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Monday, 23 January 2012

राजभवन की आपदा अबोध जानवरों पर टूटी

राजभवन की आपदा अबोध जानवरों पर टूटी

लेखक : नैनीताल समाचार :: अंक: 01-02 || 15 अगस्त से 14 सितम्बर 2011:: वर्ष :: 35 : September 16, 2011  पर प्रकाशित

राजभवन की आपदा अबोध जानवरों पर टूटी

लेखक : नैनीताल समाचार :: अंक: 01-02 || 15 अगस्त से 14 सितम्बर 2011:: वर्ष :: 35 : September 16, 2011  पर प्रकाशित
कमल जगाती
governor-house-nainital82 हेक्टर क्षेत्रफल, जिसका अधिकांश घना और खूबसूरत जंगल है, में फैला है नैनीताल का राजभवन, जिसे देश की अनमोल धरोहरों में गिना जाता है। 1900 में बना राजभवन इंग्लैंड के बर्मिंघम भवन की कॉपी है और गौथिक शैली का नायाब नमूना। फिलहाल इसमें श्रीमती मार्गरेट अल्वा राज्यपाल के रूप में काबिज हैं। महामहिम राज्यपाल के परिवारजनों को गुलदार व अन्य जीव जंतुओं के राजभवन के प्रांगण में निर्द्वंद घूमना रास नहीं आ रहा है। लिहाजा उनकी शिकायत पर लोक.निर्माण विभाग द्वारा 1980 के वन संरक्षण अधिनियम की खुलेआम धज्जियाँ उड़ा कर सुरक्षित वन से लगे सवा दो किलोमीटर में तार-बाड़ (घेराबंदी) कर दी गई है।
इस वन में सदियों से, राजभवन बनने से पहले से ही, तमाम तरह के जंगली जानवर रहते हैं। अब इन जानवरों का कोरिडोर (आने जाने का रास्ता) इस फेंसिंग के माध्यम से बंद हो गया है। रास्ता बंद होने से अबोध जंगली जानवर इस दीवार व जाली से टकराकर जान दे रहे हैं। अभी जून माह में इसी तार-बाड़ में तेंदुए का बच्चा भी राजभवन की पानी की टंकी के पीछे फँस गया था। उसे बमुश्किल वन विभाग के कर्मचारियों ने निकाला था व इसकी जानकारी अपने उच्चाधिकारियों को दी। 12 जुलाई को एक दो वर्षीय नर कांकड़ राजभवन से लगे क्षेत्र से मृत मिला था। पोस्टमार्टम में उसके सर व जांघ पर बड़ा घाव मिला था, जिससे साबित होता है कि अपने रास्ते पर पड़े व्यवधान को ये जानवर समझ नहीं पाते व रास्ते को पार करते समय खड़ी दीवार से टकरा जाते हैं। एक अन्य मामले में प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार एक काकड़ दोपहर 11 बजे राजभवन के पिछले हिस्से में स्टाफ हाउस की तरफ कई बार दीवार से टकराया व अंत में दरवाजे से बाहर की तरफ भाग गया। अप्रैल के महीने में पर्यावरणविद व प्रख्यात छायाकार अनूप साह तथा नगर के अन्य जागरूक नागरिकों द्वारा महामहिम राज्यपाल व वनाधिकारी को एक मेजरनामा देकर सुरक्षित वन से लगे हुए राजभवन के क्षेत्र में रेजर वाईरिंग को तुरंत निकालने की मांग की गई थी।
नियमों के अनुसार गैर वानिकी कार्यों के लिए केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से अनुमति की आवश्यकता होती है, जो इस घेरबाड़ के लिये नहीं ली गई है। वन विभाग के क्षेत्राधिकारी के.सी. सुयाल ने मार्च 2011 में प्रभागीय वनाधिकारी बीजूलाल टी.आर. को खत लिखकर अवैध घेरबाड़ की जानकारी दी थी। मार्च में ही उप प्रभागीय वनाधिकारी राजेश श्रीवास्तव ने भी वनाधिकारी को खत लिखकर सुरक्षित वन में हो रहे अवैध कार्यों की जानकारी दी थी। वन क्षेत्राधिकारी के द्वारा वनाधिकारी को समय-समय पर तार-बाड़ से जंगली जानवरों को हो रहे नुकसान के बारे में अवगत कराया जाता रहा है। इन पत्रों में जंगली जानवरों, गुलदार, काकड़, लोमड़ी, घुरल, लंगूर आदि के फँसने की आशंका जताई गई है और इस क्षेत्र में विशेष रूप से पाई जाने वाली पक्षियों की प्रजातियों को इस रेजर फेनसिंग से खतरा बताया है। वन विभाग के एक अधिकारी के अनुसार यहाँ जो रेजर वायर लगाई गयी है उसे सीमान्त या अति संवेदनशील क्षेत्र में लगाया जाता है। यह पशु-पक्षियों के लिये निश्चित रूप से खतरनाक है। इस खतरे की ओर ध्यान खींचने पर प्रभागीय वनाधिकारी बीजूलाल टी.आर. ने बताया कि उन्हें इसकी जानकारी है। वे खुद मौके पर जाकर मुआयना करेंगे व जिलाधिकारी से वार्ता कर उचित कार्यवाही करेंगे।
जब हमने इस मामले में राजभवन प्रशासन का पक्ष जानना चाहा तो महामहिम राज्यपाल के सचिव अशोक पाई ने अत्यन्त उद्धत ढंग से जवाब दिया कि हम लोक निर्माण विभाग से पूछें। राजभवन कोई जनता का कार्यालय नहीं है। मैं इस सवाल का जवाब देने को बाध्य नहीं हूँ और न ही आपको ऐसे सवाल पूछने का दुस्साहस करना चाहिए। सूत्र बतलाते हैं कि राजभवन की सुरक्षा के लिए महामहिम राज्यपाल के अपर सचिव व ए.डी.सी. द्वारा सर्वेक्षण के बाद इस मामले में शासन को मौखिक निर्देश दिए गए थे। लोक निर्माण विभाग के सहायक अभियंता राजीव गुरानी के अनुसार शासन से इस कार्य की अनुमति 5-8-2010 को प्राप्त हुई थी। संपूर्ण राजभवन को तार बाड़ से घेरने के लिये रु. 151.49 लाख की धनराशि अवमुक्त की गई थी। जनवरी 2011 से इस परियोजना पर काम शुरू हुआ। अब तक सवा दो किलोमीटर क्षेत्र में जाली लगाई जा चुकी है और लगभग एक किलोमीटर में और लगनी है। तीसरे गोल्फ ग्राउंड में जिस जगह पर भूस्खलन हो रहा है, वहाँ लगभग 300 मीटर के दायरे में तार बाड नहीं लगाई जाएगी।
इस कोरिडोर मामले की तुलना रामनगर क्षेत्र के सुंदरखाल क्षेत्र से की जा सकती है। सुन्दरखाल में कॉर्बेट के जंगल से नदी तक जाने में बाघों को गाँव पार करना पड़ता है। बाघों ने यहाँ कई बार ग्रामीणों को मौत के घाट उतार दिया था। ग्रामीणों के भारी विरोध के चलते एक बाघ को नरभक्षी घोषित करते हुए मारा भी गया। अब केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने समूचे सुन्दरखाल गाँव को ही कोरिडोर से हटा कर अन्यत्र विस्थापित करने का मन बना लिया है। मनुष्यों के लिए तक सुखाधिकार अधिनियम बना है। इस अधिनियम के अनुसार सदियों से इस्तेमाल किये जाने वाले किसी रास्ते को तब तक बंद नहीं किया जा सकता, जब तक कोई वैकल्पिक रास्ता तैयार न कर दिया जाये।
फिलहाल राजभवन का अबोध वन्य प्राणियों से वैमनस्य किसी की समझ में नहीं आ रहा है।