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Sunday, 13 January 2013

जिस हिंदुत्व के महानायक और महात्मा गुजरात नरसंहार के अपराधी हैं, कया विवेकानंद उसके प्रतिनिधि हैं?



जिस हिंदुत्व के महानायक और महात्मा गुजरात नरसंहार के अपराधी हैं, कया विवेकानंद उसके प्रतिनिधि हैं?

पलाश विश्वास

हमारे पुरातन मित्र और उधमसिंह नगर के अपने गृहजिला के पड़ोसी वरिष्ठ पत्रकार जगमोहन फुटेला ने इधर मेरे लेखों में छूट गयी ​​गलतियों की ओर ध्या खींचा है। हमने उन्हें जो जवाब लिखा है, यह कोई निजी पत्रालाप नहीं है, क्योंकि यह अभिव्यक्ति के संकट से जुड़े हमारे कामकाज की समस्याओं पर केंद्रित है, इसलिे इसे मैं अपने आम पाठकों के साथ भी शेयर कर रहा हूं। आज देशभर में युद्धोन्मादी ​​जायनवादी धर्मान्ध राष्ट्रवाद के आवाहन के लिए स्वामी विवेकानंद की १५० वीं जयंती पर युवा उत्सव मनाया जा रहा है देशभर में। स्वामी​ ​ जी  कर्मयोग में आस्था रखते थे और प्रचलित अर्थों में आध्यात्मिक नहीं थे। वेदान्त संबंधी उनके विचारों के एकतरफा इस्तेमाल करते ​​हुए उन्हें घृणा, भेदभाव, अस्पृश्यता, भेदभाव और अस्पृश्यता पर आधारित मनुस्मृति निर्भर हिंदू राष्ट्रवाद के आइकन बतौर पेश किया​​ जाता है। जबकि उनका दर्शन मानवताबोध, समता और सामाजिक न्याय के गौतम बुद्ध की अहिंसक परंपरा में ही निहित है। वे आक्रामक ​​हिंदुत्व के समर्थक कैसे हो सकते हैं?जिस हिंदुत्व के महानायक और महात्मा गुजरात नरसंहार के अपराधी हैं, कया विवेकानंद उसके प्रतिनिधि हैं?

बंगाल में सारी दुनिया जानती है कि ममता दीदी जबरन भूमि अधिग्रहण के खिलाफ हैं। अब उन्होंने ऐलान कर दिया है कि रवींन्द्र नाथ ​​टैगोर और विवेकानंद की स्मृति में जरुरी हुआ तो जबरन भूमि अधिग्रहण किया जायेगा। जहां टैगोर मंदिर में बंदी देवता की बात करते थे और चंडालिका की मुक्ति के संग्राम को स्वर देते थे, वहीं स्वामी विवेकानंद अगला युग शूद्रों का है, का ऐलान कर चुके थे। टैगोर ने सामाजिक​ ​ यथास्थिति को तोड़ने  के लिए शूद्रों के नेतृत्व की बात करते थे। दोनों ही यह मानते थे कि यह सभ्यता श्रमजीवी  अपांक्तेय अन्त्यज अस्पृश्य लोगों की देन है। फर उनके इन विचारों को किनारे करके उन्हें हिंदुत्व के अवतार बतौर पेश करके हिंदू राष्ट्रवाद के हित  साधने का राष्ट्रव्यापी अभियान जारी है।

आम तौर पर बंगाली और बाकी देशवासी स्वामी विवेकानंद के धर्म के कैसे  अनुयायी हैं? और तो और, स्वामी विवेकानंद ने नरनारायण की सेवा के लिए स्वयं जिस प्रतिष्टान की नींव डाली, वहां भी मनुस्मृत व्यवस्था है। संगठन​​और दीक्षा मनुस्मृति के मुताबिक तो है ही, रोजमर्रे के कामकाज में कुलीनत्व, पूंजी. भेजभाव व अस्पृश्यता का बोलबाला है। दुनिया ​​जानती है कि रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद के अभ्युत्थान के पीछे एक अस्पृश्य मछुआरे की बेटी का सबसे बड़ा योगदान है। ​​लेकिन लोकमता उस रानी रासमणि को यथोचित सम्मान देना तो दूर स्वामी विवेकानंद और रामकृष्ण परमहंस के नाम से जुड़े प्रतिष्ठानों​ ​ में उनका नामोनिशान तक नहीं मिलता। जाहिर है कि वर्चस्ववाद महज समाज, धर्म, राजनीति, अर्थव्यवस्था  और संस्कृति का मामला नहीं है, यह इतिहास और भूगोल से बेदखली का भी मामला है। बाहैसियत एक शरणार्थी परिवार के अंश बतौर हम आजीवन इस समाजवास्तव को जी​ ​ ही रहे हैं। हमारे लोग न सिर्फ इतिहास और भूगोल, बल्कि मातृभाषा से भी वंचित हैं।


मैंने मित्रवर फुटेला को लिखा है, अशुद्धियों से नाराज पाठक भी कृपया यह पढ़ लें!

जो मैंने फुटेला को नहीं लिखा, वह यह है कि भूमंडलीकरण की महिमा से हम कितने असहाय हैं। मेरी पत्नी सविता को बाथरूम में गिरने से गहरी​ ​ चोटें आयी हैं। हम दोनों मधुमेह के मरीज हैं और सविता तो इनसुलिन पर जीवित है। हम अपने इलाज के लिए पहले से असमर्थ हैं। यह दशा कोई सिर्फ हमारे साथ नही ंहै। बहुसंख्यक भारतवासियों के साथ है। पर खास बात यह है कि  १९८० से प्रथम श्रेणी के अखबारों में लगातार काम करते रहने के बाद हमारी यह हालत है। हम पदेन जूनियर मोस्ट बन गये हैं बंगालल आने की वजह से। हम चूंकि बंगाल में वर्चस्ववादी व्यवस्था के बारे में पहले कुछ भी नहीं जानते थे, इसलिए कुछ करने को नहीं है। १९५ में सविता का ओपन हर्ट आपरेशन हुआ,तब हमारे अखबार और सहकर्मियों ​​के सहयोग से डा. देवी शेट्टी जैसे चिकित्सक की अनुकंपा से हम उसे मौत के मुंह  से निकालने में काबिल रहे। पिछले २१ साल से हम​
​ जहां जिस स्थिति में थे, उसी हालत में है। अब रिटायर करने पर हमें माहवार दो हजार रुपये के पेंशन पर गुजारा करना है। यह संकट मुंह ​​बांए खड़ा है। हमारे पिता आजीवन अपने लोगों के लिए लड़ते रहे और हासिल कुछ नहीं किया। अपना सबकुछ न्यौच्छावर कर गये। हम तो कुछ भी जोड़ नहीं पाये। एक बेटा है , वह भी पारिवारिक तेवर के साथ सामाजिक  कर्म और पत्रकारिता में लगा हुआ है। हमें उसकी लगातार मदद भी करनी होती है। हम एक्सक्लुसिव इसलिए नहीं किसी के लिए लिख पाते क्योंकि हमने पहले खाड़ी युद्ध के दौरान ही अमेरिका से सावधान लिखते​ ​ हुए सूचना विस्फोट के शिकार बहुजन समाज को तथ्यों से अवगत कराने की मुहिम छेड़ रखी है। क्योंकि अक्सर एक्सक्लुसिव लेखन कारपोरेट राज के खिलाफ होने के कारण कचरे के डब्बे में डाल दिया जाता है। वैसे भी कारपोरेट मीडिया में हम काली सूची में दर्ज हैं। हम लोग आनंद​ ​ स्वरुप वर्मा और पंकज बिष्ट जैसे समर्त मित्रों के साथ पिछले चार दशक से वैकल्पिक मीडिया की दिशा में प्रयास करते रहे हैं। अब अंतर्जाल केजरिये हम कम से कम अपने पाठकों को तुरंत संबोधित करा पाते हैं और जरुरी मुद्दों पर बहस भी चला सकते हैं। इससे एक बात यह भी हुई कि कुछ कारोबारी पत्र पत्रिकाओं में भी लेखन का कुछ हिस्सा छप जाता है। पर पारिश्रामिक कहीं से नहीं मिलता।​​
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​कुल मिलाकर आशय यह है कि नेट पर बने रहने का भी खर्च है। अब तक तो बिना समझौता किये अपने तेवर के साथ हम कुछ न कुछ​ ​ लिखते रहे हैं, पर हालात इतने तेजी से हमारे नियंत्रण के बाहर है कि यह सिलसिला ज्यादा दिनों तक चलेगा नहीं। विडंबना यह है कि ​​वर्चस्ववादी सत्ता के पक्षधर लोगों को हमारी जैसी कोई समस्या नहीं है। उन्हें हर तरफसे सहारा और प्रोत्साहन मिलता है, जबकि इसके ​​उलट बहुसंख्यक जनता के हितों में लेखन करते हुए भी हमारे जैसे लोगों का अल्तित्व ही संकट में है। अब आप ही विचार करें कि कैसे ​​हम विशुद्ध लेखन कर सकते हैं। अब तो यह लेखन भी किसी भी दिन बंद होने को है।​
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​हमने फुटेला को लिखा हैः


इधर घटनाक्रम इतना तेज हुआ है कि तुरंत विश्लेषण करके जनता तक पहुंचाना सबसे बड़ी प्राथमिकता लगती है। क्योंकि मिथ्या और प्रवंचना के इस बाजारु समाज में अपने लोगों को सूचना ही नहीं होती। अपनी कोशिश होती है कि नीति निर्धारण
संबंधी सूचनाएं सही परिप्रेक्ष्य में पाठकों के सामने तुरंत रखा जाये। आप जैसे सजग मित्रों के सहयोग से यह अब असंभव नहीं लगता। फिर अपने पर कार्य का दबाव इतना है कि लिखने के बाद दुबारा देखने की फुरसत नहीं होती। फिर देखने पर फ्लो
में लिखी गयी चीजें पढ़ते वक्त दुरुस्त ही लगती है। पहले जमाने में प्रूफ की व्यवस्था इसीलिए थी। होता यह है कि छपने के बाद ही गलतियां नजर आती हैं।मैंने भी देखा है कि इस लेख में और भारत पाक युद्ध वाले लेख में वर्तनी संबंधी ऐसी
गलतियां रह गयी हैं, जो रहनी नहीं चाहिए।

एक बात और, इधर कंप्युटर में बांग्ला लिखने की तकनीक हमारे पास हो गयी है।बांग्लाभाषी जनता को बांग्ला में संबोधित करना यहां के रोज बिगड़ते हालात में सर्वोच्च प्राथमिकता हो गयी है। इतने सालों से बांग्ला में लिखा ही नहीं है।अभी लिखना कठिन है और बहुत वक्त इसमें खप रहा है। इधर हिंदी बिगड़ने के पीछे एक बड़ी वजह बांग्ला में नियमित लेखन है। अंग्रेजी में लिखना इसलिए अनियमित हो गया है। पर कोशिश है कि बांग्ला और हिंदी में ताजा सूचनाएं तुरंत दे दी जायें।पाठक यह बात नहीं समझेंगे। पर हामारा लेखन अभियान तो आप जैसे मित्रों के कारण ही संभव है।

मैं अपनी ओर से आगे कोशिश करता हूं कि यह स्थिति थोड़ी बोहतर जरूर हो और कम से कम वर्तनी संबंधी गलतियां कम से कम रहे। समय पर टोकने के लिए आभारी हूं। बाहैसियत संपादक और मित्र आपकी चिंता  एकदम वाजिब है।



बहरहाल, स्वामी विवेकानंद की 150 वीं जयंती के उपलक्ष्य में देश भर में शनिवार को विभिन्न धार्मिक व सामाजिक संस्थाओं के सदस्यों ने भव्य शोभा यात्रा निकाली गई।जगह-जगह आयोजित कार्यक्रमों में स्वामी विवेकानंद के दिखाए गए रास्तों पर चलने का आह्वान किया गया। विवेकानंद का क्या संदेश, सक्षम सुंदर भारत देश, गांव गांव में जाएंगे भारत भव्य बनाएंगें, वंदेमातरम, आदि के नारे और जयघोष से शहर शहर गूंजता रहा। पश्चिम बंगाल में स्वामी विवेकानंद की 150वी जयंती के मौके पर सांस्कृतिक कार्यक्रम, उनकी शिक्षाओं को प्रदर्शित करती एक झांकी और रंगारंग प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। कोलकाता में शहर के शिमला स्ट्रीट पर स्थित स्वामी के पैतृक आवास से समारोह शुरू हुआ। सभी वर्ग के लोगों ने वहां पहुंच कर स्वामीजी को श्रद्धांजलि दी। एक रंगारंग प्रदर्शन निकाला गया जिसमें ज्यादातर स्कूली छात्र शामिल थे। यह प्रदर्शन शहर के मार्गो से गुजरा। राज्यपाल एम.के. नारायणन ने विवेकानंद को श्रद्धांजलि दी, जबकि उनके पूर्ववर्ती गोपाल कृष्ण गांधी संत के पैतृक आवास पर मौजूद रहे। रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन के मुख्यालय के रूप में स्वामी विवेकानंद द्वारा स्थापित बेलुर मठ में इस दिन को युवा दिवस के रूप में मनाया गया। हावड़ा जिले के बेलुर स्थित इस मठ में मंगल आरती के साथ समारोह का शुभारंभ हुआ। इस मौके पर विशेष प्रार्थना, होम, ध्यान, समर्पण गान और धार्मिक क्रियाएं आयोजित की गईं। यहां भी स्कूली बच्चों ने रैली निकाली। रामकृष्ण मिशन ने भारतीय आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत को समेटते हुए "शाश्वत भारत" के नाम से एक घुमंतू प्रदर्शनी निकाली है। वेद से लेकर श्री रामकृष्ण तक की यह झांकी पूरे पश्चिम बंगाल का दौरा करेगी।

दूसरी ओर, गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात को दुनिया के लिए भारत में प्रवेश करने का मेन गेट बताया। उन्होंने उद्योगपतियों से कहा कि वह वाइब्रेंट गुजरात शिखर सम्मेलन के मंच का इस्तेमाल दुनिया को शोषण वाले आर्थिक मॉडल से दूर रहने का सकारात्मक संदेश देने के लिए करें।मोदी ने ये बातें वाइब्रेंट गुजरात शिखर सम्मेलन 2013 के उद्घाटन सेशन को संबोधित करते हुए कही। उन्होंने कहा, 'एक समय था जब गुजरात भारत से बाहर दुनिया में जाने का द्वार हुआ करता था। अब यह भारत में आने का ग्लोबल प्रवेश द्वार बन रहा है। हम एक ऐसा गुजरात बनाएंगे कि सारी दुनिया उसे अपना घर बनाएगी।'
उन्होंने कहा, 'मैं दोहराना चाहूंगा कि यह आयोजन केवल निवेश के बारे में नहीं है। यह केवल वित्तीय रिटर्न देने वाली योजनाओं के बारे में नहीं है। यह तो आर्थिक माहौल में सकारात्मकता लाने के बारे में है। यह तो हमारी सामाजिक आर्थिक गतिविधियों में घनिष्ठता लाने के लिए है। यह हमारी आर्थिक प्रक्रिया में ग्लोबल और स्थानीय समग्रता लाने के लिए है। सम्मेलन में कई इंटरनैशनल, नैशनल और स्थानीय उद्योगपति मौजूद थे। उन्होंने इस दौरान राज्य की सफलता की कहानी को और आगे ले जाने का वादा किया।

महात्मा नरेंद्र मोदी

वाइब्रेंट गुजरात समिट के पहले दिन रिलायंस एडीए ग्रुप के चेयरमैन अनिल अंबानी ने दुनियाभर के उद्योगपतियों के बीच नरेंद्र मोदी की तारीफ में कसीदे गढ़े. उपनी तारीफों से उन्होंने नरेंद्र मोदी को महात्मा गांधी, बल्लभ भाई पटेल और धीरू भाई अंबानी की कतार में खड़ा किया. अनिल ने कहा, 'नरेंद्र मोदी ने गुजरात के लिए जितना किया है उससे वो गांधी, पटेल और मेरे पिता के साथ खड़े दिखते हैं.'

उन्होंने कहा, 'नरेंद्र मोदी को कई नामों से बुलाया जाता है लेकिन मेरी समझ में नरेंद्र मोदी का मतलब 'किंग ऑफ लीडर्स' है.'

उनके बड़े भाई मुकेश अंबानी ने भी मोदी की बहुत तारीफ की और कहा, 'मोदी के रूप में हमें एक दूरदृष्टि रखने वाला नेता मिला है.' साथ ही उन्होंने रिलायंस इंडस्ट्रीज को ग्लोबल कंपनी बताते हुए गर्व से कहा कि रिलायंस एक गुजराती कंपनी है.

अनिल ने कहा, 'मोदी के पास विजन है और गुजरात के विकास के मामले में उनकी एकाग्रता अर्जुन की तरह है.'

उन्होंने कहा, 'यह नरेंद्र मोदी का विजन है जिसकी वजह से पिछले एक दशक से देश-विदेश के उद्योगपित गुजरात की ओर खींचे चले आ रहे हैं.'

अदानी ग्रुप के चेयरमैन गौतम अदानी ने भी मोदी के विजन की खुल कर तारीफ की और कहा, 'मोदी ना सिर्फ चुनाव लड़ रहे थे बल्कि वो साथ ही इस समिट के आयोजन की प्लानिंग भी कर रहे थे.'

गौरतलब है कि मोदी ने हाल ही में संपन्न गुजरात विधानसभा चुनावों में हैट्रिक लगा कर इतिहास रचा है. उनके तीसरे कार्यकाल में यह पहला वाइब्रेंट गुजरात समिट आयोजित किया जा रहा है. दो दिनों तक चलने वाले इस वाइब्रेंट गुजरात का आयोजन गांधीनगर के महात्मा मंदिर में किया जा रहा है.

इस सम्मेलन में केवल भारत से ही करीब 50 हजार उद्योग प्रतिनिधियों के शामिल होने की उम्मीद की जा रही है और साथ ही 105 देशों के 1800 प्रतिनिधियों के भी आने की उम्मीद है.



और भी... http://aajtak.intoday.in/story/anil-ambani-compares-narendra-modi-to-gandhi-1-718416.html

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने आज कहा कि स्वामी विवेकानंद की शिक्षा का दुनिया भर में प्रसार करने की जरूरत है। यह शिक्षा दुनिया भर के लोगों के लिए काफी अहम है। स्वामी विवेकानंद की 150वीं जयंती के कार्यक्रमों का यहां राष्ट्रपति भवन में उद्घाटन करते हुए मुखर्जी ने कहा कि भारत की जनता पर इस शिक्षा के शक्तिशाली प्रभाव के पूर्ण आभास के साथ उसका भारत और दुनिया भर में प्रसार किया जाना चाहिए ।

राष्ट्रपति ने मशहूर ब्रिटिश इतिहासकार ए.एल. बाशम के हवाले से कहा कि आने वाली सदियों में स्वामी विवेकानंद को आधुनिक विश्व के मुख्य प्रतिरूपकार के रूप में याद किया जाएगा। उन्होंने कहा कि विवेकानंद की गरीबों के प्रति गहरी वचनबद्धता थी। एक सरकारी विज्ञप्ति में मुखर्जी के हवाले से कहा गया कि स्वामीजी की शिक्षा केवल उनके जीवित रहते ही नहीं बल्कि आज के भारत के लिए भी प्रासंगिक है।

नेपाल में मनाई गई स्वामी की जयंती
काठमांडो : स्वामी विवेकानंद की 150वीं जयंती पर आयोजित एक कार्यक्रम में नेपाल के राष्ट्रपति रामबरन यादव ने समाज के उत्थान के लिए स्वामीजी द्वारा किए गए कार्यों की प्रशंसा की। राष्ट्रपति रामबरन यादव आज इस समारोह के मुख्य अतिथि थे। उन्होंने कहा, 'विवेकानंद सिर्फ एक हिन्दू संत नहीं बल्कि स्वतंत्रता सेनानी भी थे जिन्होंने भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त कराने के लिए काम किया।' नेपाल में भारत के राजदूत जयंत प्रसाद ने कहा, 'अमेरिका के शिकागो में वर्ष 1893 में विश्व धर्म सम्मेलन में मशहूर भाषण देने के बाद विवेकानंद पूरब और पश्चिम के बीच पुल बन गए थे।'

150वीं जयंती पर चार टिकट जारी
जम्मू : डाक विभाग ने स्वामी विवेकानंद की 150वीं जयंती पर आज यहां चार विशेष डाक टिकट जारी किया। जम्मू कश्मीर के मुख्य पोस्टमास्टर जनरल जॉन सैमुअल ने आज यहां गांधीनगर प्रधान डाकघर में एक आकषर्क कार्यक्रम में डाक टिकट जारी किए। ये डाक टिकट रामकृष्ण मिशन के सचिव स्वामी गिरिजाशानंद को सौंपे गए।