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Monday, 21 January 2013

रक्षा खर्चों का सच!!!क्या सचमुच हमें इतने हथियार चाहिए?

रक्षा खर्चों का सच


हिमांशु शेखर

रक्षा खर्चों में काफी बढ़ोतरी की जा रही है। इस साल भी ऐसा ही हुआ। यूपीए सरकार की ओर से अंतरिम बजट पेश करते हुए वित्त मंत्रालय का काम संभाल रहे प्रणब मुखर्जी ने यह घोषणा किया कि सरकार ने इस साल के रक्षा बजट में पैंतीस फीसद की बढ़ोतरी की है। प्रणब मुखर्जी ने अपने बजट भाषण में कहा कि इस साल रक्षा के मद में 1,41,703 करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे। जबकि पिछले साल यह रकम एक लाख छप्पन हजार करोड़ थी। सरकार के इस फैसले को सही ठहराते हुए उन्होंने कहा कि रक्षा बजट बढ़ाने का फैसला देश की मौजूदा सुरक्षा हालात को देखते हुए लिया गया है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि देश कठिन समय से गुजर रहा है और मुंबई हमलों ने सीमा पार के आतंकवाद को पूरी तरह से नया आयाम दे दिया है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए उन्होंने यह ऐलान किया कि इस साल रक्षा क्षेत्र के लिए बढ़ा हुआ योजना खर्च 86,879 करोड़ रुपए होगा। जबकि पिछले साल यह रकम 73,600 करोड़ रुपए थी।
दरअसल, रक्षा के मद में बढ़ाए जाने वाले खर्चों के असली कारणों पर गंभीरता से विचार करना जरूरी है। अभी तक होता यह रहा है कि सरकार देश में हो रहे आतंकवादी घटनाओं की बात करके रक्षा के क्षेत्र में आवंटन बढ़ाती रही है और लोग भी इसे बेहद जरूरी मसला मानकर स्वीकार करते रहे हैं। पर इस बार स्थितियां कुछ अलग हैं। जिसे समझना आवश्यक है। रक्षा बजट के बढ़ाए जाने को अमेरिका के साथ हुए परमाणु करार से जोड़ कर देखने की जरूरत महसूस होती है। क्योंकि तमाम विरोधों के बावजूद इस करार को जिस तरह से अमली रूप दिया गया था वह अपने आप में कई सवाल और संदेह पैदा कर रहा था। उस समय भी एक बड़े तबके ने इसे मनमोहन सरकार की अमेरिकापरस्ती माना था। रक्षा बजट के बढ़ाए जाने और अमेरिका के साथ हुए परमाणु करार के आपसी संबंधों को समझने के लिए करार होने के दौरान के कुछ घटनाओं पर निगाह डालना आवश्यक है। इससे बहुत सारी बातें बिल्कुल स्पष्ट हो जाती हैं।

जब अमेरिका के साथ परमाणु करार को आगे बढ़ाया जा रहा था तो उस वक्त अमेरिका में हथियारों के उत्पादन से जुड़ी लाॅबी इस करार को अमली जामा पहनवाने में लगी हुई थी। उल्लेखनीय है कि अमेरिका में हथियार उत्पादन का उद्योग बहुत बड़ा है। वहां का यह उद्योग इतना बड़ा हो गया है कि इसे ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने लिए नए-नए बाजार चाहिए। वहां का रक्षा उद्योग वहां के चुनावों में सियासी दलों को भी काफी मोटा चंदा देता है। जाहिर है कि औद्योगिक घराने चुनावी चंदा दलों के दायरे से बाहर निकल कर देते हैं। क्योंकि किसी भी दल की सरकार बने उन्हें तो अपना व्यावसायिक स्वार्थ साधने से मतलब होता है। इस नाते अगर देखा जाए तो कल तो हथियार उत्पादकों की जो अमेरिकी लाॅबी जाॅर्ज बुश के साथ खड़ी थी आज वही बराक ओबामा के साथ खड़ी है। इसलिए ओबाम प्रशासन भी वैसी ही नीतियों को आगे बढ़ा रहा है जिससे इस उद्योग का हित सधे। अभी अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की संख्या बढ़ाए जाने की घटना से नए अमेरिकी प्रशासन के चरित्र को समझा जा सकता है। इसके अलावा गाजा में जो कुछ हुआ उसमें भी इजरायल के साथ अमेरिका का खड़ा रहना उसके चरित्र को उजागर करता है।

खैर, पिछले साल दुनिया भर में गहराई आर्थिक मंदी से दुनिया का शायद ही कोई उद्योग बचा हो। आर्थिक मंदी की मार से वहां का यह उद्योग बुरी तरह प्रभावित हुआ है और उसका संकट और भी गहरा गया है। इसलिए इस उद्योग को नए बाजार की तलाश थी और भारत में यह संभावना उसे सबसे ज्यादा दिख रही थी। सारी दुनिया जानती है कि हथियार और पुनर्निर्माण का खेल अमेरिका का सबसे बड़ा व्यापार है। इसके लिए वह अमेरिका ऐसी परिस्थितियां तैयार करता है कि उसके रक्षा उद्योग के उत्पादों की खपत बढ़े और उसके यहां कि हथियार उत्पादक कंपनियां जमकर चांदी काटें। अभी तो वैसे भी मंदी चल रही है और अमेरिका के रक्षा उद्योग को भारत जैसे बड़े बाजार की और भी ज्यादा जरूरत है।

एसोचैम के एक अनुमान के मुताबिक 2012 तक भारत तकरीबन तीस बिलियन डाॅलर के हथियारों का आयात करेगा। इसमें लड़ाकु विमान, हेलीकाप्टर, मिसाइल के अलावा कई तरह के आधुनिक हथियार शामिल हैं। इसमें से भी बड़ा हिस्सा वायु सेना पर खर्च होने वाला है। एसोचैम का यह अध्ययन बताता है कि 2012 तक वायु सेना के लिए 126 लड़ाकु विमान खरीदे जाने वाले हैं। इसके लिए तकरीबन 42 हजार करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है। जाहिर है, ऐसे में दुनिया के बडे़ हथियार निर्माता इसमें से ज्यादा से ज्यादा हिस्सा हर हथियार निर्माता देश अपने खाते में डालना चाहता है। कुछ दिनों पहले तक रूस भारत में सबसे ज्यादा हथियारों की आपूर्ति करता था लेकिन अब भारत को सबसे ज्यादा हथियार निर्यात करने वाला देश इजरायल बन गया है।

बहरहाल, परमाणु करार की प्रक्रिया जब आगे बढ़ रही थी तो उस वक्त अमेरिका के पूर्व रक्षा सचिव विलियम कोहेन ने जो बयान दिया था उससे रक्षा के खेल को आसानी से समझा जा सकता है। उन्होंने कहा था कि अमेरिकी रक्षा उद्योग ने कांग्रेस के कानून निर्माताओं के भारत को परमाणु शक्ति के रूप में मान्यता दिलाने के लिए यानी परमाणु करार कराने के लिए लाॅबिंग की है। अब इस उद्योग को मालदार ठेके चाहिए। उन्होंने जब यह बयान दिया तो उस वक्त तक रक्षा ठेका पाने के लिए लाॅकहीड मार्टिन, बोईंग, राथेयन, नार्थरोप ग्रुमन और हानीवेल जैसी पचास से ज्यादा कंपनियां रक्षा ठेका पाने के लिए भारत में अपना कार्यालय चलाने लगी थीं। अमेरिकी रक्षा उद्योग की कोशिशें रंग लाईं और करार हो गया। इसके बाद इस साल के शुरुआत में ही भारत और अमेरिका के बीच अब तक का सबसे बड़ा रक्षा समझौता हुआ।

जनवरी के पहले सप्ताह में ही भारत में अमेरिका के साथ पचासी सौ करोड़ रुपए के रक्षा समझौते पर दस्तखत किया। इसके तहत भारत आठ बोईंग पी-81 खरीद रहा है। समझौते के तहत भारत को पहला पी-81 2012 के अंत तक या फिर 2013 के शुरूआत में मिलेगा और इस आपूर्ति को 2015-16 तक पूरा कर दिया जाएगा। इस समझौते को अमेरिका के साथ हुए परमाणु करार में दोनों पक्षों के बीच सहमति का ही विस्तार माना जाना चाहिए। संभव है इस साल भी अमेरिका के साथ कुछ बड़े रक्षा सौदे देखने को मिल जाएं। क्योंकि आखिरकार रक्षा बजट बढ़ाकर तो यह सरकार अमेरिका से किया गया अपना वायदा ही निभा रही है। यह बात अलग है कि यह सब सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने की आड़ में हो रहा है।

रक्षा के मोर्चे पर बढे़ बजट को लेकर भी प्रणब दादा जो दावे कर रहे हैं, वे खोखले नजर आते हंै। कार्यवाहक वित्त मंत्री ने बदहाल सुरक्षा व्यवस्था को आधार बनाकर रक्षा बजट बढ़ाने का सही ठहराने की कोशिश की है। पहली बात तो यह कि अगर वे मानते हैं कि देश की सुरक्षा व्यवस्था बदहाल बनी हुई है तो इस बदहाली की जिम्मेवारी भी उनकी ही सरकार के मत्थे जाता है। पिछले पांच साल से देश पर राज करने के बावजूद अभी भी वे सुरक्षा व्यवस्था की बदहाली का रोना रो रहे हैं तो इसे उनके द्वारा जनता को भरमाने वाला एक शातिर चाल ही कहा जा सकता है।

ऐसा इसलिए भी कहा जा सकता है कि रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के मामले में सरकार कोई ठोस कदम बढ़ाती नहीं दिख रही है। जब तक रक्षा के क्षेत्र में शोध और विकास यानी रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर मजबूती से काम नहीं होगा तब तक तो देश साधारण रक्षा जरूरतों के लिए भी अमेरिका और इजरायल जैसे हथियार निर्माताओं की मुंह ताकता रहेगा। पिछले साल सरकार ने रक्षा क्षेत्र में शोध और विकास के लिए 6,486 करोड़ रुपए खर्च किया। इसका अगला कदम तो यह होना चाहिए था कि या तो सरकार इस मद में आवंटन बढ़ाती या फिर कम से कम उतनी पैसे की तो व्यवस्था करती ही। पर सरकार ने रक्षा क्षेत्र में होने वाले शोध और विकास के लिए रकम को घटाकर चार हजार करोड़ कर दिया।

इस कदम से भी मौजूदा सरकार के मंसूबों पर सवाल उठता है। कभी भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु भारत को रक्षा क्षेत्र की जरूरतों के मामले में आत्मनिर्भर बनाना चाहते थे। पर उनका यह सपना अब तक पूरा नहीं हो पाया और उन्हीं की पार्टी की सरकार उनके सपनों के साथ खेल रही है। रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ने के बजाए सरकार जानबूझ कर वैसी नीतियों को अमली जामा पहना रही है जिससे अमेरिका और इजरायल जैसे बड़े हथियार निर्माताओं के लिए भारत एक बड़ा बाजार बन सके। यही वजह है कि शोध और विकास के मद में होने वाले खर्च को घटाया जा रहा है  और पूरे रक्षा क्षेत्र में होने वाले खर्च को बढ़ाया जा रहा है।

आज हालत यह है कि भारत अपनी रक्षा जरूरतों के लिए आवश्यक सामग्री के 70 फीसद का आयात करता है। पर इस आयात को कम करने की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं दिखती। सही मायने में इसे विदेशपरस्ती और खास तौर पर अमेरिकापरस्ती के तौर पर देखा जाना चाहिए। अमेरिका के साथ हुए परमाणु करार के बाद तो भारत कहने को उसका रणनीतिक साथी बन गया है। पर सही मायने में भारत को एक बड़ा बाजार मानकर दोहन करने के लिए अमेरिकी कंपनियां कमर कस चुकी हैं। इस बाबत सबसे दुर्भाग्यपूर्ण तो यह है कि यहां की सरकार भी यहां के लोगों के हितों की परवाह किए बगैर उनके साथ कदमताल करती दिख रही है। सरकार का हर कदम इस बात की पुष्टि करता हुआ स्पष्ट तौर पर दिखता है। सरकार का यही रवैया रहा तो यह अंदाजा लगा पाना भी बेहद मुश्किल हो जाएगा कि भारत किस हद तक अमेरिकापरस्ती की दिशा में बढ़ेगा।


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क्या सचमुच हमें इतने हथियार चाहिए?

राजकिशोर   Tuesday April 24, 2012
भारत की सामरिक क्षमता और हथियार नीति के बारे में दो खबरें साथ-साथ आई हैं। पहली खबर का संबंध अग्नि-5 मिसाइल के सफल परीक्षण से है। इस परीक्षण के बाद भारत दुनिया के पांच देशों के सुपर क्लब में शामिल हो गया है। अमेरिका, चीन, फ्रांस और रूस के बाद अब यह क्षमता हमारे देश ने विकसित कर ली है। इससे भारतवासियों का सीना आत्मगौरव से फूल उठा है तो स्वाभाविक ही है। आखिर कोई तो सूची है जिसमें हमारा देश अमेरिका, फ्रांस और रूस जैसे संपन्न देशों और अपने पड़ोसी देश चीन के साथ मौजूद है। चीन का महत्व इसलिए है कि एक बार उसके सामने हम मुंह की खा चुके हैं।

दूसरी खबर प्रसन्न करनेवाली है या दुखी करनेवाली, यह तय करना आसान नहीं है। एक ओर हथियार की टेक्नोलॉजी में हमारा दर्जा ऊपर से ऊपर उठता जा रहा है, पर दूसरी ओर हथियार आयात का हमारा बिल कम नहीं हो रहा है। एक अनुमान के अनुसार, भारत इस समय दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक देश है। सन  2007 और 2011 के बीच यानी कुल पांच वर्षों में भारत के हथियार आयात में 38 प्रतिशत बढ़ती हुई। 2010 में हमने 333 करोड़ अमेरिकी डॉलर की कीमत के हथियार खरीदे। हमारे बाद दूसरे नंबर पर था सऊदी अरब, जिसने 258 करोड़ अमेरिकी डॉलर की कीमत के हथियार खरीदे। इस सूची में कुछ अन्य नाम हैं दक्षिण कोरिया, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया, पाकिस्तान, चीन ग्रीस आदि। ये रकमें बहुत ज्यादा नहीं हैं। अरबों के पाँच-सात घोटाले तो हमारे देश में हर साल आराम से हो जाते हैं। लेकिन यह सूची भी बहुत गौरवपूर्ण नहीं है। ये देश दुनिया के सबसे उन्नत देशों में नहीं हैं।

इस संदर्भ में भारत द्वारा हथियारों के निर्यात की तस्वीर भी देख लेनी चाहिए। भारत अगर एक सभ्यता और संस्कृति का नाम भी है, अगर दुनिया को देने के लिए कोई संदेश इसके पास है, तो हम ऐसे भारत पर कदापि गर्व नहीं कर सकते जो विश्व बाजार में हथियार बेचता हो। हथियार बनाना और उनका आयात करना आत्मरक्षा के लिए जरूरी है। हमारे लिए तो और भी ज्यादा, क्योंकि एक बार हम गच्चा खा चुके हैं। लेकिन हथियारों का निर्यात करना एक और तरह की घटना है। इसका लक्ष्य युद्ध की संस्कृति को बढ़ावा देने के अलावा और क्या हो सकता है? दुनिया भर में सबसे बड़ा हथियार उद्योग संयुक्त राज्य अमेरिका का है और युद्ध-मुक्त तथा शांति-पूर्ण विश्व की रचना में उसकी क्या भूमिका है, यह हर कोई जानता है। इसलिए यह सुन कर हमें खुश नहीं होना चाहिए कि भारत हथियारों का निर्यात भी करता है। हर देश को अपनी जरूरत भर के हथियार ही बनाने चाहिए। हथियार एक भयानक चीज है। यह मानवता का दुर्भाग्य है कि आज भी उससे बचा नहीं जा सकता। चूँकि दूसरे हथियार बनाते और रखते हैं, इसलिए हमें भी बनाने और रखने पड़ते हैं। लेकिन हथियार बना कर किसी और देश को बेचने का कोई सभ्य तर्क नहीं हो सकता।

इस खुशी की बात है कि दुनिया के 16 बड़े हथियार निर्यातक देशों में हमारे देश का नाम नहीं है। हम पांचवें या छठे सवारों में हैं। एक रिटायर मेजर-जनरल के अनुसार, हमारे हथियार निर्यात का स्तर हास्यास्पद बिंदु पर पहुंच चुका है। सन 2008-09 में हमने 41 करोड़ रुपए के हथियार बेचे थे। 2009-10  में हमने सिर्फ 12 करोड़ रुपए के हथियार बेचे। भारत में कलम का बाजार ही 1600 करोड़ रु. का बताया जाता है। इस मेजर-जनरल के मुताबिक, यह ��स��ताहाली हमारे द्वारा बनाए जानेवाली सामरिक वस्तुओं की निम्न क्वालिटी की वजह से है। निर्यात के लिए हम बड़े-बड़े आइटम नहीं बनाते - छोटे-छोटे आइटम बनाते हैं और वह भी इतना खराब कि विश्व बाजार में उनकी कोई पूछ नहीं है। हथियार बेचने के मामले में चीन से हमारी कोई तुलना नहीं है। 2010 में उसने 142 करोड़ अमेरिकी डॉलर के हथियार बेचे थे।  इससे यह निष्कर्ष भी निकलता है कि उच्चतर टेक्नोलॉजी के मामले में हम एक स्तर पर भले ही अमेरिका, फ्रांस, रूस और चीन के बराबर हो गए हों, पर निम्नतर टेक्नोलॉजी से बननेवाले हथियारों के उत्पादन और क्वालिटी के मामले में हम फिसड्डी हैं।  तभी तो हमें इतने बड़े पैमाने पर हथियारों का आयात करना पड़ता है। यह मान लेना ठीक नहीं होगा कि सिर्फ घोटाला करने के लिए हथियारों की खरीद बढ़ाई जाती रही है।

जब भारत ने परमाणु बम बनाने की क्षमता हासिल कर ली और परमाणु विस्फोट के माध्यम से यह जगजाहिर भी हो गया, तब  हमारे देश में दो तरह की प्रतिक्रियाएं हुई थीं। एक पक्ष का कहना था कि परमाणु बम बनाने के क्षेत्र में उतर कर भारत ने बहुत बड़ी भूल की है। यह हमारी विश्व नीति के खिलाफ है। दूसरे पक्ष में बहुत थोड़े-से लोग थे। इनका कहना था कि परमाणु बम अल्टिमेट हथियार है - इसके बाद प्रतिरक्षा बजट पर खर्च कम हो जाता है। माना जाता है, पाकिस्तान के पास भी परमाणु बम बनाने की क्षमता है। समानता के इस तर्क से भारत और पाकिस्तान के बीच अब युद्ध हो ही नहीं सकता। सीमा पर छिटपुट झड़पें जरूर चालू रहेंगी। लेकिन जिसे परमाणु लाभांश (न्यूक्लीयर डिविडेंड) कहा जा सकता हो, ऐसी कोई चीज अभी तक देखने में नहीं आई है। यह परमाणु बम के दर्शन का अपमान है।

पूरी स्थिति पर गौर करने से, स्वाभाविक रूप से यह सवाल जेहन में आता है : क्या वास्तव में हमें इतने हथियार चाहिए? क्या यह बेहतर नहीं होगा कि हम अपनी परमाणु क्षमता का विस्तार करें तथा अन्य हथियार सिर्फ वे बनाएँ जिनकी जरूरत सीमा पर होनेवाली मामूली झड़पों के दौरान होती है? क्या इक्कीसवीं सदी में यह मुमकिन है कि कोई ताकतवर देश अपने पड़ोसी देश पर कब्जा कर ले? क्या चीन ऐसा सोच भी सकता है? क्या पाकिस्तान या बांग्लादेश के लिए यह संभव है? हथियारों के मामले में पूरी तरह से तैयार और लैस रहने के परंपरागत विचारों पर प्रश्नचिह्न लगाने का समय आ पहुंचा है। इस पर भावुकता से नहीं, वैज्ञानिक वस्तुपरकता के साथ विचार किया जाना चाहिए।
http://blogs.navbharattimes.indiatimes.com/rajkishore/entry/%E0%A4%95-%E0%A4%AF-%E0%A4%B8%E0%A4%9A%E0%A4%AE-%E0%A4%9A-%E0%A4%B9%E0%A4%AE-%E0%A4%87%E0%A4%A4%E0%A4%A8-%E0%A4%B9%E0%A4%A5-%E0%A4%AF-%E0%A4%B0-%E0%A4%9A-%E0%A4%B9-%E0%A4%8F