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Monday, 20 February 2012

पिछले पच्चीस-तीस सालों में उत्तराखंड के सबसे तेजी से उभरे नगर हल्द्वानी पर हमारे निरन्तर और विशेष आग्रह पर हल्द्वानी के वरिष्ठतम पत्रकार आनन्द बल्लभ उप्रेती ने एक ग्रन्थ लिखा है।








घामतपवे भाबर से साइबर युग में फटक मारता हल्द्वानी

लेखक : आनन्द बल्लभ उप्रेती :: अंक: 07 || 15 नवंबर से 30 नवंबर 2011:: वर्ष :: 35 : November 30, 2011  पर प्रकाशित
(पिछले पच्चीस-तीस सालों में उत्तराखंड के सबसे तेजी से उभरे नगर हल्द्वानी पर हमारे निरन्तर और विशेष आग्रह पर हल्द्वानी के वरिष्ठतम पत्रकार आनन्द बल्लभ उप्रेती ने एक ग्रन्थ लिखा है। इसके पुस्तकाकार में प्रकाशित होने से पूर्व हम इसके महत्वपूर्ण अंश धारावाहिक रूप से नैनीताल समाचार के पाठकों के लिये प्रकाशित कर रहे हैं। -सम्पादक)
haldwani'हल्द्वानी' यह नाम सब से पहले बचपन में मैंने अपने बड़बाज्यू (स्व. चिन्तामणि उप्रेती) से सुना। वे अक्सर बातों में हल्द्वानी का जिक्र किया करते थे। बचपन में हमारे आसपास ऐसे बहुत से बुजुर्ग थे जो अक्सर अपने से सम्बंधित कुछ स्थानों का हवाला बात-बात पर दिया करते थे। बच्चों के लिए ये नाम बहुत जिज्ञासापूर्ण हुआ करते थे। सौ साल से अधिक उम्र के शोबनदा अक्सर बीरभट्टी की रट लगाए रहते और मेरे पिता जी (स्व. राधा बल्लभ उप्रेती) बम्बई और बर्मा की। इन स्थानों के नाम ही हमारे लिए जिज्ञासा भरे नहीं होते थे, वरन् उनसे जुड़े कई किस्से-कहानियाँ हमारे लिए महत्वपूर्ण तो थे ही, एक अलौकिक अनुभूति भी दे जाते थे। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सन् 1940 में जब पिता जी और उनके कई साथी बर्मा छोड़ कर पैदल आसाम के खासी-जयंती के बीहड़ जंगलों को पैदल पार करते हुए 3 महीनों में हिन्दुस्तान पहुँचे तो जाहिर है इस दुरूह यात्रा के संस्मरण भी 'स्पेन्सर' की 'फेयरी क्वीन' से कम रोमांचित करने वाले नहीं होंगे।
मेरे बड़बाज्यू दो भाई थे। उनका मूल निवासस्थान गंगोलीहाट जिला अल्मोड़ा (बाद में पिथौरागढ़) था। उनका अधिकांश समय भाबर यानी हल्द्वानी के आसपास ही गुजरा था। होलियों से पूर्व वे अपने घर पहाड़ पहुँचते और दीपावली का पर्व मना कर भाबर की यात्रा पर चल पड़ते। तब पहाड़ में गाडि़याँ नहीं चलती थीं। पैदल ही चल कर यात्रा पूरी करनी होती थी। बाद में दो घोड़े भी उन्होंने यात्रा के लिए रख लिए थे। वे बताते थे कि चारधाम यात्रा भी उन्होंने छह महीने पैदल चल कर पूरी की थी। प्रातःकाल जब वे बड़ी तन्मयता से ''पवन मंद सुगन्ध शीतल हिम मंदिर शोभितम्, निकट गंगा बहत निर्मल श्री बदरीनाथ विश्वम्भरम्।'' गाते तो लगता कि वे कहीं दूर बद्रीनाथ की हिममंडित चोटियों में विचरण कर रहे हैं। उनका एकाग्र होकर गाना मुझे भी रोमांचित कर जाता था। उनके जीवन का सबसे दुःखद क्षण था उनके बड़े भाई (स्व. कान्ति बल्लभ उप्रेती) की मृत्यु का। उसके बाद उन्होंने भाबर आना-जाना बन्द कर दिया। वे बताते थे कि गौलापार किशनपुर में उनके पास एक खेत था, गायें भी पाली थीं किन्तु बड़े भाई की मृत्यु के बाद खेत व गायों को मात्र सौ रुपये में बेच कर पहाड़ चले आए। उनके पास हल्द्वानी और उसके आसपास की तत्कालीन जीवनशैली, जनजीवन के सम्बंध में किस्से-कहानियों का अम्बार था। दरअसल ये किस्से-कहानियाँ उनके जीवन की अनुभूत धरोहरें थीं। वे बताते कि एक बार वे गौलापार से हल्द्वानी की ओर गौला नदी की ओर से आ रहे थे तो उनका सामना शेर से हो गया। मरना तो है ही, ऐसा सोच कर उन्होंने छाता खोल दी और शेर की ओर तान कर उसे खोलने व बन्द करने लगे। शेर की समझ में क्या आया क्या नहीं, वह तेजी से जंगल की ओर भाग गया। खत्तों में जानवरों के साथ रहने वाले गूजरों की जीवन पद्धति पर भी अक्सर वे बहुत कुछ बताया करते थे। तब भाबर में इस तरह के खत्तों की भरमार थी और पहाड़ से जाड़ों में मय परिवार के बैलगाडि़यों में गृहस्थी का सामान लाद कर लोग यहाँ पहुँचते थे और मेहनत मजदूरी कर होलियों से पहले पहाड़ की ओर रुख करते थे। खाली पड़ी भूमि में या बगीचों में वे अपना डेरा जमा लेते और खुले आसमान के नीचे ही सोते थे। उन दिनों जाड़ों में आजकल का जैसा कोहरा नहीं पड़ता था। जंगलों व बगीचों का कट जाना मौसम में भारी परिवर्तन पैदा कर गया है।
उन दिनों पहाड़ में यातायात के साधन सुलभ नहीं थे और बुढ़ापे के कारण वे पैदल चल कर हल्द्वानी पहुँचने लायक नहीं रह गए थे किन्तु उनकी उत्कट अभिलाषा थी कि वे एक बार अपनी हल्द्वानी देखें। जाड़ों में जब बहुत ठंड बढ़ जाती तो उन्हें भाबर के घाम बहुत ही याद आते। यों भाबर के घाम और मलेरिया जानलेवा समझे जाते थे और पहाड़ के लोग भाबर में बसने का मतलब मौत के मुँह में जाने के बराबर समझते थे। बच्चे बुजुर्गों की भाबर के बारे में कही जाने वाली बातों और किस्सों से सहम से जाते। उन्हीं दिनों मोटर मार्ग की सर्वे होने लगी थी और बड़बाज्यू को उम्मीद जगी कि अब जल्दी ही हल्द्वानी तक मोटर जा सकेगी और वे एक बार वहाँ जरूर जायेंगे। सर्वे के कई वर्षों बाद जब आसपास के गाँववासियों से मोटर मार्ग के लिए प्रारम्भिक खुदान का काम श्रमदान से करवाने की बारी आयी तो वे कुदाल लेकर पहले पहुँच गए। लेकिन उनके जीते जी मोटर सड़क नहीं बन पायी।
मेरे बड़बाज्यू हल्द्वानी को जिसे हम कुमाउनी में हल्द्वा्णि कहा करते हैं को हल्द्वाँणि कहा करते थे। पहाड़ में जहाँ बांज के पेड़ अधिक होते हैं, उसे बजाँणि, जहाँ चीड़ (सल्ल) के पेड़ अधिक होते हैं उसे सलाँण, जहाँ पत्थर ही पत्थर होते हैं उसे ढुँघाण कहा करते हैं, उसी तरह हल्द्वानी में पहले हल्दू के पेड़ अधिक हुआ करते थे इसलिए उसे हल्द्वाँणि कहा जाने लगा। वर्तमान हल्द्वानी के निकट मोटा हल्दू और हल्दूचौड़ गाँव हैं। पूर्व में मोटाहल्दू के निकट वाले क्षेत्र को ही हल्द्वाँणि यानी हल्द्वानी कहा जाता था। यहाँ फूस के छप्परों में लोग रहा करते थे। कहा जाता है कि 1834 में ट्रेल साहब ने इसे बसाया था। सन् 1850 से यहाँ पक्के मकान बनने लगे और नगर का विस्तार होने लगा। मोटा हल्दू एक गाँव मात्र रह गया और आबादी वर्तमान हल्द्वानी की ओर बढ़ने लगी। किन्तु अब मोटाहल्दू-हल्दूचौड़ भी इस शहरी विस्तार में शामिल हो गए Haldwani-mangal-paravहैं। आजकल जिसे मंगल पड़ाव या पैंठ पड़ाव कहा जाता है, उस स्थान पर मंगल के दिन बाजार लगा करती थी और लोग अपनी जरूरत की वस्तुयें खरीदा करते थे। अब मंगल पड़ाव केवल नाम रह गया है। यों अब भी कुछ बंजारे मंगल के दिन चावल वगैरह लेकर पुरानी परम्परा का निर्वहन करते हैं, किन्तु अब यहाँ मुस्तकिल बाजार बन जाने से पैंठ लगाने के लिए न स्थान रह गया है और न पैंठ से कुछ खरीदने का आकर्षण ही रह गया है। बंजारों, तेलियों और सब्जी वालों की बसासत ही इस पैंठ के कारण हल्द्वानी में हुई। इस पैंठ से ही आम उपभोक्ता वस्तुयें लोग खरीदते थे। पूर्व में पीपल टोला और अब पटेलचौक कहे जाने वाले स्थान पर मिर्च, घी, शहद, हल्दी, अदरख, आदि का साप्ताहिक बाजार था। कपड़ा, गुड़, बिसातखाना, मिश्री, गट्टा पैंठ पड़ाव से लेकर क्ले बाजार, पियरसनगंज, सदर बाजार में इन दिनों बिका करते थे। हल्द्वानी का मंगल का साप्ताहिक बाजार ही यहाँ के निवासियों, आसपास के भाबरी व तराई गाँवों की खरीद-फरोख्त का एकमात्र आधार था। यही नहीं, कुमाऊँ का यह प्रवेश द्वार कमोबेश इस अंचल की प्रमुख मंडी के रूप में परिवर्तित हो गया। आज बाजारों का स्वरूप भले ही बदल गया है, लेकिन जो किफायती सामान पैंठों में मिला करता था वह नियमित दुकानों में नहीं मिल पाता है। जनसंख्या बढ़ी, जरूरतें बढ़ीं, स्थायी बाजार बसे पर रुपये की कीमत घटते चले जाने से आम खरीददार की हालत पतली होती चली गई। नतीजतन सस्ते की तलाश में साप्ताहिक पटरी बाजारों की जरूरत हुई और इस जरूरत को पूरा करने के लिए कम पूँजी वालों, रोजगार की तलाश में घूमने वालों से दूसरे शहरों की तरह हल्द्वानी में सन् 2004 में साप्ताहिक 'शनि बाजार' की शुरुआत हुई। क्योंकि शनिवार हल्द्वानी में साप्ताहिक बंदी का दिन है (सन् 1968 तक बाजार बंदी का दिन रविवार था) और दुकानें बन्द रहती हैं। इस बाजार की लोकप्रियता हल्द्वानी से दूर पर्वतीय क्षेत्रों से लेकर तराई के ग्रामीण अंचलों तक और भाबर के शहरों व गाँवों तक पहुँच गई। इस बाजार से जहाँ बहुत बड़े क्षेत्र का आम उपभोक्ता लाभान्वित हुआ, वहीं हल्द्वानी समेत आसपास के फुटकर व्यापारियों, पैकारों, फेरीवालों को रोजगार का माध्यम मिला। ये वे लोग थे जो ऊँचे किराये पर या पगड़ी पर दुकानें नहीं ले सकते हैं। ये कम से कम मुनाफा लेकर जनसाधारण को उसकी जरूरत का सामान उपलब्ध कराने लगे। स्वाभाविक है कि इस बाजार में भीड़ बढ़ने लगी। लेकिन शहर के ही इस इलाके के कुछ व्यापारियों को इस बाजार से अपने मनमाने व्यवसाय में फर्क पड़ने लगा और उन्होंने इस बाजार को हटाने के कई तर्क-कुतर्क देकर प्रशासन के सामने कानून व्यवस्था का सवाल उपस्थित कर दिया और बड़ी जद्दोजहद के बाद इन लोगों को नवीन सब्जी मंडी के पास ट्रंचिंग ग्राउंड में बाजार के लिए स्थान उपलब्ध कराया गया। किन्तु इस बाजार की वह उपयोगिता व रौनक लगभग खत्म सी होकर रह गई।
इसी मंगल पड़ाव में एक 'होली हाता' भी है, जहाँ होलिका दहन होता है। लेकिन अतिक्रमणकारियों ने इसे भी नही छोड़ा है। हर साल होलिका दहन के अवसर पर विवाद उठ खड़ा होता है। नगरपालिका यदि चाहे तो मंगलपड़ाव में बहुत बड़ा व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स बना सकती है, जिसके भूतल परं पार्किंग की अच्छी व्यवस्था हो सकती है और प्रथम तल में वर्तमान में स्थित सब्जी मंडी, फल व्यवसायियों के साथ वहाँ बसे अन्य दुकानदारों को स्थान दिया जा सकता है। इसके अलावा भी उसमें बहुत से लोगों को स्थान उपलब्ध कराया जा सकता है। द्वितीय तल में बैंक या अन्य कार्यालयों को स्थान दिया जा सकता है। बाजार में अव्यवस्थित बढ़ रही भीड़ व यातायात को भी नियंत्रित किया जा सकता है और शहर के इस प्रमुख स्थान को आकर्षण का केन्द्र बनाया जा सकता है। इस योजना पर कई बार चर्चा होती रही है, लेकिन कार्यरूप नहीं दिया जा सका है। वोटों की राजनीति और नौकरशाही की कमजोर इच्छा शक्ति यहाँ प्रस्तावित शापिंग काम्प्लेक्स के निर्माण में बड़ा रोड़ा है। वर्ष 1997 में नगरपालिका में स्वीकृत यह योजना प्रशासन की मजबूत इच्छा शक्ति में कमी के कारण वार्ताओं के कई दौर के चलते भी क्रियान्वित नहीं हो पायी। शॉपिंग काम्प्लेक्स के लिए मंजूर कार्ययोजना के तहत भूतल में पार्किंग तथा प्रथम तल में 140 दुकानों का निर्माण किया जाना था। 1 करोड़ 12 लाख रुपया केन्द्र सरकार द्वारा इस योजना के लिए मंजूर भी हो गए। पालिका इस भूमि को अपने नाम फ्रीहोल्ड भी करा चुकी है। लेकिन यहाँ जर्जर और अव्यवस्थित फड़ों में वर्षों से बहुत कम किराये पर जमे दुकानदार नहीं चाहते कि उन्हें कुछ समय के लिए ही सही, कारोबार बन्द करने के लिए कहा जाए। कारोबार को चलाए रखने के लिए कॉम्प्लेक्स बनने तक किसी वैकल्पिक व्यवस्था पर विचार किया जा सकता है, किन्तु हर जगह इच्छाशक्ति का सवाल व वोटों की राजनीति दीवार बनकर खड़ी हो जाती है। पूर्व में तत्कालीन जरूरतों के अनुरूप यहाँ सब्जी बाजार लगाने के लिए एक भवन भी बनाया गया था, किन्तु वह भी दबंगों द्वारा अतिक्रमण की चपेट में आ गया और अब एक कबाड़खाना जैसा लगता है और वर्तमान की जरूरतों के लिए नाकाफी भी हो गया है। यहाँ मुसलमानों के एक वर्ग को बनजारा मुसलमान कहा जाता है। ये बनजारे आज भी मंगल के दिन मंगल पड़ाव में चावल आदि लेकर बैठ जाया करते हैं और पुरानी परम्परा के लोग उनसे अब भी सामान खरीदा करते हैं। पुराने समय में भाबरी (हिन्दू) काश्तकारों का और बनजारों का आपसी व्यवहार बहुत ही खरा और विश्वास का था। जरूरत पर बनजारा काश्तकार को धन दे देता और फसल होने पर अनाज ले लेता। दोनों के बीच किसी प्रकार की न लिखा-पढ़ी होती थी न हो-हुज्जत। फसल पर बंजारा आता और काश्तकार उसे अनाज की कोठरी में भेज देता। बनजारा उतना ही अनाज ईमानदारी से तोल कर ले जाता, जितना तय होता। लेकिन अब न बनजारा गाँव में जाता है न आपसी ईमानदारी का ऐसा व्यवहार ही रह गया है। काश्तकार सीधे अनाज की मंडी में जाता है।
बड़बाज्यू बचीगौड़ धर्मशाले का अक्सर जिक्र किया करते थे। तब हल्द्वानी आने जाने वालों का यह एकमात्र रात्रि विश्राम का आश्रय रहा होगा। कहा जाता है कि बचीगौड़ ने सन् 1894 में यह धर्मशाला बनवाई थी तथा सन् 1896 में राममंदिर की परिक्रमा बनवाई थी। हल्द्वानी जिलाधिकारी कैम्प कार्यालय व नैनीताल में जिलाधिकारी आवास व उसके आसपास के आउट हाउस भी बचीगौड़ के ही बताए जाते हैं। इसके अलावा इसके इर्द-गिर्द कई उल्लेखनीय कार्य हुए। सन् 1884 में पं. देवीदत्त जोशी ने रामलीला का हाता व मंदिर चन्दे से बनवाये। लाला चोखेलाल मुरलीधर ने यहाँ एक रामलीला भवन बनवाया। सन् 1823 में पं. छेदालाल ने राम मंदिर की शुरूआत की थी। 1824 में इनके द्वारा लाई गई राम दरबार की मूर्ति आज भी पूजी जाती हैं। इनकी पीढि़यों ने पुरोहित का कार्य सम्भाल रखा है। वे मुर्सान कस्बा (पहले मथुरा अब हाथरस जिला उ.प्र.) से 1823 में यहाँ आए। इनके दो पुत्र, पं. रामचन्द्र और पं. दामोदर दत्त हुए। दामोदर जी की कोई सन्तान नहीं थी। वे नामी वैद्य थे और पटेल चौक में उनकी दुकान हुआ करती थी। पं. रामचन्द्र जी ने छेदालाल जी के बाद मन्दिर का संचालन किया। इनके चार पुत्र, रमेश चन्द्र, सुरेश चन्द्र, महेश चन्द्र, नन्द किशोर थे। रामचन्द्र जी के बाद मंन्दिर संचालन का कार्य पं. रमेशचन्द्र ने किया। इनके पाँच पुत्र, नरेश चन्द्र, राकेश कुमार, गुरुदेव वशिष्ठ हुए। मन्दिर की परम्परा को रामभक्त गुरुदेव वशिष्ठ ने संभाला और अब इनके युवा पुत्र विवेक कुमार इसका संचालन कर रहे हैं।
haldwani-navratra-poojanपं. गुरुदेव वशिष्ठ अपने बुजुर्गों को याद करते हुए बताते हैं कि हल्द्वानी के इतिहास में दिन की रामलीला का श्रीगणेश पं. रामचन्द्र वशिष्ठ ने किया। पहले यहाँ रासलीला और चौत्र मास में मथुरा से मण्डली आकर कार्यक्रम प्रस्तुत करती थी। इनके दादा, पिता, चाचा रामकथा के अच्छे वाचकों में माने जाते थे। रामकथा को और भव्य रूप से प्रस्तुत करने के लिये दिन की रामलीला का विचार आया और इनके परिजनों ने भी विभिन्न पात्रों का अभिनय किया। रामकथा के पाठ पर पात्र आज तक इसका अभिनय करते चले आ रहे हैं। पं. गुरुदेव ने भी 25 साल तक हनुमान का अभिनय किया। लाला झारमल ने 1958 में कीर्तन हाल बनवाया। 1995 में जन सहयोग से मन्दिर का जीर्णोद्धार हुआ। अपने बचपन का देखा और बुजुर्गों से सुना याद करते हुए पंडित जी बताते हैं कि एक जमाने में जनता की अदालत इसी मन्दिर में लगा करती थी। सभी धर्मों के लोग अपने मसले लेकर बैठक करने यहाँ आते थे और मिल-बैठकर घरेलू विवाद तक निपट जाते थे। व्यापारी आते-जाते हुए एक भेली गुड़ निश्चित रूप से इस मन्दिर में चढ़ाते थे।
राम मन्दिर की सम्पत्ति के बारे में पं. गुरुदेव बताते हैं कि देहरादून के कत्थे वाले हरिनन्दन जी ने रामलीला मोहल्ले की धर्मशाला बनवाई थी। यह धर्मशाला भी शुरूआती दौर की है। 1958 में मन्दिर के सामने हल्द्वानी के व्यापारी रतनलाल किशनलाल मिश्री वालों ने धर्मशाला बनवाई जिसमें वर्तमान में विवाह आदि समारोह होते हैं। बरेली रोड में अब्दुल्ला बिल्डिंग से लगा बगीचा सरवर मिस्त्री ने राममन्दिर को दान दिया था, जो 90 साला लीज पर था। लाइन नं. एक में पाल परिवार के एक गड़रिये ने मकान राम मन्दिर को दान में दिया था, जो किराये पर चलता है। हल्द्वानी के इस प्राचीन मन्दिर की सम्पत्ति को लेकर विवाद भी हुआ, जो सुप्रीम कोर्ट तक लड़ा गया। 1983 में राममन्दिर कमेटी बनी जो इसकी सम्पत्ति को देखती है। मन्दिर सम्बन्धी संचालन परम्परागत रूप से पंडित जी का परिवार देखता है।
अगले अंक में जारी………
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