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Friday, 18 January 2013

मूलनिवासी आंदोलन की चुनौतियां

मूलनिवासी आंदोलन की चुनौतियां

- संजीव खुदशाह

दलित आंदोलन के बाद भारत में मूलनिवासी आंदोलन की सुगबुगाहट हो चली है। इस
आंदोलन में दो प्रकार के लोग जुड़े हुए है, पहला वे लोग जो दलित आंदोलन से जुड़े
थे इन्हे अब लगता है कि दलित आंदोलन का दायरा बड़ा किया जाना चाहिए एवं दूसरा
वे लोग जो पिछड़ी जातियों से है तथा ये समझते है कि वे अनार्य है एवं आर्यो ने
उनका शोषण किया है। यहां पर मै बताना चाहूंगा की अभी आदिवासी इस आंदोलन से नही
जुड़ पाया है। भले ही मूलनिवासी आंदोलन के लोग इन्हे मूलनिवासियों का ही अंग
मानते हों।

मूलनिवासी आंदोलन की पृष्ठभूमि में मनुवादियों द्वारा मुसलमानों-ईसाइयो को
विदेशी बताकर खदेड़े जाने की साजिश की कलई खोलना इनके लक्ष्यो में शामिल है। यह
सिध्दांत यह बतलाता है की भारत के मुसलमान एवं इसाई विदेशी नही बल्कि यहां के
ही दबे कुचले तबके के मूलनिवासी लोग है। जिन्होने प्रताड़नाओं से तंग आकर अन्य
धर्म ग्रहण कर लिया। जबकि वास्तविक विदेशी लोग यहां के सवर्ण है, जो अपने आपको
आर्य कहकर गौरवांवित होते है।

दर असल मूलनिवासी सिध्दांत की पैदाईष डाॅं अम्बेडकर की किताब ‘शूद्र कौन थे?’ एवं
‘अछूत कौन और कैसे ?’ में प्रतिपादित किये गये सिध्दांत पर हुई है। जिसमें
डाॅं अम्बेडकर स्पष्ट संदर्भो के हवाले से बताते है कि आर्य विदेषी जाति
है, जिन्होने
भारत आकर अनार्यो (भारत के मूलनिवासी) को युध्द में हराया और अपना गुलाम बना
दिया। इस प्रकार ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैष्य आर्य है, और दलित, आदिवासी, पिछड़ा
वर्ग अनार्य है। यह बात भारत के परिप्रेक्षय में बिल्कुल सही है। लेकिन मूल
निवासी सिध्दांत एवं उनके पैरोकरों द्वारा इस पर स्पष्ट सिध्दांत के प्रतिपादन
की अपेक्षा है।

जैसा की वैज्ञानिक तथ्य है कि संसार में मानव कि उत्पत्ति आफ्रिका में हुई।
भूगर्भ वैज्ञानिक के अनुसार भारतीय उपमहाद्वीप किसी समय आफ्रिका का अभिन्न
हिस्सा हुआ करता था। बाद में यही टुकड़ा एशिया महाद्वीप से आकर जुड़ गया एवं
भारतीय प्रायद्वीप कहलाया। यह घटना अमूमन लाख साल पहले की रही होगी। लेकिन
मानव का विकास 5.4 लाख वर्ष पूर्व पिथिकेन्थ्रोपस, हायडेलबर्ग मानव के रूप में
प्रारंभ हुआ माना जाता है। इसी विकास क्रम में मानव आफ्रिका से संसार के तमाम
द्वीपों एवं महाद्वीपों में पहुंचते गये। प्रत्येक महाद्वीपों में ये मानव दो
से तीन लाख वर्षो से निवास कर रहे है। इस प्रकार मनुष्य की चार मुख्य
प्रजातियां विकसित हुई आफ्रिकन, मंगोलियन, नौर्डिक एवं आर्यन। भारत के मूल
निवासी इसी आफ्रिकी नस्ल के वंषज है।

अब यहां पर प्रष्न खड़ा होता है कि मूल निवासी होने के आधार क्या होगे- यहां
पर मुझे दो संभावनाएं दिखती है-

1. भारतीय प्रायद्वीप आफ्रिका का अंष था। इसलिए भारत के आफ्रिकी
प्रजाति के लोग मूल निवासी कहलाने का हक रखते है। या

2. विदेशी आर्यो से युध्द में हारे हुऐ अनार्य लोग पहले से भारत के
निवासी है, इसी आधार पर वे भारत के मूल निवासी कहलाने का हक रखते है।



दरअसल मूलनिवासी सिध्दांत के मामले मे इन पेचिदगियों को नजर अंदाज नही किया जा
सकता। शायद यही कारण रहा होगा, कि डाॅ अम्बेडकर ने अनार्यो को मूल निवासी तो
माना, लेकिन मूल निवासी जैसी किसी आंदोलन कि संभावना पर जोर नही दिया।

मूलनिवासी आंदोलन की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि भारत के वास्तविक मूलनिवासी
दूसरे राज्यो में बाहरी करार दिये जा रहे है। शायद यह मनुवादियों कि चाल का एक
हिस्सा है कि लगभग प्रत्येक राज्य में पचासो साल रहने के बावजूद दलित बहुजन
उस राज्य द्वारा राजनीतिक सामाजिक रूप से स्वीकार नही किया गया। क्योकि दलित
बहुजन लोग अपने स्थानिय टाईटल या सरनेम से शोभित होते है। जहां मिश्रा, शर्मा,
ठाकुर, गुप्ता पूरे देश में एक सा मिलेगा। वही दूसरी ओर जाटव, बंजारे, समुंद्रे,
केरकेटा जैसे दलित बहुजन सरनेम किसी स्थानियता को प्रदर्शित करते है। इस मामले
में दुखद पहलू यह है कि इस दलित बहुजन बहिस्करण में वहां का स्थानीय दलित
बहुजन वर्ग भी मूक समर्थन करता है।

स्पष्ट है भारत जैसे बड़े भू-भाग में क्षेत्रियवाद ने मूलनिवासी आंदोलन की जड़े
कमजोर करना शूरू कर दिया है, अब मुलनिवासी आंदोलन के लिए चुनौती यही है सबसे
पहले इनसे कैसे निपटा जाय। जैसा कि मै पहले चर्चा कर चुका हूं कि भारत में
क्षेत्रियवाद शुरू से हावी रहा है। अंग्रेज शासन के दौरान हुये सियासी संघर्ष
के दौर में क्षेत्रियवाद की जड़े कुछ कमजोर हुई, लेकिन आजादी के बाद यह और बढ़ा
है। यह भारत जैसे कम्युनल, धर्मान्ध देष में कोई आष्चर्य नही है। इस दौरान
गरीब दलित बहुजन समाज के लोग अपने अपने मूल निवासी क्षेत्र को छोड़कर, जहां
उनके पूर्वज सदियों से प्रताड़ित होते रहे है अन्य क्षेत्र में चले गये। ये वो
लोग थे जिन्होने बाबा साहब के इस सिध्दांत का पालन किया कि जातिगत प्रताड़नाओं
का केन्द्र ग्रामीण क्षेत्र है। इसलिये दलित बहुजन को शहर की ओर आ जाना चाहिए।
इस दौरान बहुत सारे दलित,बहुजन उत्तर से दक्षिण, पूर्व से पश्चिम की ओर पालायन
करने लगे। ऐसा पालायन आज भी जारी है।

अब, जब भारत के अनन्य राज्यों में क्षेत्रियवाद का प्रभाव बढ़ने लगा है और
आम्ची मुंबई, आम्चा महाराष्ट्र, मेरा मध्यप्रदेष, मेरा पंजाब, सबले बढ़िया
छत्तीसगढ़ीया, जय झारखण्डी आदी नारे बुलंद होने लगे। इन नारों के निशाने में
सिर्फ और सिर्फ उस क्षेत्र विषेष के गैर राज्य-वासी दलित बहुजन समाज के
मेहनत-कष लोग ही है। आज आम्ची मुंबई के झंडा बरदारों के द्वारा मेहनत कष
यूपी-बिहारियों को खदेड़ना तथा टाटा, बिडला, अंबानी, अमिताभ बच्चन को रिझाना ही
एक मात्र लक्ष्य बन कर रह गया है। ये कहानी सिर्फ महाराष्ट्र की नही बल्कि देष
के सभी राज्यों की है। इस काम में स्थानीय प्रशासन सबसे महत्वपूर्ण भूमिका
निभा रहा है क्योकि प्रसाशन में इन्ही फासीवादियों का कब्जा है। दलित बहुजन आज
किसी भी प्रदेश में मूलनिवासी होने का प्रमाण देने में अक्षम है। इसलिए
प्रत्येक प्रदेष में गैर मूलनिवासी आर्य नही दलित बहुजन है जैसे महाराष्ट्र
में प्रताड़ित यू.पी.बिहारी कोई और नही दलित बहुजन ही है। छत्तीसगढ़ में गैर मूल
निवासी कोई और नही उड़ीसा और महाराष्ट्र के दलित है। ये हाल आसाम, बंगाल, पंजाब,
तमिलनाडु, आंध्रा सहित देष के पूरे राज्य में है। स्थानीय प्रसाशन पूरी तैयारी
में है कि इन दलित बहुजनों को गैर मूल निवासी करार करके उनके मूल गांव में भेज
दिया। गाय जहां वे पहले की तरह तेल पिरोये, घड़ा बनावे, मवेशी चराए, मैला उठावे
या मरे जानवर फेके,। यानि दलित बहुजन अपने मूलवास(गांव) में भी शोषित है और
नये वास में भी।

बावजूद इसके मूल निवासी आंदोलन अपने पथ पर अग्रसर है। यहां पर इन्हे देश के
सभी दलित बहुजन को एक सूत्र में बांधने की भी जरूरत है। ताकि वे क्षेत्रियवाद
के षड़यंत्र का मुकाबला कर सके। इस प्रकार के क्षेत्रियवाद बहिस्कारण से
मुकाबला करने के लिए दलित बहुजनों के पास दो रास्ते बचे है-

1. वे सौ दो सौ साल पहले छोड़े हुए अपने गांव चले जाये। जहां जाति के
दानव उनका इंतजार कर रहे है।

2. या वे संगठित होकर स्थानीय प्रशासन में अपना अधिकार जमा ले।