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Friday, 18 January 2013

मॅक्स मूलर का पत्र और संस्कृत की प्रेरणा -डॉ. मधुसूदन - 10 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में हिन्दी विभाग ही नहीं : डा. रामप्रकाश


                   मॅक्स मूलर का पत्र और संस्कृत की प्रेरणा -डॉ. मधुसूदन
 
http://www.pravakta.com/maxmuller-letter-and-sanskrit
 
मॅक्स मूलर ने, I C S ( Indian Civil Service) की परीक्षा के हेतु तैय्यार होने वाले युवाओं के सामने १८८० के आस पास, केम्ब्रिज युनीवर्सीटी में ७ भाषण दिए थे।उन भाषणों के उपलक्ष्य़ में जो पत्र व्यवहार हुआ था, उसका अंश प्रस्तुत है। सभी भारतीय संस्कृत प्रेमी और अन्य भारतियों को यह जानकारी, संस्कृत अध्ययन की प्रेरणा ही दे कर रहेगी।
जब मॅक्स मूलर अंग्रेज़ युवा छात्रों को संस्कृत अध्ययन के लिए प्रेरित करते हैं,, जो उन छात्रों के लिए अवश्य अधिक कठिन ही होगा, तो हमारे युवा ऐसे आह्वान से कैसे मुह चुराएंगे, जिनके लिए निश्चित रूपसे संस्कृत अध्ययन अंग्रेज़ो की अपेक्षा कमसे कम तीनगुना तो सरल ही होगा।
(१) एक हमारी सभी भाषाएँ ७० से ८० प्रतिशत (तत्सम और तद्भव) संस्कृतजन्य शब्द रखती है।
अपवाद केवल तमिल है, जिसमें ४० से ५० प्रतिशत संस्कृतजन्य शब्द होते हैं।
पर अचरज यह है, कि, तमिलनाडु में ही वेद्पाठी गुरूकुल शालाएं आज भी अबाधित रूप से चल रही है।
(२) हमारी ६०-६५ प्रतिशत भाषी जनता देवनागरी जानती है। उपरान्त ३० प्रतिशत भारतियों की भाषाएँ, देवनागरी की ही भाँति ध्वन्यानुसारी रूप से व्यवस्थित और अनुक्रमित है।
(१) प्रोफेसर कॉवेल युनीवर्सीटी ऑफ़ केम्ब्रिज मॅक्स मूलर, प्रोफेसर कॉवेल को, जो उस समय, युनीवर्सीटी ऑफ़ केम्ब्रिज में संस्कृत पढाते थे,लिखते हैं; ….."पर आप भी जानते हैं कि अभी तो संस्कृत साहित्य के विशाल-काय महाद्वीप की एक छोटी पट्टी (strip) भर ही खोजी गयी है, और कितना अज्ञात धरातल अभी भी बचा हुआ है।" टिप्पणी:{बस एक विशाल हिम शैल की शिखामात्र खोजी गयी थी।} जिन्हों ने 'PRIDE OF INDIA'– A glimpse into India's scientific heritage,(2006), पढी होगी, उन्हें सहमत होने में कठिनाई नहीं होगी
(२) कठिन कष्टदायक काम मॅक्स मूलर कहते हैं: निःसंदेह, यह काम कठिन है, कष्टदायक भी, और बहुत बार हताश करने वाला भी है, पर युवा छात्रों को वे वचन जो डॉ. बर्नेल ने कहे थे, ध्यान में रखने चाहिए, —"जिस काम को करने से, अन्यों को (हमारी बाद की पीढियों को) सुविधा होगी, ऐसा कोई कठिन काम त्यागना नहीं चाहिए।" टिप्पणी: क्या हमें यह कठिन काम त्यागना चाहिए? और क्या हमारे लिए उनसे भी कठिन माना जाए? आप, टिप्पणी दीजिए।
) कठिन परिश्रमी युवा चाहिए (३)आगे, मॅक्स मूलर लिखते हैं: हमें ऐसे युवा चाहिए, जो कठिन परिश्रम करेंगे, जिनके परिश्रम का कोई पुरस्कार भी उन्हें शायद ही मिले, हमें ऐसे पुरूषार्थी और निडर युवाओं की आवश्यकता है, जो आँधी, बवंडरों से डरते नहीं है, समुद्री टीलों पर नौका की टक्कर से जिनकी नाव टूटती है, पर हताश होते नहीं है। वे नाविक बुरे नहीं होते, जिनकी नौका पथरीले टिलोंपर टकरा कर टूटती है, पर वें हैं, जो छोटे छोटे डबरों में नाव तैराकर उसी किचड में लोट कर ही संतोष मान लेते हैं। टिप्पणी: हमारे युवा, और युवामानस रखने वाले इन शब्दों पर विचार कर, अपनी टिप्पणी दें।
(४)आलोचना करना बंद करो:आगे, मॅक्स मूलर अंग्रेज़ युवाओं को लक्षित कर लिखते हैं: बहुत सरल है, आज, विलियम जोन्स, थॉमस कोलब्रुक, और एच. एच. विलसन इत्यादि विद्वानों के परिश्रम की आलोचना करना, पर संस्कृत के विद्वत्ता प्रचुर अगाध ग्यान का क्या होता, यदि इस क्षेत्र में, वे विद्वान आगे बढे न होते, जहाँ पग रख कर प्रवेश करने में भी आप सारे इतने डरते हो?
(५)संस्कृत में भरी पडी, विपुल जानकारी, आगे, मॅक्स मूलर लिखते हैं: और संस्कृत में भरी पडी, विपुल जानकारी का क्या होगा, यदि इस क्षेत्र की उपलब्धि के लिए, हम सदा के लिए इस विषय में हमारी मर्यादा में ही बँधे रह जाएँ? लेखक: क्या यह वाक्य हमारे लिए भी, लागू नहीं होता? शायद अंग्रेज़ों से भी अधिक ही होता है। लेखक: फिरसे जिन्हों ने 'PRIDE OF INDIA'– A glimpse into India's scientific heritage,(2006), पढी होगी, उन्हें सहमत होने में कठिनाई नहीं होगी
(६) विशाल ज्ञान का भंडार आगे, मॅक्स मूलर लिखते हैं: आप निश्चितरूपसे जानते हैं, कि संस्कृत साहित्य और धर्म ग्रंथों में, में नल दमयन्ती और शाकुन्तल के नाटकों से बढकर भी बहुत विशाल ज्ञान का भंडार भरा पडा है, जो कई अधिक खोजने की आवश्यकता है; और जानने योग्य भी है। और अवश्य जो युवा प्रति वर्ष भारत जाते हैं, उनकी ऐसा साहस करने की क्षमता नहीं है; ऐसा मैं नहीं मान सकता। लेखक :तो क्या भारत का युवा, अंग्रेज़ युवा से कम क्षमता रखता है?
(७)लेखक: इस सुभाषित से भी हमारे युवा सीख ले सकते हैं।
योजनानां सहस्रं तु शनैर्गच्छेत् पिपीलिका।
आगच्छन् वैनतेयोपि पदमेकं न गच्छति॥
संधि विच्छेद कर:
योजनानां सहस्रं तु शनैः गच्छेत्‌ पिपीलिका।
आगच्छन वैनतेयः अपि पदम्‌ एकम्‌ न गच्छति॥
अर्थ: यदि चींटी भी यदि चले, तो धीरे धीरे हज़ारों योजन (मील) काट सकती है। पर गरूड यदि अपनी जगह से ना हीला तो एक पग भी आगे नहीं बढ सकता।
पिपीलिका: यह चींटी का एक पर्यायवाची नाम है। पीपल के वृक्ष पर पायी जाती है, इससे पिपीलिका कहलाती है। और गरूड विनता की सन्तान होने से उसे वैनतेय कहते हैं। यह प्रत्ययों का जादु है। कभी आगे विशद किया जाएगा।
कविता
जब चींटी चले धीरे धीरे, हजारों योजन कटे।
गरूड हिले न, अपनी जगह , एक भी पग ना बढे॥
चींटी की भाँति ही संस्कृत के ज्ञान में आगे बढें।
संस्कृत भारती का सम्पर्क कीजिए।
"Madhusudan H Jhaveri" <mjhaveri@umassd.edu>
मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।
  • अवनीश सिंह says:                                                                                                                                                                  तथ्यों और तर्कों पर कसा हुआ एक और ओजपूर्ण लेख|.
    हमेशा की तरह आपका ये लेख भी सोचने पर मजबूर करता है कि हम इतने आत्मविस्मृत हुये कैसे|.
    आपका यह लेख युवाओं के लिए प्रेरक है, उम्मीद करता हूँ कि युवा देश को निराश नहीं करेंगे| वो भाषा जो देश के प्राण स्वरूप उसकी नसों को उर्जा देती रही है, आज हमें पुनः उसका गौरव महसूस करना है
    |.
आपका प्रश्न- तो क्या भारत का युवा, अंग्रेज़ युवा से कम क्षमता रखता है?
उत्तर- नहीं, कतई नहीं| भारत में प्रतिभा का अभाव नहीं है, बस प्रतिभावानों को उचित दिशा और दशा देने में यह देश असमर्थ है|.
" कठिन परिश्रमी युवा चाहिए|".
अवश्य मिलेंगे|
चींटी और गरुड़ वाले उद्धरण पर विशेष ध्यान है और यह दिशा सूचक भी है|.
 
 

10 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में हिन्दी विभाग ही नहीं : डा. रामप्रकाश

 
कुरूक्षेत्र, 6 दिसम्बर (हप्र)। देश की राजभाषा हिंदी को पूरा मान-सम्मान तभी मिलेगा, जब यह भाषा देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में पढ़ाई जाएगी। इसके लिए आवश्यक है कि प्रत्येक विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग
का गठन हो, लेकिन विडम्बना यह है कि देश को आजाद हुए 60 साल से भी अधिक हो चुके हैं, लेकिन आज तक देशभर में स्थित आधे से अधिक विश्वविद्यालयों में हिंदी विभाग का गठन भी नहीं हुआ। आज समय की मांग है कि प्रत्येक विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग का गठन हो। यह मांग देश की सबसे बड़ी पंचायत में राज्यसभा सांसद डॉ. रामप्रकाश ने उठाई।

उन्होंने राज्यसभा में मांग उठाई देश भर में स्थित केंद्रीय विश्वविद्यालयों में कई ऐसे विश्वविद्यालय हैं, जिनमें आज तक हिंदी विभाग का गठन नहीं हुआ, संस्कृत तो दूर की बात है। देशभर में 40 केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं, जिनमें से 10 विश्वविद्यालयों में हिंदी विभाग नहीं हैं और 27 विश्वविद्यालयों में संस्कृत के विभाग नहीं हैं। इसी तरह से देशभर में राज्य कानून के तहत बने 451 विश्वविद्यालय हैं। इन विश्वविद्यालयों में पूरे देशभर में 232 ऐसे विश्वविद्यालय हैं, जिनमें हिंदी विभाग नहीं हैं तथा 239 विश्वविद्यालय वे हैं, जिनमें संस्कृत विभाग नहीं। हरियाणा प्रदेश में 19 विश्वविद्यालय हैं, जिनमें से 10 विश्वविद्यालयों में हिंदी तथा 10 में संस्कृत के विभाग नहीं हैं। हिमाचल प्रदेश में 19 विश्वविद्यालय हैं, जिनमें से 9 विश्वविद्यालयों में हिंदी व 9 में ही संस्कृत के विभाग नहीं हैं। उत्तर प्रदेश में 42 विश्वविद्यालय हैं, जिनमें से 22 विश्वविद्यालयों में हिंदी व 21 विश्वविद्यालयों में संस्कृत के विभाग नहीं हैं। राजस्थान में 48 विश्वविद्यालय हैं। इनमें से 24 विश्वविद्यालयों में हिंदी विभाग ही नहीं हैं और 25 विश्वविद्यालयों में संस्कृत के विभाग नहीं।
 
 
 
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From: Dr. VSH  - om.sriguru@gmail.com;
 
I am getting more and more appalled at the way Urdu is hijacking the space which should rightfully belong to our national language Hindi. First of all, Muslims are grossly overrepresented in these programs and by virtue of that Urdu and Maasha-Allah is getting thrust on our faces as if we are all Muslims and Paakistaanis. What a shame?? And we have established Hindu artists who bend over backwards to accommodate these Muslims and their Urdu. It is just an absolute disgrace. Actually it seems to one that the Islamization of this nation is taking place even before Muslims will eventually become majority here.
Muslims having disproportionate representation in TV music shows
Has anyone ever noticed a trend of Muslims disproportionately representing in music shows on TV, shows like Sa_Re_Ga_Ma_Pa on
Zee_TV. The anchor, the judges, the participants, U name it Muslims are there in sizable numbers and the way the hosts and the judges pander to these Muslims over and above the Hindus, it is quite possible that the winners of these shows will no doubt be a Muslim.
Dr VSH
 
From: Chanchal Malviya  - chanchalmalviya@gmail.com;
It is simple - people who have forgot to connect to past, have always been ruled by others. For example, a child not connected to his father or grandfather culturally will always find neighbours influencing him... If people of the nation finds glory in Mughal history and British established education and administrative systems, where will you find room for Hinduism, which we all are. We are like orphans without Father (hindu dharma in our life) and hence people are more engaged in thinking out Muslims and Christians. Root cause treatment is desired, but no one wants to do that. Every concerned person wants immediate result. It took 1000 years to eradicate Hindu culture and its values. It will of course take few centuries to resurrect them. Results are not be seen in our life span. We can seed elements of change. And that is what we should focus upon.
I have myself interacted with many Kashmiris. Three young boys were even employed in my company. And I remember the news how Hindus were asked to stand in queue and they were shot all together. You will find people criticizing it and sitting quite. You will not find many people finding its root in Koranic and Biblic education, which actually says all the stories of past 2000 years of history this world has seen. This is a state of confusion seeded by great Father (not SON) of Nation, when depite repeated suggestion not to do so, he wrote 'Sarva Dharma Sambhav' and asked Hindus to be prepared to die for peace.
We are worshippers of Krishna and Rama, but people worship today Gandhi and Sai, whose contribution to humanity is absolutely dull. So, attitude of people have also lost energy to fight. Even an idiot like Kejriwal can fool these people.
Root cause treatment is desired my dear friends. Such frustrations and expressions alone will not help. Work. Create schools of our ideology. Invest money in creating and supporting schools. If able people don't send their children to this kind of school, bring all the poor children and give them true education that we desire. And we will find change after 30 years. But who will have so deeep focus for 30 long years.
Weakness is crime. People fo this nation should have created havoc to protect lacs of Kashmiri pandits. Their daughters were dragged away, they lost their property - and people are budy talking post Godhra riot. Idiots live in this country.
 
Tapan Ghosh-Does India Needs Secularism? [Beautiful Speech]
http://www.youtube.com/watch?v=U-1Olyn15Xk
Every Hindu should become Tarun Ghosh -Otherwise - UPA lead by Congress party will make India Islamistan
The latest device is N D S which the UPA is planning to totally Subjugate Hindus.
Secular Congress & its supporters are India & Hindus enemy no 1. Sanskrit is communal & Urdu is secular;
Mandir is communal, Masjid is secular;
Sadhu is communal, Imam is secular;
BJP is communal, Muslim League is secular;
Dr. Praveen Thogadiya is anti-national, Bhukari is national;
Vande Matharam is communal, Allah-O-Akbar is secular;
Shriman is communal, Mian is secular;
Hinduism is communal, Islam is secular;
Hindutva is communal, Jihad is secular;
SIMI is secular, Bajrang Dal is communal;
& at last, Bharat is communal, Italy is secular!
 
SECULARISM is the medicine prescribed only for the HINDUS?
From: mk  - mkothari2@yahoo.com;
Ahinsa, Ahinsa, Ahinsa (Non violence) – Teachings of Ahinsa
Necessary amount of violence is needed. That is what the nature is. We should adopt.
Non-violence is against nature and should be discarded. All followers of non-violence philosophy should be expelled from Hindu society if Hindu society needs to survive.                                                                                                                   
Mahendra Kothari

The ultimate tragedy ... is not the brutality of bad people
but the silence of good people - Martin Luther King