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Sunday, 6 May 2012

बाजार को चाहिए राष्ट्रपति प्रणब

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बाजार को चाहिए राष्ट्रपति प्रणब
SUNDAY, 06 MAY 2012 09:00
बाजार के हालात ऐसे हैं कि बाजार को भरोसे में लेने के लिए देश के सर्वोच्च पद पर बाजार के मनपसंद व्यक्ति को बैठाने के अलावा सरकार के लिए अपने खिलाफ लगातार मजबूत हो रहे कारपोरेट समीकरण से निपटने का कोई और तरीका फिलहाल दीख नहीं रहा है.

एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

जिस प्रणव मुखर्जी को राष्ट्रपति चुनाव में सबसे तेज घोड़ा माना जा रहा है, खुले बाजार की वैश्विक व्यवस्था में उनकी स्थिति और मजबूत हुई है. इंदिरा गांधी के देहांत के बाद उनके प्रधानमंत्री बनने की चर्चा जरूर चली थी और शायद उन्होंने भी उम्मीद बांध रखी थी क्योंकि वे राजीव के प्रधानमंत्री बनने के बाद कांग्रेस से अलग हो गये थे. तब उन्होंने अपनी अलग पार्टी बी बना ली थी. पर जनाधार की जड़ों से कटे रहकर और कांग्रेस में गांधी नेहरु परिवार की विरासत के चलते प्रणव बाबू की प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा तो मर ही चुकी है. सिख राष्ट्रवाद के सहारे कांग्रेस अकालियों को भी मनमोहन सिंह के समर्थन में अकालियों को भी खड़ा करने में कामयाबी हासिल की है. अब बंगाली राष्ट्रवाद को भुनाने की पूरी तैयारी है. वामपंथी और ममता दोनों पहले बंगाली राष्ट्रपति की संभावना को खारिज नहीं कर सकते.

अगर राष्ट्रपति बन जाएँ प्रणव तो उनकी भूमिका क्या होगी, मनीला से इसके संकेत मिले हैं. वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी को विकास के लिए विभिन्न देशों को सस्ता कर्ज देने वाले बहुपक्षीय वित्तीय संगठन एशियाई विकास बैंक यानी एडीबी के निदेशक मंडल का अध्यक्ष चुना गया है.हालांकि प्रणब मुखर्जी ने राष्ट्रपति चुनाव में उनके प्रमुख उम्मीदवार के रूप में उभरकर सामने आने की अटकलों को खारिज कर दिया. मनीला जाते समय मुखर्जी ने संवाददाताओं से कहा, यह सिर्फ अटकल है. मैं इस पर टिप्पणी नहीं करना चाहता. एडीबी का मुख्यालय मनीला में है. एडीबी की 45वीं वार्षिक आम सभा में भारत को गौरवान्वित करने वाले एक अन्य निर्णय के तहत इसका 46वां वार्षिक सम्मेलन अगले वर्ष दिल्ली में कराने की घोषणा की गई. वित्त मंत्री ने एडीबी के निदेशक मंडल की अध्यक्षता का दायित्व स्वीकार करते हुए बैठक के समापन सत्र में कहा कि भारत को अध्यक्षता स्वीकार कर बहुत खुशी है.भारत 1966 में एडीबी का संस्थापक सदस्य था पर इस संस्था ने उसके 2 दशक बाद भारत को कर्ज सहायता देनी शुरू की. मुखर्जी ने भारत के साथ एडीबी के सहयोग के बारे में कहा कि यह 25 सालों की साझेदारी उत्साहजनक और चुनौतीपूर्ण रही है. उन्होंने कहा कि वह गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं.एडीबी के सचिव रॉबर्ट डाउसन ने बताया कि एडीबी भारत को 2012-14 की 3 साल की अवधि में विकास की योजनाओं के संचालन के लिए कुल 6.24 अरब डॉलर का कर्ज देने वाला है. यह कर्ज परिवहन, उर्जा, शहरी विकास, कृषि एवं प्राकृतिक संसाधन प्रबंध, वित्त तथा शिक्षा के लिए होगा.

बाजार के हालात ऐसे हैं कि बाजार को भरोसे में लेने के लिए देश के सर्वोच्च पद पर बाजार के मनपसंद व्यक्ति को बैठाने के अलावा सरकार के लिए अपने खिलाफ लगातार मजबूत हो रहे कारपोरेट समीकरण से निपटने का कोई और तरीका फिलहाल दीख नहीं रहा है. एक तीर से दो शिकार करने के मौके हैं. बाजार और वैश्विक पूंजी को आश्वस्त करना कि सुधारों की गति तेज रहेगी, तो दूसरी ओर राष्ट्रपति पद के लिए सहमति का दायरा बढ़कर घटक दलों और क्षेत्रीय क्षत्रपों को मनाना.कांग्रेस के सामने इससे बेहतर विक्ल्प नहीं है.एनसीटीसी मामले में सरकार की बेबसी एकदम नंगी हो गयी है.जबकि बाजार में गिरावट का रुख बना हुआ है. कमजोरी के पीछे सबसे बड़ी वजह है एफआईआई निवेशकों के द्वारा बिकवाली. माना जा रहा है कि जीएएआर पर असमंजस बने रहने से विदेशी निवेशक बाजार से पैसा निकाल रहे हैं.जीएएआर के अलावा दूसरे कई बड़े मुद्दों को लेकर विदेशी निवेशकों में चिंता बनी हुई है. भारत की आर्थिक हालत और सरकार की नीतियों पर सवालिया निशान बना हुआ है. व्यापार घाटा लगातार बढ़ रहा है. निर्यात के मुकाबले आयात में बढ़ोतरी ज्यादा है.वित्त वर्ष 2013 की पहली छमाही में करंट अकाउंट डेफेसिट बढ़ने की आशंका है. इसके अलावा सरकार पर पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाने का दबाव बढ़ता जा रहा है. अगर कीमतें बढ़ती हैं तो महंगाई में उछाल आने की संभावना है.पुरानी तारीख से टैक्स वसूलने के मलसे पर सरकार की तरफ से फिर से सफाई आई है. वित्त मंत्रालय ने कहा है कि पुरानी तारीखों पर टैक्स वसूलने के प्रस्ताव उन देशों पर लागू नहीं होंगे जिनके साथ भारत ने डबल टैक्स अवॉयडेंस अग्रीमेंट संधि (डीटीएए) कर रखी है.वित्त मंत्रालय ने ये भी कहा है कि वो मॉरिशस के साथ डीटीएए टैक्स संधि की समीक्षा करने पर विचार कर रहे हैं. भारत और मॉरिशस के बीच टैक्स अवॉएडेंस ट्रीटी है. भारत की 65 देशों के साथ डीटीएए संधि है. इस संधि के मुताबिक विदेशों में बसे भारतीयों को टैक्स के नियमों में छूट मिलती है और दोहरा टैक्स नहीं देना पड़ता है.वित्त राज्य मंत्री एस एस पलानिमनिकम ने लोकसभा में बताया कि साल 2006 में ही भारत और मॉरिशस का ज्वाइंट वर्किंग पैनल बनाया गया था. ये पैनल ऐसे तरीके खोज रहा है जिससे इस करार का दुरुपयोग नहीं हो सके. अब तक पैनल की 7 दौर की बैठकें हो चुकी हैं.एस एस पलानिमनिकम ने ये भी बताया कि इस मामले में सहयोग देने को लेकर मॉरिशस ज्यादा तैयार नहीं था लेकिन कोशिश हो रही है कि दोनों को मंजूर करने के तरीके खोजे जा सके. भारत में आने वाला ज्यादातर विदेशी पैसा मॉरिशस रूट से ही आता है.

जीएएआर और सरकार की नीतियों पर अनिश्चित्तता बनी रहने से विदेशी निवेशकों को भारत से दूर कर दिया है. जनवरी-मार्च में भारी निवेश करने वाले विदेशी निवेशकों ने अप्रैल में 600 करोड़ रुपये की बिकवाली की है.जनवरी में विदेशी निवेशकों ने 11000 करोड़ रुपये से ज्यादा की खरीदारी की थी. फरवरी में एफआईआई निवेश बढ़कर 25000 करोड़ रुपये से ज्यादा रहा था. मार्च में भी एफआईआई ने 7.75 करोड़ रुपये की खरीदारी की थी.इसके अलावा खबरें हैं कि न्यूयॉर्क के हेज फंड ओच-जिफ ने ने भारतीय शेयर बाजार में निवेश पूरी तरह बंद कर दिया है. ओच-जिफ के फंड की कीमत 30 अरब डॉलर से ज्यादा है. ओच-जिफ भारत में पी-नोट्स के जरिए निवेश कर रहा था.

रुपये में लगातार जारी कमजोरी पर लगाम लगाने के लिए आरबीआई ने 2 बड़े ऐलान किए हैं. कारोबार के दौरान रुपया 54 के स्तर के बेहद करीब पहुंच गया था.आरबीआई ने फॉरेन करंसी नॉन रेसिडेंट (एफसीएनआर) डिपॉजिट्स पर जमा दर की सीमा 0.5 फीसदी से बढ़ाई है.अब बैंक एफसीएनआर डिपॉजिट्स पर लिबार या स्वॉप रेट से 2 फीसदी तक ज्यादा ब्याज दे सकेंगे. पहले 1.5 फीसदी तक की सीमा थी. नई दरें 5 मई से लागू होंगी.इसके अलावा बैंक विदेशी मुद्रा में निर्यातकों को कर्ज देने पर ब्याज दर खुद तय कर सकेंगे. पहले आरबीआई ने ब्याज दरों पर सीमा लगाई हुई थी.आरबीआई का कहना है कि इन कदमों से बैंकों के पास विदेशी मुद्रा बढ़ेगी और निर्यातकों को कर्ज मिलने में आसानी होगी.

राष्ट्रपति पद की दौड़ में वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी का दावा और मजबूत होता जा रहा है. यूपीए का घटक दल डीएमके भी अब प्रणब के समर्थन में आ गया है. द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) के अध्यक्ष एम. करुणानिधि ने शनिवार को कहा कि यदि राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के तौर पर वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी का नाम प्रस्तावित होगा तो उनकी पार्टी इसका समर्थन करेगी. करुणानिधि ने यहां पत्रकारों को बताया, 'यदि मुखर्जी उम्मीदवार हों तो उनकी पार्टी उन्हें समर्थन देने में बिल्कुल भी नहीं हिचकिचाएगी.' साफ जाहिर है कि प्रणब मुखर्जी के नाम पर सहमति का दायरा बढ़ता जा रहा है. यूपीए के दो प्रमुख दलों ममता की तृणमूल कांग्रेस और शरद पवार की एनसीपी के साथ सरकार को बाहर से समर्थन दे रही समाजवादी पार्टी ने भी प्रणब के लिए अपना झुकाव दिखाया है. लेकिन सूत्रों के मुताबिक अभी कांग्रेस और सरकार का एक खेमा उन्हें सरकार के लिए जरूरी बता उन्हें रोकने में जुटा है.एनडीए, गैर एनडीए और बाकी दलों ने जिस तरह से सर्वसम्मत राष्ट्रपति की रट पकड़ी है, उससे प्रणब का पलड़ा भारी होता जा रहा है. दिलचस्प है कि गैर राजनीतिक राष्ट्रपति की बात कर रहे एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार भी अपने सुर बदल चुके हैं. वहीं ममता बनर्जी ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात के बाद भी अपने पत्ते पूरी तरह नहीं खोले हैं और कहा है कि अभी राष्ट्रपति चुनाव में समय है और समय आने पर वे इस बारे में निर्णय लेंगी.

पर बाजार में सरकार की साख सुधरती नहीं दीख रही. मारीशस वाला मुद्दा तो बना हुआ है. टेलीकाम नीलामी के मामले में भी सरकार बुरी तरह फंसी है. एनसीपीटी के मामले में सरकार की राजनीतिक बाध्यताओं का नये सिरे से पर्दाफाश हो गया. प्रस्तावित राष्ट्रीय आतंकवाद निरोधक केंद्र (एनसीटीसी) को लेकर केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के बीच जारी गतिरोध समाप्त होने का कोई संकेत शनिवार को नहीं मिला. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पुरजोर वकालत के बावजूद गैर कांग्रेस शासित राज्यों ने इस संस्था के मौजूदा स्वरूप का खुलकर विरोध किया. मनमोहन सिंह और केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदम्बरम शांतिपूर्वक मुख्यमंत्रियों की बातें सुनते रहे.जाहिर है कि आतंकवाद के खिलाफ केंद्र की मुहिम एनसीटीसी को करारा झटका लगा है. इस मसले पर दिल्ली के विज्ञान भवन में पीएम के साथ हुई बैठक में ज्यादातर मुख्यमंत्रियों ने इसे नकार दिया. हालांकि सरकार ने ये जताने की कोशिश की है कि ये मसला अभी पूरी तरह खटाई में नहीं पड़ा है. केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदम्बरम ने शनिवार को कहा कि राष्ट्रीय आतंकवाद निरोधक केंद्र (एनसीटीसी) के गठन के सिलसिले में अभी कोई फैसला नहीं हो पाया है. विपक्षी दलों के साथ सरकार के कुछ सहयोगी दलों के मुख्यमंत्रियों द्वारा भी इसके विरोध में मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में आवाज बुलंद करने के बाद चिदम्बरम का यह बयान आया.सरकार की इस बेबसी पर बेरहम कारपोरेट इंडिया को बी तरस आ रहा होगा.तृणमूल कांग्रेस और गैरकांग्रेस शासित राज्यों की मुखालफत के मद्देनजर जारी गतिरोध को दूर करने के लिए शनिवार को मुख्यमंत्रियों का सम्मेलन बुलाया गया था लेकिन केंद्र सरकार की मंशा धरी की धरी रह गई. गतिरोध खत्म होने के बजाए बढ़ ही गया. करीब 15 मुख्यमंत्रियों ने एनसीटीसी के गठन का या तो विरोध किया या कहा कि उसका मौजूदा स्वरूप उन्हें स्वीकार नहीं है. तीन मुख्यमंत्रियों ने इसके गठन को पूरी तरह खारिज कर दिया.

खास बात यह है कि तृणमूल कांग्रेस जो लगातार आर्थिक सुधारों के मामले में अड़ंगा डाल रही है, उसे पटाने में कांग्रेसी सौदेबाजी और जुगाड़ की कला, केंद्रीय एजंसियों के इस्तेमाल की परंपरा काम नहीं कर रही है. केंद्री मदद मिलने में टालमटोल से नाराज पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राष्ट्रीय आतंकवाद निरोधक केंद्र [एनसीटीसी] के गठन के आदेश को वापस लेने की मांग करते हुए शनिवार को कहा कि इससे देश के संघीय ढांचे को नुकसान पहुंचेगा. उन्होंने कहा कि इससे सिर्फ केंद्र सरकार व राज्यों में अविश्वास बढ़ेगा.यहां मुख्यमंत्रियों की बैठक में बनर्जी ने कहा कि गिरफ्तारी, तलाशी और जब्त करने जैसी प्रस्तावित शक्तियों से संपन्न एनसीटीसी जैसे संस्थान के गठन से संवैधानिक तौर पर स्वीकृत देश के संघीय ढांचे को नुकसान पहुंचेगा.एनसीटीसी के गठन के आदेश को वापस लेने की मांग करते हुए बनर्जी ने मांग की कि पुलिस का कामकाज राज्यों के विशेषाधिकार में शामिल रहना चाहिए, जिसका उल्लेख संविधान में किया गया है.उन्होंने कहा कि केंद्र एवं राज्य में शक्तियों और दायित्वों का सही संतुलन किसी भी परिस्थिति में बिगड़ने नहीं देना चाहिए.बनर्जी ने कहा कि वह केंद्र सरकार से अनुरोध करती हैं कि एनसीटीसी के गठन के लिए गृहमंत्रालय की ओर से तीन फरवरी 2012 को जारी आदेश वापस लिया जाए. तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने एनसीटीसी का जबर्दस्त विरोध करते हुए केंद्र पर आरोप मढ़ा कि वह देश को तानाशाही की ओर ले जा रहा है.दूसरी ओर गृहमंत्री पी चिदंबरम पर चौतरफा हमला बोलते हुए जयललिता ने कहा कि केंद्र तमिलनाडु की काफी ज्यादा अवमानना कर रहा है. उसने राष्ट्रीय आतंकवाद रोधी केंद्र (एनसीटीसी) के गठन के आदेश की प्रति तक राज्य को नहीं भेजी.गौरतलब है कि बैठक की शुरुआत करते हुए गृहमंत्री चिदंबरम ने कहा कि मुंबई हमलों के बाद देश को कड़े कानून की जरूरत है. उनके मुताबिक आतंक पर नकेल कसना एक बड़ी चुनौती है. आतंक से लड़ना राज्य और केन्द्र की साझा जिम्मेदारी है क्योंकि आतंकी राज्य की सीमाएं नहीं देखते.

इसी के मध्य बाजार को उम्मीद है कि अमेरिकी विदेश मंत्री से मुलाकात के बाद हालात बदल सकते हैं. विदेशी पूंजी की आवक होने पर ममता अपने सुविधा के मुताबिक बनाये अवरोध तोड़ भी सकती हैं. अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच रिटेल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश तथा बांग्लादेश के साथ तीस्ता नदी जल समझौते पर वार्ता हो सकती है. क्लिंटन रविवार को कोलकाता पहुंचेंगी और सोमवार को उनकी राज्य सचिवालय राइटर्स बिल्डिंग में ममता के साथ बैठक होगी. टाइम पत्रिका की प्रभावशाली व्यक्तियों की सूची में शामिल दोनों महिलाओं की बैठक कई दृष्टि से अहम है.