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Thursday, 12 April 2012

पहले नेपाल को इंडोनेशिया होने से बचाएं



पहले नेपाल को इंडोनेशिया होने से बचाएं

THURSDAY, 12 APRIL 2012 12:49
http://www.janjwar.com/janjwar-special/27-janjwar-special/2553-nepal-maoist-debate-anand-swaroop-verma-vishnu-sharma

किरण समूह से मेरी यह शिकायत है कि अगर सचमुच वे कंप्रोमाइज वाले संविधान के खिलाफ थे तो आज तक संविधान सभा में किसलिए बैठे थे? अगर बाबूराम भारत के दलाल थे तो क्यों इन लोगों ने उनका नाम प्रधानमंत्री पद के लिए प्रस्तावित किया...
आनंद स्वरूप वर्मा
'समकालीन तीसरी दुनिया' के अप्रैल 2012 अंक में प्रकाशित मेरे लेख पर पत्रकार विष्णु शर्मा ने जो टिप्पणी की है, उस पर आयी अधिकांश प्रतिक्रियाओं को देखने से ऐसा लगता है कि टिप्पणीकारों ने मेरे मूल लेख को पढ़ा ही नहीं-उन्होंने विष्णु के माध्यम से मेरे विचारों को समझा और टिप्पणी कर दी. कुछ ने विष्णु के लेख पर आयी प्रतिक्रियाओं को ही अपनी टिप्पणी का आधार बना लिया और 'तरुण विजय की शैली' कथन से तिलमिलाये विष्णु के निंदा अभियान में शामिल हो गए. कुछ ने सोचा कि यह अच्छा मौका है हिसाब-किताब (राजनीतिक और व्यक्तिगत) चुकता करने का. नेपाली कांग्रेस के गगन थापा ने फिल्म के लिए मुझे लाखों रुपये मिलने का कयास लगाया तो, किसी गुमनाम टिप्पणीकार ने मुझे (और न जाने क्यों गौतम नवलखा को भी) इतिहास के कूड़ेदान में जाने की कामना की. 
kiranbadal
किरण और बादल : विद्रोह का नाटक?
कृपया बहस को व्यक्ति केंद्रित न करें. नेपाल में आज सीधे सीधे दो लाइन का संघर्ष है- एक लाइन का मानना है कि शांति और संविधान को प्राथमिकता देनी चाहिए जबकि दूसरी लाइन का कहना है कि इसमें समय बर्बाद करने की बजाय विद्रोह पर जोर देना चाहिए क्योंकि हमारी कोशिशों के बावजूद वैसा संविधान नहीं बन सकेगा जैसा हम चाहते हैं. पहली लाइन को प्रचंड और (अभी कुछ महीनों से) बाबूराम भट्टराई मानते हैं जबकि दूसरी लाइन को किरण समर्थकों की लाइन माना जाता है. मैं शुरू से पहली लाइन के पक्ष में हूं - उस समय से ही जब बाबूराम इस लाइन के खिलाफ थे और प्रचंड दोनों लाइनों के बीच डोल रहे थे. यह मेरा कनविक्शन है. इसके लिए समय-समय पर प्रकाशित मेरे लेखों को देखा जा सकता है. 
मेरा कहना है कि 2008 में ही यानी चुनाव के बाद ही पता चल गया था कि संविधान वैसा नहीं बन सकेगा जैसा माओवादी चाहते हैं, क्योंकि संविधान सभा में माओवादियों को दो तिहाई सीट नहीं प्राप्त है लिहाजा अपनी ताकत के बल पर जितना हासिल किया जा सकता है, करना चाहिए ताकि नए संविधान के अंतर्गत पिफर चुनाव हो और संविधान सभा में अटक गयी राजनीति आगे बढ़े. चुनाव में माओवादी अपने मैनिफेस्टो के रूप में अपने संविधान के प्रारूप के साथ जनता के बीच जाय और अगर जनता उस संविधान से संतुष्ट होगी तो निश्चय ही उन्हें दो तिहाई मत प्राप्त हो जाएगा और फिर वे संविधान में संशोधन कर उसे वह रूप दे सकते हैं जैसा वे चाहते हैं. 
बेशक, अगर इस 'कंप्रोमाइज' वाले संविधान को भी सामंती और प्रतिक्रियावादी ताकतें नहीं बनने देती हैं तो विद्रोह के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता है. वैसी हालत में जनता भी यह महसूस करेगी कि माओवादियों ने बेहद लचीलापन दिखाते हुए संविधान बनाने की कोशिश की पर उन्हें चलने नहीं दिया गया और ऐसी हालत में वह विद्रोह के आह्वान पर तुरत साथ आयेगी. 
दूसरी लाइन के नेतृत्व समूह से मेरी यह शिकायत है कि अगर सचमुच वे कंप्रोमाइज वाले संविधान के खिलाफ थे तो आज तक संविधान सभा में किसलिए बैठे थे? क्यों कभी प्रचंड को बाबूराम के खिलाफ तो कभी बाबूराम को प्रचंड के खिलाफ लड़ाने की बुर्जुआ राजनीति में फंसे हुए थे? अगर बाबूराम भारत के दलाल थे तो क्यों इन लोगों ने उनका नाम प्रधानमंत्री पद के लिए प्रस्तावित किया? और प्रधानमंत्री बनने के तीन ही दिन बाद किस आधार पर इन्होंने बाबूराम को फिर  भारत का दलाल घोषित कर दिया? क्या महीने भर के भीतर कोई  दलाल से देशभक्त और फिर देशभक्त से दलाल हो सकता है? जाहिर है कि सच वही नहीं है जो दिखाई दे रहा है. मामला केवल सैधांतिक नहीं है. मामला अहम के टकराव का और पार्टी नेतृत्व पर कब्जा करने का भी है जिसके लिए क्रांतिकारी तेवर दिखाना जरूरी है. 
इन सबके बावजूद जब भी मुझे पार्टी द्वारा किये जाने वाला कोई काम गलत लगा, मैंने पार्टी नेतृत्व की आलोचना की और कोशिश की कि यह आलोचना सकारात्मक हो. 2002 में मुझे लगातार इस आशय की खबरें मिल रही थीं कि पार्टी द्वारा लोगों को डरा-धमका कर पैसे वसूले जा रहे हैं. मैं इसके प्रमाण ढूंढने में लगा था और जब नेपाल के एक प्रमुख वामपंथी राजनीतिज्ञ पद्मरत्न तुलाधर ने भी यह शिकायत की और प्रमाण में उन्होंने प्रचंड के हस्ताक्षर वाला एक पत्रा दिखाया जिसमें पैसे की मांग की गयी थी तो उस हस्ताक्षर की सत्यता की जांच किये बगैर मैंने तुरत नेपाल के सर्वाधिक प्रसारित दैनिक पत्र 'कांतिपुर' में 15 अप्रैल 2002 में लंबा लेख लिखा जिसमें प्रचंड को सीधे संबोधित करते हुए निम्न पंक्तियां लिखीं :
''...अगर विचारधारा पर से पकड़ ढीली हो गयी तो कर्नाटक के जंगलों में अड्डा बना कर रह रहे तस्कर वीरप्पन और किसी क्रांतिकारी में फर्क ही क्या रह जायेगा. जनविरोधी तत्वों को सजा देने से लेकर वैकल्पिक शासन के तरीकों पर भी माओवादी नेतृत्व को गंभीरता से सोचने की जरूरत है क्योंकि उन्हें आने वाले दिनों के लिए एक माडल पेश करना है. भारत ही नहीं अनेक देशों में हमने अतीत में अनेक आंदोलनों को सफलता के शिखर तक पहुंचते-पहुंचते मामूली सी भूल से लुढ़क कर इतना नीचे गिरते देखा है जहां से वे कभी उठ नहीं सके. नेपाल में माओवादी जनयुद्ध की विफलता से इतना ही नहीं होगा कि इस सूची में एक और नाम जुड़ जाएगा. अगर इतना ही होता तो हम संतोष कर लेते. इस आंदोलन की विपफलता का असर केवल नेपाल पर नहीं, बल्कि समूचे दक्षिण एशिया पर पड़ेगा और यह हमारे लिए चिंता की बात है.''
अभी कुछ माह पूर्व मुझे खबर मिली कि नेपाल के बर्दिया में भूमिहीनों से उन जमीनों को खाली कराने के लिए, जिनपर उन्होंने जनयुद्ध के दौरान कब्जा किया था, एमाले और नेपाली कांग्रेस के नेताओं के साथ स्वयं प्रचंड भी गये तो मैंने एक बार पिफर 'कांतिपुर' में प्रचंड की इस नीति पर तीखा प्रहार करते हुए एक लेख लिखा जिसे दिसंबर 2011 के 'समकालीन तीसरी दुनिया' में देखा जा सकता है. उस लेख की कुछ पंक्तियों पर गौर करें :
''...नेपाल में आज तेलंगाना के इतिहास को दोहराए जाने के संकेत मिल रहे हैं. किसने कब और क्या समझौता किया-इसके विस्तार में जाने की जरूरत नहीं है. अगर उन समझौतों के नतीजे के रूप में भूमिहीनों को उन जमीनों से वंचित किया जा रहा हो जिन पर पिछले 10 वर्षों से भी अधिक समय से उनका कब्जा है और जिसे उन्होंने एक लंबे संघर्ष के बाद हासिल किया है तो यह मानने के लिए काफी है कि जो लोग इस काम में मदद कर रहे हैं वे नेपाली क्रांति के दुश्मन हैं. अगर किसी समझौते की परिणति जनता को या जनमुक्ति सेना को पूरी तरह समाप्त करने में होती है तो कहा जा सकता है कि यह समझौता जनविरोधी है. इसमें कोई दो राय नहीं कि एक देश में दो सेनाएं नहीं रह सकतीं और अगर एनेकपा (माओवादी) भूमिगत पार्टी नहीं है और खुले रूप में काम कर रही है तो उसे अपनी सेना को समाप्त करने के बारे में कोई निर्णय लेना ही होगा. तो भी महज इस तर्क के आधार पर जनमुक्ति सेना को भंग करना जनता के साथ धोखा है. शुरू से हम यही समझते रहे हैं बल्कि हमें यही समझाया जाता रहा है कि संविधान निर्माण से पहले जनमुक्ति सेना का समायोजन नहीं होगा और क्रांतिकारी भूमि सुधार से पहले कब्जा की गयी जमीनों के बारे में कोई फैसला नहीं लिया जाएगा. क्या प्रचण्ड और बाबूराम भट्टराई ने सामंती लुटेरों का प्रतिनिधित्व करने वाली नेपाली कांग्रेस और इनकी लूट में सहभागी बन चुकी नेकपा (एमाले) से इस आशय का कोई समझौता किया कि वे क्रांतिकारी भूमि सुधार के लिए तैयार होंगे? क्या इनसे इस बात पर सहमति ली गयी कि संविधान में भूमि सुधार के एजेंडा को सर्वोच्चस्थान दिया जाएगा? अगर ऐसा नहीं था तो किस आधार पर पार्टी का शीर्ष नेतृत्व खुद जमीन खाली करवाने बर्दिया पहुंच गया? क्या यह कदम उठाने से पहले रामचंद्र पौडेल और बामदेव गौतम की बजाय मोहन बैद्य किरण और रामबहादुर थापा बादल को विश्वास में लेना ज्यादा जरूरी नहीं लगा? क्या वे वर्ग शत्रु हो गए हैं जिनसे इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर भी बातचीत संभव नहीं थी? क्या यह नेतृत्व का अहं नहीं है जो किसी सार्थक विमर्श अथवा संवाद को रोक रहा है? आने वाले दिनों में ये सवाल प्रेत की छाया की तरह दिन-रात पीछा करते रहेंगे. अभी भी समय है. इतिहास के पहिए को पीछे मोड़ने की जिसने भी कोशिश की वह उसके नीचे बुरी तरह रौंद दिया गया क्योंकि इतिहास का पहिया बहुत निर्मम होता है....''
अप्रैल 2011 में 'क्या माओवादी क्रांति की उल्टी गिनती शुरू हो गयी है?' शीर्षक अपने लेख में 'समकालीन तीसरी दुनिया' और 'कांतिपुर' में प्रचंड को संबोधित करते हुए लिखा : ''... एक तरफ तो आप यह कहते हैं कि शांति प्रक्रिया को पूरा करना है, संविधान बनाना है, संविधान बनाने के लिए ही जनता ने इतनी बड़ी कुर्बानी दी, संविधान बनाने का नारा हमारा नारा था आदि आदि और दूसरी तरफ कार्यकर्ताओं की आंतरिक बैठकों में विद्रोह की बात करते हैं. क्या यह क्रांतिकारी लफ्फाजी नहीं है? क्या यह अपने कार्यकर्ताओं को धोखे में रखना नहीं है?''
 इसी लेख में मैंने कहा था कि आज विद्रोह की वे स्थितियां नहीं हैं और पार्टी को हर हाल में शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए. इसी लेख में किरण जी के 'यूटोपिया' की आलोचना करते हुए कहा था कि नेपाल का यथार्थ आज यही है कि किसी भी तरह संविधन निर्माण का काम पूरा किया जाय और एक दुष्चक्र में फांसी राजनीति को आगे बढ़ाया जाय. ऊपर जिन लेखों का मैंने उल्लेख किया है उन सबसे युवा पत्रकार विष्णु परिचित थे लेकिन मुझे प्रचंड का प्रवक्ता साबित करने की उनकी ललक ने जानबूझकर इन तथ्यों को पाठकों से छिपा कर रखा. 
विष्णु का कहना है कि 'मैं इतिहास से सबक नहीं लेता...मेरा इतिहास तथ्यों का नहीं सुविधा का इतिहास है...मेरा लेखन अवसरवादी बौद्धिकता का प्रमाण है...मुद्दों को उलझाने में मैं महारत हासिल कर चुका हूं...मैं साम्यवादी इतिहास के शानदार प्रतीकों का मजाक उड़ाता हूं...मैं संदर्भों के साथ धोखेबाजी करता हूं...मैंने अपने इस लेख में पत्रकारिता की मान्यताओं को ताक पर रख दिया है और बार-बार झूठ गढ़ा है...मेरी साम्राज्यवाद के साथ साठगांठ है और मैं किरण समूह के लोगो के नरसंहार का माहौल बना रहा हूं...मेरे वामपंथ और तरुण विजय के दक्षिणपंथ में केवल भाषा का फर्क है...' आदि आदि. इन सबका जवाब देने की जरूरत नहीं है क्योंकि इनमें तथ्य कम और पूर्वाग्रह ज्यादा हैं.
'इतिहास में दर्ज होने की क्षमता प्रचंड के नेतृत्व समूह में थी ही नहीं'-यह जुमला लिखते समय इस पत्रकार को याद नहीं रहा कि यहां जिस घटना का संदर्भ है (2006) उस समय तक 'प्रचंड वाले नेतृत्व समूह' जैसी शब्दावली कहां थी? उस समय तो पार्टी की लाइन को लेकर मतभेद था ही नहीं. मतभेदों की शुरुआत तो 2008 के बाद हुई है. 
फटाफट निष्कर्ष तक पहुंचने की युवा सुलभ हड़बड़ी में इस पत्रकार ने विकिलीक्स और अमेरिकी राजदूत की बातों पर भरोसा करते हुए यह मान लिया कि भारत माओवादियों की तरफदारी कर रहा था. आप अमेरिका और विकीलीक्स को भूल जाइये और मेरी बात पर ध्यान दीजिये-मैं दावे के साथ आपको बता रहा हूं कि भारत कभी राजतंत्र की समाप्ति नहीं चाहता था और न वह माओवादियों को कभी सत्ता में देखना चाहता था. जिस 2004 की बात आप कर रहे हैं उस समय तक माओवादी जनयुद्ध सफलता के नित नए सोपान तैयार कर रहा था और ज्ञानेंद्र की सेना लगातार पराजित होती जा रही थी. आपको अशोक मेहता से लेकर श्याम सरन तक में माओवादियों के प्रति अगर लगाव दिखाई देता है तो यह बात क्यों नहीं समझ में आ रही है कि राजा के खिलाफ तेवर दिखाना भारत की मजबूरी हो गयी थी ताकि सबकुछ खोने पर भी कुछ हासिल हो जाय. डोल्पा के सफल आपरेशन के बाद से ही माओवादियों का पलड़ा भारी हो गया था.
एक बात और. 2004 या 2005 में नहीं बल्कि जन आंदोलन-2 के सफलता के करीब पहुंचने पर भारत सरकार ने अप्रैल 2006 के अंत में 'दो खम्भों का सिद्धांत' (ट्विन पिलर थ्योरी अर्थात नेपाल की स्थिरता के लिए संवैधानिक राजतंत्र और बहुदलीय लोकतंत्र जरूरी है) छोड़ा. 
मुझे अफसोस है कि आप मुझे नहीं समझ सके जिसके साथ आप काम कर चुके हैं और अच्छा-खासा समय बिता चुके हैं. अगर आपने मुझे समझा होता तो कम से कम आप 'तेल में डूबी स्याही' शब्दावली का मेरे लिए इस्तेमाल नहीं ही करते. जो लोग मेरे जीवन और काम से परिचित हैं, उन्हें भी आप के इस कथन से ठेस पहुंची होगी. 
आज उन सबको-जो नेपाली क्रांति के समर्थक हैं- कुछ मुद्दों पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है. 2006 के समझौते की परिणति के रूप में माओवादियों के पास अब उनकी जनमुक्ति सेना नहीं रही. किरण समूह और प्रचंड समूह के बीच जो लंबा विवाद चला जिसमें पार्टी के शीर्ष नेता सार्वजनिक मंचों से पार्टी अध्यक्ष की निंदा करते रहे (कामरेड गौरव ने सिन्धुली की एक जनसभा में कामरेड प्रचंड को भारत की गुप्तचर संस्था 'रा' का एजेंट कहा.) और पार्टी की एकता लगातार कमजोर होती गयी, पार्टी ने अपनी बारगेनिंग पावर खत्म कर दी. 
नतीजतन जनमुक्ति सेना ऐसे समय उनके हाथ से निकल गयी जब अभी संविधान निर्माण का काम बाकी है और चारो तरफ से दुश्मन इन पर घात लगाकर बैठा है. नेपाली कांग्रेस के नेता शेर बहादुर देउबा चीख चीख कर कह रहे हैं कि संविधान न लिखे जाने की अवस्था में 1990-91 का संविधान लागू किया जाय जिसका सीध अर्थ है राजतंत्र को वापस लाया जाय. 
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इंडोनेशिया की कम्युनिस्ट पार्टी (सत्ता से बाहर की पार्टियों में) दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी थी जिसके तकरीबन 35 लाख सदस्य थे और जिसके पार्टी से सम्बद्ध संगठनों के सदस्यों की संख्या 11 करोड़ की आबादी वाले देश में 2 करोड़ से ज्यादा थी. लेकिन 1965-66 में सुहार्तो की सरकार ने देखते-देखते पांच लाख से भी अधिक कम्युनिस्टों और उनके समर्थकों का अमेरिका की मदद से सफाया कर दिया. पार्टी के पास अपनी कोई जनसेना नहीं थी. लगभग ऐसी ही स्थिति चिली में देखने को मिली.
पेरिस कम्यून से लेकर इंडोनेशिया तक और चिली तक यही सबक मिला है कि पार्टी के पास अपनी जनसेना का होना ही कम्युनिस्टों का सफाया रोकने की एकमात्रा गारंटी है. नेपाल में अगर इस तरह की कोई घटना हुई तो प्रचंड और किरण ही नहीं, बल्कि एमाले तथा छोटे बड़े विभिन्न कम्युनिस्ट ग्रुपों के लोग भी इसके शिकार बनेंगे क्योंकि दुशमन के लिए लाल रंग का गाढ़ा या हल्का होना कोई मायने नहीं रखता. यह एक खतरनाक स्थिति है जो किसी भी ऐसे व्यक्ति के लिए जो खालिस पत्रकार न हो बल्कि पत्रकार होने के साथ साथ एक कम्युनिस्ट और एक्टिविस्ट भी हो, चिंता की बात है. सबको मिलकर यह सोचना है कि नेपाल को इंडोनेशिया या चिली बनने से कैसे रोका जा सकता है?
anand-swaroop-vermaवरिष्ठ पत्रकार आनंद स्वरुप वर्मा समकालीन तीसरी दुनिया के संपादक हैं.