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Tuesday, 10 April 2012

राजनीतिक बाध्यताओं से तो निजात पा ली है, पर कारपोरेट लाबिइंग के दबाव खत्म होने के आसार नहीं! टेलीकाम सेक्टर में हाथ और मुहं दोनों जलने के बावजूद आकाओं को होश नहीं आया।


राजनीतिक बाध्यताओं से तो निजात पा ली है, पर कारपोरेट लाबिइंग के दबाव खत्म होने के आसार नहीं! टेलीकाम सेक्टर में हाथ और मुहं दोनों जलने के बावजूद आकाओं को  होश नहीं आया।

मुंबई से एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

विचित्र स्थिति है। तुलसी दास ने ही ऐसी स्थिति का सटीक वर्णन किया है।गाल फुलाकर हंसना असंभव है। बजट में बाजार का खास ख्याल रखने और वित्तमंत्री की तमाम कसरतों के बावजूद विदेशी निवेशकों की आस्था नहीं लौट रही है। कोल इंडिया लिस्टेड कंपनी है, जिसमें विदेशी निवेशकों नें पूंजी लगायी हुई है। पर उसके नीति निर्धारण में पीएमओ से लेकर राष्ट्रपति भवन से हस्तक्षेप हो जाता है। राजनीतिक बाध्यताओं से तो सरकार ने लगता है रंग बिरंगे खैरात पाकर निजात पा ली है, पर कारपोरेट लाबिइंग के दबाव खत्म होने के आसार नहीं है।टेलीकाम सेक्टर में हाथ और मुहं दोनों जलने के बावजूद आकाओं को  होश नहीं आया। नतीजतन विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) द्वारा 2011-12 के दौरान शेयर बाजार में शुद्ध निवेश 47935 करोड़ रुपये रहा जो पिछले तीन साल का सबसे निचला स्तर है। सेबी के आंकड़ों के मुताबिक, 31 मार्च, 2012 को समाप्त हुए वित्त वर्ष के दौरान शेयर बाजार में एफआईआई का शुद्ध निवेश 47935 करोड़ रुपये रहा, जबकि 2010.11 में इनका निवेश 1.1 लाख करोड़ रुपये और 2009.10 में 96857 करोड़ रुपये था। वर्ष 2008.09 में विदेशी फंडों ने 47706 करोड़ रुपये मूल्य के शेयर बेचे।जनरल एंटी अवॉइडेंस रूल (जीएएआर) को लेकर आशंका की वजह से एफआईआई बाजार से दूर बने दिख रहे हैं। अप्रैल के शुरुआती 3 कारोबारी दिन में एफआईआई की हिस्सेदारी कम हुई है।मार्च के मुकाबले कैश मार्केट में एफआईआई की हिस्सेदारी 51 फीसदी घटी है। वहीं, फ्यूचर मार्केट में एफआईआई की हिस्सेदारी 53 फीसदी घटी है। एफआईआई निवेश कम होने से रुपये पर भी दबाव नजर आ रहा है।जीएएआर को लेकर अब भी असमंजस बना हुआ है। पुराने मामलों में टैक्स लगेगा कि नहीं इसको लेकर एफआईआई आशंकित हैं।

गौरतलब है कि खुले बाजार में भारतीय अर्थ व्यवस्था शेयर बाजार का पर्याय है, जिसका कोई मूल आधार नहीं है क्योकि यह देश की उत्पादन प्रमाली से जुड़ी नहीं है और इसमें लिवाली बिकवाली विदेशी निवेससकों के मिजाज पर निर्भर है। खुले बाजार का सिद्धांत है कि अर्थ व्यवस्था पर सरकार का नियंत्रण हो ही नहीं। लेकिन कारपोरेट लाबिइंग की मारी सरकार कदम कदम  पर हस्तक्षेप करने से बाज नहीं आती। जैसी अर्थ व्यवस्था​
​ सत्ता वर्ग ने चुन ली है , उसमें जन सरोकार की कोई गुंजाइश नहीं बनती। लेकिन दिक्कत यह है कि बाजार में प्रवेश के लिए आम आदमी के पास क्रय शक्ति हो या नहीं, वोट जरूर है। बाजार में लोकतंत्र पर बहस मुनासिब नहीं है। पर लोकतंत्र का छलावा और लोक कल्याणकारी सरकार के ​
​पाखंड की गरज से सरकार को बाजार के मन मुताबिक आर्थिक सुधार करने में राजनीतिक बाध्यताएं आड़े आती है। पर यह सरकार इन दिक्कतों से निजात पाने में महारत हासिल करती दीख रही है। पर कारपोरेट लाबिइंग से निपटने के लिए सरकार के पास कोई इलाज नहीं है और चाहे अनचाहे वह बाजार के नियम तोड़ रही है। विदेशी निवेशकों की अनास्था की खास वजह यही है।

राष्ट्रपति के निर्देश के तहत बिजली कंपनियों को कोयले की निश्चित मात्रा में आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए कोल इंडिया [सीआईएल] इस वित्त वर्ष में एक करोड़ टन कोयले का आयात कर सकती है।कोल इंडिया के नामित चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक एस नरसिंह राव ने आज यहां कहा कि जरूरत पड़ने पर सीआईएल एक करोड़ टन कोयले का आयात कर सकती है। राव के जल्द कोल इंडिया के सीएमडी का पदभार संभालने की उम्मीद है। फिलहाल वह सिंगरेनी कोलरीज के प्रमुख हैं।हालांकि कोल इंडिया के सबसे बड़े शेयरधारक (भारत सरकार) और दूसरे सबसे बड़े शेयरधारक (द चिल्ड्रंस इन्वेस्टमेंट फंड मैनेजमेंट) के बीच टकराव बरकरार है, पर कंपनी के परिदृश्य को लेकर बाजार उत्साहित है। कोल इंडिया के संदर्भ में मंगलवार को एक सरकार के निर्देश के बाद से माना जा रहा है कि मार्च 2009 के बाद शुरू हुए संयंत्रों के लिए विद्युत उत्पादकों के साथ कोल इंडिया ईंधन आपूर्ति समझौते करेगी। इससे पहले कंपनी ने कहा था कि वह कोयला आयात नहीं कर सकती  क्योंकि कोयला आयात करना उसका बिजनेस नहीं है। सरकार ने 3 अप्रैल को महारत्न कंपनी कोल इंडिया को राष्ट्रपति की ओर से निर्देश जारी कर कहा था कि वह बिजली उत्पादक कंपनियों के साथ ईंधन आपूर्ति समझौते (एफएसए) करे और उनको जरूरत का 80 फीसदी कोयला सप्लाई करने का आश्वासन दे। प्रधानमंत्री ने कोल इंडिया के सामने 31 मार्च की डेडलाइन तय करते हुए निर्देश दिया था कि वह बिजली उत्पादकों के साथ ऐसे समझौते करे। तय समय पर ऐसा नहीं होने पर राष्ट्रपति का निर्देश जारी किया गया। कोल इंडिया कुल 28,000 मेगावाट क्षमता के लिए एनटीपीसी, रिलायंस पावर और डीवीसी सहित 50 कंपनियों के साथ ईधन आपूर्ति के समझौते कर सकती है। वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने रविवार को कहा कि नीतिगत मामलों में सरकार पंगु नहीं है और केंद्र सरकार ने अनेक कड़े निर्णय किये हैं।

हालत यह बन गयी कि   अर्थव्यवस्था की हालत खराब होने और सरकार के आर्थिक सुधारों की ओर कदम न उठाने से विदेशी निवेशकों का बाजार पर भरोसा कम हुआ है। कमजोर अंतर्राष्ट्रीय संकेत और निवेशकों में भरोसा कम होने से बाजार 1.5 फीसदी गिरे। सेंसेक्स 264 अंक गिरकर 17222 और निफ्टी 88 अंक गिरकर 5234 पर बंद हुए।अंतर्राष्ट्रीय बाजारों से मिले कमजोर संकेतों की वजह से घरेलू बाजारों ने गिरावट के साथ शुरुआत की। शुरुआती कारोबार में ही सेंसेक्स 130 अंक लुढ़क गया और निफ्टी 5250 के करीब घूमता नजर आया।मेटल, कैपिटल गुड्स और पावर शेयरों में बिकवाली बढ़ने से बाजार में गिरावट गहराती चली गई। दोपहर 2 बजे के करीब बाजार दिन के निचले स्तरों पर पहुंचे। सेंसेक्स 273 अंक और निफ्टी 84 अंक गिरे।रियल्टी और हेल्थकेयर शेयरों में मजबूती आने से बाजार निचले स्तरों से संभलते नजर आए। हालांकि, रिकवरी ज्यादा देर तक नहीं टिकी और आखिरी कारोबार में बाजार पर बिकवाली का दबाव बढ़ा।हेलियस कैपिटल के समीर अरोड़ा का कहना है कि सरकार की नीतियां साफ न होने, अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी पड़ने और जीएएआर की वजह से एफआईआई निवेश में 50 फीसदी की गिरावट आ सकती है।

बाजार के जानकारों के मुताबिक आगे बाजार में निवेश चुनौतीभरा होता जा रहा है। ऐसे में इसके और नीचे उतरने की आंशका है। वित्त वर्ष 2011-12 के बजट में विदेशी निवेशकों पर जनरल एंटी एवायडेंस रूल 'गार' के तहत कराधान के नए नियम लागू करने के प्रस्ताव से मार्च की तुलना में अप्रैल में पूंजी बाजार में विदेशी संस्थागत निवेशकों की लिवाली अब तक 51 प्रतिशत घट चुकी है।बीएसई के आंकडों के मुताबिक पहली अप्रैल से बाजार का दैनिक कारोबार र्माच के 15,874 करोड़ रूपए की तुलना में 26 प्रतिशत घटकर 11,680 करोड़ रूपए पर सिमट चुका है। वैकल्पिक सौदों का दैनिक औसत कारोबार भी मार्च के 1,41,558 करोड़ की तुलना में 48 प्रतिशत घटकर 73,825 करोड़ रूपए पर आ गया है।

'गार' लागू करने के पीछे सरकारी तर्क यह है कि इसके जरिए देश में आने वाले काले धन पर लगाम लगायी जा सकेगी। विदेशी निवेशक दोहरे कराधान नियमों में मिली छूट के कारण अबतक मॉरिशस के जरिए पूंजी बाजार में निवेश से आयकर बचाते रहे थे जो अब 'गार' के लागू होने के बाद संभव नहीं हो सकेगा। उन्हें भारतीय अधिकारियों को यह बताना जरूरी होगा कि उनका पैसा मारिशस के जरिए आया है या नहीं।