़ को उकसाया। कोडनानी आज उसी आरोप में राज्य के विश्व हिंदू
परिषद् नेता जयदीप पटेल व अन्य कई अरोपियों के साथ जेल में है। माया
कोडनानी लालकृष्ण अडवाणी की भी खास सहयोगी हैं तथा 1960 में गठित गुजरात
राज्य की पहली सिंधी समुदाय की मंत्री थीं।

नरेंद्र मोदी के एक अन्य सहयोगी हरेन पांडया जोकि गुजरात दंगों के समय
राज्य के गृहमंत्री थे, का भी बड़े ही रहस्यमयी ढंग से 2003 में उस समय
कत्ल हो गया जबकि वे सुबह की सैर करने के बाद कार में बैठकर अपने घर
वापसी करने वाले थे। हरेन पांडया के परिजनों को आज तक उनकी मौत को लेकर
संदेह बरकरार है। हालांकि इस प्रकरण में कई लोगों को सज़ा भी हो चुकी है।
परंतु पांडया की हत्या को लेकर संदेह की सुई न केवल नरेंद्र मोदी की ओर
घूमी थी बल्कि लाल कृष्ण अडवाणी भी इस विषय पर आलोचना के केंद्र बने थे।

दरअसल गोधरा कांड के बाद सत्ताईस फरवरी 2002 को मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी
के निवास पर जो बैठक बुलाई गई थी उसके विषय में हरेन पांडया व आईपीएस
अधिकारी संजीव भट्ट को 'सबकुछ' पता था। इस मीटिंग के 'गुप्त एजेंडे' पर
संजीव भट्ट व पांडया ने परस्पर चर्चा भी की थी। कहा जाता है हरेन पांडया
नरेंद्र मोदी के उस एकतरफा रुख से सहमत नहीं थे जोकि नरेंद्र मोदी ने
गोधरा हादसे के बाद गुजरात दंगों को लेकर अपनाया।

पांडया की इस असहमति के बाद संजीव भट्ट ने पांडया को सचेत रहने व उनपर
संभावित खतरों से भी आगाह किया था।  इसके बावजूद पांडया की सुरक्षा नहीं
बढ़ाई गई और उनकी हत्या कर दी गई। इस प्रकरण में कानून भले ही नरेंद्र
मोदी को माफ कर अन्यों को सज़ा क्यों न दे दे परंतु समाज व पांडया परिवार
की ओर से संदेह की सुई नरेंद्र मोदी पर जाकर टिकती है। और  मोदी कभी उससे
बरी नहीं हो सकेंगे।

गोधरा में जि़ंदा जलाए गए कारसेवकों की लाशों को गोधरा से अहमदाबाद
मंगाकर तथा बाद में पूर्ण नियोजित तरीके से उन लाशों को एक-एक कर जुलूस
की शक्ल में उनके घरों तक पहुंचाकर जिस प्रकार नरेंद्र मोदी ने गुजरात
में सांप्रदायिक दंगों की राज्यव्यापी उपजाऊ ज़मीन तैयार की क्या यह है
रामराज्य. या फिर बाद में स्वयं नियंत्रण कक्ष में बैठकर लोगों को जि़ंदा
जलाए जाने व पूरी-पूरी बस्तियां व गांव उजाड़े जाने का खेल देखते रहे वह
स्थिति सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है । इस प्रकार की राजनैतिक व प्रशासनिक
कार्यशैली को अंजाम देने वाले  विध्वंसकारी प्रवृति के व्यक्ति को देश का
एक वर्ग भावी प्रधानमंत्री के रूप में देख रहा है, शर्मनाक है.

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हरियाणा साहित्य अकादमी के पूर्व सदस्य तनवीर जाफरी
राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मसलों के प्रखर टिप्पणीकार हैं.