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Tuesday, 22 January 2013

नकद हस्तांतरण लाएगा तबाही

नकद हस्तांतरण लाएगा तबाही

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/22/2013 10:25:00 AM

कुछ समय पहले शुरू की गई सब्सिडियों के नकद हस्तांतरण की योजना और आधार के अनुभवों के बारे में बता रहे हैं पत्रकार प्रफुल्ल बिदवई.
संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग ) सरकार आधार यूनीक पहचान (यूआईडी) के आधार पर नकद हस्तांतरण की विशाल परियोजना शुरू करने जा रही है जिसका मकसद लोगों तक सार्वजनिक सेवाओं को सीधे पहुंचाना है। इस परियोजना को सरकार देश के 51 जिलों में नए साल के पहले दिन से चलाने की जल्दी में है जिसके अंर्तगत वृध्दावस्था और विधवा पेंशनों, मातृत्व लाभ और छात्रवृति जैसी 34 योजनाएं आती हैं; यह खाद्य, स्वास्थ्य सुविधाओं और ईंधन तथा खाद सब्सिडयों के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली (साविप्र) जैसी तमाम योजनाओं को आधार आधारित नकद हस्तांतरण (आआनह) के अधीन लाने की दिशा में एक कदम है।

साफ है कि संप्रग यह मानता है कि यह एक ऐसी अचूक गोली है जिससे गरीब-समर्थक योजनाओं का न केवल खर्च घटाने बल्कि चुनाव जीतने में भी मदद मिलेगी। 14 दिसंबर को राहुल गांधी ने कांग्रेस पदाधिकारियों से कहा था कि ''क्रांतिकारी'' परियोजना से अगले दो आम चुनावों में पार्टी की जीत उसी तरह से पक्की हो जाएगी जैसे कि 2009 में किसानों के कर्जों को माफ करने से हुई थी।

अगले ही दिन दिल्ली की कांग्रेस सरकार ने ''अन्नश्री'' योजना की शुरूआत कर दी जिसके अंर्तगत दो लाख परिवारों को खाद्य सामग्री खरीदने के लिए प्रति माह 600 रु. दिए जाने हैं। और शीला दीक्षित ने तत्काल यह बकवास कर दी 600 रु. से पांच लोगों के परिवार की खाद्य संबधी जरूरतों को पूरा करने के लिए 600 रु. काफी हैं -जबकि असल में महज जिंदा रहने के लिए खाद्य पदार्थ खरीदने को इससे पांच गुने की जरूरत है। 

यूआईडी के विवादास्पद विचार में मिठास लाने और स्वीकार्य बनाने के लिए, खबर है कि संप्रग 40 करोड़ लोगों को 100 घंटे के मुफ्त टॉक आइम और 500 मुफ्त एसएमएस के साथ आधार-समर्थ स्मार्ट मोबाइल फोन उपहार में देने जा रही है जिनमें इंटरनेट की सुविधा भी होगी। इससे प्रदर्शित होता है कि मूल सुविधाएं प्रदान करने के बजाए सरकार को ज्यादा चिंता मुफ्त की चीजों को बांट कर आधार को आगे बढाने की है, सिर्फ जिन पर ही 7000 करोड रु. का अतिरिक्त खर्च आएगा।

यह सोच कि आआनह से ''खेल बदल जाएगा'' और संप्रग की लोकप्रियता तत्काल बढ़ जाएगी बुनियादी तौर पर गलत है। सर्वेक्षण से प्रदर्शित होता है कि 90 फीसदी से यादा गरीब नकद हस्तांतरण की तुलना में, जिसके दुरूपयोग की गुंजाइश रहती है, खाद्य पदार्थ साविप्र से लेना पसंद करते हैं।  जैसा कि हाल ही में इस स्तंभ में कहा गया था यूआईडी परियोजना प्रोद्योगिक, प्रशासनिक और संभार तंत्रीय समस्याओं से भरी पड़ी है। यह उंगलियों के निशानों (जो 15 फीसदी से यादा मामलों में लोगों की पहचान नहीं कर पाते हैं) और आंख की पुतली के स्केन (जो मातिया बिंद तथा आंखें की अन्य समस्याओं के चलते विश्वास योग्य नहीं रहते हैं) जैसे अविश्वसनीय चिह्नों का इस्तेमाल करती, और डाटा की सुरक्षा तथा राय की संस्थाओं द्वारा निजी जानकारी के दुरूपयोग जैसी गंभीर समस्याएं पैदा करती है।

यूआईडी परियोजना बेहद खर्चीली है (संभवतया एक लाख करोड रु. से अधिक की) और इसे ग्रेट ब्रिटेन तक छोड़ चुका है। इसमें गरीबी रेखा के नीचे की सूचियों में, जो पहले से ही 40 फीसदी गरीबों को इससे बाहर रखने के लिए बदनाम हैं, वास्तव में पात्र लाभार्थियों को बाहर रखने और अपात्रों को गलत ढंग से शामिल किए जाने जैसी गंभीर गलतियां हो सकती हैं। जिन सरकारी अधिकारियों ने गरीबी रेखा के नीचे की सूचियों को असरदार लोगों के प्रभाव में तैयार किया है वो ही यूआईडी की सूचियां भी बनाएंगे। प्रत्येक गरीब परिवार को बाहर किए जाने का अर्थ है कम से कम दो मतदाताओं से हाथ धो बैठना ।

यूआईडी को कोई वैधानिक या कानूनी आधार नहीं है। योजना को वैधानिक समर्थन देने के लिए भारतीय रार्ष्ट्रीय पहचान प्राधिकरण विधेयक 2009 पर विचार करते हुए संसद की स्थाई समिति (वित्त ) ने इस परियोजना को ''दिशाहीन'' और ''स्पष्ट उद्देश्य'' से हीन कहा था। इसने यूआईडी प्रोद्योगिकी 'अपरीक्षित, अप्रमाणित, अविश्वसनीय और असुरक्षित कहा था।

यूआईडी को बैंक खातों या माइक्रो-एटीएम जैसे दस्ती साधनों, जिनके जरिए बैंकिंग करेस्पोंडेट्स (बीसी) लोगों को नकदी का भुगतान करेंगे, के साथ जोडे ज़ाने से योजना की जन्मजात अनिश्चितताएं और जोखिम और बढ़ जाएंगे। ये तमाम युक्तियां केंद्रीकृत डाटाबेसों, इंटरनेट सपंर्क तथा भरोसेमंद बिजली आपूर्ति पर निर्भर हैं। परंतु ग्रामीण क्षेत्रों में तो बिजली अक्सर ही कई कई दिनों तक नहीं आती है और जब आती भी है तो आपूर्ति में उतार चढाव होते रहते है। योजना बैंकिंग करेस्पोंडेट्स को पूरी तरह से ईमानदार मान कर चलती है, जबकि वे गरीबों के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रस्त और उनके विरोधी हो सकते हैं।  ये समस्याएं उन दो जिलों में सामने आईं थी जिनमें आआनह की अग्रिम परियोजना को एक साल पहले शुरू किया गया था। झारखंड के रामगढ़ जिले में मनरेगा के अंर्तगत भुगतान आआनह के अधीन किए गए थे।  भयानक परिणाम सामने आए। जिला प्रशासन काम का बोझ ही संभाल नहीं सका। आबादी का वो अनुपात जिससे यूआईडी की संख्याएं और कल्याणकारी योजनाओं के विवरण मेल खाते हैं दो प्रतिशत से भी कम है। ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश का कहते हैं कि योजना को उपयोगी होने के लिए इसके अंर्तगत कम से कम 80 प्रतिशत को आना चाहिए।

सेवाओं के स्थान पर नकदी प्राप्त करने के लिए लोगों को बैंक खाते खोलने होंगे। लेकिन बैंकों शाखाएं पर्याप्त संख्या में है ही नहीं। भारत के 6 लाख से अधिक गांवों में इनकी कुल 32,000 शाखाएं हैं। रामगढ़ की अग्रणी बैंक ने आधार संबंधी काम को एक टेलीकॉम कंपनी को सौप दिया जिसने इस काम के लिए बैंकिंग करेस्पोंडेट्स को काम पर रख लिया। लेकिन इन बैंकिंग करेस्पोंडेट्स को समय से भुगतान नहीं हुआ और इससे उनकी दिलचस्पी लगभग खत्म हो गई। इस तरह से रामगढ में मनरेगा में होने वाले भुगतान के केवल 3 प्रतिशत लक्ष्य को ही प्राप्त किया है।  रामगढ के एक ब्लॉक में 8,231 ''सक्रिय'' कार्ड धारकों में से केवल 162 को ही आआनह के जरिए भुगतान हो पाया है। एक अन्य ब्लॉक मे 45 लाभार्थियों पेंशन देने के लिए जब उंगलियां के निशानों की पुष्टि करने का प्रयास किया गया, तो यह केवल 9 मामलों में सफल हो पाया। और भुगतान उनको भी आआनह के जरिए नहीं किया गया है।  इलाके के बैंकिंग करेस्पोंडेंट के अनुसार मनरेगा के आधे मजदूरों की उंगलियों के निशान मेल नहीं खाते हैं। दि हिंदू की एक खबर के अनुसार एक गरीब मजदूर ने माइक्रो-एटीएम पर अपनी उंगलियों के निशान को 15 बार मिलाने की कोशिश की लेकिन सफल नहीं रहा। बैंकिंग करेस्पोंडेट्स ने उस बेचारे से तीन चार दिन तक अपनी उंगलियों पर बोरो प्लस या वेसलीन मलने के बाद फिर से आने को कहा।

कहीं यह न सोच लिया जाए कि झारखंड में ऐसा राय के पिछड़ेपन और अक्षम नौकरशाही के कारण हुआ था। विफलता का एक अन्य उदाहरण राजस्थान में अलवर जिले के एक संपन्न गांव में सामने आया है-हांलांकि राजस्थान को अपेक्षाकृत एक बेहतर शासित प्रदेश माना जाता है जिसमें मनरेगा का प्रदर्शन देश में सबसे अच्छा रहा है।

एक साल पहले सरकार ने कोटकासिम गांव के 25,843 राशनकार्ड धारको को 15.25 रु..प्रति लीटर की दर से केरोसिन बेचना बंद कर दिया और इसकी जगह उनसे 49.10 प्रति लीटर की बाजार दर से पैसे वसूल किए। इस अंतर को प्रत्येक तीन महीने में उनके खाते में जमा किया जाना था। लेकिन उस क्षेत्र में बैक की शाखा औसतन तीन किलोमीटर है और कुछेक के लिए तो 10 किलोमीटर तक है। इसलिए बैंक खाता कुल परिवारों के केवल 52 प्रतिशत ही बैंक खाता खुलवा पाए। बाकी तो योजना से ही बाहर हो गए।  कुछ परिवारों को मूल्य में अंतर की पहली किस्त मिली और उसके बाद कुछ नही। ज्यादातर को पूरे साल कुछ नहीं मिला। इस बीच केरोसिन की बिक्री 84,000 लिटर से घट कर सिर्फ 5000 लिटर रह गई यानी 94 प्रतिशत कम हो गई। लोगों को सूखी टहनियों, कपास और सरसों के डंठलों या उस सब खरपतवार को जला कर काम चलाना पड़ रहा है जिससे ईंधन की जरूरत पूरी नहीं होती और प्रदूषण फैलता है।

कोटकासिम के लोग इतने दुखी और नाराज हैं कि वे चाहते हैं कि नकद सब्सिडी की योजना को पूरे राजस्थान में लागू कर दिया जाए ताकि उनकी ही तरह इसके परिणाम सब ही भुगत सकें।

इस तरह की मिसालें उन दूसरे जिलों से भी मिल सकती हैं जिनमें नकद हस्तांतरण योजना चलाई जा रही है। अभी तक आधार पहचान संख्या दो तिहाई से कम लाभार्थियों को मिल पाई है। उनमें अधिकतर उन 20 जिलों में है जिनमें यह 80 से 90 प्रतिशत है। विडंबना यह है कि सबसे बुरी हालत महाराष्ट्र के नांदूरबार जिले में है जहां सितंबर 2010 में सबसे पहला यूआईडी पंजीकृत किया गया था। वहां आधार के अंर्तगत अब भी केवल 28 प्रतिशत आबादी ही है।

सरकार इन नीची संख्याओं का इस्तेमाल लोगों में हड़बड़ी पैदा करने के लिए कर रही है कि वे जल्दी से आधार पंजीकरण केंद्रों पर पहुंचें, और दूसरी ओर यह सार्वजनिक वितरण प्रणाली को कमजोर करने और इसकी जगह नकद हस्तांतरणों को लाने, ग्रामीण बाजारों पर निजी पूंजी को थोपने की तैयारी कर रही है। आधार को किसी प्रकार से नकद हस्तांतरणों से जोड़ना गलत है क्योंकि इससे भारी बिखराव और समस्याएं पैदा होने जा रही हैं। बहुत से प्रबुध्द समाज विज्ञानियों द्वारा जारी बयान हमसे ''उस बुजुर्ग के बारे में सोचने का आग्रह करता है जो अभी तक अपनी पेंशन स्थानीय डाकघर से प्राप्त करता है, लकिन उसे यूआईडी समर्थ बैंक में खाता खुलवाने के लिए इधर उधर चक्कर काटने पडते हैं, और फिर उसे पता चल सकता है कि उसकी उंगलियों के निशान ही नहीं मिल रहे हैं, सम्पर्कता की समस्या है या बिजली नहीं है अथवा ''बिजनेस कारोसपोंडेन्ट'' छुट्टी पर है वगैरह वगैरह। उसकी पेंशन को आधार के आसरे छोड़ने का कोई मतलब नहीं है।

खाद्य सामग्री तथा जिन दूसरी चीजों की आपूर्ति साविप्र के माध्यम से की जाती है उनके लिए नकद हस्तांतरण योजना और भी गलत है। करोड़ों गरीब परिवारो के लिए साविप्र से मिलने वाला भोजन अधिक पोषक और आर्थिक रूप से सुरक्षित है; इसने पूरे अभाव के हालत को बड़ी हद तक कम किया है। हाल के अनुभव से पता चलता है कि अनेक रायों में साविप्र में सुधार हुआ है। साविप्र में और भी सुधार किए जा सकते हैं। हमें एक लक्षित साविप्र के विरूध्द एक सर्वजनीन साविप्र के साथ एक राष्ट्रीय भोजन सुरक्षा एक्ट की तत्काल जरूरत है।  भारत के ग्रामीण बाजार ज्यादातर कम विकसित हैं। यह सोचना समझदारी की बात नहीं होगी कि नकद पैसे से आपको भोजन या स्वास्थ्य की वों सुविधाएं मिल सकेंगी जो स्थानीय तौर पर मौजूद ही नहीं हैं। साविप्र को खत्म करने से खाद्य पदार्थों का प्रवाह टूट जाएगा और बहुत से लोगों को लुटेरे व्यापारियों और बिचौलियों के रहमो-करम के हवाले हो जाएंगे। इससे चोट खास तौर पर अकेली महिलाओं, अशक्तों और बुजुर्गों पर होगी जो बैंकों से पैसे निकाल कर खाद्य सामग्री खरीदने के लिए आसानी से बाजार नहीं जा सकते हैं। नकद हस्तांतरण से परिचलन में भारी मात्रा में पैसा आएगा जिससे मुद्रास्फीति बढ़ेगी और लोगों की य शक्ति कम होगी।

वृध्दावस्था और विधवा पेंशन, मातृत्व सहायता और छात्रवृत्ति के लिए तो नकद हस्तांतरण ठीक हो सकता है, लेकिन खाद्य सामग्री, ईंधन और अन्य आवश्यकताओं के लिए बिल्कुल भी नहीं। नकद हस्तांतरण अधिक से अधिक सार्वजनिक सेवाओं की व्यवस्था के लिए पूरक का काम कर सकते हैं। गरीबों के प्रति अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करने के स्थान पर इसको स्थापित करके संप्रग तबाही को ही न्योता देगा।