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Sunday, 11 March 2012

हल का विकल्प खोजें लेखक : गजेन्द्र पाठक :: अंक: 24 || 01 अगस्त से 14 अगस्त 2011:: वर्ष :: 34 :September 2, 2011 पर प्रकाशित


http://www.nainitalsamachar.in/lets-find-the-alternative-of-plough/


हल का विकल्प खोजें

लेखक : गजेन्द्र पाठक :: अंक: 24 || 01 अगस्त से 14 अगस्त 2011:: वर्ष :: 34 : September 2, 2011  पर प्रकाशित
hal-bailबाँज पर्यावरण संतुलन, जैवविविधता एवं जल संरक्षण की दृष्टि से महत्वपूर्ण वृक्ष है। इस सदाबहार वृक्ष की जड़ से लेकर तने तक का प्रत्येक भाग किसी न किसी रूप में उपयोगी है, अतः इसे पहाड़ का कल्प वृक्ष भी कहा जाता है। ग्लोबल वॉर्मिंग एवं जलवायु परिवर्तन के वर्तमान दौर में इस वृक्ष का महत्व और भी बढ़ जाता है, लेकिन इतनी सारी खूबियों वाला यह वृक्ष सरकार की उदासीनता एवं ग्रामीणों की मजबूरी के चलते अनियंत्रित दोहन का शिकार होकर तेजी से गायब हो रहा है। अपनी मजबूती के कारण बाँज का कृषि उपकरणों के निर्माण एवं जलौनी लकड़ी के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। यही मजबूती इसके विनाश का कारण बन गयी है। पर्वतीय भूभाग में ग्रामीण परम्परा से कृषि उपकरणों, हल आदि के निर्माण में बाँज, उतीस आदि वृक्षों का प्रयोग करते आये हैं। बाँज के मोटे तने को उस स्थान, जहाँ से वह दो भागों/शाखाओं में विभक्त होता है, पर काट कर हल बनाया जाता है और सीधे तने को काटकर नहेड़ बनाया जाता है। उतीस की लकड़ी हल्की और मजबूत होने के कारण जुए के निर्माण में प्रयोग की जाती है। बाँज तथा उतीस दोनों जल संरक्षण एवं संवर्द्धन में सहायक हैं। हर साल उत्तराखंड में लाखों ग्रामीण परिवारों द्वारा हल, नहेड़ तथा जुए के निर्माण के लिये दसियों हजार पेड़ काटे जा रहे हैं। इतनी भारी संख्या में बाँज तथा उतीस के वृक्ष काटे जाने से जल स्रोत सूख रहे हैं। वनों की जल संरक्षण क्षमता घट रही है तथा जैव विविधता को भी नुकसान हो रहा है। मगर इस व्यापक नुकसान की ओर बार-बार ध्यान आकृष्ट करने के बावजूद आज तक लकड़ी के हल का उपयुक्त विकल्प नहीं ढूँढा जा सका है।
स्याहीदेवी-शीतलाखेत के आरक्षित वन क्षेत्र में मौजूद जल स्रोतों को बचाने के लिये वर्ष 2003-04 से प्रयासरत 'स्याहीदेवी क्षेत्रीय विकास मंच, शीतलाखेत' ने स्वयं अपने प्रयासों से लगभग 6 दर्जन लोहे के हल एक दर्जन से अधिक ग्राम सभाओं में वितरित किये। ग्राम्य विकास विभाग द्वारा विकसित इस हल में कई तरह की समस्यायें होने के कारण एक-दो व्यक्तियों को छोड़ कर अधिकांश ने पुनः लकड़ी के बने हल का प्रयोग करना आरम्भ कर दिया। तब मंच द्वारा इस हल की कमियों को दूर कर एक सर्वस्वीकार्य उपयुक्त हल विकसित करने के संदर्भ में जिला प्रशासन, कृषि विभाग, वन विभाग, विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसंधानशाला हवालबाग, पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय, वन एवं पर्यावरण मंत्रालय भारत सरकार सहित स्थानीय विधायक, सांसद, मंत्री, मुख्यमंत्री एवं राज्यपाल तक से निवेदन किया गया। मगर कहीं से कोई मदद नहीं मिली। सबसे ज्यादा निराश किया एशिया का सबसे बड़ा कृषि विश्वविद्यालय कहे जाने वाले पन्तनगर कृषि विश्वविद्यालय ने। इस विश्वविद्यालय से एक पत्र प्राप्त हुआ, जिसमें कहा गया कि, पंतनगर आकर विश्वविद्यालय द्वारा विकसित हल का परीक्षण किया जा सकता है। जब मंच द्वारा इस हल को पर्वतीय क्षेत्र में खेत में किसानों के बीच चला कर दिखाने, ताकि किसान हल की खूबियों-खामियों को बेहतर तरीके से जाँच सकें का निवेदन किया गया तो विश्वविद्यालय ने चुप्पी साध ली।
वन क्षेत्र विकसित करने के नाम पर हर वर्ष करोड़ों रुपया खर्च कर पौंधारोपण किया जा रहा है, हालाँकि वह पौंधारोपण जमीन पर कहीं नजर नहीं आता। दूसरी ओर, सैकड़ों वर्ष पुराने बाँज उतीस के वृक्षों का विकल्प देने में आपराधिक विलम्ब किया जा रहा है। देर-सबेर हमें पहाड़ी किसानों को हल का विकल्प तो देना ही पड़ेगा, मगर देखना यह है कि वह विकल्प बाँज-उतीस की प्रजाति समाप्त होने के पहले मिलता है या बाद में।
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