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Wednesday, 11 April 2012

माओवादियों की सेना पर नेपाली सरकार का कब्जा WEDNESDAY, 11 APRIL 2012 11:30


माओवादियों की सेना पर नेपाली सरकार का कब्जा

WEDNESDAY, 11 APRIL 2012 11:30
http://www.janjwar.com/2011-05-27-09-09-22/28-world/2548-napal-govt-in-maovadi-vishnu-sharma-janjwar

माओवादियों की सेना पर नेपाली सरकार का कब्जा

WEDNESDAY, 11 APRIL 2012 11:30

पिछले रविवार से ही शिविरों में तनाव की स्थिति बनने लगी थी। माओवादी पार्टी के लड़ाके सरकारी निर्णय के खिलाफ मीटिंग और प्रदर्शन कर रहे थे। इसके चलते स्वयं माओवादी कमांडर ही असुरक्षित महसूस करने लगे थे और वे लगातार सरकार पर जल्द निर्णय लेने का दवाब बना रहे थे...
विष्णु शर्मा
माओवादी लड़ाकों के 15 शिविरों को 10 अप्रैल को नेपाली सेना ने अपने कब्जे में ले लिया है। इसके साथ ही माओवादी पार्टी भी नेपाल की अन्य पार्टियों की तरह सेना रहित पार्टी बन गई। मंगलवार को प्रधानमंत्री कार्यालय में आयोजित तीन प्रमुख दलों के शीर्ष नेताओं की बैठक में इस संबंध में फैसला लिया गया था। शाम होने तक नेपाली सेना और पुलिस के 15 सौ जवानों ने शिविरों और हथियारों को अपने नियंत्रण में ले लिया, जिसके बाद शिविरों के फाटकों पर सेना तैनात कर दी गई। सेना ने इन शिविरों पर बिना अनुमति प्रवेश को भी वर्जित कर दिया है।
nepal-maoist-army-photo-by-ajay-prakash
नेपाली सेना के प्रवक्ता रमिंद्र क्षेत्री ने बताया सेना को आदेश है कि वह माओवादी लड़ाकू, हथियार, कंटेनर, शिविर और अन्य सामग्री और शिविरों की सुरक्षा का जिम्मा अपने नियंत्रण में कर ले। साथ ही शिविरों की सुरक्षा में तैनात माओवादी लड़ाकों को भी अपने कार्यभार से मुक्त कर दिया गया है।
तय योजना के अनुसार शिविरों का जिम्मा 12 अप्रैल को सेना के हवाले किया जाना था, लेकिन शिविरों में बढ़ते असंतोष के मद्देनजर सरकार को यह फैसला दो दिन पहले ही यानी 10 अप्रैल को ही करना पड़ा। विशेष समिति सदस्य और माओवादी नेता वर्षमान पुन के अनुसार, 'हमने कहा था कि 12 अप्रैल को समायोजन प्रक्रिया को पूरा कर लिया जाएगा, लेकिन शिविरों में तेजी से बढ़ती असंतुष्टि के कारण हमें दो दिन पहले यह फैसला करना पड़ा।'
नेपाली कांग्रेस के नेता महत ने बताया माओवादी नेतृत्व को यह सूचना मिल रही थी कि कुछ लड़ाके हथियारों को शिविर से निकाल कर अपने कमरों में रखना चाहते हैं इसलिए माओवादी पार्टी ने दो दिन पहले ही शिविरों को सेना के हवाले करने का निर्णय किया है।
पिछले रविवार से ही शिविरों में तनाव की स्थिति बनने लगी थी। माओवादी पार्टी के लड़ाके सरकारी निर्णय के खिलाफ मीटिंग और प्रर्दशन कर रहे थे। इसके चलते स्वयं माओवादी कमांडर ही असुरक्षित महसूस करने लगे थे और वे लगातार सरकार पर जल्द निर्णय लेने का दवाब बना रहे थे। द्वंद की स्थिति के चलते जल्दबाजी में बुलाई गयी बैठक में शिविरों को निर्धारित तिथि से दो दिन पहले 10 अप्रैल को सेना के हवाले करने का निर्णय लिया गया था।
उधर माओवादी पार्टी के किरण समूह ने कल एक बयान जारी कर इस फैसले पर कड़ा एतराज जताया है। पार्टी के सचिव सीपी गजुरेल ने कहा कि, हम इस फैसले की घोर निंदा करते हैं और सभी देशभक्त और अग्रगामी शक्तियों से अपील करते हैं कि वे देश के खिलाफ हो रहे षड़यंत्र की निंदा करें। मोहन वैद्य 'किरण' ने इस फैसले पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि यह फैसला आत्मसमर्पण है और यह नेपाली क्रांति के साथ गद्दारी है।
यह पूछे जाने पर कि तनाव बढ़ाने में उनके समूह की कोई भूमिका है? गजुरेल ने कहा, 'यह कहना एकदम गलत है क्योंकि हमने अपने समर्थकों से अवकाश लेने का अनुरोध किया था। समायोजन का निर्णय उनका अपना था और असंतुष्टि का कारण सरकार की नीति है।' इस फैसले के खिलाफ किरण समूह ने पार्टी के अध्यक्ष प्रचण्ड और उपाध्यक्ष तथा प्रधानमंत्री बाबुराम भट्टाराई का पुतला दहन का कार्यक्रम आयोजित किया है। 
नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के संयोजक मातृका यादव ने सरकार के इस निर्णय को जनता के साथ विश्वासघात बताया है और कहा है की उनकी पार्टी इस कदम की कड़ी निंदा करती है। विशेष समिति के एक सदस्य कुल प्रसाद केसी ने भी इस फैसले पर विरोध जताते हुए कहा है कि शांति प्रक्रिया के पूरा होने से पहले माओवादी सेना को नेपाली सेना के मातहत करना आत्मसमर्पण है और उन्होंने इस प्रक्रिया से खुद को अलग रखने का निर्णय लिया है।
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पिछले रविवार से ही शिविरों में तनाव की स्थिति बनने लगी थी। माओवादी पार्टी के लड़ाके सरकारी निर्णय के खिलाफ मीटिंग और प्रदर्शन कर रहे थे। इसके चलते स्वयं माओवादी कमांडर ही असुरक्षित महसूस करने लगे थे और वे लगातार सरकार पर जल्द निर्णय लेने का दवाब बना रहे थे...
विष्णु शर्मा
माओवादी लड़ाकों के 15 शिविरों को 10 अप्रैल को नेपाली सेना ने अपने कब्जे में ले लिया है। इसके साथ ही माओवादी पार्टी भी नेपाल की अन्य पार्टियों की तरह सेना रहित पार्टी बन गई। मंगलवार को प्रधानमंत्री कार्यालय में आयोजित तीन प्रमुख दलों के शीर्ष नेताओं की बैठक में इस संबंध में फैसला लिया गया था। शाम होने तक नेपाली सेना और पुलिस के 15 सौ जवानों ने शिविरों और हथियारों को अपने नियंत्रण में ले लिया, जिसके बाद शिविरों के फाटकों पर सेना तैनात कर दी गई। सेना ने इन शिविरों पर बिना अनुमति प्रवेश को भी वर्जित कर दिया है।
nepal-maoist-army-photo-by-ajay-prakash
नेपाली सेना के प्रवक्ता रमिंद्र क्षेत्री ने बताया सेना को आदेश है कि वह माओवादी लड़ाकू, हथियार, कंटेनर, शिविर और अन्य सामग्री और शिविरों की सुरक्षा का जिम्मा अपने नियंत्रण में कर ले। साथ ही शिविरों की सुरक्षा में तैनात माओवादी लड़ाकों को भी अपने कार्यभार से मुक्त कर दिया गया है।
तय योजना के अनुसार शिविरों का जिम्मा 12 अप्रैल को सेना के हवाले किया जाना था, लेकिन शिविरों में बढ़ते असंतोष के मद्देनजर सरकार को यह फैसला दो दिन पहले ही यानी 10 अप्रैल को ही करना पड़ा। विशेष समिति सदस्य और माओवादी नेता वर्षमान पुन के अनुसार, 'हमने कहा था कि 12 अप्रैल को समायोजन प्रक्रिया को पूरा कर लिया जाएगा, लेकिन शिविरों में तेजी से बढ़ती असंतुष्टि के कारण हमें दो दिन पहले यह फैसला करना पड़ा।'
नेपाली कांग्रेस के नेता महत ने बताया माओवादी नेतृत्व को यह सूचना मिल रही थी कि कुछ लड़ाके हथियारों को शिविर से निकाल कर अपने कमरों में रखना चाहते हैं इसलिए माओवादी पार्टी ने दो दिन पहले ही शिविरों को सेना के हवाले करने का निर्णय किया है।
पिछले रविवार से ही शिविरों में तनाव की स्थिति बनने लगी थी। माओवादी पार्टी के लड़ाके सरकारी निर्णय के खिलाफ मीटिंग और प्रर्दशन कर रहे थे। इसके चलते स्वयं माओवादी कमांडर ही असुरक्षित महसूस करने लगे थे और वे लगातार सरकार पर जल्द निर्णय लेने का दवाब बना रहे थे। द्वंद की स्थिति के चलते जल्दबाजी में बुलाई गयी बैठक में शिविरों को निर्धारित तिथि से दो दिन पहले 10 अप्रैल को सेना के हवाले करने का निर्णय लिया गया था।
उधर माओवादी पार्टी के किरण समूह ने कल एक बयान जारी कर इस फैसले पर कड़ा एतराज जताया है। पार्टी के सचिव सीपी गजुरेल ने कहा कि, हम इस फैसले की घोर निंदा करते हैं और सभी देशभक्त और अग्रगामी शक्तियों से अपील करते हैं कि वे देश के खिलाफ हो रहे षड़यंत्र की निंदा करें। मोहन वैद्य 'किरण' ने इस फैसले पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि यह फैसला आत्मसमर्पण है और यह नेपाली क्रांति के साथ गद्दारी है।
यह पूछे जाने पर कि तनाव बढ़ाने में उनके समूह की कोई भूमिका है? गजुरेल ने कहा, 'यह कहना एकदम गलत है क्योंकि हमने अपने समर्थकों से अवकाश लेने का अनुरोध किया था। समायोजन का निर्णय उनका अपना था और असंतुष्टि का कारण सरकार की नीति है।' इस फैसले के खिलाफ किरण समूह ने पार्टी के अध्यक्ष प्रचण्ड और उपाध्यक्ष तथा प्रधानमंत्री बाबुराम भट्टाराई का पुतला दहन का कार्यक्रम आयोजित किया है। 
नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के संयोजक मातृका यादव ने सरकार के इस निर्णय को जनता के साथ विश्वासघात बताया है और कहा है की उनकी पार्टी इस कदम की कड़ी निंदा करती है। विशेष समिति के एक सदस्य कुल प्रसाद केसी ने भी इस फैसले पर विरोध जताते हुए कहा है कि शांति प्रक्रिया के पूरा होने से पहले माओवादी सेना को नेपाली सेना के मातहत करना आत्मसमर्पण है और उन्होंने इस प्रक्रिया से खुद को अलग रखने का निर्णय लिया है।