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Friday, 3 February 2012

अगर विकास मुश्किल है तो उसे आसान भी तो बनाया जा सकता है

अगर विकास मुश्किल है तो उसे आसान भी तो बनाया जा सकता है


सदस्य, म्यर उत्तराखंड,  धुमाकोट /नैनीडाँडा तथा इंटेरेंट पर उपलब्ध दूसरे उत्तराखंडी ग्रूप

कल की मेल का शीर्षक था  क्या उत्तराखंड के भावी चुनाओं पर इंटरनेट का प्रभाव पड़ेगा? प्रतिक्रिया  आई मुश्किल. बेडू पाको ग्रुप पर आशुतोष डंगवाल जी ने यह
प्रतिक्रिया प्रकट की.  मुश्किल है तभी तो काम किया जाना चाहिए.  चुनाव
नतीजों की प्रतीक्षा वह अवसर है जिसमे सोचा जा सकता है कि इस मुश्किल को
आसान कैसे बनाया जा सकता है. जो काम इंटरनेट बिजनेस कर रहा है वह तो करता
ही रहेगा. जो काम उत्तराखंड और केंद्रीय सरकारें कर रही हैं वह तो होते ही  जाएंगे.

17 जनवरी की मेल का शीर्षकविकास का संकेत विकास नहीं है. विकास के लिए पूरी प्लानिंग चाहिए था.  इस मेल का अन्तिम भाग कहता है 

बात केवल राज नेताओं की नहीं है.  राज नेता तो तभी काम कर सकते हैं
जब बुद्धिजीवी  अपना काम करें और उस काम से राज नेताओं पर दबाव डालें. जो
काम कोचियार लाइब्रेरी कर रही है वह काम उत्तराखंड के शिक्षा संस्थानों क़ो भी करना चाहिए ताकि जमीन स्तर पर प्लानिंग हो.  प्लानिंग कमीशन की स्थापना ही  जमीनी स्तर पर सुझाए कार्यों के लिए धन उपलब्ध करने के लिए हुई थी. 
शायद अब इन्टरनेट बुद्धिजीवियों में कुछ जागृति लेआये. 

विदेशों
में रह रहे या बहीं बसे हुए उत्तराखंडियों की संख्या कम नहीं है. अमेरिका
में बसे हुए उत्तराखंडियों ने उसी समय उत्तराखंड असोसियेशन ऑफ नॉर्थ
अमेरिका नाम की संस्था बनाई थी जब कि गोपीओ बन रहा था.   उस संस्था ने
उत्तराखंड आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी.  उसका काम अच्छा चल रहा था.
उन्होने नरेंद्र सिंह नेगी का कार्य क्र्म अमेरिका में पेश किया था वह
अत्यंत सफल रहा पर इस सफलता को अधिकारी पचा नहीं पाए. आपस में भिड़ गये . 
एक के बजाय दो ऊना बन गये.  पर उतना काम नहीं करा पाए जितना काम
राजस्थानअसोसिएशन ऑफ नॉर्थ अमेरिका ने इस साल का प्रवासी भारतीय दिवस जयपुर
मे आयोजित करवाने में अपनी भूमिका निभा कर किया.

आज वह सुविधाए जो अमेरिका मे जा कर मिलती थीं भारत में ही मिल रही हैं.
गांवों तक मोबाइल पंहुच गये हैं क्म्प्यूटर  और इंटरनेट भी मोबाइलों के
मार्फ़त गाँवों मे पंहुच जाएंगे. जो लोग उत्तराखंड के गाँवों में नहीं रह
रहे हैं वह प्रवासी ही तो हुए. चाहे वह न्यूयॉर्क में हैं या दिल्ली मे
क्या फर्क पड़ता है. नयी सुविधाएं सभी को जोड़ रहीं है. बात फयदा उठाने की
है.

मोबाइलों का बिजनेस विदेशी कंपनियाँ कार रही हैं.  अपने फायदे के लिए
कर रही है. उत्तराखंडी खुद अपना फायदा नहीं उठा सकते.   यह काम संगठित तौर
पर एसे ही हो सकता है जैसे कि शिक्षा स्कूलों के माध्यम सेही मिलती है.
व्यवस्था के अभाव में हर काम  मुश्किल हो जाता है.

राम प्रसाद