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Monday, 7 May 2012

इतिहास बनाने वाले हंस नहीं पाते, हंसी उनके लिए बाधा है


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इतिहास बनाने वाले हंस नहीं पाते, हंसी उनके लिए बाधा है

7 MAY 2012 
♦ अपूर्वानंद
ई दिवस और गणपति में संबंध ही क्या हो सकता है? दोनों की न तुक मिलती है और न ही अनुप्रास की छटा दोनों के पास-पास होने से बिखरती है। फिर गणपति शुद्ध हिंदू देवता हैं, गणेश चतुर्थी के अवसर पर तो उनका नामजाप समझ में आता है, लकिन मई दिवस पर उनका आह्वान? इससे बड़ा दूषण हो ही नहीं सकता और इसका दंड उन्हें तो किसी न किसी रूप में भुगतना ही पड़ेगा। सो हुआ।
सती अनामंत्रित अपने पिता दक्ष के घर गयी थीं और अपमान न सह पाने के कारण उन्हें यज्ञ वेदी में ही कूद कर जल मरना पड़ा। किसी भी जगह बिन बुलाये नहीं जाना चाहिए, इसकी सीख देने के लिए यह कथा वे सुनाते हैं, जिन्हें इस समय भी कुछ कथाएं याद रह गयी हैं। निश्चय ही त्रिथा को यह प्रसंग या तो पता न होगा या वे इसे भूल गयीं, जब मई दिवस पर जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में एक वामपंथी छात्र संगठन द्वारा आयोजित एक संगीत संध्या में मंच पर वे अनामंत्रित गाने चली गयीं। एक तो वे स्वयं अनपेक्षित, अतः किंचित अस्वस्तिकर उपस्थिति थीं, दूसरे आयोजकों और श्रोताओं को, जो मई दिवस पर संघर्ष और क्रांति के जुझारू गीत सुन कर अपने शरीर के भीतर जोश भरने आये थे, इसकी आशंका थी कि वे इस पवित्र अवसर पर जाने क्या गा देंगी। और आखिरकार उन्होंने इस आशंका को सही साबित कर दिया, जब वे शास्त्रीय संगीत के नाम पर "वक्रतुंड महाकाय…" गाने लगीं। थोड़ी देर पहले जो सैकड़ों शरीर 'हिल्लेले झकझोर दुनिया' पर झूम रहे थे, उनसे नहीं-नहीं का शोर उठा। इस छात्र जनता के नेता जन-भावना का आदर करते हुए मंच पर पहुंचे और त्रिथा को अपना गाना बीच में रोक कर मंच से जाना पड़ा।

छायाकार प्रकाश के रे
एक मई को जेएनयू में पाकिस्तान के लाल बैंड को सुनाने हजारों की तादाद में सिर्फ जेएनयू के ही नहीं, दूसरी जगहों के भी छात्र-नौजवान और हमारी तरह के पूर्व-युवा भी पहुंचे थे। इन लोगों के वहां आने की तीन वजहें रही होंगी : कुछ मई दिवस की भावना में शामिल होने, कुछ हिंदुस्तान-पाकिस्तान मैत्री की भावना के साथ और कुछ तो सिर्फ संगीत प्रेम के कारण, जो उन्हें मीलों दूर ले जा कर रात-रात भर जगाता है, आये थे। लाल-बैंड के पहले पटना की संस्था हिरावल की इस आयोजन से संगति थी। अपने सादा अंदाज में उन्होंने जो सुनाया, वह वहां इकट्ठा जन समुदाय की इच्छाओं के मुताबिक ही था। लेकिन उनके जाने के बाद लाल-बैंड के गायक ने मंच पर त्रिथा को बुलाया, जिन्हें कोई जानता नहीं था। वे युवा हैं, अभी संगीत के क्षेत्र में जानी नहीं जातीं। फिर यह बताया गया कि वे तीन गीत सुनाएंगी। त्रिथा ने युवावस्था के कच्चे उत्साह में अपना लाल आंचल लहरा कर कहा कि मैं भी लाल हूं। उस पूरे माहौल में स्वीकार किये जाने का यह आग्रह कैसे ग्रहण किया गया, मालूम नहीं। फिर वे गाने लगीं। लेकिन जो गा रही थीं, वह कोई जन गीत नहीं था, न क्रांतिकारी संगीत ही। वह शास्त्रीय रागों की उनकी आवाज और पाश्चात्य वाद्य-यंत्रों के मेल से की गयी अदाकारी थी। आवाज में दम था तो आशंकित श्रोता-वर्ग पर उन्होंने असर छोड़ा। लेकिन तीसरा गीत 'गणपति' जैसे ही उन्होंने शुरू किया, जन-समूह में बेचैनी की लहर दौड़ने लगी। 'वापस जाओ', 'गो बैक' कह कर उन्हें दुरदुराया जाने लगा। तुरत ही मंच पर आयोजक पहुंच गये और त्रिथा को उन्होंने गाना बंद कर देने को कहा। यह सामूहिक सहमति से कलाभिव्यक्ति की हत्‍या की एक घटना थी। इसे बिना प्रतिवाद किये हम सब देखते रहे, जो हुसेन से लेकर रामानुजन तक के प्रसंग में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए नारे लगाते हैं।
मेरी किशोरी बेटी ने लौटते हुए पूछा कि लोगों ने त्रिथा को क्यों हटाया। उसे उसकी आवाज की ताकत ने मुतास्सिर किया था। मैंने जब आयोजकों में से एक से अपना प्रतिवाद जताया, तो उसने बुदबुदाते हुए जो कहा, उसका आशय यह था कि किसी धर्मविशेष से जुड़ी चीज को इस मंच पर इजाजत देना ठीक न होता। अगले दिन अपनी एक विदुषी अध्यापक मित्र से मैंने इस प्रसंग पर राय जानना चाही तो उन्होंने त्रिथा को रोक दिये जाने को बिलकुल सही ठहराया। उन्होंने कहा कि मई दिवस जैसे मौके पर गणपति जैसी हिंदू चीज गाने का कोई तुक नहीं था, इसलिए भी कि जेएनयू एक ऐसी जगह है, जहां दलित राजनीति बड़ी मजबूत है।
तब से मैं इस पूरी तर्क पद्धति को समझने की कोशिश कर रहा हूं। त्रिथा के गणपति गायन को अगर धार्मिक होने के कारण अनुचित माना गया तो फिर लाल बैंड के फरीद और बुल्लेशाह को किस तर्क से मुनासिब मान लिया गया? सूफी संगीत धार्मिक और रहस्यवादी तत्वों से मुक्त नहीं होता। दूसरा तर्क यह था कि मई दिवस इस तरह के गायन का सही अवसर नहीं था। किसी और मौके पर त्रिथा इसी समुदाय के सामने यह गातीं, तो कोई आपत्ति न होती। मई दिवस तो संघर्ष के गीत गाने और सुनने का दिन है।
मई दिवस का अवसर है क्या आखिर? मई दिवस श्रमिकों द्वारा सिर्फ काम के घंटे कम किये जाने के संघर्ष की याद नहीं है। काम के घंटे कम किये जाने की मांग के पीछे श्रमिकों की मनुष्य की तरह जीने की अनिवार्य शर्त, यानी, अवकाश हासिल करने की आकांक्षा थी। अवकाश, जिसमें वे उत्पादन की अनिवार्यता के दबाव से मुक्त सृजन कर सकें, या अपना पुनः सृजन कर पाएं। वरना मनोरंजन तो मात्र अभिजन का अधिकार रहा था। गोदान का वह दृश्य याद करें, जिसमें राय साहब रामलीला का आयोजन करते हैं। होरी जैसे लोगों को उसके लिए इंतजाम भर करना है। उसमें होरी भी हिस्सा लेता है, तो इसलिए कि वह ग्रामीण समाज है। शहरी पूंजीवाद मेलजोल के ये अवसर भी नहीं देता। फिर मजदूर श्रमिक एक-दूसरे से मिलें कैसे, जब उनके शरीर मात्र उत्पादक यंत्र भर रह गये हों।
कार्ल मार्क्स ने अपनी 1844 की पांडुलिपियों में लिखा, "जब कम्युनिस्ट कामगार एक दूसरे से मिलते है, सिद्धांत, प्रचार, इत्यादि उनका पहला मकसद होता है। लेकिन ठीक उसी वक्त, इस मेल-जोल के चलते उनमें एक नयी आवश्यकता का बोध जागता है – समाज की आवश्यकता। और जो साधन मालूम पड़ता है, साध्य बन जाता है। इस व्यावहारिक प्रक्रिया में सबसे उम्दा नतीजे देखने को आते हैं, जब फ्रेंच समाजवादी श्रमिक साथ-साथ देखे जाते हैं। तंबाकू के मजे लेना, खाना-पीना आदि सिर्फ मिलने का माध्यम भर नहीं रह जाते। मिलना-जुलना, संग-साथ, गप-शप … उनके लिए अपने-आप में पर्याप्त है, बंधुत्व उनके लिए नारा भर नहीं, एक जीवन-तथ्य है… मानवीय गरिमा की प्रभा से उनके श्रम-कठोर शरीर दमकते रहते हैं।"
दिक्कत शायद यह है कि मई दिवस संभवतः श्रमिक के जीवन चक्र का स्वाभाविक अंग नहीं बन पाया है। यह अभी तक श्रम और श्रमिक जीवन के व्याख्याकारों का आयोजन है, जो पुनः उनके जीवन-क्रम में भी कर्तव्यवश है, उससे अभिन्न नहीं है। वरना जो अभिव्यक्ति उनके लिए एक जगह स्वीकार्य है, वह यहां वर्जित कैसे हो जाती? दूसरे रूप में यह मुख्यतः उनका आयोजन है, जो स्वयं श्रम के अनुभव से विलग हो चुके हैं। जिनकी रोजाना की जिंदगी ही एक जंग है, वे जंग के गीत अलग से नहीं रचते। जो वे खुद रचते और गाते रहे हैं, वह क्या मई दिवस के मंचों पर कभी सुना जाता है? और क्या वह कभी स्वीकार्य होगा? वह तो अशिक्षित जन की अपरिष्कृत अभिव्यक्ति होगी।
जिनके जीवन में श्रम के अनुभव कम हैं, संघर्ष के अनुभवों का भी उन्हें आयात करना होता है। एक प्रकार से वे संघर्षरत नहीं, संघर्ष के अनुभव के उपभोक्ता ही रहते हैं। हामिद सर्वहारा है, लेकिन वह ईद मनाता है जबकि उसकी मुक्ति के लिए लड़ने वाले ईद मिलन का आयोजन करते हैं क्योंकि वह उनके लिए जन संपर्क का एक अवसर होता है।
गणपति को किसने रचा होगा? हाथी से चहरे वाले तुंदियल देवता की कल्पना करने की क्षमता क्या गंभीर दार्शनिकों ने की होगी? वह 'वक्रतुंड' है और 'महाकाय' है, उसे लंबोदर के संबोधन से भी अपमान नहीं लगता। साधारण जन की सर्जनशील प्रतिभा ने ही तो मैथिलों के विद्यापति के लिए शिव जैसे भंगेड़ी और गणेश जैसे हाजिरजवाब को गढ़ा होगा। वह एक कलानुभव है, जो लोक-कल्पना को पर्याप्त अवकाश देता है कि वह उसे तोड़े-मरोड़े और कुछ का कुछ बना दे। वरना वह कला और साहित्य का देवता क्योंकर होता? शब्द से तो उसकी प्रतिबद्धता इतनी है कि व्यास का डिक्टेशन लेते वक्त कलम गिर जाने के कारण, व्यास के सृजन-प्रवाह में बाधा न आये, यह सोच अपना एक दांत तोड़ कर उसी से लिखना उसने जारी रखा और एकदंत लोकप्रिय हुआ। वह खुद भी हंसता है और बच्चों को हंसाता भी है।
लेकिन इतिहास बनाने वाले हंस नहीं पाते, हंसी उनके लिए बाधा है। तभी तो हमारे कवि ने, जिसका नाम अज्ञेय है, लिखा, "जिनका इतिहास होता है | उनके देवता हंसते हुए नहीं होते: | कैसे हंस सकते? | और जिनके देवता हंसते हुए होते हैं | उनका इतिहास नहीं होता | कैसे हो सकता?" अज्ञेय की कविता पढ़ कर मुझे इस पूरे प्रसंग पर अपने क्षोभ की छद्म-गंभीरता का एहसास हुआ। तो कवि का उपदेश ही मान लूं, "इसी बात को लेकर | मुझे आज हंसना चाहिए…" और इस प्रकरण को समाप्त करूं।
जेएनयू में लालबैंड से जुड़ी इन पोस्‍ट्स से भी गुजरें…
[सौजन्‍य : नासिरुद्दीन वाया जनसत्ता]
(अपूर्वानंद। वरिष्‍ठ आलोचक और मानवाधिकार कार्यकर्ता। दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में प्राध्‍यापक। पटना में लंबे समय तक संस्‍कृति की आंदोलनकारी गतिविधियों की अगुवाई की। अशोक वाजपेयी के समय महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा से जुड़े रहे। उनसे apoorvanand@kafila.org पर संपर्क किया जा सकता है।)