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Thursday, 4 April 2013

गलत दवा की मांग





गलत दवा की मांग

Tuesday, 02 April 2013 11:30
अरविंद कुमार सेन 
जनसत्ता 2 अप्रैल, 2013: बुखार कोई रोग नहीं है बल्कि शरीर में हुए किसी दूसरे रोग का सूचक है। बुखार को खत्म करने के लिए जरूरी है कि असली रोग का उपचार किया जाए। कुछ लोग पहले बुखार की दवाएं खाकर रोग के दूर होने का भ्रम पाल लेते हैं। बिहार के लिए विशेष राज्य के दर्जे की मांग इसी श्रेणी में आती है। नीतीश कुमार सत्ता में आने के बाद से विशेष राज्य की रट लगा रहे हैं। उनकी दिल्ली रैली के सियासी मतलब पहले ही निकाले जा चुके हैं। पर सवाल है कि क्या विशेष राज्य का दर्जा बिहार की सारी दिक्कतें दूर कर देगा? जवाब जानने से पहले बीमारी की पड़ताल करते हैं। 
बिहार की प्रतिव्यक्ति मासिक आय दो हजार रुपए से कम है और गरीबी रेखा के नीचे की आबादी का अनुपात तिरपन फीसद है। राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिव्यक्ति मासिक आय पांच हजार रुपए है और देश की तीस फीसद आबादी गरीबी रेखा के नीचे रहती है। इन दोनों बड़े पैमानों पर बिहार राष्ट्रीय स्तर से बहुत पीछे है। लेकिन क्या बीमारी केवल बिहार तक सीमित है? राजस्थान, ओड़िÞशा, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, झारखंड, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ भी कमोबेश ऐसी ही हालत में हैं।
हालांकि ये किताबी पैमाने भारत की सही तस्वीर पेश नहीं करते। अपेक्षया संपन्न माने जाने वाले राज्यों में भी तस्वीर का दूसरा पहलू दिखता है। मसलन, महाराष्ट्र के विदर्भ, गुजरात के सौराष्ट्र, आंध्र प्रदेश के तेलंगाना और दिल्ली के पूर्वी इलाके की हालत भी कम गई-गुजरी नहीं है। कहने का मतलब यह कि कथित विकास का फायदा गरीबों को नहीं मिला, चाहे वे मुंबई में हों या बिहार में, लेकिन देश के हर अमीर को इसका फायदा मिला है। हमारे आर्थिक विकास की सबसे बड़ी खामी यह है कि पूरी जनता के बजाय खास कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए फैसले लिए गए हैं। 
आजादी के वक्त देश की साठ फीसद से ज्यादा आबादी कृषि क्षेत्र पर टिकी हुई थी और उस समय अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी सत्तावन फीसद थी। आज कृषि क्षेत्र पर टिकी जनसंख्या की तादाद लगभग उतनी ही है मगर अर्थव्यवस्था में इस क्षेत्र की हिस्सेदारी घट कर 2010-11 में महज 14.2 फीसद रह गई है। जाहिर है, खेती-बाड़ी में लगी विशाल आबादी को विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार मुहैया कराने में हम नाकाम रहे हैं।
पूरी दुनिया ने विकास का एक ही रास्ता अपनाया है। सबसे पहले विनिर्माण क्षेत्र को मजबूत बनाया जाता है और इस क्षेत्र में खेतिहर आबादी को रोजगार दिया जाता है। ऐसे में एक तरफ उद्योग-धंधों को जरूरी मानव संसाधन मिलता रहता है वहीं कृषि क्षेत्र से जरूरत से ज्यादा दबाव हट जाता है। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद राख से खड़े होने के लिए जापान ने इसी रास्ते को अपनाया था। चीन ने भी विनिर्माण के रास्ते समृद्धि का रास्ता पकड़ा है। आज दुनिया का हर बाजार चीनी सामान से अटा पड़ा है और प्रति हेक्टेयर पैदावार के मामले में चीन हमारे देश से मीलों आगे है। जबकि भारत में विनिर्माण क्षेत्र की लगातार अनदेखी गई। 
चूंकि विनिर्माण क्षेत्र के उद्योग-धंधे श्रम आधारित होते हैं, इसलिए यहां बड़ी तादाद में नौकरियां पैदा होती हैं। चीन, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे देशों की अर्थव्यवस्था में भी विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी तीस फीसद से ज्यादा है। मगर भारतीय अर्थव्यवस्था में इस क्षेत्र का योगदान चौदह फीसद से भी कम है और यह क्षमता भी पूरे देश में समान रूप से नहीं है। गुड़गांव-मानेसर, चेन्नई-श्रीपेरम्बदूर और पुणे-चाकन को छोड़ कर पूरा देश श्रम आधारित उद्योग-धंधों के लिए तरस रहा है। 
बिहार समेत देश के पिछड़े सूबों की दिक्कतें इसी से जुड़ी हुई हैं। बिहार का घाव गहरा करने में वहां के नेताओं ने भी खूब वार किए हैं। पश्चिम बंगाल की तर्ज पर बिहार में भूमि सुधार की राजनीतिक इच्छाशक्ति किसी नेता या पार्टी ने नहीं दिखाई। नतीजा, कृषियोग्य भूमि कुछ ही हाथों में सिमटी हुई है। समय के साथ कृषि क्षेत्र की बदहाली में इजाफा होने पर भूमिहीन मजदूरों-सीमांत किसानों की सबसे ज्यादा दुर्गति हुई और इसका सबसे ज्यादा खमियाजा बिहार को भुगतना पड़ा।
बिहार के नेताओं ने भूमि सुधार करने या भूमिहीन आबादी को विनिर्माण क्षेत्र में खपाने के बजाय दूसरे राज्यों को गरीबों का निर्यात करना शुरू कर दिया। बिगड़ती कानून-व्यवस्था के कारण बिहार से अकुशल और कुशल, दोनों तरह के लोगों का पलायन शुरू हुआ। नीतीश कुमार अखबारों में दावे कर सकते हैं लेकिन बिहार से इस पलायन के रुकने का कोई मजबूत संकेत अब तक नहीं मिला है। बिहार की दिक्कत ने देश के विनिर्माण बनाम कृषि की दुविधा में और इजाफा किया है। 
बाल ठाकरे जैसे नेताओं के उभार में विकास की इस विडंबना का बड़ा हाथ रहा। नीतीश के पास पूरा अवसर था कि वे गिरावट को थाम कर आगे बढ़ने का रास्ता खोजते। बिहार में पर्याप्त जल संसाधन और उपजाऊ जमीन है। सही दिशा में आगे बढ़ कर इस सूबे को कृषि उत्पादों के प्रसंस्करण का हब बनाया जा सकता है। नीतीश इस तरफ बढ़ने के बजाय विशेष राज्य के दर्जे को रामबाण मान बैठे हैं।
विशेष दर्जे की परिपाटी 1969 में पांचवें वित्त आयोग की सिफारिश पर शुरू की गई थी। विशेष दर्जा पाने वाले राज्य को शुरुआती एक दशक के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों में छूट मिलती है। विकास कार्यों के लिए नब्बे फीसद रकम अनुदान के रूप में केंद्र सरकार से मिलती है और दस फीसद पैसा राज्य सरकार को लगाना होता है। कड़वी सच्चाई यह है कि विशेष राज्य के दर्जे से कुछ उद्योगों के मुनाफे में इजाफा जरूर होता है, जनता को कोई बड़ा फायदा नहीं मिलता है। 
पूर्वोत्तर के आठ राज्यों और जम्मू-कश्मीर को 1969 से ही विशेष राज्य का दर्जा मिला हुआ है। क्या इन राज्यों का पिछड़ापन दूर हो गया है? भाजपा की अगुआई वाली राजग सरकार ने उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा दिया था। दोनों ही राज्यों में शुरुआती एक दशक के दरम्यान मिलने वाली कर-राहतों का फायदा उठाने के लिए थोड़ा-बहुत निवेश हुआ। गौर करने वाली बात है कि यह निवेश दवा और सौंदर्य प्रसाधन बनाने वाली, कम श्रम की मांग वाली छोटी कंपनियों ने किया था। पिछले साल औद्योगिक राहत की छूट खत्म होते ही इन कंपनियों ने अपने बोरिया-बिस्तर बांधने शुरू कर दिए। विकास और रोजगार के मानक पर दोनों राज्य उसी मोड़ पर खड़े हैं जहां से 2002 में शुरुआत हुई थी।
दरअसल, विकास के मामले में हमारी अर्थव्यवस्था संरचनात्मक अवरोधों से घिरी हुई है और इसका समाधान हल्की-फुल्की राहतों से होने वाला नहीं है। बिहार ही क्यों, सभीगरीब राज्यों को आगे बढ़ने का हक है, मगर इसके लिए विशेष राज्य का दर्जा सही उपाय नहीं है। खासदर्जे या वैसी रियायतों की मांग करना असल में एक बहुत गंभीर समस्या का सरलीकरण करना है। दिन-ब-दिन कृषि क्षेत्र की बदहाली में इजाफा होने से बड़ी ग्रामीण आबादी रोजगार की तलाश में शहरों का रुख कर रही है। 
कृषि से हो रहे पलायन के हिसाब से शहरी इलाकों में रोजगार पैदा नहीं हो रहे हैं, इसलिए यह आबादी झुग्गी-झोपड़ियों और फ्लाइओवरों के नीचे विकास की कहानी बयान कर रही है। दिशाहीन नीतियों के कारण हुए कथित विकास ने एक राज्य, यहां तक कि एक ही शहर के भीतर विकास के टापू बना दिए हैं जो गरीबी के दलदल से घिरे हुए हैं। 
सन 1990 के बाद से अब तक भारतीय अर्थव्यवस्था के इंजन का काम कर रहा सेवा क्षेत्र भी अब अमेरिका और यूरोप की मंदी से हलकान है। कंपनियों का कहना है कि कुशल लोगों के लिए नौकरियों का ढेर है, वहीं बाहर अकुशल और अधकचरी जानकारी वाले युवाओं की तादाद बढ़ती जा रही है।
अखबारों में अक्सर सुनहरी तस्वीर पेश की जाती है कि देश की साठ फीसद आबादी पैंतीस साल से कम उम्र की है। कई जानकार इस आंकड़े के सहारे अपनी पीठ ठोंकते हुए कहते हैं कि भारत जल्दी ही महाशक्ति बन जाएगा। हकीकत यह है कि भारत एक बड़े संकट की तरफ बढ़ रहा है। देश की विशाल युवा आबादी को हर साल दस करोड़ नौकरियों की जरूरत है, पर सालाना एक करोड़ नौकरियां भी पैदा नहीं हो पा रही हैं। जब युवा आबादी कुल जनसंख्या के आधे से ज्यादा हो तो इसे जनसंख्या परिलाभ (डेमोग्राफिक डिवीडेंड) कहा जाता है। मगर इस युवा आबादी का सही फायदा उठाने की शर्त यह है कि हर हाथ में काम हो, वरना यह युवा-शक्ति आक्रोश के ज्वालामुखी में बदल जाती है। 
चीन और दक्षिण कोरिया ने विनिर्माण क्षेत्र में हुवावे, सैमसंग, एलजी और हुंडई जैसी कंपनियां खड़ी करके जनसंख्या परिलाभ का फायदा उठाया। भारत में बहुत देर से सरकार ने जीडीपी में विनिर्माण क्षेत्र की भागीदारी पचीस फीसद करने का किताबी लक्ष्य तय किया है। चूंकि अब दुनिया भर का विनिर्माण क्षेत्र उच्च तकनीक के दौर में प्रवेश कर गया है, लिहाजा कह सकते हैं कि भारतीय युवाओं के लिए विनिर्माण की बस छूट चुकी है।
बिहार की त्रासदी पूरे देश के गरीबों के साथ चल रहे बड़े क्रूर मजाक का एक छोटा हिस्सा है। अगर कोई नीतीश के वादे पर ऐतबार कर बैठा हो कि विशेष राज्य का दर्जा मिलते ही बिहार का पिछड़ापन दूर हो जाएगा तो विशेष राज्य के पालने में पैदा हुए पूर्वोत्तर के आठ राज्य आईने का काम कर सकते हैं। बिहार के  पिछड़ेपनका समाधान मुंबई में नौकरी खोजने या विशेष राज्य का दर्जा हासिल करने से नहीं होने वाला है, और राज्य की बदहाली के लिए केंद्र से ज्यादा खुद वहां के लोग जिम्मेवार हैं। यह सच नीतीश जितनी जल्दी समझ लेंगे, उतना ही बिहार के लिए बेहतर होगा। 
बहरहाल, भूख पर आई अपनी हालिया किताब में हर्ष मंदर लिखते हैं कि घोर गरीबी में जीवनयापन करने वाले मुसहर जाति के लोग रोटी मांगने पर अपने बच्चों को अफीम सुंघा देते हैं। रोटी नहीं है और भूख का साथ जीवन भर रहना है, लिहाजा मुसहर लोग अपने बच्चों को भूख के साथ जीना सिखाते हैं। ऐसा लगता है कि बिहार जैसे देश के दूसरे सूबों के गरीबों ने भी बदहाली के साथ जीना सीख लिया है।
http://www.jansatta.com/index.php/component/content/article/20-2009-09-11-07-46-16/41680-2013-04-02-06-01-20