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Saturday, 12 May 2012

मिसाइल बनाम स्कूल


मिसाइल बनाम स्कूल


Saturday, 12 May 2012 12:09
लाल्टू 
जनसत्ता 12 मई, 2012: देश की उच्चतम शिक्षा संस्थाओं में यह चिंता गहरी है कि उनकी अंतरराष्ट्रीय ख्याति कैसी है। अलग-अलग तरीके अपना कर, कभी किसी पश्चिमी मुल्क की संस्था के साथ द्विपक्षीय समझौता कर तो कभी दूसरे मुल्कों में अपना कैंपस खोल हमारी उच्च शिक्षा संस्थाएं इस कोशिश में हैं कि उनकी वैश्विक पहचान बने। आम स्कूलों और कॉलेजों में शिक्षा का जो बुरा हाल है, उसके प्रति उच्च शिक्षा संस्थाओं की असंवेदनशीलता को देख कर परेशान कई उदारमना लोग अक्सर पूछते हैं कि उच्च शिक्षा का कोई जमीनी संदर्भ क्यों नहीं? दरअसल नामी विश्वविद्यालयों, आइआइटी आदि संस्थानों में काम कर रहे कई लोग जीवन भर स्कूली शिक्षा के सुधार में समर्पित होकर काम करते रहे हैं। उनके काम से थोड़ा नहीं, खासा असर स्कूली शिक्षा पर पड़ा है। पर वह असर दिखता नहीं, ऐसा क्यों?
अगर प्रबुद्ध लोगों के कठिन परिश्रम से भी स्कूली शिक्षा में व्यापक सुधार नहीं दिखता तो इसका समाधान कहीं और ढूंढ़ना पडेÞगा। किसी भी जटिल तंत्र में सुधार के लिए एक न्यूनतम स्तर की पूर्व तैयारी जरूरी है। तभी उसमें नवाचार की कोई संभावना बन सकती है। यह पुरानी बहस है और बार-बार इस बात को दोहराना जरूरी है। इन दिनों जब बहुत सारे साथी शिक्षा अधिकार कानून से काफी आशान्वित हैं कि शिक्षा में संख्याबहुल तबकों की भागीदारी बढेÞगी और अभिजात स्कूलों में पचीस फीसद आरक्षण गरीब बच्चों के लिए होने से स्तरीय शिक्षा आम बच्चों तक पहुंचेगी, यह बहस चलती रहनी चाहिए।
शिक्षाविदों के अनुसार, प्राथमिक स्तर की शिक्षा के लिए आदर्श स्थिति में प्रति बीस बच्चों के लिए एक शिक्षक की जरूरत है। कुल जनसंख्या के एक तिहाई को किशोर या उससे कम उम्र का मान लिया जाए तो देख सकते हैं कि हर शाला में एक-दो अध्यापक अतिरिक्त भी रखे जाएं तो भी कुल मिला कर भारत के सभी बच्चों के लिए एक करोड़ से ज्यादा प्राथमिक शाला के अध्यापकों की जरूरत न होगी। अव्वल तो हमारे यहां इतनी शालाएं हैं नहीं। फिर भी अगर मान लें कि एक करोड़ अध्यापक चाहिए तो कहां हैं ये एक करोड़ लोग? प्राथमिक स्तर में पढ़ाने की न्यूनतम योग्यता रखने वाले लोग कई करोड़ हैं। ये व्यापारी हैं, बैंक अफसर हैं, प्रोफेसर आदि हैं, यहां तक कि कई पढेÞ-लिखे किसान भी इनमें हैं। ये सब लोग जरूरी कामों में लगे हैं। पर सामरिक और आंतरिक सुरक्षा में नौकरी कर रहे लोगों के बारे में क्या कहा जा सकता है?
आज सारी दुनिया में भारत की थल सेना सबसे बड़ी है। थल सेना में कुल ग्यारह लाख तीस हजार नौकरी में तैनात सिपाही हैं और करीब दस लाख रिजर्व में हैं। हमारी जल सेना में साठ हजार मौजूद सिपाही हैं और पचपन हजार रिजर्व में हैं। इसी तरह वायु सेना में सवा लाख से ज्यादा नौकरी में हैं, तो करीब डेढ़ लाख रिजर्व में हैं। 
इन सबके अलावा समुद्र तटरक्षक और अर्द्धसैनिक बलों में साढेÞ तेरह लाख सिपाही हैं। राज्यों में अलग-अलग तरह के पुलिस बलों में करीब बीस-पचीस लाख सिपाही तो होंगे। एक आम तर्क यही होता है कि पाकिस्तान और चीन में कौन से हमसे कम सैनिक हैं! बात सही है और हमें सीमापार के इंसानों की भी उतनी ही फिक्र करनी चाहिए जितनी कि इस ओर के लोगों के लिए करते हैं। सैन्यबलों के बारे में सच कभी भी आम लोगों तक उजागर नहीं होता- इसलिए यह कह पाना मुश्किल है कि सही आंकड़े क्या हैं, पर इन दिनों काफी हद तक सही-सही आंकडेÞ मिल जाते हैं।
अब जरा आर्थिक संसाधनों पर नजर डालें। प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक सारा परिदृश्य मिला कर शिक्षा के मद में राष्ट्रीय बजट का दस से ग्यारह प्रतिशत ही आता है। चीन की तुलना में यह काफी कम है और लंबे समय से कम ही रहा है। सरकार के अपने निर्देशों के मुताबिक शिक्षा में सकल घरेलू उत्पाद का छह प्रतिशत लगाया जाना तय है, पर यह आंकड़ा कभी भी चार से ऊपर नहीं गया। इस मामले में भुखमरीग्रस्त सहारा रेगिस्तान के आसपास के मुल्कों में भी हमसे बेहतर स्थिति है।
स्कूलों के लिए, वहां पढ़ाने वाले अध्यापकों के लिए पैसा कहां से आएगा? सामाजिक सेवा क्षेत्र हमेशा दरिद्र स्थिति में रहा है। इस साल के बजट में राष्ट्रीय ग्रामीण साक्षरता मिशन और राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन को दो-दो खरब रुपए मिले हैं। बाकी ऐसे ही तमाम सामाजिक क्षेत्रों को ले लें तो शायद दस खरब के आसपास पहुंच सकें। सामरिक और सुरक्षा खाते में पिछले साल की तुलना में उनतालीस अरब बढ़ा कर कुल बीस खरब रुपए डाले गए हैं। कौन जानता है कि कितना कुछ छिपा हुआ है; कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय बजट का तकरीबन चालीस प्रतिशत- उजागर और छिपा- सामरिक खाते में चला जाता है।
माथे पर टीका लगाए सुरक्षा, शोध और विकास संस्थान के निदेशक घोषणा करते हैं कि अब हम दो हजार किलोमीटर दूरी तक के प्रक्षेपास्त्र को नष्ट करने की क्षमता पा चुके हैं। संस्कृत से लिए तत्सम नाम के इस आइसीबीएम के जवाब में पाकिस्तान ने फारसी से लिए नाम के एक प्रक्षेपास्त्र का परीक्षण किया। इस तरह सैकड़ों करोड़ रुपए पानी में डाल कर दक्षिण एशिया के इन दो देशों ने अपनी आधी से अधिक गरीब, अशिक्षित या अल्पशिक्षित, कुपोषित जनता को समझाया कि वे ताकतवर मुल्क के नागरिक हैं। 
हमने जल, थल, वायु, हर लोक में नाभिकीय विनाशलीला की क्षमता हासिल कर ली है। और यह भी तब जब कि यह अच्छी   तरह साबित हो चुकाहै कि शस्त्रों का भंडार जमा कर जंगें रोकी नहीं जा सकतीं, यह एक अंतहीन दौड़ है जिसमें आखिरकार कोई नहीं बच पाएगा- न इंसान, न पक्षी, न और दीगर पशु। फिलहाल वे कहते हैं कि माथे पर टीका लगाएं और उत्सव मनाएं।
आखिर किसके खिलाफ कौन तैयार हो रहा है? भारत के नागरिक को किससे सुरक्षा चाहिए? क्या वह पाकिस्तान या चीन का वह आम आदमी है, जो तमाम कठिनाइयों के बीच अपनी रोजाना जिंदगी गुजार रहा है? सच यह है कि इस तैयारी में न तो भारत का आम नागरिक शामिल है, और ऐसे ही दीगर मुल्कों के शस्त्रों के बारे में कहा जा सकता है, कि न ही यह उनके हित में है जो पाकिस्तान या चीन के बहुसंख्यक लोग हैं। 
यह सब एक खेल है, जिसे इन राष्ट्रों में मौजूद कुछ लोग खेलते हैं और इसे बाकी विशाल जन-समुदाय पर थोपते हैं। इस खेल में जुटे लोगों को धरती, प्रकृति, हवा, पानी से कोई मतलब नहीं, पर ये ताकतवर लोग हैं। उनके पास ताकत है कि वे जैसे चाहें हमारा-आपका पैसा खर्चें, हमारे विनाश के रास्ते बनाएं और फिर हमसे कहें कि वे हमारी सेवा कर रहे हैं।
यह पुरानी बहस है कि उच्च शिक्षा और शोध संस्थानों में बहुत सारा पैसा जाया होता है और स्कूली शिक्षा में पैसा नहीं लगाया जा रहा। उच्च शिक्षा में जो चल रहा है वह कितना देश के हित में है; कुछ लोग तो पढ़-लिख कर विदेशों में जाकर बस जाते हैं, आदि आदि। यह बहस दरअसल बेमानी है। उच्च शिक्षा में सुधार की गुंजाइश कम नहीं, पर जो खर्च लगना है वह तो लगना ही है। खर्च स्कूली शिक्षा में भी लगना है, पर हमारे जैसे सुविधासंपन्न लोगों में यह समझ नहीं है कि देश के हर बच्चे के लिए स्तरीय शिक्षा की जरूरत है।
पूरे दक्षिण एशिया में बडेÞ पैमाने पर भुखमरी, अशिक्षा और बेहाली की स्थिति है। सरकारें इसे कभी गरीबी रेखा की परिभाषा बदल कर, कभी साक्षरता की परिभाषा बदल कर नकारने की कोशिश करती हैं। पर किसे नहीं पता कि सच क्या है? कल्पना करें कि रवींद्रनाथ ठाकुर की कहानी 'इच्छापूरन' की तरह हम और आप एक सुबह झारखंड के गांव के बच्चों के मां-बाप बन जाएं, जहां की एक प्राथमिक शाला के बारे में हाल ही में एक टीवी चैनल पर यह खुलासा हुआ था कि अध्यापिका 'संडे' की मात्राएं गलत रटाती हैं। यह उस रिपोर्टर की महानता है कि उसे लगता है कि अंग्रेजी में 'संडे' की मात्राओं की जानकारी झारखंड के गांव के बच्चों के लिए जरूरी है, मगर इस पर कोई दो राय नहीं हो सकती कि उन बच्चों को भी उचित शिक्षा चाहिए। 
बहरहाल, अगर हमारे दिमाग शहरी मध्यवर्ग के नागरिकों की तरह रहें तो 'इच्छापूरन' के बाद ग्रामीण मां-बाप होकर भी सरकार से हम यही कहेंगे कि भइया मारक या विनाशक मिसाइलों से हमें क्या लेना, आप हजारों करोड़ रुपए पश्चिमी मुल्कों के मोटे व्यापारियों को देकर शस्त्र खरीदना बंद करें। हमारे बच्चों के लिए स्तरीय प्रशिक्षण-प्राप्त, अच्छी तनख्वाह वाले अध्यापक और डॉक्टर भेजिए। हमें अपने बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा चाहिए। पर रवींद्रनाथ ठाकुर की कहानी तो कहानी है और हम-आप जो हैं सो हैं, शहरी, संपन्न; हमें क्या मतलब कि देश में बच्चों की एक बड़ी संख्या स्कूल नहीं जाती, और जो जाते हैं उनमें से ज्यादातर प्राथमिक स्तर में ही रुक जाते हैं। 
हमारी अपनी राजनीति है, जो हमारे कहने से नहीं, हम जो करते हैं उन क्रियाकलापों से, हमसे अलग परिभाषित होती है। हम जानते हैं कि निरक्षर, भूखे लोगों का देश मजबूत नहीं होता, पर हमें सेना चाहिए, पुलिस चाहिए ताकि लाचार लोगों को दूर रख सकें, ताकि हमारा मुनाफा बढेÞ, ताकि हम अन्याय से मिली सुविधाओं को भोग सकें। हमें स्वस्थ, शिक्षित लोग नहीं, मारक शस्त्र चाहिए। हम महान परंपराओं, संस्कृतियों की दुहाई देकर दूसरों को ही नहीं, खुद को भी धोखा देना चाहते हैं। 
आज हम इस बहस में डूबे हैं कि हम चीन से कितना आगे और पीछे खडेÞ हैं, हमारे मिसाइल साढ़े पांच या साढ़े छह हजार किलोमीटर जाते हैं; जो हम नहीं जानते, वह सच यह है कि प्रक्षेपास्त्र अरिहंत हो, अग्नि या शाहीन, जो वंचित हैं वे इन मिसाइलों की परवाह किए बिना अपनी तैयारी कर रहे हैं, उन्हें पता है कि जीवन का नाम सिर्फ जंग नहीं है। वे आएंगे, और जब वे आएंगे, आप हम अपनी सारी तैयारियों के बावजूद समझ न पाएंगे कि प्रलय की शुरुआत कब कैसे कहां से हुई।
हम वापस शिक्षा पर चलें। जब तक हम सामरिक खाते में खर्च कम न करेंगे, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में स्थिति सुधर नहीं सकती। यह बहस चलती रहेगी और हमें यह कहते रहना पडेÞगा।