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Monday, 1 April 2013

पश्चिम बंगाल में बेरोजगारों की नुमाईश बनी प्राइमरी टीचर की परीक्षा


पश्चिम बंगाल में बेरोजगारों की नुमाईश बनी प्राइमरी टीचर की परीक्षा

डा.मान्धाता सिंह

प्रशासनिक अदूरदर्शिता ने एक साथ  लगभग ३५००० प्राइमरी शिक्षकों की नियुक्ति के ममता बनर्जी के महत्वाकांक्षी फैसले पर दाग लगा दिया। रविवार ३१ मार्च को एक साथ ४५ लाख परीक्षार्थियों ने टीचर इल्जीबिलिटी टेस्ट दिया। मगर अव्यवस्था के साथ परीक्षार्थियों व अभिभावकों की परेशानियों का पूर्वानुमान न कर पाने के कारण हजारों छात्र परीक्षा नहीं दे पाए। इसकी कई वजहें रहीं।
  पहली वजह यह कि सभी परीक्षार्थियों को अपने फार्म नंबर के आधार पर http://wbbpe.org/TETvenue.aspx  साइट से अपना परीक्षा केंद्र जानकर परीक्षा देनी थी। आरोप हैं ति तमाम परीक्षार्थियों को तकनीकी गड़बड़ी के कारण सही केंद्र का पता नहीं चला। जो मालूम हुआ उसके आधार पर जब परीक्षार्थी उस सेंटर पर पहुंचे तो बताया गया कि आपका सेंटर यहां नहीं कहीं और है। यह गड़बड़ी शायद ज्यादा नहीं थी मगर जो फंसे उनका तो प्राथमिक शिक्षक बनने का सपना ही टूट गया।
  दूसरी वजह परीक्षार्थियों के अपने सेंटर पर पहुंचने के दौरान हुईं दिक्कतें थीं। एक उदाहरण लीजिए। सियालदह से चली बनगांव लोकल  दमदमकैंट पर पहुंची तो वहां मौजूद भारी हुजूम से लोकल खचाखच भर गई। इसके बाद हाबरा स्टेशन तक हर स्टेशन पर बारी तादाद में परीक्षार्थी ट्रेन में चढ़ने का असफल प्रयोस करते रहे। नतीजे में तमाम परीक्षार्थी अपने सेटर वाले स्टेशन पर उतर ही नहीं पाए। ताज्जुब तो तब होता है जब हर स्टेशनों पर मौजूद भीड़ देखकर भी रेल प्रशासन या स्थानीय प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा। नतीजें में कई परीक्षार्थी भीड़ की धक्कामुक्की सह नहीं पाए और नीचे गिरकर जख्मी हो गए। अफवाह तक फैल गई कि कुछ छात्रों की मौत हो गई है। यह ट्रेन जब हाबरा स्टेशन पहुंची तो वहां भी हजारों लोग इसी ट्रेन में चढ़ने के लिए खड़े थे। ऐसी मारामारी शुरू हुई कि उतरने वाले उतर नहीं पाए और चढ़ने वाले लोगों को उतरने नहीं दिए। सबसे अधिक दुर्दशा छात्राओं और उनके साथ चल रही महिला अभिभावकों की हुई। चारो ओर चीखपुकार मच गई। किसी के पर्स गायब तो तमाम की चप्पलें या तो टूट गईं या फिर पैर से निकलकर गायब हो गईं।
  मैं और मेरे साथ कुछ और लोग दौड़कर ड्राईवर केबिन गए और अनुरोध किया कि ट्रेन को कुछ देर रोककर रखें अन्यथा हादसा हो जाएगा। ड्राईवर ने ट्रेन जब रोके रखी तो महिला डिब्बों समेत कई डिब्बों में चढ़ने वालों यह बताकर रोका गया कि ट्रेन रोकी गई है। उतरने वालों को पहले उतरने दीजिए। ऐसा करने के बावजूद डिब्बे से छात्राएं रोते-चीखते निकल पाईं। यहां बता दूं कि सबसे ज्यादा परीक्षार्थी हाबरा स्टेशन पर ही उतरने वाले थे।
  यह अफरातफरी सावधानी न बरतने का ही परिणाम था। रविवार को ट्रेने कम होती हैं मगर कहा गया था कि रोज की तरह ट्रेनें चलेंगी। इस ट्रेन के साथ ऐसा इसलिएभी हुआ क्यों कि इसके आगे बारासात, और दत्तपुकुर को छोड़ा गया जिससे हाबरा जाने वाले परीक्षार्थी नहीं जा सकते थे। १२ बजे तक सेंटर पर पहुंचने के लिए ९ से ९.३० के बीच की ट्रेनों में भीड़ होना लाजिमी था। अगर पहले और बाद की ५ या ६ ट्रेनों को बनगांव तक लेजाते और इसकी घोषणा स्टेशनों पर की जाती तो शायद लोगों को इतना कष्ट नहीं झेलना पड़ता। रेल प्रशासन यह क्यों नहीं समझ पाया, यह समझ से परे है। शायद जनता को रामभरोसे की आदत पड़ी हुई है। कैसे नहीं समझ में आया कि ४५ लाख परीक्षार्थी और उनके साथ ४५ लाख अभिभावक होंगे और इतने बड़ी भीड़ को पीक आवर में संभालने के विशेष इंतजाम करने होंगे। ऊपर से कुछ सिरफिरे लोगों ने बाद में ट्रेंन अवरोध कर दिया नतीजे में भीड़ के कारण पिछली ट्रेंन से अपने सेंटर पर आ रहे लोंग अटक गए। कोई आधा घंटे तो कोई १५ से लेकर २० मिनट लेट तक सेंटर पहुंचा। इनके मानसिक कष्ट और नुकसान का अपराधी किसे समझा जाए?
 बेरोजगारी के मारे इन परीक्षार्थियों के प्रति इतनी गैरजिम्मेदार व्यवस्था की आखिर क्या सजा हो सकती है? लोगों के जानमाल के साथ यह साफ खिलवाड़ था। एक आंकड़े के अनुसार ३४५५९ असिस्टेंट टीचर के लिए ४५ से ५५ लाख तक परीक्षार्थी की परीक्षा के बाद राज्य के ५९००० प्राइमरी स्कूलों में खाली पड़ जगहों को भरा जाना है। यह एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती थी। पहली बार पश्चिम बंगाल सरकार ने एक ही बार में इतने सारे शिक्षकों की नियुक्ति का फैसला लिया है।

   अव्यवस्था की एक और वजह परीक्षार्थियों को अपने स्थायी निवास से काफी दूर के सेंटर दिया जाना था। किसी का घर श्यामबाजार में है तो उसे ८० किलोमाटर दूर हाड़ोआ में भेजा गया। कोई बेलघरिया का परीक्षार्थी है तो उसे संदेशखाली ( यानी सुंदरवन ) भेज दिया गया। ऐसे हजारों परीक्षार्थियों को भटकना पड़ा। अगर सेंटर कम पड़ रहे थे तो दो शिफ्ट में परीक्षा लिया जाना उचित था।
   बहरहाल जो भी हो एक बात तो स्पष्ट देखने को मिली कि परीक्षार्थी के साथ अभिभावक भी इस से बेहद नाराज थे। आपस में टिप्पणी करके अपने आक्रोश व्यक्त कर रहे थे।
 शक तो यह भी होता है कि पंचायत चुनाव की बिसात का मोहरा बनाकर परीक्षार्थियों के साथ राजनीति हुई। सत्ता के इस राजनीतिक खेल में आखिर कब तक पिसती रहेगी मासूम जनता? और यह जनता भी आखिर कब तक खुद को बेचारी समझती रहेगी?​