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Sunday, 13 January 2013

अंग्रेज़ी का संस्कृत स्रोत




                            अंग्रेज़ी का संस्कृत स्रोत
डॉ. मधुसूदन उवाच
http://www.pravakta.com/sanskrit-source-of-english?utm_source=feedburner&utm_medium=email&utm_campaign=Feed%3A+pravakta+%28PRAVAKTA+%E0%A5%A4+%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A4%95%E0%A5%8D%E2%80%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE%29
 
It is fact that many people do not know that just after independence Jawahar Lal Nehru ordered to stop teaching Sanskrit in various colleges and universities. Due to his order Sanskrit was stopped teaching in more than 400 colleges
This fact is mentioned in one of the following videos.
A Dharma Video Presentation With Sri Dharma Pravartaka Acharya - dharmacentral@yahoo.com;
What does it actually mean to find the Highest Reality? Finding the Highest Reality is not an intellectual exercise designed merely to satisfy our curiosity or feed our ego even further. Rather, it is a profoundly transformative spiritual experience that leaves one unalterably and deeply changed forever. In what is without doubt Sri Dharma Pravartaka Acharyaji's most powerful and inspiring Dharma talk to date, this authentic spiritual master reveals the exact nature of the Divine as revealed in the ancient Vedic literature, and what is required of us in order to know that Divine intimately. This talk will radically transform both your understanding of God, as well as your very approach to reality itself!
WATCH THE FULL VIDEO HERE:

http://www.youtube.com/watch?v=Y164ypTI5bQ
"In Defense of Reality" - Powerful  Video
http://www.youtube.com/watch?v=8BVjT8ChRk0
Nehru was pro- Muslim; he did not like anything associated with Hindus and wanted to promote Urdu and English. Many people wanted to switch over to Hindi after independence, but he extended to continue English for 15 years, then after Hindi will become national language if all states of Bhaarat pass a resolution that they want Hindi as national language. This condition can never be fulfilled. Instead the rule should have been if the population of the states who want Hindi as national language is 75% then Hindi would be declared as national language. Then both Hindi and Sanskrit would have been prevalent in Bhaarat.
 
 
The government of India may declare Sanskrit as dead language if less than 1 crore of people declare that they do not know Sanskrit in the census.
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और मैं Cause से जुड गया। पता नहीं कौन इस जनगणना के परिच्छेद के पीछे है?
फिर मनमोहन सिंह जी भाषण में जो बोले, उसका उपरि अनुरोध से ताल मेल कैसे बैठाएं? और संस्कृत के प्रचार-प्रसारार्थ कार्यवाही करने के लिए शासन को ६५ वर्षों से कौन रोक रहा था?
पर मैंने निम्न लेख जो, मेरी तीन एक शालाओ एवं उत्सवों पर, हापुड़, हिमाचल प्र. एवं गाज़ियाबाद इत्यादि स्थानों पर ३ माह पहले, प्रस्तुतियां हुयी थी, उस के आधार पर बनाया था। शाला के बाल बालिकाओं को भी समझ में आए ऐसे सरल शब्दों से प्रारम्भ किया है। फिर कुछ कठिन शब्दों को अन्त की सूचि में प्रस्तुत किया है। केवल अंतिम भाग ही कुछ कठिन हो सकता है। आगे, और संस्कृत धातुओं से व्युत्पादित सामग्री प्रस्तुत करने का सोचा जा सकता है।
युवाओं के मन-मस्तिष्क में, राष्ट्र की अस्मिता यदि जाग गयी, तो युवा वर्ग कठोर परिश्रम करने के लिए कटिबद्ध हो जाता है, यह अनुभव मुझे बार बार हुआ है। यही उद्देश्य है।
हिंदी/संस्कृत-अंग्रेज़ी प्रवाह
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अब कुछ सरल शब्दों का अनुसंधान स्रोत ढूंढते हैं।
पहला सभी के परिचय का, और बोल चाल का अंग्रेज़ी शब्द है "NAME"। आप, अब सोचिए कि हमारे हिन्दी-संस्कृत के एक सरलतम शब्द "नाम" से यह मिलता जुलता है या नहीं?
इसी से प्रारंभ करता हूं। यही नाम अंग्रेज़ी में पहुंचकर नेम (Name) बन गया है। कुछ और ढूंढ ने का प्रयास किया तो पता लगा कि इस Name का ही स्पेलिंग, कुछ सदियों पहले Nahm (ना:) हुआ करता था। और यह नाःम की आप नामः इस शुद्ध संस्कृत से तुलना कर सकते हैं। यह स्पेल्लिंग मैं ने किसी पुस्तक या शोध-लेख में पढा हुआ स्मरण होता है। अब आप के ध्यानमें आया होगा, शुद्ध संस्कृत का नामः (Namah), पहले नाःम (Nahm) बना, और बाद में नेम (Nem उच्चारण ) Name बना। शायद और भी कुछ बदलाव की मध्यस्थ कडियों से गया होने का संभव नकारा नहीं जा सकता, पर मुझे यही जचता है।
फिर Nomination, Anonyamous, Nominally इत्यादि इसी Name से निकले हैं।
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दूसरा सभी का परिचित शब्द "DOOR" लेते हैं। इस Door के लिए : हिंदी-संस्कृत शब्द है "द्वार" ( अर्थात दरवाज़ा)। अब अंग्रेज़ी में यही द्वार –>डोअर कैसे बदला होगा, इसका आप अनुमान करें। मेरा अनुमान है, यह डोअर उच्चारण बनने का कारण, अंग्रेज़ी में द जैसा सौम्य उच्चार नहीं है। मेरे मधुसूदन इस नाम को भी अमरिकन "मढुसूडन" ऐसे उच्चारित करते हैं। तो द के स्थान पर ड का उच्चार उन के लिए सहज है। अनुमानतः निम्न बीच की कडियों से यह द्वार रुपांतरित हुआ होगा।
द्वार से ड्वार बना होगा, फिर शायद ड्वार से ड्वॉर बना होगा, और बाद में ड्वॉर से –> ड्वोर और अंत में ड्वोर से डोअर (जो आज कल) प्रयुक्त होता है।
वैसे गौरव की बात है कि हमारी देवनागरी में मूल शब्द का उच्चारण बदलने की सम्भावना न्य़ून मात्र है। इस लिए जो उच्चारण वैदिक काल में रहे होंगे, वे लगभग आज भी वैसे ही उच्चरित होते हैं। कुछ ऋ, ज्ञ, कृ, क्ष ऐसे कतिपय अक्षर है, जिन के विषय में कुछ संदिग्धता संभव है। पर यह हानि हमारी गुरूकुल प्रणाली के लोप होने के कारण ही मानता हूँ।
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COW: तीसरा अपना "गौ" शब्द लेते हैं। उच्चारण प्रक्रिया को समझने में सरलता हो, इसलिए यह जानने की आवश्यकता है, कि, उच्चारण की दष्टिसे क और ग दोनोंका उचारण मुख-विवर के कंठ के निकट के भागों से ही आता है। यही गौ, हिन्दी में गऊ भी उच्चरित होता है। यही गऊ का गाउ हुआ होगा, और गाउ से काऊ जो आज कल COW -स्पेल्लिंग से लिखा जाता है।
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MEDIUM:चौथा लेते है माध्यम जैसे प्रचार माध्यम यही माध्यम अंग्रेज़ी में Medium( मिडीयम) बना हुआ है। इस मिडियम का बहुवचन मिडीया है। तो आज कल बहुत चर्चा में मिडीया, मिडीया हम करते रहते हैं। उसके बदले हमारा शुद्ध माध्यम शब्द का प्रयोग किया जा सकता है।
एक बडा विचित्र अवलोकन है। सोचिए हमारे माध्यम शब्द से अंग्रेज़ी में पहुंचा मिडियम जिसका बहुवचन है मिडिया।
तो अचरज इस बात का है, हमसे उधार लेकर शब्द बना है मिडिया। उस मिडिया शब्द का प्रयोग हिन्दी में करने में कौनसी बुद्धिमानी समझी जाएगी? पर हम ठहरे बुद्धिभ्रमित !
एक और विशेष बात ध्यान में आयी है। कुछ अंग्रेज़ी के शब्दोंको (Phonetically)ध्वन्यानुसारी रीति से पढकर देखिए, तो उनके मूल जानने में सरलता होगी। एकाध उदाहरण से यह बिंदू विषद करता हूं।
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अंग्रेज़ी में प्रयुक्त होता एक शब्द CENTRE है। इसका अमरिका में प्रयुक्त स्पेलिंग Center है। उच्चारण सेंटर ही है।
इसका इंग्लिश स्पेल्लिंग Centre होता है। अब C को स भी पढा जाता है, जैसे Cycle सायकल पढते हैं, और क भी जैसे Cat कॅट पढाता है। जब हम उसका Centre के C का उच्चार क करेंगे, तो Centre को केंट्र ही पढेंगे। अब सोचिए कि यह Centre का केंट्र उच्चार हमारे "केंद्र" के निकट है या नहीं?
हमारे निकट एक गांव में एक नाट्य शाला का नाम Centrum सेन्ट्रम ही है। यह सेन्ट्रम हमारे केंद्रम जैसे शुद्ध संस्कृत शब्द से बहुत मिलता है। आपने Central अर्थात सेन्ट्रल सुना होगा। उसे केन्द्रल समझा जा सकता है।
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कुछ मात्रा में निम्न सूचि कठिन है, पर जिन बंधुओं को संस्कृत व्याकरण और धातुओं का ज्ञान है, वे विचार कर सकते हैं।
मैं केवल छोटी निम्न सूची देता हूं। एक बौद्धिक व्यायाम की दृष्टिसे इस सूचि के शब्दों का संस्कृत मूल ढूंढनेका प्रयास करें। ऐसा प्रयास, आप को आनन्द ही देगा। टिप्पणियों में आप अपने उत्तर लिख सकते हैं। कुछ उत्तर सरल है, कुछ कठिन। मूल ढूंढिए–>
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Character का, Heart का, Day का, Night का, Hour का, We का, You का, They का, Mother का, Father का, Daughter का, Son का, Widow का, Widower का, Brother का, Uncle का, Know का, Stop का, Equal का, Axis का, Dentist का, Generate का, Same का, Octagon का, Decagon का, November का, September का, October का, December का, Calendar का, Man का, Sewing का, Create का, Ignite का, Station का, attic का, Fan का, Decimal का, Navy या Naval का, Nose का, Signal का, Signature का, मूल क्या रहा होगा?
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बहुत सारे शब्दों का अनुसन्धान किया जा सकता है। पर इस लघु लेख का अंतिम (७वाँ) भाग छोडकर , सरल समझ में आए ऐसे ही शब्द चुनकर लिखने का प्रयास किया है।
ऐसी विश्व-प्रभावी भाषा को "मृत भाषा" घोषित करने का प्रयास कर, एक सर्व हितकारी, सर्व समन्वयी, विचारधारा को क्षीण करने का प्रयास किन बलों के संकेत पर किया जा रहा है?
·         २६ अप्रैल २००७ को, भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम जी ग्रीस देश गए थे। वहाँ आप के स्वागत समारम्भ में ग्रीस के राष्ट्रपति श्री कार्लोस पम्पाडॅलिस ने "राष्ट्रपति महाभाग। सुस्वागतम् यवन देशे" ऐसे किया।
जुलाई २००७ में, अमरिकी सेनेट का सत्र प्रारम्भ संस्कृत वैदिक प्रार्थना से हुआ। गत २१८ वर्षों के अमरिका के इतिहास में ऐसी घटना पहली बार ही घटी। ॐ शान्तिः,शान्तिः, शान्तिः के उद्गारों से प्रार्थना का अन्त हुआ, तो सेनेट में शान्ति छायी रही । पश्चात तालियों की गड गडाहट से सभागार गूँज उठा।
Anil Gupta
ऐसा ही एक शब्द मेरे विचार में वेलान्तायीं है. जो हमारे वसंती शब्द से बना लगता है. वसंत ऋतू में वसंत उत्सव मनाया जाता है. इसके साथ ये कहानी भी जुडी है की जब शिवजी का तीसरा नेत्र खुलने पर उसके सामने आये कामदेव भस्म ओ गए तो सब देवी देवताओं ने शिवजी से कहा की कामदेव के न रहने से साड़ी स्रष्टि रुक जाएगी तो शिवजी ने कहा की अब वसंत ऋतू में साडी प्रकृति में कामदेव का वास होगा.वसंत ऋतू में साडी प्रकृति में श्रंगारिक भाव व्याप्त रहता है. इससे प्रभावित होकर संत वेलान्तायीं की कहानी बना दी गयी और पूरी दुनिया में वेलान्तायीं डे मनाया जाने लगा.वास्तव में हमें वेलान्तायीं डे का विरोध करने की जगह वसंतोत्सव पर जोर देना चाहिए.
साहित्य के प्रधान भाषा रूप में यह हर्ष वर्धन के काल तक तो था हीं उसके बाद शायद साहित्य में भी इसका महत्त्व कम होता गया. संस्कृत जैसी समृद्ध भाषा का इस तरह जन मानस की निगाह से दूर होना और फिर साहित्य से भी पलायन मेरी समझ के परे है.कहीं ऐसा तो नहीं है की बौद्ध या जैन धर्म के विकास के साथ ही संस्कृत केवल सनातनी पंडितों की भाषा होकर रह गयी.ऐसा भी हो सकता है की उस समय के तथाकथित प्रबुद्ध लोगों ने एक सोची समझी चाल के अंतर्गत इसे विशिष्ट वर्ग की भाषा का रूप दे दियाऔर यही इसकी अवनति का कारण बना.ऐसे ये सब मेरे अनुमान हीं हैं,अतः गलत भी होसकते हैं.
॥अमृत भाषा संस्कृत॥- डॉ. मधुसूदन उवाच
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() सुस्वागतम् यवन देशे"
२६ अप्रैल २००७ को भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम जी ग्रीस देश गए थे। वहाँ आप के स्वागत समारम्भ में ग्रीस के राष्ट्रपति श्री कार्लोस पम्पाडॅलिस ने
"राष्ट्रपति महाभाग। सुस्वागतम् यवन देशे"
इस संस्कृत वाक्य से अपने भाषण का प्रारंभ कर स्वागत किया था । अपने भाषण में उन्हों ने संस्कृत यह प्राचीन भारतीय भाषा है, और उसका सम्बंध ग्रीक भाषा से भी है, ऐसा कहा था।
()ॐ शान्तिः, शान्तिः, शान्तिः
और, उसी वर्ष, जुलाई २००७ में, अमरिकी सेनेट का सत्र प्रारम्भ संस्कृत में वैदिक प्रार्थना, से हुआ था। गत २१८ वर्षों के अमरिका के इतिहास में ऐसी घटना पहली बार ही घटी थी । ॐ शान्तिः, शान्तिः, शान्तिः के उद्गारों से प्रार्थना का अन्त हुआ , तो सेनेट में शान्ति छायी रही ; पश्चात् तालियों की गड़गड़ाहट से सभागार गूँज उठा।
()वैदिक गणित
कुछ वर्ष पहले, एक अमरिकी सज्जन संस्कृत में छपी, वैदिक गणित (मॅथेमॅटिक्स) की पुस्तक के कुछ अंशो के अर्थ के विषय में चर्चा करने मुझ से समय माँगने आए थे। परामर्श के लिए उचित पारिश्रमिक शुल्क भी देना चाहते थे।
()शुद्ध देवनागरी
मेरी युनिवर्सीटी की फॅकल्टी के डीन, डॉ. फ़ॉन्टेरा जिन्होंने अहमदाबाद की मिलों के प्रबंधन पर ,पी. एच. डी. का शोध निबंध लिखा था, उस शोध के समय भारत भी रहे थे; वे अपने ऑफिस के प्रवेश द्वार पर शुद्ध देवनागरी में भी अपनी नाम पट्टिका लगाते थे। मेरा साक्षात्कार कर नियुक्ति करवाने में भी उनका योगदान था।
() जन्म सिद्ध, सर्वाधिकार
उपरि लिखित सच्चाइयां, आप को प्रमाणित करती हैं, कि, सारे संसार में, संस्कृत को उस के जानकार बडे आदर से देखते हैं। उसे जानने में गौरव का अनुभव करते हैं। जहाँ सारे संसार में संस्कृत को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है, उस संस्कृत पर जिस देश का जन्म सिद्ध, परम्परा गत सर्वाधिकार है, या यूं कहे, कि एकाधिकार (Monopoly) ही है , उस भारत के लक्षण कुछ निराशा जनक ही प्रतीत होते हैं। कहीं मैं गलती तो नहीं कर रहा? नहीं नहीं। ऐसा अन्य विषयों में भी हुआ है।
()योगदान संस्कृत
* भारत को वास्तव में अपनी सर्वोत्कृष्ट भाषा देववाणी संस्कृत पर गर्व होना चाहिए, गौरव होना चाहिए।
संसार में १८ प्रमुख भाषा परिवार है, और सभी भाषा परिवारों में सबसे आगे यह भारोपिय भाषा परिवार अति समृद्ध और अति प्रगत माना जाता है। इस भाषा परिवार को ऐसा उन्नततम स्थान प्राप्त कराने में भी, और सारी भाषाओं को सिंचित कर पल्लवित और पुष्पित करने में भी योगदान संस्कृत का ही मानता हूँ। और भी मानते हैं।
()संस्कृत के साथ जुडने की होड
प्राच्यविदों में अपनी अपनी भाषा को संस्कृत के साथ जोडने की एक होड सी लगी थी।
अलग अलग प्राच्यविदों ने कभी इस भाषा परिवार को, जिस में संस्कृत है; कभी 'इन्डो-युरोपियन', कभी 'इन्डो-जर्मन', कभी 'इन्डो-आर्यन', तो कभी 'इन्डो-इरानियन' भाषा परिवार के नाम से उल्लेखित किया। पर हर नाम में 'इन्डो' स्थायी रूप से रहा। क्यों? कारण था हर कोई गुट अपनी पहचान संस्कृत के साथ करने में गौरव मानता था।
पर हमें जिन्हे संस्कृत की समूचि धरोहर प्राप्त है, उन्हें, संस्कृत भाषा पर कितना गर्व-गौरव है?
उसका प्रचार प्रसार करने में, और उसका संसार में, डंका बजाने में कितनी रूचि है? और नहीं, तो बताइए क्यों नहीं?
() संस्कृतिक दूत
हम चाहते तो सहस्रो संस्कृत पण्डितों को प्रोत्साहित कर सारे संसार में भेजते। वे वहां पर हमारे संस्कृतिक दूत के भांति भी काम करते, और हमारे लिए संसार भर में सद्‌ भावना ही फैलाते। हमें व्याख्यानों के लिए यदि, आमंत्रित किया जाता है, तो वह गीता के किसी विषय पर, हिन्दु दर्शन पर, चार पुरूषार्थों पर, परिवार की भारतीय प्रणाली पर इत्यादि इत्यादि ….ऐसे विषयों पर बुलाया जाता है। कोई हमें सेक्युलरिस्म पर व्याख्यान देने नहीं बुलाता।
()विल ड्युरांट
अमरिकन इतिहासकार विल ड्युरांट, संस्कृत और भारत के विषय में क्या कहता है ?
"भारत हमारे वंशगत, प्रजाति की मातृ भूमि थी, और संस्कृत युरपकी भाषाओं की जननी: वह हमारे दर्शन शास्त्र की जन्मदात्री थी; अरबों द्वारा हमें प्राप्त हुए गणित (के ज्ञान) की माता, बुद्ध द्वारा प्रसारित, इसाइ संप्रदाय के आदर्शों की भी जननी वही है। ग्राम पंचायत की परंपरा से प्राप्त, स्वशासन और जनतंत्र की जननी भी, भारत ही है। भारत माँ अनेकविध परंपराओं से हम सभी की माँ ही है।"
(१०)विल्यम जोन्स
सर विल्यम जोन्स (ब्रिटीश प्राच्यवेत्ता ) क्या कहता है ?
"संस्कृत भाषा जो कुछ भी उसकी प्राचीनता हो, अद्भुत गठन (संरचना ) वाली,
युनानी(ग्रीक) से अधिक परिपूर्ण, लातिनी(लॅटीन) से अधिक शब्द-समृद्ध, और (लातिनी और युनानी) दोनों से अधिक सूक्ष्मता से, परिष्कृत (साफ ) की गई भाषा है।"
सारे संस्कृतज्ञ यदि उद्धरित किए जाएं, तो पन्ने के पन्ने नहीं एक छोटीसी पुस्तक भर जाएं।
(११)संस्कृत को मृत भाषा नहीं "अमृत भाषा"
प्रत्येक निर्णय का प्रभाव-क्षेत्र और प्रभाव की काल-परिधि अलग अलग होती है। कुछ निर्णय देश को कुछ समय के लिए ही, प्रभावित करते हैं। कुछ निर्णय सारे राष्ट्र को, लम्बे काल तक प्रभावित करते ही रहते हैं।
इस लिए हरेक निर्णय समान महत्वका नहीं होता।
पर संस्कृत को मृत भाषा घोषित करना किसी भी दृष्टिसे बहुत गम्भीर और दीर्घ काल तक विपरित प्रभाव पैदा करने वाला निर्णय है। इसे, बन्दर के हाथ में आरी दे कर या दिया सलाइ थमा कर उत्तेजित करने जैसा निर्णय मानता हूं।
ऐसे निर्णय का फल हमारी बाद की पीढियों को अननुमानित काल तक भुगतना पडेगा।
कौन सी शक्तियां ऐसी संस्कृति द्रोही, संस्कृत द्रोही, ज्ञानद्रोही, राष्ट्र द्रोही, निर्णय के पीछे हो सकती है ?
सोचिए।
सोचिए।
जी हां आपका अनुमान सही है।
अतिसुन्दर मधुसुदन जी, कुछ सवाल मन में उमड़ते घुमड़ते रहते हैं कि जब आप जैसे प्रबुद्ध ज्ञानी इतनी सुंदर व्याख्या हिंदी और संस्कृत की करते हैं फिर क्यूँ भारत में उच्च पदों पर आसीन नौकरशाह और नेता हिंदी और संस्कृत के उत्थान हेतु काम नहीं कर रहे! क्यूँ विदेश में रहने वाले ज्यादातर भारतीय हिंदी/संस्कृत को हेय दृष्टि से देखते हैं!

क्या सरकार का अंग्रेजी मोह ज्यादातर भारतीयों को हकीकत से दूर रखना है ताकि वो मचाई जा रही लूट पर सवाल न उठा सकें
?
Shashi Sharma · Columbia, Maryland
The spiraling popularity of Sanskrit these days in India and worldwide clearly indicates that Indian youth want the connection with their distinctive heritage to be kept alive. Whether the pseudo-secular crowd likes it or not the fact remains that Indian culture is synonymous with Hindu culture and Sanskrit is the base for that culture. Therefore it should come as no surprise that Indian students all over India and abroad are beginning to realize the significance of Sanskrit in their personal development. That's why the push for declaring a dead language is from those who are "varna-shankar" from the fractured west mentality and will remain so. Culture and language cannot be separated. You lose a language, you lose the culture. This cynical fact is what they want to translate thinking that if you separate the language, you separate the culture, and the culture is the one which is on the target. Language is standing on the way. A long term investment for our pseudo secular intellectuals whose hearts swelled with joy when they imagined the future of India studded with potential Lenins, Macaulays.
 
धनके बलपर भारत का इसाईकरण करने में उन्हें कठिनाइ हो रही है। कारण भारत की सर्व स्पर्शी, विकेन्द्रित, बहु योगी(कर्म भक्ति इ इ ), बहु दैवी (बहुत देवी देवता वाली), बहु आयामी, बहु मार्गी, सांस्कृतिक, बहु नैष्ठिक (अनेक निष्ठाएं नदी, वृक्ष, गिरि, अरण्य, इ इ ) बहु आश्रमी, बहु पुरूषार्थी, इत्यादि बहुत सारा।
पर सारा संस्कृत के आधार पर खडा हुआ है। यदि संस्कृत मृत हो जाए, तो समाज में जानकारी कैसे, और कहांसे पहुंचेगी? इस लिए वॅटिकन चाहेगी कि सभी शास्त्रों की जड संस्कृत का ही अंत हो जाए, तो फिर मतांतरण का मार्ग प्रशस्त होगा।
और यह दबाव आज कल के बिना रीढ के शासन पर आ रहा है। ३०० मिलियन डॉलर(२००५ का आंकडा) जब मतांतरण के लिए आया है। तो उसके आधार पर कितने समाचार, स्तम्भ लेखक,मिडिया, विधायक, इ और "——" खरिदे जा सकते हैं? आंतर राष्ट्रीय कूट नीति ३ मार्गों से अधिकार जमाने का विश्लेषण करती हैं।
(
) सेना बल,
(
) धन बल
(
) सांस्कृतिक घुसपैंठ, इत्यादि
१ वाला रास्ता अब यु एन ओ के कारण पिछड गया है। २ और ३ वाला रास्ता प्रायोजित हो रहा है।
जिस संस्कृति से सबसे अधिक भय लगता है, उन्हें वह है, सनातन संस्कृति।
जो आज तक नाथी नहीं गयी है। अब आप सोच सकते हैं। क्यों?
मेरा अनुमान, कहता है, कि, हमारी सर्व समन्वयी, विशाल वटवृक्ष जैसी, परम्परा का भय। कि उन्हें पता है, कि वटवृक्ष का एक मूल काटा तो दूसरे अनेक मूल तो कटे बिना, जीवित ही हैं।
राम की निष्ठा का अंत हुआ, तो बाकी देवी देवता है।
फिर नदियां, परबत, पर्व, त्यौहार,व्रत, उत्सव।
गीता पर, रामायण पर, महाभारत पर, ६ दर्शनों पर, १८ पुराणों पर, १०८ उपनिषदों पर, चार वेदों पर, चार योगों पर, ३३ कोटि देवताओं
——
सूचि बडी लम्बी है।
यह सब एक संस्कृत मर (क्षमा मांगता हूं, लिखने के लिए) जाने से समाप्त होगा।
यही है कारण। संस्कृत के विषय को समाप्त करने के पीछे।
यह मेरी धारणा है। एक, दो खंभो पर टिकी हुयी संस्कृतियां मतांतरित होने में कठिनाइ नहीं होती।
पर बहु आयामी बहु मार्गी सनातन समन्वयी संस्कृति को निगला नहीं जा सकता। यह उसके सुधार भी कर लेती है।
धन के बल पर बेचारे कुछ तो कर पाएंगे।
बडा लम्बा हो गया, और भी पहलु है। कभी लेख ही ईश्वर कृपा से, प्रयास करुंगा।
तन मन धन सब
तेरा।
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http://www.pravakta.com/spokesman-pravda-and-provok-sanskrit-sources
dr.raguvir ji ke baad डॉ. मधुसूदन ji aise vyakti hain jinke paas shabad rachna kaa gyan hai. dr. raguvir ne sanskrit par addaarit ek lakh se adhik hindi ke shavad banye the kintu nehru hindu aur hindi bhasa virodhi tha aur use ne un shabdo ko nahi apnaaya, bulke hindi mein urdu shabodo ko protshaan diyaa. Lagta hain डॉ. मधुसूदन ji shudh hindi kaa nirmaan karege aur sanskrit aur hindi kaa prachaar karege
साहित्य के प्रधान भाषा रूप में संस्कृत हर्ष वर्धन के काल तक तो था हीं उसके बाद शायद साहित्य में भी इसका महत्त्व कम होता गया. संस्कृत जैसी समृद्ध भाषा का इस तरह जन मानस की निगाह से दूर होना और फिर साहित्य से भी पलायन मेरी समझ के परे है.कहीं ऐसा तो नहीं है की बौद्ध या जैन धर्म के विकास के साथ ही संस्कृत केवल सनातनी पंडितों की भाषा होकर रह गयी.ऐसा भी हो सकता है की उस समय के तथाकथित प्रबुद्ध लोगों ने एक सोची समझी चाल के अंतर्गत इसे विशिष्ट वर्ग की भाषा का रूप दे दिया और यही इसकी अवनति का कारण बना.
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Shuddh Hindi
From: VIJAI JEANDANI: vijaivj@yahoo.co.in;
How Hindi is being abused by the learned people.  In these Buddhi jeevi's slavery is deep into their blood and soul. They have pledged their soul should and never going to redeem it. Such people are going to destroy our beautiful Hindi.
 
The obvious result is go to Google translator type any English word and you will get Hindi word translated for it. All it gives you is Urdu word and not Hindi. So Film industry, TV, Media and these Buddhi jeevi's are responsible for brutally murdering Hindi.
 
I tried two words today on Google clue - suraag, A cook - Bawarchi. Likewise I am sure result will be all Urdu words and none Hindi except basics like tum, aap, Main, etc.
Vijai
Cook= रसोइया, पाचक, महाराज,
Clue=
सूत्र,संकेत,पता,शोध, खोज,

शब्द बार बार उपयोग करने से रूढ होते हैं।
आज अनुदान, संसद, लोकसभा, विधान सभा, जनतंत्र, लोकशाही, चुनाव, मतदान, प्रवक्ता, ----इत्यादि रूढ हो चुके हैं।
केवल संस्कृत आपको नए नए शब्द दे सकती है।
एक कृ धातु से कृति, प्रकृति, विकृति, संस्कृति, प्रकार, विकार, संस्कार, कर्म, अकर्म, विकर्म, करना, कर्तव्य, कार्य,........ बहुत सारे हैं।

और अंग्रेज़ी में वही कृ धातु क्रि बनता है। और आपको
Cre se Create, Creation, Recreation, Procreation, Creator,
जहां जहां "CRE" आयेगा वे सारे
Cre
धतुसे, अर्थात कृ धातुसे ---अंग्रेज़ी में क्रि बन जाता है।
मेरे पास बडी लिस्ट है। किस दिन यह काम मैं करूंगा।
आपके मित्र को भेजिएगा।
मेरी ओरसे उन्हें धन्यवाद।

डॉ. मधु झवेरी
 
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From: Satish Mullick - scmullick@gmail.com;
I have always maintained that English should be offered as an optional language in schools/colleges. Those who want to learn it can take extra classes and do that.
                I have also maintained and believe that Hindi should be taught all over India. But, Hindi speaking areas must require the students to learn one other Indian language, e. g. Tamil, Telugu, etc. All of those languages have vast literature and history. This will bring different Indians closer, help in understanding and appreciating each other more. Simply expecting non-Hindi speakers to learn Hindi and ignoring their language has not worked and will not work. Indians becoming capable of communicating with each other is much more important than learning English to be able to communicate with the outside world.