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Wednesday, 1 February 2012

कितनी भयावह होगी स्‍त्री के बिना इस दुनिया की कल्‍पना?

कितनी भयावह होगी स्‍त्री के बिना इस दुनिया की कल्‍पना?

31 JANUARY 2012 
♦ राहुल सिंह
Film as dream, film as music, no art passes our conscience in the way film does and goes directly to our feelings, deep down into the dark rooms of our souls.
Ingmar Bergman

संभव है कि मनीष झा एक ऐसा नाम जान पड़े, जिससे आप सब वाकिफ न हों लेकिन इसे पढ़ने और फिल्म को देखने के बाद शायद ही आप उन्हें भुला सकें। बेतिया में जन्मे और दिल्ली में बढ़े मनीष झा, रामजस कॉलेज से स्नातक हैं। अभिनय की चाहत में स्नातक के दिनों में बाल बढ़ाये घूमनेवाले मनीष जब रामजस कॉलेज के एक रंगमंचीय समूह से जुड़ने की हसरत लिये गये तो पहले उन्हें बाल कटाने को कहा गया। अमेरिक में 9/11 की घटना तक इनके बाल बढ़े ही हुए थे क्योंकि उस घटना के बाद अमेरिका की किसी सड़क पर चहलकदमी के दौरान अमेरिकी पुलिस ने इनके बढ़े बाल और दाढ़ी के कारण छह घंटे की लंबी पूछताछ की थी। उसी अनुभव से इनकी दूसरी फिल्म ‘अनवर’ (2007) उपजी थी। रामजस से स्नातक करने के बाद अभिनय की चाहत बंबई खींच ले गयी, जहां टीवी धारावाहिकों में बतौर असिस्टेंट डाइरेक्टर काम करते हुए 30,000 की लागत से एक डाक्यूमेंट्री ‘अ वेरी वेरी साइलेंट फिल्म’ (2001) बनायी, जिसे कॉन फिल्म महोत्सव में उस वर्ष सर्वश्रेष्ठ शार्ट फिल्म से नवाजा गया। लेकिन यहां मैं उनकी डेब्यू फीचर फिल्म ‘मातृभूमि: अ नेशन विटाउट विमेन’ (2003) की बात करने जा रहा हूं, जिसने अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सवों में उसी साल (वेनिस, पोलैण्ड, फ्लोरेंस, ग्रीस) में पुरस्कारों की झड़ी लगा दी थी। इस फिल्म की धाक का एहसास इस बात से लगाया जा सकता है कि टाइम मैग्जीन ने इसे वर्ष 2003 की विश्व की दस श्रेष्ठ फिल्मों में शुमार किया था। बावजूद इसके भारत में इसे रीलीज होने में अठारह महीने लग गये थे। देरी का सुखद पहलू यही था कि फिल्म एक साथ पांच भारतीय भाषाओं (बंगाली, तमिल, तेलूगु, गुजराती और भोजपुरी) में रीलीज हुई थी। अमूमन किसी फिल्म के प्रोड्यूसर और को-प्रोड्यूसर यह देखते हैं कि बाक्स ऑफिस की कलेक्शन कितनी आ सकती है लेकिन इस लिहाज से भी इसके फ्रेंच प्रोड्यूसर पैट्रिक सॉब्लमन, भारतीय प्रोड्यूसर संजीव सिंह और को-प्रोड्यूसर पंकज खरबंदा थोड़े अलहदा जान पड़ते हैं। पैट्रिक के लिए जहां विषय महत्‍वपूर्ण था, वहीं संजीव सिंह ने इस फिल्म के बाद अनुराग कश्यप की उड़ान को भी प्रोड्यूस किया था।
जाहिर है कि सिनेमा एक ‘कमर्शियल वेंचर’ है और समानांतर फिल्मों के निर्माण से मिलने वाली शोहरत और ईनाम से प्रोडक्शन हाउसेज नहीं चला करते, फिर भी ‘तनु वेड्स मनु’ जैसी कमर्शियल फिल्म को भी प्रोड्यूस करनेवाले संजीव सिंह जब मनीष झा की अगली फिल्म ‘माउंटैन मैन’ को प्रोड्यूस करने के लिए तैयार होते हैं, तो एक समानांतर फिल्म के चाहनेवालों के लिए भी गुंजाइश बची रह जाती है।
इस फिल्म के सह-निर्माता पंकज खरबंदा ने फिल्म के रीलीज होने के बाद एक इंटरव्यू के दौरान जबर्दस्त बात कही थी कि “पिछले कुछेक सप्ताह में सारे अखबारों ने बाघों को बचाने के लिए अनेक लेख छापे हैं, लेकिन नवजात बालिकाओं की इतनी संख्या में की जा रही हत्याओं की अलार्मिंग स्थिति पर क्या आपको नहीं लगता कि मीडिया को थोड़ा ध्यान देना चाहिए।”
मातृभूमि के ‘सब्जेक्ट’ उसके ‘कंस्ट्रक्ट’ और ‘ट्रीटमेंट’ के कारण उसके अन्य सिनेमाई कौशलों मसलन सिनेमेटोग्राफी, बैकग्राउंड स्कोर, स्टिल्स और कैमरावर्क की ओर हमारा ध्यान फिल्म देखने के दौरान उतना नहीं जा पाता है, लेकिन यह सब मिल कर ही उस दमदार पटकथा को रचते हैं, जो काल्पनिक जान पड़ती हुई भी नितांत जमीनी है। यह फिल्म ईरानी या इस्लामिक देशों की उन फिल्मों की तरह है, जिसमें उन फिल्मों का परिवेश भी एक महत्वपूर्ण किरदार हुआ करता है, जिसकी दूसरी भाषा में की गयी नकल अक्सर परिवेश के अभाव में आत्माविहीन लगा करती हैं।
यों तो यह कहानी भारत के किसी भी सुदूर गांव-देहात की हो सकती है, जहां बिजली, सड़क और चिकित्सा जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हों। इस तथ्य के बावजूद कि इस फिल्म की पूरी शूटिंग मध्यप्रदेश के सुदूर रेनाई नामक देहात में हुई है, इस तथ्य के बावजूद कि मनीष झा को मातृभूमि बनाने का बुनियादी खयाल गुजरात के किसी गांव के स्त्रीविहीन होने की खबर को पढ़ कर आया था। लेकिन पूरी फिल्म की ‘टोन’ और ‘कलचरल टेक्सचर’ को नजदीक से पढ़ने पर यह बिहार के सोनपुर, छपरा वाले भूभाग की कहानी जान पड़ती है। एक तो पात्रों का लहजा बिहारी है (शूल, गंगाजल और अपहरण की तरह संभव है कि मनीष स्वयं पश्चिमी चंपारण के हैं, इस नाते यह प्रभाव आ गया हो), दूसरा इस क्षेत्र में विख्यात ‘लौंडा नाच’ की लोक परंपरा के कारण और तीसरे वहां की लोकस्मृति में अंकित बेटी के प्रति लोकव्यवहार के कारण। महापंडित राहुल सांकृत्यायन का भोजपुरी में लिखा एक नाटक है, ‘मेहरारुन की दुर्दशा’ उसका एक अंश है।
एके माई बापवा के एक ही उदरवा से दोनों के जनमवा भइल रे पुरुषवा।
बेटा के जन्म पर नाच और मान होला बेटी के जनम पर शोक रे पुरुषवा।
इसी परंपरा में भोजपुरी के शेक्सपियर माने जाने वाले भिखारी ठाकुर के नाटक ‘बेटी बेचवा’ को भी ध्यान में रखें, तो इस फिल्म की कहानी भले भारत के अनेक हिस्सों के सच को बयां करती जान पड़ती हो पर ‘लोकल’ के तौर पर मनीष झा ने संभवतः बिहार के इसी भूभाग को अपने जेहन में रखा है।
ओपनिंग सीन में मातृभूमि जिस तनाव का सृजन करती है, वह तनाव धनुष की खींची हुई प्रत्यंचा जैसी पूरी फिल्म में व्याप्त है। मनीष झा के निर्देशन की सफलता उस तनाव को बनाये रखने में है। फिल्म की बढ़ती कहानी के साथ तनाव गहराता जाता है, कई जगहों पर वह असहनीय भी हो जाता है। फिल्म की शुरुआत आईने में उभरे उस अक्स से होती है, जिसमें प्रसव-वेदना से एक महिला छटपटा रही है। एक महिला ने खटिया के एक सिरे पर उसके दोनों हाथ मजबूती से पकड़ रखे हैं और दूसरे सिरे पर उसकी छटपटाती टांगों के बीच होठों में ब्लेड दबाये दाई उसका प्रसव कराने की कोशिश कर रही है। एक दूसरी महिला कठौत में पानी गर्म करके दे रही है, असहनीय दर्द से परेशां होकर गर्भवती महिला अपना पांव चलाती है और दाई का नकबाशा फूट जाता है। दाई अब प्रसव कराने के लिए ब्लेड की जगह कैंची मांगती है। बाहर महिला का पति ईश्वर से मन्नतें मांग रहा है, मनौती कुशल प्रसूति का नहीं बल्कि बेटा की जच्चगी सुनिश्चित करने के लिए। गर्भवती की धौंकनी-सी चलती सांसें, दरवाजे के बाहर बैठे उसके पति की तनावग्रस्त भंगिमा और उसी अनुपात में निस्पृह, शांत और ठंडेपन से लबरेज दाई का चेहरा और इन सबकी पृष्ठभूमि में कठौत, खटिया, मिट्टी के चूल्हे में जलती लकड़ियां, गगरी, लालटेन, पुआल, साइकिल, टुटहा छप्पर आदि एक अजब उदासी को पर्दे पर रचते हैं। इस ब्यौरे के जरिये बताना सिर्फ यह था कि फिल्म का स्क्रीनप्ले बेहद कसा हुआ है।
मनीष झा निर्देशक के साथ स्क्रिप्ट राइटर भी है और इस फिल्म की शुरुआती दो सौ पृष्ठों की स्क्रिप्ट को काटकर उन्होंने सत्तर पृष्ठों में समेट दिया था। खैर, बच्चे के रोने की आवाज के साथ पीटी जाती थाली उस तनाव को खत्म करती ही है कि दाई बाहर आकर उसी ठंडेपन के साथ सूचना देती है – ‘लड़की’। अगले क्षण ही संस्कृत के एक श्लोक के साथ एक बड़े डेग में दूध को भरते दिखलाया जाता है। उस दूध से भरे डेग में उस बच्ची को यह कह कर डुबो दिया जाता है कि ‘अगले साल लड़का’। ठीक वैसे ही जैसे फुटबॉल या टायर की ट्यूब को पानी में डाला जाता है, यह जानने के लिए कि पंक्चर कहां हैं। शुरुआत में दूघ की सतह पर कुछेक और बाद में दो-एक पानी के बुलबुलों के साथ दृश्य का समापन होता है।
इस शुरुआती सीन के खत्म होने के साथ आपको लगेगा कि आप एक पल को सांस लेना भूल गये थे। लेकिन यह महज शुरुआत है एक दुःस्वप्न की… उस दुःस्वप्न की, जिसे हमने किसी को मार कर जना है। फिल्म एक छोटी-सी कमेंट्री सुनाती है कि ‘हमने आर्थिक स्वार्थ के कारण नवजात बालिकाओं को खत्म करना समस्या का हल समझा, लेकिन यह न सोचा कि अपने आप में यह हल एक दिन समस्या बन जाएगा।’ समस्या फकत इतनी कि नवजात बालिकाओं की हत्या के सिलसिले ने एक ऐसा मंजर दरपेश कर दिया है कि उस गांव में औरतों का अस्तित्‍व ही नहीं रह गया है। 10-12 साल की बच्ची कहें या अस्सी साल की बुढ़िया कोई नहीं बची है। इस ‘क्राइसिस’ के साथ कायदन फिल्म की शुरुआत होती है। आप यदि रचनाकार हैं या अपने को कहीं से भी थोड़ा कल्पनाशील मानते हैं, तो फिल्म को यहां पॉज करके अपनी रचनाशीलता और कल्पनाशीलता को थोड़ा उड़ने का मौका दीजिए कि इस ‘क्राइसिस’ की कौन-कौन सी परिणतियां हो सकती हैं या सोचिए कि इस आधारभूमि पर कहानी किन ‘ट्विस्ट और टर्न’ के साथ आगे बढ़ायी जा सकती है। यकीन मानिए मनीष झा हमारी रचनाशीलता और कल्पनाशीलता दोनों पर भारी पड़ते हैं। मनीष झा ने इस दुःस्वप्न को बड़े जतन से बुना है। इसलिए पहले थोड़ी बात इस बुनावट की।
कास्टिंग खत्म होने के बाद ज्यों-ज्यों फिल्म आगे बढ़ती है, एक नियमित अंतराल पर लगातार ‘शॉक’ लगना शुरू होता है। एक के बाद एक होने वाले प्रहारों से दिमाग झन्ना जाता है, हर दृश्य के साथ एक नये किस्म की सिहरन पैदा होती है कि अब क्या? दूध में डुबो कर मारी गयी बच्ची के बाद दूसरा झटका लगता है, जब ब्लू फिल्म देखने के दौरान उत्तेजना के क्षणों में राकेश (पंकज झा) वीडियो हॉल से निकल कर चोरों की तरह एक गोशाला में दाखिल होता है और किवाड़ बंद करने के बाद अंधेरे में गाय की रंभाने की आवाज सुनाई देती है, तीसरा झटका तब लगता है कि जब विवाह के फेरे लेती दुल्हन का लहंगा पंडित मंडप में सरे आम खींच देता है, चौथा झटका तब जब कल्कि (ट्यूलिप जोशी) का बाप उसका सौदा एक लाख और एक गाय में तय करके पांच लाख रूपये गिन रहा होता है। एक पल को समझ में नहीं आता है कि एक की जगह पांच लाख और पांच गाएं क्यों दिये जा रहे हैं? इससे पहले कि दिमाग के घोड़े दौड़ाये जाएं, विवाह मंडप में कल्कि रामचरण (सुधीर पांडे) के पांच लड़कों (राकेश, शैलेश, ब्रजेश, लोकेश और सूरज) के साथ फेरे लेते नजर आती है। इतनी देर में आप अपने भीतर एक सन्नाटे को गूंजता हुआ महसूस करने लगते हैं। तभी यातना की छठी चोट पड़ती है। सबसे बड़ा भाई राकेश कहता है कैलेंडर लाओ। ‘बड़ा भाई होने के नाते समारोह का फीता काटने की जवाबदेही वह अपने सिर लेता है।’ अगले दिन यानी शुक्रवार को वह शैलेश (दीपक कुमार बंधु) की पारी बांधता है, लेकिन शैलेश यह कह कर मना कर देता है कि शुक्रवार को मेरा व्रत रहता है। फिर पूरे लोकतांत्रिक तरीके से सबको सप्ताह में एक-एक रात अलॉट कर दिया जाता है। फिर भी एक समस्या जस की तस रहती है कि सप्ताह सात दिनों का होता है, तो बाकी के दो दिनों का क्या किया जाए? तभी सातवां प्राणांतक प्रहार होता है। बाप रामचरण चीखता है, “अरे बेवकूफों अपने बाप के बारे में सोचा है कभी, अरे क्या नहीं किया तुम्हारे लिए। तुम्हारी मां के मरने के बाद तुम्हारा बाप भी मैं था और मां भी मैं, लेकिन तुममें जरा भी दया, जरा भी प्यार नहीं है। बाप साला मरता है तो मरे। अरे मैंने दिये हैं पांच लाख और पांच गाएं ताकि सालों तुम्हारी शादी हो सके।”
कल्कि अगली सुबह दर्द और दुःख से टिमकते देह के साथ जागती है, बगल में ससुर सोया है। उसके बाद हर रात बारी-बारी से बाप-बेटों के आने का अंतहीन सिलसिला शुरू होता है। कल्कि के चेहरे पर दुःख, दर्द, पीड़ा, यातना, अवसाद के भाव धूप-छांह की तरह आते-जाते रहते हैं। इस नारकीय यंत्रणा में सहानुभूति, संवेदनशीलता और हार्दिकता का स्पर्श कल्कि को सबसे छोटे पति सूरज (सुशांत सिंह) से मिलता है, लेकिन बाप समेत भाइयों को अपनी साझी संपत्ति का सूरज की ओर बढ़ता झुकाव नागवार लगता है और भाई के द्वारा भाई की हत्या कर दी जाती है। उम्मीद की आखिरी किरण के तौर पर वह अपने पिता प्रताप (रोहिताश्व गौर) को चुपके से चिट्ठी लिखकर रग्घू (विनम्र पंचारिया) के हाथों भिजवाती है। उसका पिता आकर एक लाख रुपया और वसूल कर, यह कह कर चला जाता है कि अच्छा किया तूने अपने ससुर के बारे में बता दिया। ‘ससुरा मुफ्त में ही तेरे साथ…’ इस एक लाख की अतिरिक्त चपत से बाप-बेटे बौखला जाते हैं और कल्कि के लिए स्थितियां बदतर होती चली जाती हैं। इस नरक कुंड से भागने की कोशिश में रग्घू उसका साथ देता है और बीच सड़क में गोली खाकर गिरने के बाद उसकी बोटी-बोटी काट डाली जाती है। रग्घू पर तलवार से वार किये जानेवाला दृश्य ‘लव, सेक्स और धोखा’ के ऑनर किलिंग वाले दृश्य की याद दिलाता है। इस दृश्य तक तक आते-आते यकीन मानिए, हलक सूख जाएगा। लेकिन मनीष झा का मास्टर स्ट्रोक अभी भी बचा है।
हिंदी सिनेमा के इतिहास के चंद अमानवीय और क्रूरतम दृश्यों में शुमार किये जा सकने वाला दृश्य अभी नमूदार नहीं हुआ है। क्रियाओं की बारंबारता किस कदर क्रूरता की सरहदों को छू सकती हैं, हिंदी सिनेमा में इसे साकार करने का काम मनीष झा ने किया है और इस लिहाज से हिंदी सिनेमा के क्रूरतम दृश्यों में से एक को फिल्माने का श्रेय कम से कम उन्हें दिया जा सकता है। नीची जाति के नौकर के साथ भागने के कारण कल्कि अशुद्ध करार दी जाती है। उसकी वापसी तो होती है, लेकिन इस बार वह गोशाला में गायों के बीच खुद भी लोहे के सीकड़ से पशुओं की तरह बंधी पड़ी है। रग्घू की मौत का बदला लेने आया रग्घू का चाचा (आदित्य श्रीवास्तव) उसे गोशाला में पाकर उसके मुंह में कपड़ा ठूंस कर बलात्कार करता है, फिर शुरू होता है मृतप्राय हो चुकी कल्कि से बलात्कार का अंतहीन सिलसिला, जिसमें शीघ्र ही उसे अशुद्ध मान चुके उसके चारों पति और ससुर भी शरीक हो जाते हैं। मुर्दे की तरह गोशाला में पड़ी कल्कि मुंह में गाय की पेशाब की छींटे पड़ते हैं, कल्कि के हाथों में इतनी जुंबिश भी नहीं कि अंगुलियों पर बैठी मक्खी को उड़ा सके। सिर के पास गाय का गोबर और खुद खरोंचों और खून, गर्द और गोबर से सनी और भूख-प्यास से बेहाल कल्कि लाश-सी लगती है। गर्भ धारण किये हुए वह गोशाला में लगभग आठ-नौ महीने तक लस्त-पस्त पड़ी रहती है। ऐसे ही एक पल में राकेश आकर पैरों से उसे ठोंकता-कोंचता है। बमुश्किल वह अपना पेटीकोट खींचकर अपनी टांगों को फैला पाती है। इस अमानवीय और क्रूरतम दृश्य की तुलना में मुझे सिर्फ सआदत हसन मंटो की कहानी ‘खोल दो’ का दृश्य याद आता है।
स्त्री के न होने से पुरुष अपनी शारीरिक जरूरतें की पूर्ति हेतु किन विकल्पों की तलाश कर सकता है, इस पर मनीष झा ने चार दृश्य फिल्माये हैं। एक लौंडा नाच, दूसरा ब्लू फिल्म, तीसरा गाय जैसे पशुओं के साथ…, चौथा समलैंगिक संबंधों का। शुरू के दो सीन ‘लाउड’ हैं, क्योंकि उसमें समूह के ‘सैक्सुअल बिहेवियर’ को ‘कैप्चर’ करने की कोशिश है और आखिरी के दो निजता के कारण सांकेतिक हैं। चाहे वह लौंडे का नाच हो या ब्लू फिल्म, कम से कम यह दोनों किसी स्त्रीविहीन समाज से उपजे वैकल्पिक कला रूप नहीं हैं। इन दोनों का संबंध कहीं न कहीं पुरुष की दमित यौनिकता की अभिव्यक्ति से है। अगर ब्लू फिल्म पूंजीवादी दौर की उपज है, तो लौंडे का नाच सामंती या शायद उससे भी पहले की। लौंडा नाच में जहां पुरुष यौनिकता के जागरण का आह्वान किया जाता है, वहीं पोर्नोग्राफी शिराओं में बहनेवाले रक्त के संचार को दृश्यों के माध्यम से संचालित करता है। नाच ‘रेस्पांसिव आर्ट फार्म’ है, उसकी सफलता दर्शकों को उन्मादी बना देने में है, पोर्नोग्राफी एक खामोश क्रांति की तरह है, जो त्वचा के नीचे उन्माद पैदा करती है। मनीष झा इन दोनों के सामूहिक प्रभाव को बखूबी कैप्चर करते हैं। फर्क इतना है कि लौंडा नाच के दौरान वे आडिएंस की ‘बॉडी लैंग्वेज’ और पोर्नोग्राफी के दौरान ‘फेसियल एक्सप्रेशन’ को ‘कैप्चर’ करते हैं। ‘बॉडी लैंग्वेज’ लाउड रहने के कारण आसानी से पकड़ में आने लायक होता है लेकिन पोर्नोग्राफी देखने के दौरान चेहरे के बदलते भावों को पकड़ना जिस बारीकी की मांग करता है, उसे आप उस दृश्य को देख कर ही समझ सकते हैं। आलंबन का स्त्रोत एक होने के बावजूद उद्दीपन का एहसास इतने जुदा-जुदा हैं कि इस दृश्य को देखकर अज्ञेय की असाध्य वीणा की वह पंक्तियां याद आती हैं कि ‘इयत्ता सबकी अलग-अलग जागी।’
प्रथम दृष्टया यह फिल्म भ्रूण में शिशु बालिकाओं एवं नवजात बालिकाओं की हत्या और घटते लिंगानुपात को संबोधित जान पड़ती है, है भी। लेकिन इस मुख्य चिंता के समानांतर भी फिल्म में कुछ बातें हैं, जिसे ‘बाइप्रोडक्ट’ मानकर छोड़ दिया गया है। मानव सभ्यता के विकास के इतिहास में मानव समाज के वर्गीकरण के जो दो विश्वसनीय आधार उभरकर सामने आये हैं, उनमें से एक है आर्थिक आधार और दूसरा लैंगिक आधार। मार्क्सवादी पहले को और नारीवादी दूसरे को तरजीह देती हैं। चाहे वह आर्थिक आधार हो या लैंगिक आधार दोनों में स्त्रियां सबसे निचले पायदान पर हैं।
मातृभूमि सबाल्टर्न दृष्टि से भी एक महत्‍वपूर्ण फिल्म है। सबाल्टर्न समूहों में दलितों के संग स्त्रियों को भी एक समूह के तौर पर देखा जाता है लेकिन फिल्म बेहद करीने से इसकी चीर-फाड़ करती है। फिल्म में सामाजिक विभाजन के आर्थिक, लैंगिक और जातिगत आधार अर्थपूर्ण ढंग से उपस्थित हैं। सवर्णों के साथ दलितों का समूह भी है। फिल्म में हर जमात से इक्के-दुक्के पात्र लिये गये हैं, जो व्यक्ति से ज्यादा अपने समूह का प्रतिनिधित्व करते हैं। कुल मिलाकर वे पात्र कम प्रतीक ज्यादा हैं।
पहले दलित समुदाय के पात्रों को लेते हैं।
रग्घू : नौकर (विनम्र पंचारिया) की फिल्म में इंट्री एक श्रमजीवी के रूप में होती है। वह अपने गांव के दबंग और रसूखदार सवर्ण रामचरण (सुधीर पांडेय) के यहां नौकर का काम करता है। नीची जाति से ताल्‍लुक रखने के कारण मालिक और उसके लड़के गाहे-बगाहे उलाहना के साथ उसे प्रताड़ित भी करते रहते हैं। 10-12 साल का बच्चा प्रतिकार में क्या कर सकता है? हाल ही में एक दिलचस्प किताब के बारे में पढ़ा, ‘वेपन ऑव द वीक’, जिसमें कमजोर और असंगठित क्षेत्र के लोगों को प्रतिरोध के दिलचस्प तरीकों का उल्लेख था। जैसे मजदूर पर आप बहुत निगरानी करेंगे तो वह क्या करेगा, वह काम के दौरान फांकी मारेगा, कम से कम अपने जानते ऐसे तरीकों से आपका नुकसान करके अपने अहं को तुष्ट करेगा। रग्घू ने भी बदले का एक ऐसा ही तरीका ईजाद कर रखा है। जैसे पंडित जगन्नाथ (पीयूष मिश्रा) को शर्बत देने से पहले वह उसमें थोड़ा पेशाब करना नहीं भूलता, रामचरण के यहां खाना जान-बूझकर वह थोड़ा खराब बनाता है ताकि ज्यादा से ज्यादा बच जाए और वह अपने चाचा और विक्षिप्त पिता का पेट पाल सके। इस तरह जब वह जूठन और बचे हुए खाने के साथ अपनी दलित बस्ती में लौटता है, तो उसकी जातिगत अस्मिता सामने आती है। कल्कि उसके श्रम और यातना का साझीदार बनती है। एक दृश्य है, जहां रामचरण और उसके पांचों बेटे एक पंगत में बैठ कर खा रहे हैं और रग्घू की जगह पर कल्कि बैठी है। कल्कि उस घर में एक दास को ‘रिप्लेस’ करती है। कल्कि को बचाने के अपने बालसुलभ प्रयास में ही रग्घू मारा जाता है। जो स्वयं अपनी यातना से मुक्ति का मार्ग नहीं तलाश सका हो, वह कैसे दूसरे की मुक्ति का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। इसलिए रग्घू की उस कोशिश को बालसुलभ चेष्टा कह रहा हूं। इस लिहाज से देखें तो रग्घू फिल्म के तीन कोणों को जोड़नेवाले महत्‍वपूर्ण संयोजक की भूमिका में है।
रग्घू का पागल बाप कचरा (मुकेश भट्ट) के पागलपन का हम अनुमान ही कर सकते हैं। उसकी वर्गगत और जातिगत अवस्था को देखकर यह कयास लगाया जा सकता है कि ताउम्र श्रम करने के बाद भी वह अपने बच्चे को गुलामी से बचा नहीं सका। लेकिन इन बाप-बेटे की तुलना में दलित तबके का सच्चा प्रतिनिधित्व रग्घू का चाचा (आदित्य श्रीवास्तव) करता है। रग्घू का चाचा अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो रहे अवसरवादी दलित तबके का नुमाइंदा जान पड़ता है। वह अपने भतीजे रग्घू की हत्या का इस्तेमाल जिस ढंग से जातीय एकजुटता के लिए करता है, उससे पिछले तीन मौकों पर उसकी नजरंदाज की जा चुकी मानीखेज मौजूदगी की ओर फिर से हमारा ध्यान जाता है। पहली बार वह लौंडा नाच के दौरान फ्रेम में आता है, दूसरी बार ब्लू फिल्म देखने के दौरान वह जनता क्लास (गांव के सामाजिक व्यवहार का अपना आचारशास्त्र है, जहां वीडियो हॉल में भी एक किस्म की जातिगत आधार पर बैठने की व्यवस्था है।) से उठ कर सवर्णों के साथ बेंच में बैठने की कोशिश करता नजर आता है, तीसरी बार वह रग्घू को यह कहता नजर आता है कि ‘ऊंचे घरों में काम नहीं करना चाहिए, दिमाग खराब हो जाता है।’ और चौथे मौके पर खून का बदला खून का नारा बुलंद करते हुए अपने समाज को संगठित कर रहा होता है, जहां उसके नेतृत्व की महत्‍वाकांक्षा उभर कर आती है। रग्घू के चाचा को अवसरवादी इसलिए भी कह रहा हूं… एक ओर जहां वह अपने भतीजे की हत्या पर अपने लोगों को एकजुट करता है, वहीं कल्कि के गर्भ में पलनेवाले बच्चे के पिता के तौर पर अपने पागल भाई को प्रोजेक्ट करता है। उसके इस अवसरवादी चरित्र को आखिरी दृश्यों में जातिगत दंगों के दौरान मनीष झा स्पष्ट करते हैं, जब वह अपने गांव के लोगों के साथ सवर्णों पर आक्रमण करता है, तो गांव से हूजूम के साथ दौड़ते हुए वह सबसे आगे रहता है लेकिन लोगों पर जब दो एक गोलियां चलती है, तो वह यकायक थोड़ा पीछे की ओर भागता है ताकि उसकी जान सलामत रहे। इतना ही नहीं, बेबस कल्कि के प्रति दलित होने के नाते वह कोई सहानुभूति प्रदर्शित किये बिना लगातार बलात्कार करता है। यह इस बात की ओर भी संकेत करता है कि एक पुरुष के मुकाबिल एक स्त्री केवल एक सेक्स ऑब्जेक्ट मात्र होती है, उसके आर्थिक और जातिगत आधार या पहचान मायने नहीं रखते हैं। दलित और सवर्ण दोनों समान रूप से पितृसत्तात्मक होते हैं। स्त्री दोनों के लिए भोग्या मात्र है (कश्मीर और उत्तर पूर्व विशेषकर मणिपुर की स्त्रियां भारतीय सैनिकों को किस रूप में देखती होंगी?)। इसलिए सबाल्टर्न समूह का हिस्सा होते हुए भी स्त्रियां दलितों की तुलना में ज्यादा शोषित हैं।
मनीष झा वैचारिक और राजनीतिक तौर पर बहुत महीन वार कर गये हैं। कम से कम स्त्री और दलित विमर्शों पर हिंदी में बहसते बहुत से बुद्धिजीवियों की तुलना में वे ज्यादा सटीक हैं। इस कोण से देखें तो मातृभूमि एक पॉलिटिकल फिल्म भी लगती है। अगर मनीष झा के संदर्भ में यह दूर की लायी गयी कौड़ी जान पड़ रही हो, तो याद दिला दूं कि ‘अनवर’ उन्होंने ही बनायी थी और उनके सरनेम से अगर सवर्ण मानसिकता की बू आये तो यह भी बताता चलूं कि फिल्म में वह ब्राह्मण के साथ ज्यादा कठोरता से पेश आये हैं। पंडित जगन्नाथ (पीयूष मिश्रा) को वे न सिर्फ दलित का पेशाब पीते दिखलाते हैं, बल्कि नैतिक तौर पर एक ऐसे अनैतिक जीव के तौर पर प्रस्तावित करते हैं, जिसका शुचिता, शुद्धता, नैतिकता और पवित्रता आदि विचारों से कोई नाता नहीं है। पंडित जगन्नाथ समलैंगिक है। उसके पोथी-पतरे झूठे हैं। कुल मिलाकर कहें तो टके की खातिर अपनी जाति, धर्म सबको बेचने वाली जमात के तौर पर मनीष ब्राह्मण वर्ग को चित्रित करते हैं। किरदारों के लिए जो स्पेस मनीष झा ने क्रिएट किया है, उसके मूल में जो निःसंगता है, वह ब्रेख्तीय अलगाव की याद दिलाता है। यही कारण है कि कल्कि (ट्यूलिप जोशी) की केंद्रीयता के बावजूद पीयूष मिश्रा, पंकज झा, आदित्य श्रीवास्तव ने यादगार अभिनय किया है। राकेश की भूमिका में पंकज झा ने जो सेक्सुअली फ्रस्ट्रेटेड और शार्ट टेंपर्ड युवक की भूमिका निभायी है, उसकी दूसरी मिसाल मुश्किल है। पीयूष मिश्रा पावरफुल परफार्मेंस के बावजूद अभिनय का सेहरा पंकज झा के सिर पर। पंकज झा को अगर कोई मात दे सका है, तो आदित्य श्रीवास्तव, वह भी बस एक दृश्य में। यह वह दृश्य है, जब कल्कि के गर्भवती होने की खबर सुन कर उसके संभावित पिता के तौर पर खुद को प्रस्तावित करता हुआ, वह ऐतिहासिक वाक्य कहता है कि “अरे इतने साल के शोषण के बाद भी मर्दानगी नहीं खोई है रे…” इस पैंतालिस सेकेंड के दृश्य में पैंतीस सेकेंड का नाच है। यह अद्भुत नाच है। ढोल, डफली और झलकुट्टन के मेल से जिस लोकसंगीत को पर्दे पर साकार किया गया है, उसकी लय पर थिरकते आदित्य श्रीवास्तव के हाथ-पैर की गति, देह की भंगिमा नृत्य के उस विरल रूप को मूर्त करते हैं, जिसमें संगीत की लय और देह की लय एकाकार हो जाती है। खुशी और उल्लास की आदिम आकांक्षा के अवशेष आदित्य श्रीवास्तव के थिरकन में आप देख सकते हैं। मैंने आदिम काल के भित्ति चित्र नहीं देखे हैं, लेकिन मुझे लगता है कि खुशी के क्षणों में जब पहले-पहल मृत पशु के चमड़े से बने किसी वाद्य यन्त्र से कोई लयबद्ध ध्वनि फूटी होगी तो आदिम मनुष्य के आरंभिक हस्त चालन की मुद्राएं कुछ ऐसी ही रहीं होंगी।
फिल्म का एक और महत्वपूर्ण पहलू है : हिंदू समाज के धार्मिक-पौराणिक मिथकों के जरिये आधुनिक हिंदू समाज के छद्म का उद्घाटन। फिल्म के बेहद शुरुआती दृश्य में जो व्यक्ति अपनी नवजात बालिका को दूध में डुबोकर मारता है, उसका नाम गोपाल (‘ले गोपाल बीड़ी पी ले’) है। मीराबाई ने भी तारणहार के तौर पर कृष्ण के गिरधर के साथ गोपाल वाले रूप को याद किया है (मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोय)। गोपाल का एक अर्थ इंद्रियों का रक्षक भी होता है। लेकिन इंद्रिय की रक्षा तो दूर, गोपाल स्वयं कंस की भांति नवजात शिशु की हत्या में संलग्न है। रामचरण और उसके पांचों बेटे और पंडित जगन्नाथ के नामों के साथ उनके आचरण को रखें, तो हिंदू समाज में नाम के उलट आचरण की प्रवृत्ति को मनीष झा कटघरे में खड़ा करते नजर आते हैं। पुराणों के अनुसार कलयुग में होनेवाले विष्णु के दसवें अवतार का नाम कल्कि होगा। कल्कि की दुर्गति जहां एक ओर किसी अवतार की कल्पना का निषेध करती है, वहीं दूसरी ओर अपना ईश्वर आप बनने की संघर्षशीलता को स्थापित भी करती है। कल्कि और गाय कई मौकों पर एक दूसरे के पर्याय जान पड़ते हैं। भारतीय लड़कियों के विवाह के संदर्भ में एक मुहावरा चलता है कि ‘लड़कियां तो गाय होती हैं, चाहे ब्राह्मण को दान दे दो या कसाई को बेच दो।’ जब कल्कि को भी गायों की तरह गोशाला में जंजीर से बांध दिया जाता है, तब वह भी उन गायों में से एक में तब्दील हो जाती है। भारतीय सभ्यता-संस्कृति में गाय पूज्य और पवित्र मानी गयी है, स्त्रियां भी (यत्र नार्यस्तु पूज्यते रमंते तत्र देवता), लेकिन दोनों का हश्र एक ही है।
एक दृश्य है जिसमें कल्कि का पिता प्रताप कल्कि की चिट्ठी पढ़कर वापस आया है और एक लाख रुपया फिर से गिन रहा है। वहां रामचरण कहता है कि वह आपकी एक गाय हम भिजवा देंगे, तब प्रताप कहता है ‘कि न जी, अब गाय की कोई जरूरत नहीं है, हम तो सब कुछ बेच कर शहर शिफ्ट कर गये हैं।’ यह गांवों के शहरों में शिफ्ट होने भर की ओर इंगित नहीं करता है बल्कि अर्थव्यवस्था में आये बदलाव के साथ मनुष्य की प्रकृति और प्रवृत्ति में आये बदलाव को भी लक्ष्य करता है। फिल्म के अंत में स्क्रीन पर उभरने वाली इस सूचना पर गौर फरमाएं कि ‘स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय के अनुसार पुत्र लोभ के कारण पिछले सौ वर्षों में 350 लाख बालिकाएं भारत की जनसंख्या से लापता हैं।’ जिनको यह संख्या अतिरंजित लगती है, उन्हें यह पिछले दस साल मे भारतीय किसानों के द्वारा की गयी आत्महत्या के आंकड़े भी अतिरंजित लग सकते हैं, नक्सल के नाम पर मारे गये आदिवासियों की संख्या भी संदिग्ध लग सकती है और फिल्म तो अतिरंजित लगेगी ही।
भारतीय इतिहास के पिछले सौ साल को पूंजीवादी विकास के साथ सामंती अवशेषों के बचे रहने और पुर्नजीवित होने के दौर के रूप में भी देखा जा सकता है। यह पूंजीवादी विकास के नारों के स्त्रीविरोधी चरित्र को भी एक स्तर पर उजागर करनेवाली फिल्म है। फिल्म के शुरुआती दृश्य से उपजी तनाव की तान फिल्म के आखिरी दृश्य में जाकर टूटती है। जब फिल्म के अंत में कल्कि के चेहरे पर प्रसव की जद्दोजहद से उपजी पसीने की बूंदों तले नवजात बच्ची का रक्ताभ रुदन सुनाई देता है और उसकी नन्हीं रक्तिम मुट्ठी को कल्कि जब अपनी हथेलियों में समेटती हुई दिपदिपाती-झिपझिपाती पलकों और स्मित हास के साथ अपने पहलू में लेती है, वह दृश्य अदम्य संघर्षशीलता और उद्दाम जीजिविषा का एक बेनजीर दृश्य जान पड़ता है। विष्णु के दसवें अवतार के तौर पर एक स्त्री को परिकल्पित करने का जो काम मनीष झा ने किया है, उसकी जितनी सराहना की जाए, कम है।
इस फिल्म की रिव्यू लिखते हुए सोमा वाधवा ने एक बड़े मार्के की बात 4 मार्च 2004 के अंग्रेजी आउटलुक में लिखे अपने लेख में नोटिस की थी, जो शायद एक पुरुष होने के नाते मैं नहीं महसूस कर सका था। इस पूरी फिल्म को देखते समय मेरे जेहन में अमानवीय शब्द लगातार बना रहा, लेकिन कभी भी उसकी जगह पाशविक लिखने का खयाल नहीं आया। दूसरा प्रसंग इस फिल्म की थीम से जुड़ा है। लगभग अब तक सारे रिव्यूज में इसे नवजात और भ्रूण में स्त्री शिशुओं की हत्या और उनके घटते लिंगानुपात से जोड़कर ही देखा गया है, जबकि कमला भसीन इसे बुनियादी मानवाधिकार से जुड़ा मानती हैं। इन दो नुक्तों की ओर मेरा ध्यान नहीं गया था, अपनी तमाम संवेदनशीलता के बावजूद शायद पुरुष होने मात्र से इन दो बातों की ओर मेरा ध्यान नहीं जा सका था। बहरहाल, सोमा वाधवा की वह बात यह थी कि “Without women men are not human. This metamorphosis of the male into animal if the world were to become womanless is the theme of Matrubhoomi : A nation without women.” Will Durant ने अपनी किताब ‘The Greatest Mind and Ideas of All Time’ में लिखा है कि “It was women who gave man agriculture and the home; she domesticated man as she domesticated the sheep and pig.Man is woman’s last domestic animal, and perhaps he is the last creature that will be civilized by woman.” विल ड्यूरां के उपरोक्त विचारों के बाद क्या कल्कि अवतार के रूप में स्त्री की परिकल्पना बेमानी लगती है!
इस फिल्म को पहली दफा 2006 में देखा था। देखकर पहली अनुभूति किसी गहरे आघात की और दूसरी शायद शर्म की हुई थी। शर्म शायद इसलिए कि जीवन में पहली बार पुरुष होने के नाते भीतर से अपमानित महसूस किया था। मालूम नहीं यह संबंधों के आवरण से इतर पहली बार स्त्री को एक निपट स्त्री के रूप में देखने के एहसास के कारण था या एक स्त्री के बरक्स एक निपट पुरुष के मायने समझ में आने के कारण। बिना किसी लिहाज के पहली बार एक सेक्स ऑब्जेक्ट के तौर पर, एक कमॉडिटी, एक प्रोडक्ट के तौर पर स्त्री को देखना, एक असहज कर देने वाला क्षण था। यह क्षण गड़ा हुआ था, कहीं बेहद गहरे। आज शायद इस रिव्यू के मार्फत उसी क्षण से मुक्त हो रहा हूं।
(राहुल सिंह। युवा आलोचक, कहानीकार। हिंदी की कई साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित लेखन। इन दिनों एएस कॉलेज, देवघर में हिंदी पढ़ाते हैं। राहुल से alochakrahul@gmail.com पर संपर्क करें।)