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Monday, 16 April 2012

वित्तीय अनुशासन की हवा निकल गयी लड़खड़ाते बाजार में।

वित्तीय अनुशासन की हवा निकल गयी लड़खड़ाते बाजार में। आंकड़े बदल देने से या परिभाषाएं मनमुताबिक गढ़ लेने से आंधियों और भूकंप का सिलसिला बंद होने से तो रहा।

मुंबई से एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

बाजार लड़खड़ा रहा है। वित्तमंत्री से संभाले नहीं संभल रही है अर्थ व्यवस्था और प्रधानमंत्री कठिन दौर का राग अलाप रहे हैं। पर कोई ठोस कदम उठाने की गुंजािस बनती नहीं दिख रही है। ठहती हुई इमारत पर रंगरोगन में पूरे दम खम से लगी है सरकार। उत्पादन प्रणाली को ठप करके महज सेवा और उपभोक्ता बाजार से तो अर्थ व्यवस्था सुधरने से रही। प्रणव मुखर्जी पहले आर्थिक सलाहकारों की सनकर वित्तीय अनुशासन लागू करने की कोशिश करते हैं जैसा कि उन्होंने बजट में भी किया। लेकिन सेटर बाजार के डांवाडोल होते ही उनके अनुशासन की हवा निकल गयी। जिस आयकर कानून में संशोधन के जरिये कालाधन वापस करने का लोक लुभावन नारा लगाया जा रहा था, विदेशी निवेशकों के बिदकने से सरकार अब उसमें भी ढिलाई के लिए तैयार दीख रही है। बिजली, खनन और तेल, स्वास्त्य जैसे क्षेत्रों में शत प्रतिशत विदेशी निवेश और बाकी क्षेत्रों में भी विदेशी पूंजी का खुला खेल का मौका देने के बाद बाजार पर सरकारी नियंत्रण और वह भी सिर्फ मौद्रिक नीतियों के जरिये रिजर्व बैंक के मार्फत, की उम्मीद कैसे की जा सकती है। आंकड़े बदल देने से या परिभाषाएं मनमुताबिक गढ़ लेने से आंधियों और भूकंप का सिलसिला बंद होने से तो रहा।

अर्थव्यवस्था में बरकरार नरमी को जाहिर करते हुए औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर इस साल फरवरी में घटकर 4.1 फीसदी रह गई है। ऐसा मुख्य तौर पर विनिर्माण क्षेत्र और उपभोक्ता उत्पाद खंड के खराब प्रदर्शन के कारण हुआ है।इससे बाजार को करारा जटका लगा है। अगर राष्ट्रपति की दखलांदाजी से टेलीकाम मामले में राहत मिले तो सायद बाजार की सांस में सांस आयें।अभी कोयला घोटाला और रक्षा सौदों का मामला निपटा नहीं है। सैनिक तैयारियों की खामियां दूर करने का कार्यभार सामने है।कोयला ब्लाकों की नीलामी भी होनी है। सुप्रीम कोर्ट के रवैये पर भी आर्थिक सुधार की गति निरअबर करेगी, जो राजनीतिक बाध्यताओं से थमी थमी सी है। सामने राष्ट्रपति चुनाव है। जीएसटी और डीएसटी लागू करने में ही सरकार की जीभ निकल रही है। बाकी वित्तीय सुधारों और विनिवेश कार्यक्रम का ​​क्या हाल होना है, इस पर उद्योग जगत की कड़ी निगाह है।औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर के आंकड़ों को निराशाजनक बताते हुए वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने इसकी मुख्य वजह सख्त मौद्रिक नीति और वैश्विक कारणों को बताया है। भारतीय रिजर्व बैंक ने कहा है कि बढ़ते राजकोषीय घाटे और शॉर्ट टर्म के लोन का बढ़ता स्तर 'काफी परेशान' करने वाला है। बैंक का कहना है कि हालांकि देश के सामने 1991 जैसा भुगतान संकट पैदा नहीं होगा।

रिजर्व बैंक की सालाना मौद्रिक नीति और सोमवार को जारी होने वाले मुद्रास्फीति के मासिक आंकड़े इस हफ्ते शेयर बाजार की चाल तय करेंगे। इसके अलावा, कंपनियों के चौथी तिमाही के परिणाम भी बाजार पर अपना प्रभाव बनाए रखेंगे। समीक्षकों के मुताबिक, मंगलवार को जारी होने वाली रिजर्व बैंक की सालाना मौद्रिक नीति पर कारोबारियों की निगाह रहेगी। सोमवार को मुद्रास्फीति के मासिक आंकड़े जारी हो सकते हैं।लेकिन इसमें सबसे खतरनाक पेंच यह है किजिस ईरान से तल आयात जारी रखने पर भारत अमेरिकी खबरदारी और इजराइली नाराजगी के बावजूद अड़ा हुआ है, जानी दुश्मन चीन​ ​ के भरोसे, ब्रिक का सहारा भी है, वहां से बुरी खबर है। तेल संकट गहरा जाने से सरकार इस अर्थ व्यवस्था को संभालने के लिए बाजार और आम जनता से क्या सलूक करेगी, वह शेक्सपीयर के नाटकों में अभिव्यक्त क्रूरता से ज्यादा जानलेवा होगा। उसके लिए भी तैयारी रखें।इस बीच अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) का कहना है कि भारत व चीन ने गरीबी घटाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की है लेकिन इसी समय ऊंची वृद्धि दर के कारण असमानता भी बढ़ी है।असमानता में वृद्धि सरकार के लिए कोई सरदर्द का सबब नहीं है, पर वृद्धि दर तमाम तरह की परिभाषाओं में संसोधन और आंकड़ों में रदबदल के बावजूद सुधर नहीं रही है। गरीबी घटने का क्या, परिभाषा बदलकर गरीब को ्मीर दिखादो मसला हल हो जायेगा, पर कारोबार में हिसाब गड़बड़ाने से सत्यम की परिणति सुनिश्चित है।

बहरहाल ईरान में कच्चे तेल के उत्पादन में इस वर्ष के अंत में लगभग 5,00,000 बैरल प्रतिदिन की गिरावट आने की संभावना है। यह गिरावट ईरान पर लगे प्रतिबंधों के कारण निवेश के अभाव के चलते आएगी। यह बात अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (ईआईए) ने कही है।समाचार एजेंसी सिन्हुआ के अनुसार, ईआईए ने मंगलवार को जारी अपनी मासिक रपट में कहा कि ईरान का तेल उत्पादन 2011 के अंत में 35.50 लाख बैरल प्रतिदिन था। रपट में कहा गया है कि ईरान के तेल उत्पादन में गिरावट की शुरुआत 2011 की अंतिम तिमाही से हुई थी।ईआईए ने कहा है कि ईआईए का मानना है कि तेल उत्पादन में इस तीव्र गिरावट से निवेश का अभाव स्पष्ट होता है। स्वाभाविक उत्पादन में गिरावट पर लगाम लगाने के लिए निवेश की जरूरत है।ईआईए की रपट के अनुसार, ईरान के तेल उत्पादन में निवेश करने वाली कई विदेशी कम्पनियों ने प्रतिबंधों के कारण अपनी गतिविधियां रोक दी है। प्रतिबंधों के कारण इन कम्पनियों का ईरान के साथ व्यापार करना कठिन हो गया है।ईरान के तेल उत्पादन में इस वर्ष गिरावट के अनुमान के अलावा ईआईए ने सम्भावना जताई है कि 2013 में होने वाली 2,00,000 बैरल प्रतिदिन की अतिरिक्त गिरावट, ओपेक (पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन) के अन्य देशों में होने वाली उत्पादन वृद्धि से पूरी कर कर ली जाएगी।

यूरोपीय मार्केट में फिर घबराहट है जो यूरोपीय देशों के बैंकों द्वारा यूरोपीय केंद्रीय बैंक (ईसीबी) से भारी मात्रा में कर्ज लेने से आई है। स्पेन के वित्तीय संस्थानों ने मार्च में करीब 417 अरब डॉलर का कर्ज लिया है। उसने फरवरी में करीब 200 अरब डॉलर का कर्ज लिया था। अन्य यूरोपीय देश भी इसी राह पर हैं। मार्केट को डर इस बात का है कि इतने कर्ज को किस तरह से वापस लौटाया जाएगा क्योंकि यूरोपीय देशों की अर्थव्यवस्था और मार्केट में ठहराव आया हुआ है।

देश का विदेशी पूंजी भंडार 6 अप्रैल को समाप्त सप्ताह में 1.47 अरब डॉलर घटकर 292.92 अरब डॉलर रह गया। पिछले दो महीने का यह निचला स्तर है। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा रुपये का अवमूल्यन को रोकने के लिए डॉलर की कथित बिक्री को इस गिरावट का कारण समझा जा रहा है।
रिजर्व बैंक के साप्ताहिक पूरक आंकड़े के मुताबिक विदेशी पूंजी भंडार का सबसे बड़ा घटक विदेशी मुदा भंडार इस अवधि में 1.42 अरब डॉलर घटकर 258.65 अरब डॉलर रह गया। विदेशी मुद्रा भंडार के मूल्य में हुए बदलाव के लिए रिजर्व बैंक ने कोई कारण नहीं बताया। इसने कहा कि भंडार को डॉलर में अभिव्यक्त किया जाता है और इसमें पाउंड और येन जैसी अन्य मुद्राओं के मूल्य में हुए उतार-चढ़ाव का असर होता है।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा है कि भारत की अर्थव्यवस्था मुश्किल दौर से गुजर रही है, लेकिन उन्होंने यह उम्मीद भी जताई कि चुनौतियों से पार पा लिया जाएगा, उन्होंने पैनल चर्चा के दौरान संक्षिप्त हस्तक्षेप में कहा, ''कठिनाइयां हैं, लेकिन अगर कोई कठिनाई नहीं हो, तो जीवन का मतलब नहीं रह जाता है। मुझे विश्वास है कि अधिक दृढ़ता के साथ हम इसे दूर कर लेंगे।''

रिजर्व बैंक के गवर्नर डी. सुब्बाराव ने कहा है कि 1991 का संकट तेल की ऊंची कीमतों की वजह से पैदा हुआ था, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार सूख गया था। भारत के आर्थिक सुधार तथा विकास पर पैनल चर्चा में सुब्बाराव ने कहा कि राजकोषीय घाटा और चालू खाते का घाटा सिस्टम पर दबाव बनाने वाले प्रमुख कारक हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी उनके विचारों को सुन रहे थे। सुब्बाराव ने कहा कि 1991 में राजकोषीय घाटा 7 प्रतिशत था। 2012 में यह 5.9 प्रतिशत पर है। इसी तरह चालू खाते का घाटा 3.6 प्रतिशत है, जो 1991 की तुलना में ऊंचा है। वहीं लघु अवधि का लोन जीडीपी का 23.3 प्रतिशत है, जो 1991 में 10.2 प्रतिशत पर था।

सुब्बाराव ने कहा, 'यह काफी परेशान करने वाली तस्वीर है। लेकिन मैं फिर कहूंगा कि 1991 में स्थिति बिगड़नी निश्चित थी। लेकिन 2012 में ऐसा नहीं होगा।' उन्होंने कहा कि अर्थव्यवस्था का ढांचा बदल चुका है। अब वित्तीय बाजार ज्यादा परिपक्व और विविधता वाले हैं। साथ ही उनमें झटकों को सहने की क्षमता है।

फैक्टरियों में प्रॉडक्शन की सुस्त रफ्तार और कमतर आर्थिक विकास दर के मद्देनजर उम्मीद जताई जा रही है कि रिजर्व बैंक सोमवार को ब्याज दर में कटौती करेगा। इससे मार्केट में पैसा आएगा और विकास को रफ्तार मिलेगी। मुमकिन है कि रिजर्व बैंक कैश रिजर्व रेश्यो में भी कमी करे। बैंक अपने यहां जमा राशि का एक हिस्सा रिजर्व बैंक के पास रखते हैं , जिसे कैश रिजर्व रेश्यो कहते हैं। बैंकों के पास नकदी की स्थिति बेहतर रहे , इसके लिए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने पिछले महीने ही कैश रिजर्व रेश्यो मंे कमी की थी। बैंक ऑफ बड़ौदा और बैंक ऑफ इंडिया को पिछले महीने फिक्स्ड डिपॉजिट की ब्याज दरों में बढ़ोतरी करनी पड़ी थी। ऐसा नकदी की तंगी के कारण किया गया। आलम यह है कि बैंक औसतन हर रोज रिजर्व बैंक से 80 हजार करोड़ रुपये उधार ले रहे हैं।  पब्लिक सेक्टर के ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स ने फिक्स्ड डिपॉजिट की ब्याज दरों में आधा पर्सेंट की कमी है। बैंक ने 11 अप्रैल से कर्ज की सबसे कम ब्याज दर यानी बेस रेट में भी 0.1 पर्सेंट की कमी कर दी है। इससे बैंक के होम लोन और ऑटो लोन समेत दूसरे कर्ज 0.1 पर्सेंट सस्ते हो जाएंगे। इन बातों से संकेत मिल रहे हैं कि ऊंची ब्याज दरों का दौर वाकई खत्म होने जा रहा है। बैंकों के लिए ब्याज दरों के बारे में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया अपनी नीति पर कल गौर करेगा। बैंकर भी उम्मीद जता रहे हैं कि ब्याज दरों में 0.25 पर्सेंट जबकि कैश रिजर्व रेश्यो में 0.75 पर्सेंट की कमी हो सकती है। अगर ब्याज दरों में कमी हुई तो यह पिछले तीन साल में इस मद में कटौती का पहला मौका होगा। लेकिन इससे पहले रिजर्व बैंक महंगाई दर के आंकड़े भी देखेगा , जो आज सामने आने वाले हैं। महंगाई पर काबू पाने के लिए ही रिजर्व बैंक ने मार्च 2010 से अक्टूबर 2011 के बीच ब्याज दरों में 13 बार बढ़ोतरी की थी। इसके बाद आर्थिक हालात बेहतर हुए , फिर भी रिजर्व बैंक ने ब्याज दरों में कमी का रास्ता नहीं चुना। इसकी वजह यह थी कि कच्चे तेल की कीमतों के मद्देनजर महंगाई बढ़ने का खतरा कायम था। ब्याज दरें घटाने से पहले रिजर्व बैंक यह भी चाहता है कि सरकार वित्तीय घाटे को लेकर ठोस कदम उठाए।

आयकर कानून को लेकर मुसीबतें अभी कत्म हुई नही है । अब सरकार ने सीमा शुल्क चोरी से जुड़े बड़े मामलों में सख्ती बरतते हुए इसके लिए संबंधित कानून में संशोधन का प्रस्ताव किया है। इसके तहत तीन साल से अधिक जेल की सजा के प्रावधान वाले मामलों में दोषी को जमानत के लिए अब न्यायालय का दरवाजा खटखटाना होगा।वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने संसद में पेश वित्त विधेयक 2012 में एक नए प्रावधान का प्रस्ताव किया है, जिसमें सीमा शुल्क चोरी से जुड़े गंभीर अपराध जिनमें कि तीन साल या इससे अधिक की जेल की सजा हो सकती है, में जमानत दिये जाने के अधिकार सीमा शुल्क अधिकारियों से हटाकर न्यायालय अथवा मजिस्ट्रेट के सुपुर्द कर दिये हैं।

औद्योगक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) के आधार पर आंके जाने वाले औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर फरवरी 2011 में 6.7 फीसदी थी। गुरुवार को जारी आधिकारिक आंकड़े के मुताबिक आईआईपी की जनवरी की वृद्धि दर के अंतिम आंकड़े को संशोधित कर 1.14 फीसदी कर दिया गया है जबकि अस्थाई अनुमान 6.8 फीसदी का था।
   
विनिर्माण क्षेत्र का उत्पादन फरवरी में सिर्फ चार फीसदी बढ़ा जबकि फरवरी 2011 में यह 7.5 फीसदी था। आईआईपी में विनिर्माण क्षेत्र का योगदान करीब 75 फीसदी है। उपभोक्ता वस्तुओं के उत्पादन में भी कमी हुई। इस क्षेत्र का उत्पादन भी फरवरी में 0.2 फीसदी घटा।
   
इसके अलावा टिकाउ उपभोक्ता खंड का उत्पादन फरवरी में 6.7 फीसदी घटा जबकि पिछले साल की समान अवधि में इस खंड में 18.2 फीसदी वृद्धि दर्ज हुई थी। हालांकि पूंजीगत उत्पाद क्षेत्र में वृद्धि दर 10.6 फीसदी रही जबकि पिछले साल फरवरी में 5.7 फीसदी की कमी हुई थी।
   
खनन उत्पादन में भी फरवरी के दौरान 2.1 फीसदी का सुधार नजर आया जबकि फरवरी 2011 में 1.2 फीसदी की वृद्धि हुई थी। बिजली उत्पादन में फरवरी के दौरान आठ फीसद की वृद्धि दर्ज हुई जबकि पिछले साल के उसी महीने में 6.8 फीसदी की वृद्धि दर्ज हुई थी।
   
इस महीने 22 में से 18 औद्योगिक समूहों ने फरवरी में सकारात्मक वृद्धि दर्ज की। मूल उत्पादों का उत्पादन 7.5 फीसदी बढ़ा जबकि पिछले साल फरवरी में 5.5 फीसदी बढ़ा था। हालांकि मध्यस्थ उत्पादों में 0.6 फीसदी की कमी दर्ज हुई जबकि पिछले साल फरवरी में 6.3 फीसदी की वृद्धि दर्ज हुई।
   
अप्रैल-फरवरी 2011-12 के दौरान आईआईपी की वृद्धि दर 3.5 फीसदी रही जबकि 2010-11 की समान अवधि में यह 8.1 फीसदी थी। अप्रैल से फरवरी के दौरान आईआईपी की कुल 3.5 फीसदी की धीमी वृद्धि दर के कारण रिजर्व बैंक अपनी सालाना मौद्रिक नीति में अल्पकालिक ऋण और उधारी दर में कमी कर सकता है। सालाना मौद्रिक नीति का अनावरण अगले सप्ताह होना है।
   
उद्योग ने वृद्धि में नरमी के लिए उच्च ब्याज दर को जिम्मेदार ठहराया है जिसके कारण उधारी मंहगी हुई और उपभोक्ता खर्च में कमी आई। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति के प्रमुख सी रंगराजन ने कहा थाकि आरबीआई द्वारा नीतिगत दरों में कटौती मुद्रास्फीति की गतिविधि पर निर्भर करेगी।
   
ताजा आंकड़ों के मुताबिक फरवरी के महीने में सकल मुद्रास्फीति 6.95 फीसदी पर बनी हुई है।