Pages

Sunday, 17 February 2013

विदेशी पूंजी और साहित्यिक खेल


विदेशी पूंजी और साहित्यिक खेल


Wednesday, 13 February 2013 12:09
शंभुनाथ 
जनसत्ता 13 फरवरी, 2013: महाभारत युद्ध के बाद पांडव पक्ष के सभी योद्धा अपनी-अपनी वीरता के बारे में हांके जा रहे थे। कौन फैसला करे? चलो, पहाड़ के शिखर पर बर्बरीक के पास। बर्बरीक ने कहा, मैं तो एक ही व्यक्ति को युद्ध करते देख रहा था- कृष्ण को। उनके हाथ में हथियार कभी नहीं दिखा। अभिव्यक्ति की आजादी आज सिर्फ उनके पास है, जिनके पीछे विदेशी पंूजी खड़ी है। कोई बढ़े तो, कोई मिटे तो सब विदेशी पंूजी की लीला है। विदेशी पंूजी ही आज हर आजादी की गंगोत्री है। इसके साहित्यिक खेल कम सनसनीखेज नहीं होते। 
आज जब सलमान रुश्दी, अरुंधति राय, कमल हासन, आशीष नंदी आदि की अभिव्यक्ति की आजादी छिनने की बात उठती है तो समझ में नहीं आता कि अगर इन्हें ही अभिव्यक्ति की आजादी नहीं मिली हुई है, तो किन्हें मिली हुई है। आज ऐसे ही बुद्धिजीवी बोल रहे हैं, पढ़े-सुने जा रहे हैं, बिक रहे हैं और सभी पढ़े-लिखे लोगों की जुबान पर हैं और चिंतनीय है कि उतना ही दबता जा रहा है गैर-सनसनीखेज बाकी साहित्य। ये सभी खूब खाए-पीए और अघाए लेखक हैं, कलाकार हैं, जो अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का व्यावसायिक इस्तेमाल करना जानते हैं।
ये विवाद-क्षेत्र में सिर्फ इससे व्यावसायिक र्इंधन लेने के लिए जाते हैं, विवाद को बड़े परिप्रेक्ष्य में देखने के लिए नहीं। इन सभी के चेहरों पर अभिजात भद्रता और चिकनाई है, गुस्से की जरा-सी बदसूरती नहीं है। ऐसे ही लेखकों और बुद्धिजीवियों का बाजार है, इन्हीं के लिए भीड़ इकट्ठी होती है। ऐसे ही कार्टूनिस्ट रीयलिटी शो में जा रहे हैं। ऐसे ही लेखक और समाजविज्ञानी विदेश घूम रहे हैं। इनमें नागार्जुन और रेणु की तरह कौन जेल में है? 
गुलामी के दिनों में अंग्रेज कहते थे- भारत के लोग असभ्य हैं, बंदरों और पेड़ों की पूजा करते हैं, भारत एक राष्ट्र नहीं है, यहां लोकतंत्र नहीं चल सकता और जातिप्रथा अंग्रेजी राज के लिए बड़े फायदे की चीज है। एडवर्ड सईद ने विस्तार से बताया है कि यूरोपीय लेखक मुसलमानों के बारे में क्या-क्या कहते थे। सलमान रुश्दी, अरुंधति राय, आशीष नंदी जैसे बुद्धिजीवी पौर्वात्यवादियों के ही वंशज हैं। कोई बताए, ये उनसे भिन्न क्या कह रहे हैं? 
कुछ बुद्धिजीवी ऐसे हैं जो सलमान रुश्दी और कमल हासन पर मुखर होते हैं, मगर हुसेन पर मौन साध जाते हैं। कुछ हैं जो साम्राज्यवाद का विरोध करेंगे, पर अमेरिका का नाम नहीं लेंगे, मानो साम्राज्यवाद एक ऐसा शेर हो, जिसका मुंह गाय का है। पुराने फासीवाद और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के वर्तमान हनन में फर्क यह है कि पहले लेखक जेल में डाल दिए जाते थे, अब उन पर डॉलरों की बरसात होती है। ये हर महीने न्यूयार्क, लंदन, कहीं न कहीं जाते रहते हैं। कोई प्रकाशक से अपनी रेटिंग बढ़ जाने पर अधिक रॉयल्टी की मांग करता है। किसी की रात प्रसिद्धि के जश्न में अचानक रंगीन हो जाती है। कई लेखक बेताब हैं, कहीं से फतवा जारी हो, कहीं रोक लगे ताकि बाजार उठे। 
ताजा उदाहरण लें। आशीष नंदी की गिरफ्तारी की मांग से बढ़ कर जनतंत्र-विरोधी बात क्या होगी। पर उनका कहना कि वाममोर्चा शासन में भ्रष्टाचार इसलिए नहीं हुआ कि वहां दलित और जनजातीय लोग कभी सत्ता में नहीं आ पाए, कुछ का यह मानना है कि दलित और जनजातीय लोग बुनियादी रूप से भष्ट होते हैं। उन्हें भष्टाचार की होड़ में आगे बढ़ जाना चाहिए। अंग्रेज कई जनजातीय लोगों को अपराधी मानते थे। कुछ वही मानसिकता अब सत्ता-विमर्श के नए ढांचे में आई है। ऐसा नहीं कि इस तरह का बयान साधारण हास-परिहास है। माफी मांग लेने पर भी सैद्धांतिक मानसिकता उजागर होती है। यह किसी भी भारतीय परिघटना को धर्म, जाति, स्थानीयता से जोड़ कर देखने की सबाल्टर्नवादी थियरी का एक स्वाभाविक हिस्सा है। वामपंथी शासन में भ्रष्टाचार नहीं हुआ या कम हुआ, इसका संबंध राजनीतिक विचारधारा और ईमानदार लोगों से है या जाति-बिरादरी से? 
आशीष नंदी अपना मौलिक सबाल्टर्नवाद दिखाने के झोंक में लगभग यह कह गए कि अब भ्रष्टाचार से ही लोकतंत्र आएगा, समाजवाद आएगा। इसलिए 'कुछ के द्वारा भ्रष्टाचार' से 'सबके द्वारा भ्रष्टाचार' तक बढ़ो। दलित और जनजातीय लोग घूस लेकर दुनिया बरोब्बर करें। दलितों का भ्रष्टाचार 'इक्वलाइजिंग फोर्सेस' है। 
क्या पश्चिम में जाति-बिरादरी की वजह से भ्रष्टाचार बढ़ा है? आशीष नंदी का कथन लोकतंत्र और समानता की धारणाओं का ही उपहास नहीं है, यह भ्रष्टाचार को अकादमिक-नैतिक वैधता देना भी है। क्या सभी दलित और जनजातीय लोग मधु कोड़ा और ए राजा हो सकेंगे? आम दलितों के पास तो चटनी की गंध भी नहीं पहुंचेगी। असलियत है कि आम दलित और जनजातीय लोग दूसरे गरीब लोगों की तरह ही ईमानदार और भोले हैं, वे बेईमान नहीं हैं। वे ज्यादा मनुष्य हैं, जिन्हें पढ़े-लिखे अभिजात लोग ही सामुदायिक कट्टरवाद में प्रशिक्षित कर रहे हैं। 
निश्चय ही भ्रष्टाचार जितना दल-निरपेक्ष और धर्म-निरपेक्ष मामला है, उतना ही जाति-निरपेक्ष भी है। इसे लेकर गुस्सा समूचे राष्ट्र में है, भले सभी लोग असहाय हों। भ्रष्टाचार नीचे से कहीं बहुत ज्यादा ऊपर है, चाहे वहां ब्राह्मण हो, दलित या अति आधुनिक हो। इसी तरह नैतिकता सबसे अधिक जमीन के आम लोगों में है। 
दिल्ली और कुछ खास महानगरों में पिछले कुछ दशकों में समाज विज्ञान के ऐसे केंद्र बने हैं, जो नव-उपनिवेशवाद के   घोंसले हैं। इनमें ऐसे ही अंडे फूटते हैं और सिद्धांत निकलते हैं। इन केंद्रों में अमेरिका और बहुराष्ट्रीय कंपनियों का जम कर पैसा आता है। यह जरूर देखना चाहिए कि प्रमुख सबाल्टर्नवादी समाज विज्ञानियों ने अपने जीवन के कितने साल अमेरिका में बिताए। अब ये यूरोप नहीं जाते, इनका ठिकाना अमेरिका है। 
दलितों, स्त्रियों, जनजातियों, किसानों के दमन और उनके उत्पीड़न के सवालों को उठाना एक बात है, और इनकी समस्याओं को एकदम अलगाव में देखना दूसरी बात। राष्ट्रीयता के पूंजीवादी और सामंतवादी दोषों की वजह से सबाल्टर्नवादी लेखक समूची 'राष्ट्रीयता' को ही ध्वस्त कर ]यह कम विडंबना नहीं है कि अमेरिका की हॉलीवुड जैसी जगहों से ऐसी संस्कृति आती है जो देश में फास्ट फूड-पेय, नाचने-गाने और उपभोग में 'एकरूपता' ला रही है। वहां के बौद्धिक-शैक्षिक केंद्रों से ऐसा सिद्धांत आता है जो उपर्युक्त सांस्कृतिक एकरूपता के समांतर 'सामाजिक भिन्नता' को बढ़ावा दे रहा है। भारत के बुद्धिजीवी उसका अंधानुकरण करते हैं। पश्चिम फिर बता रहा है कि हम क्या हैं। वह स्वतंत्रता के सब्जबाग दिखाता है और 'सामुदायिक शत्रुता का दर्शन' देता है, जिसे समाज वैज्ञानिक बुद्धिजीवी विद्वत्ता कहता है। 
सबाल्टर्नवादी समाज विज्ञानीया रुश्दी समर्थक अंग्रेजी लेखक कभी प्रत्यक्ष विदेशी पंूजी निवेश का विरोध नहीं करेंगे। वे हिंसक अमेरिकी जीवन-ढंग पर नहीं बोलेंगे, दुनिया के एक सौ पचास से अधिक देशों में अमेरिकी फौज की उपस्थिति पर टिप्पणी नहीं करेंगे। साम्राज्यवाद और सांस्कृतिक उन्मूलन पर उनकी कलम नहीं चलेगी। वे 'मधुशाला' का पाठ करके काव्य-प्रेम दिखाने वाले अमिताभ बच्चन के नरेंद्र मोदी के ब्रांड एंबेसडर बन जाने पर चुप रहेंगे। वे संक्रामक वंशवाद और मनमोहन सिंह से सम्मोहित रहेंगे।
महाराष्ट्र और असम में हिंदीभाषियों के विरुद्ध घृणा-प्रचार पर बिल्कुल नहीं बोलेंगे, क्योंकि वे 'भारतीय राष्ट्रीयता' की धारणा से ही प्रस्थान कर चुके हैं और दरअसल, यथास्थितिवादी वाग्विलासी हैं। ये आम आदमी की पहुंच के बाहर जा चुकी अच्छी शिक्षा और चिकित्सा के बारे में अनजान बने रहेंगे। ये अंबानी के तिरपन मंजिलों के मकान को अश्लील न कह कर दलितों से कहेंगे, तुम भी ऐसे मकान बना लो। 
सबाल्टर्नवादियों की कुछ अपनी चुप्पियां हैं, जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस्तेमाल न करना इस स्वतंत्रता को किसी न किसी के हाथ बेच देना है।
जयपुर साहित्य समारोह एक व्यावसायिक विनियोग का अवसर है। हर बार इसमें चुना जाता है कि विवाद की थीम क्या हो। आजकल विवाह-शादी में, सार्वजनिक पूजा या मॉल-मल्टीप्लेक्स के प्रचार के लिए सोचा जाता है कि केंद्रीय थीम क्या हो। ठेकेदार थीम के अनुसार पैसे लेकर सब तैयार कर देते हैं। अब साहित्यिक उत्सव भी 'विवाद की थीम' बना कर तैयार होते हैं। सिनेमा, टीवी, खेल की हस्तियों को बुला कर और बड़े-बड़े पुरस्कार देकर प्रचारित किए गए लेखकों को देश-विदेश से बुला कर भीड़ दिखाई जाती है, ताकि साहित्यिक उत्सव का आकर्षण बढ़े। कभी-कभी रुश्दी-नायपॉल, कभी आशीष नंदी, कभी किसी और लेखक से परिस्थिति बना कर साहित्यिक उत्सव में वितंडा खड़ा कराया जाता है। कभी मंत्री कूदते हैं। कोर्ट-कचहरी भी हो जाती है। इससे उत्सव उछलता है, पूंजी भी उछलती है, लेखक भी उछलता है और बाजार भी उठता है। उछलता जो हो, गिरता साहित्य है। 
ज्ञान और विशेषज्ञता हमेशा आदर की चीज हैं। फिर भी, प्राचीन काल में सत्ता के स्वार्थ में शास्त्र के दुरुपयोग हुए हैं, उसी तरह आज भी यथास्थितिवाद के लिए सामाजिक विभाजन के उद््देश्य से ज्ञान और विशेषज्ञता के दुरुपयोग हो रहे हैं। आशीष नंदी का जाति या किसी भी खंडित सामुदायिक कोण से समस्याओं को देखना ऐसा ही एक दुरुपयोग है। 
हर बार ऐसा होता है कि जयपुर साहित्य समारोह के बौद्धिक पहाड़ से बस ऐसा ही कोई मरा चूहा निकलता है। कहीं यह समारोह का खोखलापन तो नहीं है? दुनिया भर के सैकड़ों लेखक, इतना बड़ा जमावड़ा, करोड़ों का खर्च, दुर्लभ वैश्विक दृश्य, उपन्यास ही उपन्यास और इतने तामझाम से बार-बार निकले सिर्फ नकली विवाद, नकली प्रश्न या मिथ्या चेतना। हमेशा एक शब्द और एक लाठी साथ निकलें।
देश में असहिष्णुता कौन बढ़ा रहा है? आप खुद समावेशी राष्ट्रीयता को सह नहीं पा रहे हैं, संविधान के निर्देशक सिद्धांतों को तोड़ रहे हैंं और जनता को नई-नई मिथ्या चेतनाओं और वंचनाओं के बीच निस्सहाय छोड़ रहे हैं और कहते हैं कि जनता असहिष्णु हो गई है, गुस्सैल हो गई है। बुद्धिजीवियों के चेहरे से गुस्सा गायब होगा और चिकनाई आएगी तो जनता का असंतोष निर्बुद्धिपरक रास्तों से फूटेगा। जब लेखक और समाज विज्ञानी अतार्किक होंगे तो क्या जनता कभी तार्किक होगी? साहित्य और समाज विज्ञान के पीछे से अगर अमेरिका अपना खेल खेलेगा और जयपुर साहित्य समारोह अंग्रेजी वर्चस्व वाला समारोह बन जाएगा तो वहां से सांस्कृतिक प्लेग के चूहे निकलेंगे। 
सांस्कृतिक महामारी के चूहे सिर्फ इसलिए बढ़ रहे हैं कि हिंदी लेखकों और प्रकाशकों में आत्मविश्वास की कमी है, एकजुटता की कमी है। वे भी दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले में भारतीय भाषाओं के लेखकों का मेला आयोजित कर सकते हैं। जयपुर साहित्य समारोह के राष्ट्रीय जवाब की जरूरत है, जहां विवाद हो तो सही प्रश्न भी उठें।