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Saturday, 12 January 2013

दमन में साझेदारी



Saturday, 12 January 2013 12:43
सुभाष गाताडे 
http://www.jansatta.com/index.php/component/content/article/20-2009-09-11-07-46-16/36502-2013-01-12-07-14-08
जनसत्ता 12 जनवरी, 2013: किसी जनांदोलन की सुगबुगाहट होते ही सरकारों और कॉरपोरेट कर्णधारों की प्रति-रणनीति शुरू हो जाती है। वे दमन की योजना बनाने लगते हैं। राज्यसत्ता को लेकर जो एक व्यापक भ्रम समाज में मौजूद है, उसके अंतर्गत ऐसी कल्पना करना भी मुश्किल जान पड़ सकता है, मगर हकीकत यही है। 
पिछले दिनों 'गार्डियन' (29 दिसंबर, 2012) के अपने लेख में नओमी वूल्फ ने डेढ़ साल पहले अमेरिका में खड़े हुए और तमाम पश्चिमी पूंजीवादी देशों में पूंजीवाद विरोधी आवाजों को बुलंद करने में प्रेरणास्रोत बने 'वॉल स्ट्रीट पर कब्जा करो' (आक्युपाई वॉल स्ट्रीट) आंदोलन से जुड़े ऐसे ही कई तथ्यों को उजागर किया। इसके मुताबिक 'कुछ सिरफिरों की करतूत' बताते हुए कॉरपोरेट मीडिया द्वारा चित्रित इस आंदोलन के दमन में कॉरपोरेट कर्णधारों और राज्य की मशीनरी मिलजुल कर कदम उठा रही थी। 'पार्टनरशिप फॉर सिविल जस्टिस फंड' (पीसीजेएफ) द्वारा सूचना के अधिकार के तहत हासिल दस्तावेजों पर आधारित उनके लेख में बताया गया है कि अपने जन्म काल से ही एफबीआइ ने आक्युपाई आंदोलन को संभावित आपराधिक और आतंकवादी खतरे के तौर पर देखा, भले औपचारिक तौर पर वह इसके शांतिपूर्ण स्वरूप को लेकर परिचित थी। 
गौरतलब है कि जहां अक्तूबर, 2011 में न्यूयार्क के जुकोटी पार्क- जो वॉल स्ट्रीट पर स्थित एक पार्क है- और देश के अन्य हिस्सों में आंदोलनकारी हजारों की तादाद में अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ गए, उसके लगभग एक माह पहले से ही अमेरिकी गुप्तचर एजेंसी एफबीआइ सक्रिय थी और बैंकों, न्यूयार्क स्टॉक एक्सचेंज, डिपार्टमेंट आॅफ होमलैंड सिक्युरिटी और एक स्थानीय फेडरल रिजर्व ने आपसी सहमति से इस पर काम शुरू किया था। एफबीआइ के एजेंट देश के अलग-अलग हिस्सों में निगरानी के लिए सतर्क थे। लेख के मुताबिक 'फेडरल यानी केंद्र सरकार के एजेंट हकीकत में वॉल स्ट्रीट और कॉरपोरेट अमेरिका की गुप्तचर शाखा के तौर पर काम कर रहे थे।'
गौरतलब है कि 'वॉल स्ट्रीट पर कब्जा करो' आंदोलन ने बहुदेशीय कंपनियों और सरकार के बीच गठबंधन को बेपर्द किया था। एक फीसद बनाम निन्नयानबे फीसद का उसका नारा अमेरिकी जनमानस ही नहीं, पश्चिम के कई देशों में पूंजीवाद विरोधी मुहिम को तेजी प्रदान करने में सफल हुआ था। एक तरफ अमेरिका में बढ़ती बेरोजगारी, बेघरों की संख्या, शिक्षा की कीमत और दूसरी तरफ ऐसे पूंजीवादी सट्टेबाजों को बचाने के लिए जनता के कर से खरबों डॉलरों की बांटी गई खैरात से लोग उद्वेलित हुए थे। लोगों में इस बात को लेकर काफी नाराजगी थी कि सिर्फ जनता से त्याग की अपेक्षा की जा रही है, उल्टे जिनकी वजह से यह संकट खड़ा हुआ उनके सामने समर्पण किया जा रहा है। 
कॉरपोरेट सम्राटों और सरकार के विभिन्न महकमों की इस समन्वित योजना में छह अमेरिकी विश्वविद्यालय भी शामिल थे, जहां कैंपस की गतिविधियों को लेकर आक्युपाई आंदोलन में शामिल छात्रों के बारे में सूचनाएं प्रशासन को भेजी जा रही थीं; बड़े-बड़े बैंक एफबीआइ के अधिकारियों के साथ बैठ कर इस आंदोलन के प्रदर्शनकारियों के बारे में सूचनाएं एकत्रित कर रहे थे, जिसके लिए निजी सुरक्षा एजेंसियों की मदद ली गई थी; आंदोलन के दमन की एफबीआइ की योजना फिर उन्हीं संगठनों के नुमाइंदों के साथ साझा की जा रही थी, जो इस आंदोलन के निशाने पर थे।
निश्चित ही जनप्रतिरोध के दमन में 'प्राइवेट और पब्लिक सेक्टर' की साझेदारी की यह कोई पहली मिसाल नहीं है। पिछले दिनों 'अल जजीरा' ने दक्षिणपूर्व एशिया के पर्यावरणवादियों पर पिछले साल बरपे कहर का विहंगावलोकन कर इसके एक अलग और अधिक बर्बर आयाम पर रोशनी डाली थी। अपनी रिपोर्ट में उसने बताया था कि किस तरह 'सैनिक-प्रशासन गठजोड़', जिसे ताकतवर व्यावसायिक समूहों का समर्थन है, इस क्षेत्र के पर्यावरण आंदोलन के दमन में मुब्तिला है। 
'बीता वर्ष क्षेत्र के पर्यावरण हिमायतियों के लिए बहुत निर्मम साबित हुआ। म्यांमा में तांबे की खदान के विरोध में खड़े लोगों पर बम बरसाए गए, जलविद्युत परियोजनाओं के आलोचक लाओस के पत्रकारों को जान से हाथ धोना पड़ा; कंपुचिया में जंगल कटान के विरोधी दो कार्यकर्ताओं को, जिनमें चुट वट्टी भी थे, मार डाला गया। यहां तक कि फिलीपीन में जमीन पर कॉरपोरेट नियंत्रण के खिलाफ आंदोलन कर रहे छह कार्यकर्ताओं की हत्या की गई।' 
रिपोर्ट में आगे जोड़ा गया था कि किस तरह दक्षिणपूर्व एशिया की साठ करोड़ आबादी के लिए, संविधान में वर्णित अभिव्यक्ति और प्रतिवाद की स्वतंत्रता हकीकत नहीं बनती दिखती। पर्यावरण जैसे मुद्दों पर सक्रिय लोगों, समूहों के लिए इन इलाकों का एक खास साझापन दिखता है: बड़े-बड़े पूंजीपति, जिनकी सरकारों के साथ घनिष्ठता है, जमीन के व्यापक हिस्सों पर सरकारी मिल्कियत; विशाल ग्रामीण आबादी, जो इसी जमीन पर निर्भर है और प्रतिद्वंद्विता में खड़े देशी-विदेशी व्यावसायिक हित, जिन्हें ऐसी जमीन पर बिना किसी बाधा के नियंत्रण की जरूरत है। 
विश्व बैंक के आकलन के मुताबिक 2002-09 के बीच व्यापक स्तर के जमीन पर निवेश में 171 लाख हेक्टेयर की बढ़ोतरी हुई है। लाजमी है कि दक्षिण-पूर्व एशिया के संसाधनों और जमीन पर बढ़ती आपसी प्रतिद्वंद्विता में जनता के हकों की बात करना, विस्थापित होने वाले लोगों के अधिकारों की हिमायत करना खतरे से खाली नहीं है। 
सभी के लिए समान कानून का दावा करने वाली सरकारें किस तरह कॉरपोरेट जगत   की तमाम आपराधिक गतिविधियों पर परदा डाले रखती हैं या उन्हें बचाने का प्रयास करती हैं इसका अन्य उदाहरण है एचएसबीएस बैंक का, जो लंदन स्थित ब्रिटिश बहुराष्ट्रीय बैंकिंग और वित्तीय सेवाओं की कंपनी, जिसका पचासी देशों में सात हजार दो सौ दफ्तरों वाला विशाल नेटवर्क है और जिसकी परिसंपत्ति 2.6 खरब डॉलर से अधिक है। उस पर पिछले दिनों नशीली दवाओं के व्यापार, आतंकी गुटों को वित्तीय सहायता, यहां तक कि हवाला के जरिए पैसों के विनिमय को सुगम करने के आरोप लगे। 
अमेरिकी सीनेट की तीन सौ पैंतीस पृष्ठ की रिपोर्ट में इसका विस्तृत खुलासा हुआ। अगर किसी साधारण व्यक्तिया जनतांत्रिक अधिकारों के लिए समर्पित समूह पर ऐसे आरोप लगते तो शायद उनको किसी गुआंतानामो जैसी जगह में भेज दिया जाता या अमेरिका द्वारा दुनिया भर में संचालित किन्हीं गुप्त कारावासों में सड़ने के लिए छोड़ दिया जाता। ऐसी तमाम संलिप्तताओं के बावजूद एचएसबीएस को सिर्फ जुर्माना देना पड़ेगा, किसी भी अधिकारी को जेल में नहीं रखा जाएगा। 
हमारे यहां जनांदोलनों के दमन का गठजोड़ कई स्तरों पर दिखता है। पिछले दो दशक से मुल्क में लागू नवउदारवादी आर्थिक नीतियां, जिनका विरोध राजनीतिक-सामाजिक समूहों से लेकर जगह-जगह सक्रिय लोगों द्वारा किया जा रहा है, उनके दमन में संगठनों पर पाबंदी लगाने से लेकर, उनसे जुड़े लोगों को जेल भेजने, सरोकार रखने वाले नागरिकों को तरह-तरह से प्रताड़ित करने के रूप में सामने आ रही हैं। इनमें सबसे ताजा मामला दयामणी बाड़ला का है, जिन्हें पिछले दिनों झारखंड उच्च न्यायालय ने दो महीने जेल में रहने के बाद जमानत दे दी। वे महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना की गड़बड़ियों का विरोध करने और कॉरपोरेट क्षेत्र के लिए सस्ते में हथियाई जा रही आदिवासियों की जमीन के खिलाफ शांतिपूर्ण संघर्षों की अगुआई करने की वजह से जेल में थीं। 
दयामणी बाड़ला की गिरफ्तारी का तरीका भी विचित्र रहा। सबसे पहले रांची के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने एक प्रापर्टी वारंट भेजा, जिसमें रांची जिले के अंगदा ब्लॉक के मजदूरों के लिए ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के जॉब कार्ड या बेरोजगारी भत्ता देने की मांग करने वाले विरोध-प्रदर्शन की अगुआई करने को लेकर मुकदमा दायर किया गया। यह मुकदमा 2006 में दर्ज किया गया था। यह एक बहाना मात्र था।
दरअसल, बाड़ला ने गुमला और खुंटी में आर्सेलर मित्तल कंपनी द्वारा लगाए जाने वाले स्टील प्लांट को लेकर जो आंदोलन चलाया था, उससे राज्य सरकार को झटका लगा और वह इस आवाज को खामोश करना चाहती थी। छोटानागपुर किराएदारी कानून- जो आदिवासियों के लंबे संघर्ष की देन है- जिसके अंतर्गत आदिवासियों की जमीन को गैर-आदिवासियों को नहीं बेचा जा सकता, उसके आधार पर ग्यारह हजार एकड़ जमीन के आर्सेलर मित्तल को किए जा रहे हस्तांतरण की मुखालफत हुई थी। 
बाड़ला इस मुकदमे में अदालत में हाजिर हुर्इं और उन्हें जमानत भी मिल गई, मगर जेल से बाहर आते ही उन्हें एक दूसरे मुकदमे में गिरफ्तार कर लिया गया। इस बार आरोप लगा कि रांची से पंद्रह किलोमीटर दूर नगड़ी गांव की कृषियोग्य दो सौ सत्ताईस एकड़ जमीन के सरकार द्वारा किए जा रहे अधिग्रहण के विरोध की उन्होंने अगुआई की थी। 
वैसे यह कतई नहीं कहा जा सकता कि जनांदोलन दमन में कॉरपोरेट कर्णधारों और सरकार की इस सहभागिता में मामला हमेशा इकतरफा होता है। जब जनांदोलन मजबूत हों तो इस गठजोड़ को शिकस्त भी मिलती है। अभी ज्यादा दिन नहीं हुए, महाराष्ट्र इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन ने जनता के व्यापक प्रतिरोध के चलते विशेष आर्थिक क्षेत्रों को विकसित करने वाली चार परियोजनाओं को रद्द कर दिया और इसके साथ ही स्थानीय आबादी से जो आठ हजार सात सौ एकड़ जमीन ली गई थी, उसे भी 'डिनोटिफाइ' करने का एलान हुआ। 
इसमें रायगढ़ जिले में 2008 में प्रस्तावित इंडिया बुल्स की 1,935 एकड़ की परियोजना, कार्ला में महिंद्रा ऐंड महिंद्रा की तीन हजार एकड़ में फैली परियोजना, औरंगाबाद और पुणे में विडियोकॉन की तीन हजार सात सौ तिरसठ एकड़ में फैली दो परियोजनाएं शामिल थीं। गौरतलब है कि जनता के निरंतर विरोध के चलते विशेष आर्थिक क्षेत्र की योजना महाराष्ट्र में जड़ नहीं जमा सकी है और एक सौ चार मंजूर परियोजनाओं में से सिर्फ अठारह पर काम शुरू हो सका है। बाकी मंजूर एक सौ तिरालीस परियोजनाओं में से सत्ताईस ने राज्य सरकार से दरखास्त की है कि वे हटना चाहते हैं। 
इस जीत पर विश्लेषकों की प्रतिक्रिया थी कि यह देश के अन्य हिस्सों में कॉरपोरेट घरानों के लिए छीनी जा रही जमीन के खिलाफ संघर्षों में नई उम्मीद जगाती है। इस बात पर आश्चर्य प्रकट किया गया था कि आखिर जमीन पर आधारित समुदायों को उजाड़ कर पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने के लिए राज्य क्यों इतना उतावला हो रहा है। स्पष्ट है कि विशेष आर्थिक क्षेत्र का समूचा मॉडल, जिसमें जमीन, पानी, बिजली सभी सस्ती दर पर मुहैया कराए जाते हैं, कर में छूट प्रदान की जाती है, अपनी शुरुआत से ही अपनी अंतर्वस्तु में जनविरोधी रहा है। 
मालूम हो कि कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने 2009 में सत्ता संभालने के साथ ही विशेष आर्थिक क्षेत्रों के निर्माण में आई बाधाओं को दूर करने का प्रस्ताव रखा था। विशेष आर्थिक क्षेत्रों (सेज) के आकार पर अपने पिछले कार्यकाल में पाबंदी लगाने के लिए मजबूर हुई सरकार ने यह निर्णय किया था कि   अब ऐसी कोई पाबंदी नहीं रहेगी। इसके अंतर्गत सरकार ने यह फैसला किया था कि अगर दो या उससे भी अधिक सेज को मिलाया जाता है तो उस पर अधिकतम पांच हजार हेक्टेयर की पाबंदी नहीं लागू होगी। इतना ही नहीं, इसकी जगह चुनने के मामले में डेवलपरों को आजादी दी थी।