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Sunday, 15 January 2012

क्‍यों जरूरी है इस वक्‍त हम सबका माओवादी हो जाना!

क्‍यों जरूरी है इस वक्‍त हम सबका माओवादी हो जाना!


♦ चंद्रिका
92 पेज के फैसले में तीन जिंदगियों को आजीवन कारावास दिया जा चुका है। बिनायक सेन के बारे में उतना कहा जा चुका है, जितना वे निर्दोष हैं और उतना बाकी है, जितना सरकार दोषी है। अन्य दो नाम पियूष गुहा और नारायण सान्याल, जिनका जिक्र इसलिए सुना जा सका कि बिनायक सेन के साथ ही इन्‍हें भी सजा मुकर्रर हुई, शायद अनसुना रह जाता। पर जिन नामों और संख्याओं का जिक्र नहीं आया वे 770 हैं, जो बीते बरस के साथ छत्तीसगढ़ की जेलों में कैद कर दिये गये। इनमें हत्याओं और यातनाओं को शामिल नहीं किया गया है। इनमें अधिकांश आदिवासी हैं, पर सब के सब माओवादी। छत्तीसगढ़ का आदिवासी होना थोड़े-बहुत उलट फेर के साथ माओवादी होना है और माओवादी होना अखबारी कतरनों से बनी हमारी आंखों में आतंकवादी होना। यह समीकरण बदलते समय के साथ अब पूरे देश पर लागू हो रहा है। सच्चाई बारिश की धूप हो चुकी है और हमारा जेहन सरकारी लोकतंत्र का स्टोर रूम। दशकों पहले जिन जंगलों में रोटी, दवा और शिक्षा पहुंचनी थी, वहां सरकार ने बारूद और बंदूक पहुंचा दी। बारूद और बंदूक के बारे में बात करते हुए शायद यह कहना राजीव गांधी की नकल करने जैसा होगा कि जब बारूद जलेगी तो थोड़ी गर्मी पैदा ही होगी। दुनिया की महाशक्ति के रूप में गिने जाने वाले देश की सत्ता से लड़ना शायद और यकीनन आदिवासियों की इच्छा नहीं रही होगी, पर यह जरूरत बन गयी कि जीने के लिए रोटी और बंदूक साथ लेके चलना और जंगलों की नयी पीढ़ि‍यों ने लड़ाइयों के बीच जीने की आदत डाल ली।
अब तो बस देश की जनता अपनी जरूरतें पूरी कर रही है। मसलन आदिवासियों को जीने के लिए जंगल की जरूरत है और जंगल को पेड़ों की जरूरत, पेड़ों को उस जमीन की जरूरत जिसकी पीठ पर वे खड़े रह सकें, उस पीठ और जमीन की जरूरतें है कि उन्हें बचाया जा सके उखड़ने और खोदे जाने से और इन सारे बचाव व जरूरतों को पूरा करने के लिए के लिए जरूरी है माओवादी हो जाना। कार्पोरेट और सरकार की जुगलबंद संगीत को पहाड़ी और जंगली हवा में न बिखरने देना। सरकार की तनी हुई बंदूक की नली से गोली निकाल लेना, अपनी जरूरतों के लिए जरूरत के मुताबिक जरूरी हथियार उठा लेना। शहर के स्थगन और निस्‍पंदन से दूर ऐसी हरकत करना कि दुनिया के बुद्धिजीवियों की किताबों से अक्षर निकलकर जंगलों की पगडंडियों पर चल-फिर रहे हों। इस बिना पर इतिहास की परवाह न करना कि लिखा हुआ इतिहास लैंपपोस्ट के नीचे चलते हुए आदमी की परछाईं भर है, बदलते गांवों के साथ अपने नाम बदलना और पुलिस के पकड़े जाने तक बगैर नाम के जीना, या मर जाना, कई-कई नामों के साथ। नीली पॉलीथीन और एक किट के साथ जिंदगी को ऐसे चलाना कि समय को गुरिल्ला धक्का देने जैसा हो। उड़ीसा, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल के विगत वर्षों के संघर्ष, जिनका माओवादियों ने नेतृत्व किया, जीवन जीने के लिए अपनी अस्मिता के साथ खड़े होने के सुबूत हैं। जिसे भावी प्रधानमंत्री की होड़ में या निर्विरोध चुना जाने वाला, सनसनीखेज यात्राएं करता कांग्रेस का युवा नेता हाल के एक बड़े अधिवेशन में एक तरफ उड़ीसा के आदिवासियों की जीत करार देता है और कहता है कि आम आदमी वो है जो व्यवस्था से कटा हुआ है। तो दूसरी तरफ देश की लोकतांत्रिक संरचना उन्हें माओवादी कहकर जेल में या सेना के शिकारी खेल में खत्म कर रही है।
इस पूरी परिघटना के एक विचारक नारायण सान्याल, उर्फ नवीन उर्फ विजय उर्फ सुबोध भी हैं इसके अलावा इनके और भी नाम हो सकते हैं, जिनका पुलिस को पता नहीं भी हो। पोलित ब्यूरो सदस्य माओवादी पार्टी, कोर्ट के दस्तावेज के मुताबिक उम्र 74 साल और पेशा कुछ नहीं। बगैर पेशे का माओवादी। शायद माओवादियों की भाषा में प्रोफेशनल रिवोल्यूशनरी कहा जाता है और माओवादी होना अपने आप में एक पेशा माना जाता है। उर्फ तमाम नामों के साथ नारायण सान्याल को कोर्ट में पेशी के लिए हर बार 50 से अधिक पुलिस की व्यवस्था करनी पड़ती है। तथ्य यह भी कि नारायण सान्याल किसी जेल में दो माह से ज्यादा रहने पर जेल के अंदर ही संगठन बना लेते हैं। देश की जेलों में बंद कई माओवादियों के ऊपर ये आरोप हैं और उन्हें दो या तीन महीने में जेल बदलनी पड़ती है। बीते 25 दिसंबर को चंद्रपुर जेल के सभी माओवादी बंदियों को नागपुर जेल भेजना पड़ा क्योंकि पूरी जेल ही असुरक्षित हो गयी थी। प्रधानमंत्री का कहना है कि पूरा देश ही असुरक्षित है और माओवादी उसके सबसे बड़े कारक हैं।
लिहाजा बिनायक सेन के आजीवन कारावास पर बहस का केंद्रीय बिंदु माओवादी हो रहे देश में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, लेखकों व बुद्धिजीवियों की भूमिका पर है। नारायण सान्याल, कोबाद गांधी, अभिषेक मुखर्जी जैसे बुद्धिजीवियों के माओवादी हो जाने का प्रश्न है। कि आखिर तेरह भाषाओं का जानकार और जादवपुर विश्वविद्यालय का स्‍कॉलर छात्र माओवादी क्यों बना? एक मानवाधिकार कार्यकर्ता छत्तीसगढ़ या पश्चिम बंगाल में आज अपनी भूमिका कैसे अदा करे? क्या यह सलवा-जुडुम की सरकारी हिंसा को वैध करके या फिर इसके प्रतिरोध में जन आंदोलन के साथ खड़े होकर। क्या इन जनांदोलनों को इस आधार पर खारिज किया जा सकता है कि यह माओवादियों के नेतृत्व में चल रहे हैं? यह खारिजनामा छह लाख छत्तीसगढ़ के आदिवासी विस्थापितों को भी खारिज करना होगा। जिसे रमन सिंह यह कहते हुए पहले ही खारिज कर चुके हैं कि जो सलवा-जुडुम में नहीं है वो सब माओवादी है और अब सलवा-जुडुम कैंप में गिने चुने ही लोग बचे हैं, बाकी आदिवासी जंगलों में लौट चुके हैं।
chandrika(चंद्रिका। पत्रकार, छात्र। फ़ैज़ाबाद (यूपी) के निवासी। बनारस हिंदू विश्‍वविद्यालय के बाद फिलहाल महात्‍मा गांधी अंतर्राष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय में अध्‍ययन। आंदोलन। मशहूर ब्‍लॉग दखल की दुनिया के सदस्‍य। उनसे chandrika.media@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)