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Sunday, 24 February 2013

कचरे से रेडियोधर्मी तत्वों ​​के रिसाव से एक बार फिर परमाणु ऊर्जा के औचित्य पर सवालिया निशान



कचरे से रेडियोधर्मी तत्वों ​​के रिसाव से एक बार फिर परमाणु ऊर्जा  के औचित्य पर सवालिया निशान

एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास​

अब भी वक्त है कि जापान के सुनामी अनुभव से गुजरने से पहले परमाणु ऊर्जा से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर देशव्यापी स्तर पर चर्चा हो।भारत का यह लक्ष्य कि सन् 2050 तक परमाणु ऊर्जा से 25 प्रतिशत बिजली की आपूर्ति की जाए!भारत में परमाणु रिएक्टर बेचने को इच्छुक अमेरिकी कंपनी जेनरल इलेक्ट्रिक के मुख्य कार्यकारी अधिकारी का कहना है कि परमाणु ऊर्जा दूसरे संसाधनों के मुकाबले इतनी अधिक महंगी है कि इसे 'न्यायोचित ठहराना मुश्किल' है।भारत की कारपोरेट सरकार परमाणु ऊर्जा के लिए किसी भी हद तक जा रही है लेकिन अमेरिका में परमाणु कचरे से रेडियो एक्टिव तत्वों ​​के रिसाव से एक बार फिर इसके औचित्य पर सवालिया निशान लग गया है।अमेरिका में कम से कम छह भूमिगत परमाणु कचरा टैंकों से रेडियोधर्मी तत्वों का रिसाव हुआ है। इन टैंकों को पृथ्वी पर सबसे प्रदूषित परमाणु स्थल माना जाता है। हालांकि वाशिंगटन स्टेट के गवर्नर जे. इंसली ने कहा कि इस रिसाव से तत्काल या निकट भविष्य में किसी के स्वास्थ्य के लिए कोई खतरा नहीं है।भारत में भी अपने महत्वाकांक्षी परमाणु कार्यक्रम के मद्देनजर ज़मीन की सतह से 1 किलोमीटर नीचे अपना पहला भूमिगत कोष बनाने की दिशा में बढ़ रहा है। इसकी ख़ातिर आवश्यक तकनीक विकसित करने के लिए एक प्रयोगशाला स्थापित करने की भी तैयारी है। गर्वनर ने कहा कि उन्होंने आज दोपहर वाशिंगटन में अमेरिकी ऊर्जा मंत्री चिहू से मुलाकात की और मंत्री ने गर्वनर से कहा कि उर्जा मंत्रालय ने पुष्टि की है कि हैनफोर्ड में छह टैंकों से रेडियोधर्मी तत्वों का रिसाव हुआ है। अभी दुनिया भर के बहुत से देशों में परमाणु कचरा संयंत्रों के पास ही गहराई में पानी के पूल में जमा किया जाता है। इसके बाद भी कचरे से भरे कंटेनर्स की सुरक्षा बड़ी चुनौती होती है।

प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, स्वीडन और रूस के साथ ये करार किया है कि भारत इन चारों देशों से १०-१० हजार मेगावाट क्षमता के रिएक्टर खरीद कर अपने देश में स्थापित करेगा। ये हमारे देश की नयी विदेश नीति का नतीजा है जो हमारे सत्ताधीशों ने साम्राज्यवादी ताकतों के सामने गिरवी रख दी है। महाराष्ट्र के रत्नागिरि जिले में जैतापुर में लगाया जाने वाला परमाणु संयंत्र खुद फ्रांस में ही अभी सवालों के घेरे में है और हम भारत में उसे लगाने के लिए तैयार हैं। फ्रांस के राष्ट्रपति सरकोजी की पिछले दिनों हुई भारत यात्रा के पीछे भी ये व्यापारिक समझौता ही प्रमुख था। उन्होने विभिन्न स्रोतों का हवाला देकर बताया कि परमाणु संसाधनों से बनने वाली ऊर्जा न केवल अन्य स्त्रोतों से प्राप्त हो सकने वाली ऊर्जा से महँगी होगी बल्कि वो देश की ऊर्जा की जरूरत को कहीं से भी पूरी कर सकने में सक्षम नहीं होगी।खुद सरकार मानती है कि परमाणु ऊर्जा हमारे मौजूदा कुल ऊर्जा उत्पादन का मात्र ३ से साढ़े तीन प्रतिशत है जो अगले ४० वर्षों के बाद अधिका अधिक १० प्रतिशत तक पहुँच सकेगी, वो भी तब जब कोई विरोध या दुर्घटना न हो। एक मीटिंग में मौजूदा पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने बिलकुल साफ कहा था कि महाराष्ट्र के जैतापुर में बनने वाला परमाणु संयंत्र किसी भी कीमत पर बनकर रहेगा और इसकी वजह ऊर्जा की कमी नहीं बल्कि हमारी विदेश नीति और अन्य देशों के साथ हमारे रणनीतिक संबंध हैं।  

भारत में परमाणु ऊर्जा के पक्ष में तीन बातें कही जाती हैं कि ये सस्ती है, सुरक्षित है और स्वच्छ यानि पर्यावरण हितैषी है। जबकि सच्चाई ये है कि इनमें से कोई एक भी बात सच नहीं है बल्कि तीनों झूठ हैं। देश की जनता को धोखे में रखकर भारत में परमाणु कार्यक्रम बरास्ता जैतापुर जिस दिशा में आगे बढ़ रहा है, वहाँ अगर कोई दुर्घटना नहीं भी होती है तो भी आर्थिक रूप से देश की जनता को एनरॉन जैसे, और उससे भी बड़े आर्थिक धोखे का शिकार बनाया जा रहा है। और अगर कोई दुर्घटना हो जाती है तो आबादी के घनत्व को देखते हुए ये सोचना ही भयावह है लेकिन निराधार नहीं, कि भारत में किसी भी परमाणु दुर्घटना से हो सकने वाली जनहानि का परिमाण कहीं ज्यादा होगा।फुकुशिमा में परमाणु रिएक्टरों के भीतर हुए विस्फोटों को ये कहकर संदर्भ से अलगाने की कोशिश की जा रही है कि वहाँ तो सुनामी की वजह से ये तबाही मची। और भारत में तो सुनामी कभी आ नहीं सकती। ये सच है कि फुकुशिमा में एक प्राकृतिक आपदा के नतीजे के तौर पर परमाणु रिसाव हुआ लेकिन जादूगुड़ा या तारापुर या रावतभाटा या कलपक्कम आदि जो भारत के मौजूदा परमाणु ऊर्जा संयंत्र हैं, जहाँ कोई बड़ी दुर्घटना नहीं हुई है, वहाँ के नजदीकी गाँवों और बस्तियों में रहने वाले लोगों में अनेक रेडियोधर्मिता से जुड़ी बीमारियों का फैलना साबित करता है कि परमाणु विकिरण के असर उससे कहीं ज्यादा हैं जितने सरकार या सरकारी वैज्ञानिक स्वीकार करते हैं।

परमाणु कचरे से उत्पन्न विकिरण हजारों वर्ष तक समाप्त नहीं होता। विकिरण से मनुष्य की सेहत और पर्यावरण पर पड़ने वाले घातक परिणाम भी सामने आ रहे हैं। परमाणु उर्जा का लंबा इतिहास रखने वाले कई विकसित देशों में भी इस कचरे को स्थायी रूप से ठिकाने लगाने की तैयारियाँ चल रही हैं, प्रयोग चल रहे हैं। रेडियोधर्मी किरणो की चपेट में आने से कैंसर के अलावा ल्यूकीमिया और थायरायड जैसे घातक रोग बड़े पैमाने पर होते हैं और जन्मजात अपंगता, बांझपन इत्यादि पीढियों तक दिखने वाले दुष्प्रभाव होते हैं। रेडियेशन का असर प्रभावित इलाकों में सैकडों हज़ारों साल तक रहता है।भारतीय परमाणु वैज्ञानिकों की सक्षमता के गवाह पोकरण धमाके, और रावतभाटा (राजस्थान) में परमाणु रिएक्टर की स्वदेशी मरम्मत रहे हैं। ऐसे में एक विवादास्पद रिएक्टर को ऊंची कीमत में खरीद कर सरकार देश की जनता के जीवन के साथ खिलवाड़ कर रही है और अपने वैज्ञानिकों को भी हतोत्साहित कर रही है। कल तक लोग जिस संयंत्र को विकास का मानक मान रहे थे, आज उसे विनाश की कुंजी कह रहे हैं।लोग आमतौर पर सोचते हैं कि परमाणु ऊर्जा सिर्फ बम के रूप में ही हानिकारक होती है अन्यथा नहीं। लेकिन सच ये है कि परमाणु बम में रेडियोएक्टिव पदार्थ कुछ किलो ही होता है और विस्फोट की वजह से उसका नुकसान एकबार में ही काफी ज्यादा होता है, जबकि एक रिएक्टर में रेडियाधर्मी परमाणु ईंधन टनों की मात्रा में होता है। अगर वह किसी भी कारण से बाहरी वातावरण के संपर्क में आ जाता है तो उससे रेडियोधर्मिता का खतरा बम से भी कई गुना ज्यादा बढ़ जाता है।परमाणु ईंधन को ठंडा रखने के लिए बहुत ज्यादा मात्रा में पानी उस पर लगातार छोड़ा जाता है। ये पानी परमाणु प्रदूषित हो जाता है और इसके असर जानलेवा भी होते हैं। फुकुशिमा में ऐसा ही साठ हजार टन पानी रोक कर के रखा हुआ था जिसमें से ११ हजार टन पानी समंदर में छोड़ा गया और बाकी अभी भी वहीं रोक कर के रखा गया हैं। जो पानी छोड़ा गया है, वो भी काफी रेडियोएक्टिव है और उसके खतरे भी मौजूद हैं।  

जापान में परमाणु हादसे के बावजूद अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने 30 साल बाद पहली बार नया रिएक्टर बनाने की अनुमति दी है। जॉर्जिया राज्य में 14 अरब डॉलर के दो नए रिएक्टर बनेंगे। लेकिन फिर भी परमाणु ऊर्जा पर आशंका बढ़ी है।अमेरिका में ही नहीं, भारत सहित एशिया के दूसरे बड़े देश भी परमाणु तकनीक में बड़ी दिलचस्पी ले रहे हैं।  ऊर्जा की तेजी से बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए भारत और चीन अगले सालों में दर्जनों परमाणु रिएक्टर बनाएंगे।  जापान में परमाणु हादसे के बावजूद इन सरकारों की सोच में कोई बदलाव नहीं आया है। कई देश जिन्होंने पहले कभी परमाणु ऊर्जा के बारे में नहीं सोचा था, अब धीरे धीरे उसकी तरफ बढ़ रहे हैं। पहले की तरह अब भी ऐसे देश हैं जो भविष्य में बिजली के लिए परमाणु ऊर्जा पर निर्भर होंगे।लेकिन यूरोपीय संसद में परमाणु राजनीतिज्ञ रेबेका हार्म्स का मानना है कि परमाणु रिएक्टरों की संख्या में औसतन कमी आएगी. डॉयचे वेले से इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि लोग इससे पीछे हट रहे हैं।अगले दशकों में नए रिएक्टर बनेंगे, लेकिन 2030 से 2035 तक इनमें कमी आएगी।लुत्स मेत्स का भी यही मानना है।फ्रांस में यूरोप के सबसे ज्यादा परमाणु रिएक्टर हैं, लेकिन वहां भी सोच बदल रही है। खास कर इसलिए कि ऊर्जा की जरूरत चढ़ती और गिरती रहती है जिसकी वजह से ऐसे रिएक्टरों की जरूरत है जिन्हें चलाया और फिर आसानी से बंद किया जा सके. परमाणु रिएक्टरों में ऐसा करना संभव नहीं है। लुत्स कहते हैं, "मिसाल के तौर पर, काम खत्म होने के बाद जब लोग घर जाते हैं तो बिजली का इस्तेमाल ज्यादा होता है। यह आप नहीं रोक सकते."अगले कुछ हफ्तों में फ्रांस में नए राष्ट्रपति का चुनाव हो रहा है। निकोला सारकोजी को चुनौती दे रहे फ्रांसोआ ओलांद चाहते हैं कि देश में बिजली की खपत 75 से 50 प्रतिशत कम होगी। चुनाव कार्यक्रम के मुताबिक जर्मनी की सरहद पर फेसेनहाइम के रिएक्टर को बंद करने की बात कही जा रही है।

भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और इंग्लैंड के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन के बीच द्विपक्षीय परमाणु ऊर्जा समझौता हुआ है।

दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के बीच हुई बातचीत में तय किया है कि परमाणु ऊर्जा में सहयोग के मसले पर जल्द ही बातचीत शुरू की जाएगी। इंग्लैंड ने पहले ही अंतरराष्ट्रीय परमाणु जगत में भारत को शामिल करने पर अपना समर्थन दिया है और द्विपक्षीय परमाणु सहयोग समझौते पर सैद्धांतिक सहमति दी थी। इस बातचीत के बाद दोनों देशों की ओर से जारी साझा बयान में कहा गया है कि परमाणु मसले पर जारी संयुक्त घोषणा के बाद दोनों देशों के बीच परमाणु सहयोग लगातार मजबूत हुआ है। परमाणु मसले के अलावा अलावा दोनों पक्षों ने सुरक्षा, आतंकवाद और आपसी व्यापार के मसलों पर चर्चा हुई। इस दौरान दोनों नेताओं ने पत्रकारों के सवाल नहीं लिए।

न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप और दूसरे अन्य समान संगठनों में भारत की सदस्यता को इंग्लैंड द्वारा समर्थन देने पर धन्यवाद देते हुए सिंह ने कहा कि दोनों पक्षों ने परमाणु ऊर्जा सहयोग समझौते पर बातचीत शुरू करने का फैसला किया है। ये संगठन हैं : न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप, वासेनार अरेंजमेंट, ऑस्ट्रेलिया ग्रुप और मिसाइल टेक्नॉलजी कंट्रोल रिजीम।

विकासशील देशों की हालांकि परेशानी कुछ और ही है।हर साल चीन को 60,000 मेगावॉट बिजली के लिए नए रिएक्टर बनाने पड़ते हैं ताकि वह अपने विकास को बनाए रखे।लुत्स मानते हैं कि इन हालात में परमाणु ऊर्जा की भूमिका कम है।चीन हर साल 500 मेगावॉट का कोयला वाला रिएक्टर बनाता है और पिछले कुछ सालों में नवीनीकृत ऊर्जा का भी इस्तेमाल कर रहा है।चीन में परमाणु ऊर्जा देश की केवल दो प्रतिशत जरूरतों को पूरा करता है।भारत में भी यही हालत है।फ्रांस में बिजली की ज्यादा खपत है क्योंकि देश भर में सर्दी से बचने के लिए चल रहे हीटर बिजली से चलते हैं।

परमाणु रिएक्टरों की सुरक्षा तो एक बात है, लेकिन इससे बड़ी परेशानी इन्हें बनाने के लिए पैसा लाना है। एक गैस रिएक्टर में परमाणु रिएक्टर के मुकाबले दस गुना कम पैसा लगता है।एक परमाणु रिएक्टर बनाने का दाम, रिबेका हार्म्स के मुताबिक सात अरब यूरो यानि 450 अरब रुपए है।जर्मनी के लोअर सेक्सनी राज्य में आसे परमाणु रिएक्टर से निकला कचरा जमीन में घुसकर वहां पानी को खराब कर रहा है. इसे साफ करने में हजारों साल लगेंगे।मेत्स कहते हैं कि इस तरह का निवेश करने का मतलब है कि सालों साल इसमें पैसे लगते रहेंगे। अब भी परमाणु कचरे को सुरक्षित रखने का कोई तरीका नहीं मिल पाया है और पुराने रिएक्टरों को खत्म करने की तकनीक भी विकसित नहीं की गई है।

1974 में ही अंतरराष्ट्रीय परमाणु एजेंसी ने कहा था कि 2000 तक परमाणु रिएक्टरों से 4,500 गीगावॉट बिजली निकलेगी। 2010 तक यह संख्या हालांकि केवल 375 गीगावॉट रही और भविष्य में इसके और कम होने की संभावना है।

तमिलनाडु के तिरुनवेली जिले के कूडनकुलम और इंदींतकरई गांवों में हजारों लोग धरने पर बैठे। वे नहीं चाहते कि उनके यहां परमाणु बिजली केंद्र के लिए रूस से खरीदे जा रहे रिएक्टर लगाए जाएं। इस धरने की गंभीरता को देखते हुए प्रधानमंत्री ने अपने एक मंत्री वी नारायणसामी को भेजा भी, लेकिन बात नहीं बनी। प्रधानमंत्री का कहना है कि रिएक्टर के रुकने से इलाके का विकास थम जाएगा, लेकिन ग्रामीणों ने बड़ा विरोध दर्ज कर रिएक्टर को शुरू नहीं होने दिया। असल समस्या परमाणु रिएक्टर की नहीं, वहां लगाए गए रिएक्टर की गुणवत्ता की है। सनद रहे कोई दस साल पहले जब इन रिएक्टरों को खरीदने का सौदा हो रहा था, तब भी जागरूक समाज ने सरकार को चेताया था कि रूसी रिएक्टर सुरक्षा की दृष्टि से बेहद घटिया हैं।रिएक्टर के उपकरणों की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान कोई बाहरी नहीं, बल्कि खुद रूस का परमाणु और तकनीकी विभाग लगा रहा है। जापान के फुकुशिमा की परमाणु त्रासदी के परिप्रेक्ष्य में देश के प्रधानमंत्री के लिए तैयार एक रिपोर्ट में बताया गया है कि रूस में तैयार परमाणु रिएक्टर प्राकृतिक आपदा और मानवजन्य दुर्घटना, दोनों ही हालत में धोखा दे सकते हैं। भारत ने रूस से एक हजार मेगावाट शक्ति के दो वीवीईआर यानी 'वोदो वोदायननोय इनर्जेटिक स्काई रिएक्टर' खरीदे हैं। बलोना फाउंडेशन, नार्वे का आकलन है कि वीवीईआर में प्रयुक्त तकनीकी पश्चिमी देशों के सुरक्षा मापदंडों के अनुरूप कतई नहीं है। यहां तक कि वीवीईआर 1000 की उत्पादन इकाई को आर्थिक मदद करने वाले यूरोपीय आयोग ने भी इसकी सुरक्षा संबंधी खामियों पर टिप्पणियां की हैं।वीवीईआर की संरचना पश्चिमी देशों में तैयार पीडलूआर (प्रेसर्ड वाटर रिएक्टर) की तरह ही है। ग्रीनपीस और न्यूकनेट सरीखी अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण प्रेमी संस्थाओं का कहना है कि वीवीईआर में लगे 'प्रेशर वैसल' का आकार बहुत छोटा है। यह वैसल की दीवार और ईंधन से निकले न्यूट्रान के बीच पानी का वांछित दबाव बनाए रखने में सक्षम नहीं है। इसके अलावा इस रिएक्टर में अचानक रफ्तार बढऩे, अपर्याप्त अग्नि सुरक्षा और दोयम दर्जे के निर्माण और सामग्री की भी शिकायतें हैं। कूडनकुलम में लगने वाले रूसी रिएक्टर में यदि कोई दुर्घटना होती है तो वहां सटे विशाल समुद्र के समूचे जीव-जंतु जगत का जड़मूल से सफाया हो जाएगा। एकीकृत ग्रामीण तकनीकी केंद्र, पलाड के निदेशक और परमाणु विरोधी अभियान के अगुआ डा. आरवीजे मेनन के मुताबिक इस रिएक्टर का परमाणु जहर हवा के जरिए दो दिशाओं में बहेगा। उत्तर-पूर्व की तरफ इसके बहने पर श्रीलंका में कहर बरपेगा, लेकिन यदि हवा का रुख दक्षिण-पश्चिम रहा तो तमिलनाडु के थुटुकुडी, तिरुनवेली, कन्याकुमारी और रामनाथपुरम जिलों की शामत आएगी। मेनन रहस्योद्घाटन करते हैं कि परमाणु ऊर्जा विभाग के कई वरिष्ठ वैज्ञानिकों के विरोध के बावजूद यह सौदा किया गया है। वैज्ञानिक परमाणु तकनीकी के मामले में किसी भी विदेशी सहयोग के खिलाफ थे। वे लोग चाहते थे कि भारत में मौजूद स्वदेशी तकनीकी का इस्तेमाल किया जाए, जो इस रूसी सौदे से बहुत अधिक सस्ती भी पड़ती। भारतीय परमाणु वैज्ञानिकों की सक्षमता के गवाह पोकरण धमाके, और रावतभाटा (राजस्थान) में परमाणु रिएक्टर की स्वदेशी मरम्मत रहे हैं। ऐसे में एक विवादास्पद रिएक्टर को ऊंची कीमत में खरीद कर सरकार देश की जनता के जीवन के साथ खिलवाड़ कर रही है और अपने वैज्ञानिकों को भी हतोत्साहित कर रही है। कल तक लोग जिस संयंत्र को विकास का मानक मान रहे थे, आज उसे विनाश की कुंजी कह रहे हैं।

फ्रांस की कंपनी अरेवा से दो परमाणु रिएक्टरों के लिए बातचीत की प्रक्रिया अंतिम चरण में है।देश में परमाणु करार के बाद बिजली उत्पादन क्षेत्र को इससे काफी उम्मीदें हैं और इसी राह में न्यूक्लियर पावर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (एनपीसीआईएल) ने भारत में समुद्र के पास परमाणु रिएक्टर लगाने के लिए 5 से 6 जगहों की पहचान कर ली है।
केंद्र सरकार पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा हरिपुर में परमाणु संयंत्र स्थापित करने का विरोध करने पर वैकल्पिक स्थान तलाश रही है।जहाँ तक परमाणु ऊर्जा की लागत का सवाल है तो इसके लिए आवश्यक रिएक्टर तो बहुत महँगे हैं ही और भारत-अमेरिकी परमाणु करार की वजह से हम पूरी तरह तकनीकी मामले में विदेशों पर आश्रित हैं।जहाँ तक परमाणु ऊर्जा की लागत का सवाल है तो इसके लिए आवश्यक रिएक्टर तो बहुत महँगे हैं ही और भारत-अमेरिकी परमाणु करार की वजह से हम पूरी तरह तकनीकी मामले में विदेशों पर आश्रित हैं। साथ ही किसी भी परमाणु संयंत्र की लागत का अनुमान करते समय न तो उससे निकलने वाले परमाणु कचरे के निपटान की लागत को शामिल किया जाता है और न ही परमाणु संयंत्र की डीकमीशनिंग (ध्वंस) को। कोई दुर्घटना न भी हो तो भी एक अवस्था के बाद परमाणु संयंत्रों को बंद करना होता है और वैसी स्थिति में परमाणु संयंत्र का ध्वंस तथा उसके रेडिएशन कचरे को दफन करना बहुत बड़े खर्च का मामला होता है। और अगर परमाणु दुर्घटना हो जाए तो उसके खर्च का तो अनुमान ही मुमकिन नहीं। चेर्नोबिल की दुर्घटना से १९८६ में ४००० वर्ग किमी का क्षेत्रफल हजारों वर्षों के लिए रहने योग्य नहीं रह गया। वहाँ हुए परमाणु ईंधन के रिसाव से करीब सवा लाख वर्ग किमी जमीन परमाणु विकिरण के भीषण असर से ग्रस्त है। कोई कहता है कि वहाँ सिर्फ ६ लोगों की मौत हुई जबकि कुछ के आँकड़े ९ लाख भी बताये जाते हैं। क्या इसकी कीमत का आकलन किया जा सकता है? विकिरण के असर को खत्म होने में २४५०० वर्ष लगने का अनुमान है, तब तक ये जमीन किसी भी तरह के उपयोग के लिए न केवल बेकार रहेगी बल्कि इसे लोगों की पहुँच से दूर रखने के लिए इसकी सुरक्षा पर भी हजारों वर्षों तक खर्च करते रहना पड़ेगा।फुकुशिमा के हादसे के बाद से दुनिया के तमाम देशों ने अपने परमाणु कार्यक्रमों को स्थगित कर उन पर पुनर्विचार करना शुरू किया है। जर्मनी में तो वहाँ की सरकार ने परमाणु ऊर्जा को शून्य पर लाने की योजना बनाने की कार्रवाई भी शुरू कर दी है। खुद अमेरिका में १९७६ के बाद से कोई भी नया परमाणु संयंत्र नहीं लगाया गया है। वे सिर्फ दूसरे कमजोर देशों को बेचने के लिए रिएक्टर बना रहे हैं। इसके बावजूद भारत सरकार ऊर्जा की जरूरत का बहाना लेकर जैतापुर में परमाणु संयंत्र लगाने के लिए आमादा है।  


भारत को विकसित मुल्क में बदलने के लिए नाभिकीय ऊर्जा की जरूरत को अनिवार्य बताते हुए सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार डॉ. आर. चिदंबरम ने अनुमान लगाया कि अगले 20 सालों के दौरान देश के कुल बिजली उत्पादन में परमाणु ऊर्जा संयंत्रों का योगदान बढ़कर 10 फीसद के स्तर पर पहुंच जाएगा।

राजा रमन्ना प्रगत प्रौद्योगिकी केंद्र (आरआर कैट) के स्थापना दिवस समारोह में शामिल होने के बाद चिदंबरम ने कहा, फिलहाल देश के बिजली उत्पादन में परमाणु ऊर्जा संयंत्रों की भागीदारी महज चार प्रतिशत के आसपास है, लेकिन नए रिएक्टरों के शुरू होने के बाद इस भागीदारी में तेजी से इजाफा होगा और मेरा अनुमान है कि अगले 20 सालों में यह बढ़कर 10 फीसदी पर पहुंच जाएंगी।उन्होंने कहा, विकसित देशों की कतार में पहुंचने के लिए हमें भारत में प्रति व्यक्ति बिजली खपत छह से आठ गुना बढ़ानी होगी और यह वृद्धि नाभिकीय ऊर्जा के बगैर नहीं हो सकती। देश को विकसित बनाने के लिए नाभिकीय ऊर्जा अनिवार्य है।

प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार ने एक सवाल पर कहा, जापान के फुकुशिमा स्थित नाभिकीय विद्युत संयंत्र में वर्ष 2011 के दौरान हुए हादसे से सबने सबक सीखा है। इस हादसे को लेकर बुरी तरह झकझोर देने वाली प्रतिक्रियाएं सामने आई थीं। इसके बाद दुनियाभर में परमाणु ऊर्जा संयंत्रों में सुरक्षा इंतजामों की नए सिरे से समीक्षा की गई है।हालांकि, चिदंबरम ने कहा, फिलवक्त दुनिया के अधिकांश मुल्क परमाणु ऊर्जा के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं। मसलन चीन ने अपने परमाणु ऊर्जा कार्यक्रमों की रफ्तार बढ़ा दी है। बांग्लादेश भी उसी तरह का परमाणु रिएक्टर बनाना चाहता है, जो भारत के कुडनकुलम में शुरू होने जा रहा है।चिदंबरम ने एक सवाल पर कहा, भारत में परमाणु रिएक्टरों के निर्यात की क्षमता है, लेकिन देश की ऊर्जा आवश्यकताएं फिलहाल बेहद ऊंचे स्तर पर हैं। इसके मद्देनजर मेरा मत है कि हमें परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में विकसित स्वदेशी तकनीक से पहले खुद की जरूरतें पूरी करनी चाहिए। वैसे भी हम परमाणु ऊर्जा के अलग-अलग क्षेत्रों में अंतरराष्ट्रीय समुदाय को लगातार सहयोग कर रहे हैं।

जापान के सेन्दाइ प्रांत में आई सुनामी से हुई तबाही को हम ठीक से स्वीकार भी नहीं कर पाए थे कि परमाणु बिजली-केन्द्रों के धराशायी होने की अकल्पनीय खबर आनी शुरु हो गई।वहां भारी मात्रा में रेडियोधर्मी तत्व सीज़ियम-१३७ और आयोडीन-१३१ का रिसाव हुआ। चेर्नोबिल तथा थ्री-माइल आइलैंड सरीखी तबाहियों की याद अभी ताजा है। दुनिया भर के जनांदोलनों, पर्यावरणविदों और विशेषग्यों ने परमाणु ऊर्जा पर पुनर्विचार करने की मांग की है। लेकिन मुनाफ़े के लालच में अंधी कम्पनियां एवं केन्द्रीकृत ऊर्जा-उत्पादन के मायाजाल से ग्रस्त सरकारें शायद ही इससे कुछ सीखें। जापान दुर्घटना के बाद भारत के परमाणु-अधिष्ठान भरोसा दिलाया है कि हमारे देश के रिएक्टर में ऐसे हादसे नहीं होंगे। परमाणु ऊर्जा उद्योग से जुड़ा अन्तर्राष्ट्रीय प्रचार तंत्र  भी यही समझाने में जुटा है कि जापान सुनामी अप्रत्याशित रूप से भयावह थी वहाँ के रिएक्टर पुराने डिजाइन के थे, जबकि हाल तक जापानी अणु-ऊर्जा उद्योग को पूरी तरह सुरक्षित और उच्च तकनीक से लैस बताया जाता था। सोमवार सुबह जब जापान में दूसरे विस्फोट की खबर आई तब भारतीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के भूतपूर्व अध्यक्ष डॉ. अनिल काकोडकर महाराष्ट्र की विधानसभा में जैतापुर अणु-ऊर्जा प्रकल्प को ज़रूरी ठहरा रहे थे। इस योजना के खिलाफ़ रत्नागिरि जिले के किसान, मछुआरे और आमजन पिछ्ले चार साल से आंदोलन कर रहे हैं और सरकार ने भारी दमन इस्तेमाल किया है। दर्जनों लोगों पर मुकदमे चलाए जा रहे हैं। जिले से बाहर के आन्दोलनकारियों को बाहरी, देशविरोधी-विकासविरोधी और भड़काऊ बताकर घुसने नहीं दिया जा रहा जबकि उस इलाके के आन्दोलनकारियों को जिलाबदर कर दिया गया है – सरकार के लिए एकमात्र देशभक्त फ्रान्सीसी परमाणु कम्पनी अरेवा है जो लोगों को विस्थापित कर रही है और पूरे इलाके के पर्यावरण और जानमाल को खतरे में डाल रही है। जैतापुर का प्रकल्प फ़ुकुशिमा से कई गुना बड़ा होगा और यह भी दुर्घटना-सम्भावित समुद्र तट पर बनाया जा रहा है। देश में पहले ही कलपक्कम, कूडन्कुलम, तारापुर और नरोरा जैसे अणु-ऊर्जा केंद्र हैं जो भूकम्प और दुर्घटना सम्भावित इलाकों में बने हैं और कभी भी भयाअह हादसों को जन्म दे सकते हैं।

जहां तक अपने देश का सवाल है एक सुसंगत विकल्प के रूप में परमाणु ऊर्जा की बातें हमारे यहां भी लंबे समय से की जाती रही हैं। भारत का अच्छा खासा, विस्तार पाता और बड़े पैमाने पर स्वायत्त परमाणु कार्यक्रम भी है। थर्मल, हाईड्रो और अक्षय ऊर्जा के बाद परमाणु ऊर्जा ही बिजली का चौथा बड़ा स्रोत है। वर्तमान में देश में 19 परमाणु ऊर्जा संयंत्र कार्यरत हैं जिनसे 4,560 मेगावाट ऊर्जा का उत्पादन होता है। चार और परमाणु संयंत्र पाइपलाइन में हैं। उम्मीद की जा रही है कि इनसे भविष्य में 2,720 मेगावाट बिजली का उत्पादन संभव हो पाएगा। चूंकि देश में बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है और परमाणु ऊर्जा को एक किफायती विकल्प बताया जा रहा है इसलिए इस दिशा में तेजी से काम भी चल रहा है। भारत परमाणु तकनीक के मामले में विश्व का अग्रणी देश बनने का इरादा रखता है क्योंकि ऐसा कहा जाता है कि हमें फास्ट रिएक्टर और थोरियम ईंधन साइकिल में विशेषज्ञता हासिल है।

ब्रिटेन में वर्ष 2005 में जब नेशनल डिकमिशनिंग अथॉरिटी (एनडीए) ने परमाणु कचरे के निस्तारण के तौर-तरीकों पर काम करना शुरू किया था तब अनुमान लगाया जा रहा था कि इस काम पर 56 बिलियन पौंड का ख़र्चा आएगा लेकिन अब एनडीए के मुख्य कार्यकारी जॉन क्लार्क का यह कहना कि इस काम में बड़ी राशि और लंबा समय लगेगा, परमाणु कचरे से निपटने में आ रही चुनौतियों को तो बयान करता ही है साथ ही यह भी स्पष्ट करता है कि ऊर्जा के इस विकल्प को लेकर देश-दुनिया में जिस तरह की उत्साहजनक बातें की जा रही हैं या जो तस्वीर दिखाई जा रही है वह उतनी सहज, आकर्षक और जोखिम से जुदा नहीं है। यहां एक सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि जब ब्रिटेन जैसे विकसित मुल्क को परमाणु कचरे को 'दफ्न' करने में इतना समय और पैसा लगेगा तो हमारी स्थिति क्या है, हम इस मामले में कितने दक्ष हैं और परमाणु कचरे के निस्तारण से जुड़े स्वास्थ्य और पर्यावरणीय ख़तरों से निपटने को लेकर हमारी क्या तैयारी है? यह सवाल इसलिए भी मौजू है क्योंकि अभी अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी जैसे देशों में भी परमाणु कचरे को निपटाने की जोखिम रहित स्थायी व्यवस्था पर खोजबीन ही चल रही है और वर्तमान में ऐसे तरीके ही अपनाए जा रहे हैं जो न केवल अस्थाई हैं बल्कि विकिरण के दुष्प्रभावों से मुक्त भी नहीं हैं। इस मामले में भारत भी अपवाद नहीं है।अमेरिका में यह परमाणु कचरा बहुत समय तक यका पर्वत की गहराइयों में दबाया जाता रहा है लेकिन 16 अरब डॉलर खर्च करने के बाद भी यह परियोजना फेल हो गई लिहाजा अब दूसरी जगहें तलाशी जा रही है। ब्रिटेन में परमाणु कचरे को पुनः संसाधित किया जाता रहा है लेकिन अब वहां भी इस कचरे को ठिकाने लगाने के लिए जमीन के नीचे ही स्थाई रास्ते खोजे जा रहे हैं। फ्रांस में स्थाई भंडारण के लिए कई जगहों पर तलाश की गई है। जर्मनी में एक लंबे समय तक परमाणु कचरे को रीप्रोसेस किया जाता रहा। फिर इस कचरे को छिपाने के लिए नमक के गुम्बदों का सहारा भी लिया गया लेकिन अब अंततः ज़मीन के नीचे स्थाई गोदाम बनाने पर काम चल रहा है। माना जा रहा है कि इस भूगर्भीय कोष में सन् 2025 से काम शुरू हो जाएगा। इसी तरह स्पेन, कनाडा, स्वीडन, फिनलैंड और दक्षिण कोरिया में भी परमाणु कचरे को सीधे ज़मीन के नीचे दफ्न करने की तैयारियाँ जोरों पर चल रही हैं।

दुनिया अभी वह दृश्य भूल नहीं पायी है। प्रलयंकारी भूकंप और सुनामी लहरों के कहर से कराह रहे जापान पर अब रेडिएशन का खतरा मंडराने लगा है। भूकंप के कारण क्षतिग्रस्त फुकुशिमा परमाणु संयंत्र का मुख्य रिएक्टर शनिवार दोपहर बाद धमाके से उड़ गया। जिससे जापान के नंबर एक परमाणु संयंत्र से रेडिएशन युक्त सफेद धुएं के गुबार को उठते देखा गया। संयंत्र से बड़े पैमाने पर खतरनाक रेडियोधर्मी तत्व सीजियम का रिसाव होने लगा। अधिकारियों ने परमाणु प्लांट के बीस किलोमीटर के दायरे में रहने वाले वाले लोगों से इलाका खाली करा लिया। देश में परमाणु अलर्ट घोषित कर दिया गया है। पुलिस के अनुसार फुकुशिमा के निकटवर्ती एक और परमाणु संयंत्र से भी रिसाव होने की आशंका है। शनिवार सुबह भी तटीय प्रांत नागानो और नीगाता में 6.7 तीव्रता का भूकंप आया। इसी प्रकार फुकुशिमा प्रांत में भी 6.0 की तीव्रता वाले झटके महसूस किए गए। शुक्रवार को आए भूकंप के बाद उठी खूंखार सुनामी लहरों की चपेट में आकर मारे गए लोगों की तादाद बढ़ कर 1700 हो गई है। करीब 9500 लोग अब भी लापता हैं। सरकार ने मरने वालों की तादाद और बढ़ने की आशंका जताई है। दर्जन भर प्रांतों के 206 स्थानों पर अब भी विनाशलीला जारी है। ये इलाके शनिवार को भी आग में जलते रहे। तबाह हुए क्षेत्रों से दो लाख लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है। मियागी प्रांत में चार ट्रेनों के सुनामी की लहरों के साथ बह जाने की खबर है। उनका कोई अता-पता नहीं चल पा रहा है। धमाका कूलिंग में खराबी से: फुकुशिमा परमाणु संयंत्र को संचालित करने वाली टोक्यो इलेक्टि्रक पावर कंपनी की ओर से कहा गया है कि संयंत्र के मुख्य रिएक्टर में धमाका कूलिंग प्रणाली के खराब हो जाने के कारण हुआ। यह प्रणाली भूकंप से क्षतिग्रस्त हो गई थी। कंपनी के एक प्रवक्ता के अनुसार, धमाके के बाद हुए रेडियाधर्मी रिसाव की चपेट में आने से चार कर्मचारी घायल हो गए हैं। धमाके की यह घटना उस समय हुई जब वैज्ञानिकों का दल परमाणु संयंत्र के रिएक्टर और कूलिंग प्रणाली का निरीक्षण कर रहा था। मानक से दोगुना हुआ रिसाव: वैज्ञानिकों के दल ने संयंत्र से उच्चच्तरीय रेडियोधर्मी रिसाव होते हुए पाया। जापान की परमाणु और औद्योगिक सुरक्षा एजेंसी के अनुसार इलेक्टि्रक पावर कंपनी के विशेषज्ञों ने शाम को संयंत्र के एक गेट के निकट रेडियोधर्मी रिसाव का स्तर 1,015 माइक्रोसीवर्ट प्रति घंटा के हिसाब से बढ़ता पाया। विशेषज्ञों का कहना है कि जिस मात्रा में प्रति घंटा रेडियोधर्मी तत्वों के रिसाव के स्तर में बढ़ोतरी दर्ज की गई, उतनी मात्रा एक सामान्य व्यक्ति एक वर्ष में ग्रहण करता है। उनका यह भी कहना है कि रिसाव के स्तर की यह मात्रा उस मानक के दोगुना है जिस पर ऊर्जा कंपनियां सरकार से परमाणु आपातकाल घोषित करने के लिए कहती हैं। उन पांच परमाणु संयत्रों में आपातकाल की घोषणा कर दी गई है, जिनकी कूलिंग प्रणाली खराब हो गई है। राजधानी टोक्यो से ढाई सौ किलोमीटर उत्तर स्थित फुकुशिमा परमाणु संयंत्र से रेडियाधर्मी रिसाव संकट पर कैबिनेट सचिव युकियो एडेनो ने कहा कि रेडिएशन के स्तर की समीक्षा की जा रही है। टीवी फुटेज में संयंत्र की दीवार और छत को गायब पाया गया।

पाकिस्तान के एक वैज्ञानिक ने चेतावनी दी है कि देश की सेना में बढ़ते कट्टरपंथ की वजह से परमाणु हथियार कट्टरपंथी इस्लामी लोगों के हाथों में जा सकते हैं। अपनी किताब 'कन्फ्रन्टिंग द बम' के विमोचन के लिए लंदन आए पाकिस्तानी वैज्ञानिक परवेज हुडभोय ने दो टूक कहा कि पाकिस्तान के परमाणु हथियारों की सुरक्षा और संरक्षा बहुत बड़ी चिंता का विषय है।

उन्होंने कहा कि सेना के अंदरूनी ठिकानों पर हमले बताते हैं कि सेना के अंदर कट्टरपंथ बढ़ रहा है और इससे परमाणु हथियारों के कट्टरपंथियों के हाथों में जाने का खतरा है। परमाणु भौतिकी के वैज्ञानिक और रक्षा विश्लेषक हुडभोय ने कहा कि पाकिस्तान के पास भारत की तरह ही करीब 120 से 130 आयुध हैं। वह यहां इंदाली लाउंज में 'इंडियन जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन' के सदस्यों के सवालों के जवाब दे रहे थे।

उन्होंने कहा, 'पूर्व में ऐसे हथियार केवल प्रतिरोधक उपायों के तौर पर देखे जाते थे। लेकिन सबसे खतरनाक बात ऐसे हथियारों की सामग्री की बढ़ती खोज है जिससे परमाणु युद्ध का नया पहलू सामने आ गया है। इसका मतलब है कि हथियारों की संख्या में तेजी से बढ़ोत्तरी हो रही है।' मैसाचुसेट्स इन्स्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) से परमाणु भौतिकी में पीएचडी की उपाधि ले चुके हुडभोय ने कहा कि उप महाद्वीपीय और वैश्विक सुरक्षा की खातिर इस मुद्दे के हल की जरूरत है।

वैज्ञानिक ने कहा कि भारत और पाकिस्तान कम से कम पांच बार परमाणु युद्ध के कगार पर पहुंच चुके थे। वर्ष 1987 में, वर्ष 1990 में, करगिल युद्ध (वर्ष 1999) के दौरान, वर्ष 2001 में भारतीय संसद पर हमले के बाद और वर्ष 2008 में मुंबई हमलों के बाद दोनों देश परमाणु युद्ध के बिल्कुल करीब थे। हुडभोय ने कहा कि परमाणु युद्ध के कारण उत्पन्न होने वाले तनाव को देखते हुए हम इस मुद्दे पर यथास्थिति नहीं बने रहने दे सकते।

'विस्फोट के बाद रेडियोधर्मिता का भयावह असर होता है जिससे न सिर्फ उप महाद्वीप बल्कि पूरी दुनिया पर ही असर होगा।' 'कन्फ्रंटिंग द बुक : पाकिस्तानी एंड इंडियन साइंटिस्ट स्पीक आउट' नामक इस किताब का प्रकाशन ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने और इसका संपादन हुडभोय ने किया है। यह सीमा के दोनों ओर के वैज्ञानिकों के निबंधों का संग्रह है। परमाणु युग में भारत में इसकी शुरूआत 1974 में हुई जिसके बाद पाकिस्तान ने इसमें प्रवेश किया। वर्ष 1998 में परमाणु परीक्षणों के बाद एक तरह से परमाणु शस्त्रों की होड़ शुरू हो गई।

हुडभोय ने कहा, 'पाकिस्तान ने इसलिए परमाणु हथियार विकसित करना शुरू किया क्योंकि भारत ऐसा कर रहा था। भारत प्रमुख शत्रु बना हुआ है। लेकिन इस धारणा में पाकिस्तान की सेना के प्रमुख जनरल कयानी के इस हालिया कथन से बदलाव प्रतीत होता है कि पाकिस्तान की सबसे बड़ी चुनौती उसके ही अंदर मौजूद शत्रु हैं।'

वैज्ञानिक ने कहा कि इस प्रकार सेना की सोच में ही बदलाव का संकेत मिलता है 'लेकिन कयानी भी फौज में आलोचना से बच नहीं पाए।' हुडभोय ने माना कि खुद उन्हें भी जान से मार डालने की धमकियां मिल रही हैं। उन्होंने कहा, 'जिहादी पाकिस्तान में सक्रिय हैं और इस्लामी ताकतों के बारे में राज्य की नीति स्पष्ट नहीं है।'

पाकिस्तानी परमाणु प्रतिष्ठानों के खिलाफ बोलने के लिए चर्चित हुडभोय लाहौर यूनिवर्सिटी ऑफ मैनेजमेंट साइंसेज (एलयूएमएस) के भौतिकी विभाग में विजिटिंग प्रोफेसर हैं। उन्हें भारत और पाकिस्तान में परमाणु प्रौद्योगिकी के शांतिपूर्ण उपयोग को लेकर भी संशय है। उन्होंने कहा, 'सबसे बड़ा सवाल है कि क्या परमाणु स्रोतों से सचमुच बिजली उत्पादन होगा।'

हुडभोय ने कहा 'परमाणु रिएक्टरों का निर्माण बहुत खर्चीला होता है। जापान के फुकुशिमा संयंत्र में 2011 में हुए हादसे जैसी घटना भारत और पाकिस्तान में भी हो सकती है। शायद दोनों देशों के पास ऐसे हादसों से निपटने की क्षमता भी न हो।'

नागरिकों की मांग: भारत परमाणु कार्यक्रम बंद हो
लोगों में जापान में हुई परमाणु त्रासदी पर संवेदना जगाने, जापान के लोगों के साथ सहानुभूति व्यक्त करने, और भारत के परमाणु कार्यक्रम को बंद करने के लिये लखनऊ में आज पी.एम.टी कॉलेज, हजरतगंज में परिचर्चा और परिवर्तन चौक पर मोमबत्ती प्रदर्शन आयोजित किया गया.

जापान में हुई परमाणु आपात स्थिति के बाद तो इस बात पर किसी संदेह का प्रश्न ही नहीं उठता है कि दुनिया में सभी परमाणु कार्यक्रमों को, चाहे वो सैन्य या उर्जा के लिये हों, उनको जितनी जल्दी संभव हो उतनी जल्दी बंद करना होगा. इन परमाणु ऊर्जा-घरों में दुर्घटनाओं और सैन्य हमले (हिरोशिमा-नागासाकी पर अटम बम) की वजह से मानवजाति ने सिर्फ अपूर्व, भयानक और अदम्य त्रासदी ही देखी है, जिसको असंख्य प्रभावित लोगों ने सदियों तक झेला है. यह तो स्पष्ट है कि परमाणु शक्ति चाहे वो ऊर्जा बनाने में लगे अथवा बम, यह सबसे खतरनाक विकल्प है. इसमें कोई शक नहीं कि समय रहते बिना विलम्ब दुनिया में परमाणु निशस्त्रीकरण हो जाना चाहिए जिससे कि 'सुरक्षा', 'ऊर्जा पूर्ति' या 'तकनीकि विकास' के नाम पर भयावही परमाणु हादसे मानवजाति को अब और न झेलने पड़ें.

हमारी मांग है कि भारत-अमरीका परमाणु समझौता और अन्य परमाणु कार्यक्रमों को भी मानवता और विश्व शान्ति के लिये तुरंत बंद किया जाए.

हिरोशिमा और नागासाकी पर हुए अटम बम हमले, जो इतिहास के सबसे वीभत्स त्रासदी रहे हैं, के ६५ साल के बाद भी जिस देश ने इन हमलों को अंजाम दिया था, आज तक उस देश अमरीका ने माफ़ी नहीं मांगी है. जिस उत्साह के साथ भारत, भारत-अमरीका परमाणु समझौते को लागू कर रहा है, यह अत्यंत चिंता का विषय है.

पर्यावरण के लिए लाभकारी तरीकों से उर्जा बनाने के बजाय भारत परमाणु जैसे अत्यंत खतरनाक और नुकसानदायक ऊर्जा उत्पन्न करने के तरीकों को अपना रहा है. विकसित देशों में परमाणु ऊर्जा एक असफल प्रयास रहा है. विश्व में अभी तक परमाणु कचरे को नष्ट करने का सुरक्षित विकल्प नही मिल पाया है, और यह एक बड़ा कारण है कि विकसित देशों में परमाणु ऊर्जा के प्रोजेक्ट ठंडे पड़े हुए हैं. भारत सरकार क्यों भारत-अमरीका परमाणु समझौते को इतनी अति-विशिष्ठ प्राथमिकता दे रही है और इरान-पाकिस्तान-भारत तक की गैस पाइपलाइन को नकार रही है, यह समझ के बाहर है.

किसी भी देश क लिए ऊर्जा सुरक्षा के मायने यह हैं कि वर्तमान और भविष्य की ऊर्जा आवश्यकता की पूर्ति इस तरीके से हो कि सभी लोग ऊर्जा से लाभान्वित हो सकें, पर्यावरण पर कोई कु-प्रभाव न पड़े, और यह तरीका स्थायी हो, न कि लघुकालीन. इस तरह की ऊर्जा नीति अनेकों वैकल्पिक ऊर्जा का मिश्रण हो सकती है जैसे कि, सूर्य ऊर्जा, पवन ऊर्जा, छोटे पानी के बाँध आदि, गोबर गैस इत्यादि.

जापान ने कभी भी परमाणु बम नहीं बनाया पर परमाणु शक्ति का ऊर्जा के लिये इस्तेमाल किया था. परमाणु ऊर्जा भी कितनी खतरनाक हो सकती है यह जापान में हुए परमाणु आपात स्थिति से आँका जा सकता है. भारत में न केवल अनेकों परमाणु ऊर्जा-घर हैं बल्कि परमाणु बम भी है - और दुनिया में सबसे अधिक संख्या में गरीब लोग हैं. न केवल परमाणु शक्ति अत्यंत खतरनाक विकल्प है, भारत जैसे देशों के लिये परमाणु शक्ति में निवेश करना, लोगों की मूल-भूत आवश्यकताओं को नज़रंदाज़ करके 'सुरक्षा', 'ऊर्जा' के नाम पर ऐसा समझौता करने जैसा है जिसके कारणवश लोग कई गुना अधिक मार झेल रहे हैं.

भारत में शायद ही कोई ऐसा परमाणु ऊर्जा घर हो जहां कोई न कोई दुर्घटना न हुई हो. जिन स्थानों पर भारत में परमाणु कचरे को डाला जाता है, जहां परमाणु ऊर्जा घर लगे हुए हैं, जहां परमाणु खान हैं, आदि, वहाँ पर रहने वाली आबादी रेडियोधर्मिता का भीषण कुप्रभाव झेल रही है. उदाहरण के तौर पर कुछ महीने पहले ही कईगा परमाणु केंद्र में ५० से अधिक लोग रेडियोधर्मी त्रिशियम का प्रकोप झेले थे.

परमाणु दुर्घटनाओं की त्रासदी संभवत: कई पीढ़ियों को झेलनी पड़ती है जैसे कि भोपाल गैस काण्ड और हिरोशिमा नागासाकी त्रसिदियों को लोगों ने इतने बरस तक झेला. हमारी मांग है कि भारत बिना-देरी शांति के प्रति सच्ची आस्था का परिचय दे और सभी परमाणु कार्यक्रमों को बंद करे.

[एस.आर.दारापुरी, अरुंधती धुरु, रंजित भार्गव, प्रो० रंजित भार्गव, प्रो० एम.सी.पन्त, प्रो० रमा कान्त, डॉ० संदीप पाण्डेय, आनंद त्रिपाठी, एवं अन्य नागरिक]

परमाणु निशस्त्रीकरण और शांति के लिये गठबंधन, शांति एवं लोकतंत्र के लिये लखनऊ चिकित्सकों का समूह, जन-आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय, आशा परिवार एवं लोक राजनीति मंच के संयुक्त तत्वावधान मे आयोजित

भारत-अमेरिका परमाणु करार से जुड़ी कुछ बुनियादी बातें
हिमांशु शेखर

एनपीटी क्या है?

एनपीटी को परमाणु अप्रसार संधि के नाम से जाना जाता है। इसका मकसद दुनिया भर में परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने के साथ-साथ परमाणु परीक्षण पर अंकुश लगाना है। पहली जुलाई 1968 से इस समझौते पर हस्ताक्षर होना शुरू हुआ। अभी इस संधि पह हस्ताक्षर कर चुके देशों की संख्या 189 है। जिसमें पांच के पास आणविक हथियार हैं। ये देश हैं- अमेरिका, ब्रिटेन, प्रफांस, रूस और चीन। सिर्फ चार संप्रभुता संपन्न देश इसके सदस्य नहीं हैं। ये हैं- भारत, इजरायल, पाकिस्तान और उत्तरी कोरिया। एनपीटी के तहत भारत को परमाणु संपन्न देश की मान्यता नहीं दी गई है। जो इसके दोहरे मापदंड को प्रदर्शित करती है। इस संधि का प्रस्ताव आयरलैंड ने रखा था और सबसे पहले हस्ताक्षर करने वाला राष्ट्र है फिनलैंड। इस संधि के तहत परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र उसे ही माना गया है जिसने पहली जनवरी 1967 से पहले परमाणु हथियारों का निर्माण और परीक्षण कर लिया हो। इस आधार पर ही भारत को यह दर्जा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नहीं प्राप्त है। क्योंकि भारत ने पहला परमाणु परीक्षण 1974 में किया था।

सीटीबीटी क्या है?

सीटीबीटी को ही व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि कहा जाता है। यह एक ऐसा समझौता है जिसके जरिए परमाणु परीक्षणों को प्रतिबंधित किया गया है। यह संधि 24 सितंबर 1996 को अस्तित्व में आयी। उस वक्त इस पर 71 देशों ने हस्ताक्षर किया था। अब तक इस पर 178 देशों ने दस्तखत कर दिए हैं। भारत और पाकिस्तान ने सीटीबीटी पर अब तक हस्ताक्षर नहीं किया है। इसके तहत परमाणु परीक्षणों को प्रतिबंधित करने के साथ यह प्रावधान भी किया गया है कि सदस्य देश अपने नियंत्रण में आने वाले क्षेत्रें में भी परमाणु परीक्षण को नियंत्रित करेंगे।

123 समझौता क्या है?

यह समझौता अमेरिका के परमाणु ऊर्जा अधिनियम 1954 की धारा 123 के तहत किया गया है। इसलिए इसे 123 समझौता कहते हैं। सत्रह अनुच्छेदों के इस समझौते का पूरा नाम है- भारत सरकार और संयुक्त राज्य अमेरिका की सरकार के बीय नाभिकीय ऊर्जा के शांतिपूर्ण प्रयोग के लिए सहयोग का समझौता। इसके स्वरूप पर भारत और अमेरिका के बीच एक अगस्त 2007 को सहमति हुई। अमेरिका अब तक तकरीबन पच्चीस देशों के साथ यह समझौता कर चुका है। इस समझौते के दस्तावेज में अमेरिका ने भारत को आणविक हथियार संपन्न देश नहीं माना है, बल्कि इसमें यह कहा गया है कि आणविक अप्रसार संधि के लिए अमेरिका ने भारत को विशेष महत्व दिया है।

हाइड एक्ट क्या है?

हाइड एक्ट का पूरा नाम हेनरी जे हाइड संयुक्त राज्य-भारत शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा सहयोग अधिनियम 2006 है। यह अमेरिकी कांग्रेस में एक निजी सदस्य बिल के रूप में पास हुआ है। इसमें भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित परमाणु समझौते से जुड़े नियम एवं शर्तों को समाहित किया गया है। इस समझौते के लिए जब अमेरिका के परमाणु ऊर्जा अधिनियम 1954 की धारा 123 में संशोधन किया गया तब इसका नाम हाइड एक्ट रख दिया गया।

आईएईए क्या है?

इस संस्था का पूरा नाम इंटरनेशनल एटोमिक एनर्जी एजेंसी है। यह नाभिकीय क्षेत्र में सहयोग का अंतरराष्ट्रीय केंद्र है। इसका गठन 1957 में हुआ था। यह संस्था शांतिपूर्ण और सुरक्षित नाभिकीय प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देने के लिए काम करती है। इस संस्था का मुख्यालय आस्ट्रिया के विएना में है। अभी इसके महानिदेशक मोहम्मद अलबरदेई हैं। इस संस्था के तीन मुख्य काम हैं- सुरक्षा, विज्ञान और प्रौद्योगिकी एवं सुरक्षा व संपुष्टि।

45 देशों की एनएसजी क्या है?

एनएसजी का पूरा नाम न्यूक्लियर सर्विस ग्रुप है। इसे ही न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप भी कहा जाता है। इस समय इसके सदस्य देशों की संख्या 45 है। यह ऐसा समूह है जो नाभिकीय सामग्री के निर्यात पर दिशानिर्देश लागू करके नाभिकीय हथियारों के अप्रसार में मदद देता है। इसका गठन 1974 में किया गया था। शुरूआत में इसके सदस्यों की संख्या महज सात थी। उस वक्त भारत ने परमाणु परीक्षण किया था। जिसे उस समय नाभिकीय हथियार वाला देश नहीं कहा जाता था। इसका पहला दिशानिर्देश 1978 में आईएईए के दस्तावेज के रूप में तैयार किया गया था। करार के आगे बढ़ने की स्थिति में नाभिकीय सामग्री प्राप्त करने के लिए भारत को इस समूह के पास जाना पडेग़ा।

ईंधन आपूर्ति की शर्तें क्या हैं?

हाइड एक्ट की धारा 104 और 123 समझौते की धारा 2 देखने के बाद यह स्पष्ट हो जाता है कि हाइड एक्ट भारत को नाभिकीय ईंधन मिलने की राह में रोडे अटकाता है। हाइड एक्ट की धारा 104 के मुताबिक परमाणु ऊर्जा अधिनियम की धारा 123 के तहत हुए भारत के सहयोग के बाबत किसी समझौते और इस शीर्षक के उद्देश्य के तहत किसी करार को लागू होने की स्थिति के बावजूद भारत की नाभिकीय या नाभिकीय ऊर्जा से संबध्द सामग्री, उपकरण्ा या प्रौद्योगिकी का भारत को निर्यात रद्द किया जा सकता है। हमें यूरेनियम की आपूर्ति बाजार भाव पर की जाएगी और इसका दाम भी बाजार की ताकतें ही तय करेंगी। बीते कुछ सालों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरेनियम की कीमत में चार गुना से ज्यादा बढ़ोतरी हुई है और इसके दाम थमते नजर नहीं आ रहे हैं। ऐसे में यूरेनियम की उपलब्धता को लेकर अनिश्चितता बना रहना तय है।

परमाणु बिजली घरों से कितनी बिजली बनेगी?

करार समर्थकों का यह दावा कोरा ख्वाब सरीखा ही है कि 2020 तक भारत की नाभिकीय ऊर्जा उत्पादन की क्षमता बीस हजार मेगावाट हो जाएगी। अभी देश में पंद्रह रिएक्टर काम कर रहे हैं। जिनसे 3300 मेगावाट बिजली का उत्पादन हो रहा है। देश में कुल ऊर्जा उत्पादन अभी एक लाख चालीस हजार मेगावाट है। जाहिर है कि इसमें परमाणु ऊर्जा का योगदान बहुत कम है। वैसे, 1400 मेगावाट बिजली के उत्पादन के लिए नए रिएक्टर अभी बन रहे हैं। कुडुनकुलम और चेन्नई के रिएक्टर तैयार होने पर परमाणु ऊर्जा से बनने वाली बिजली सात हजार मेगावाट पर पहुंच जाएगी। भारत सरकार के तहत ही काम करने वाला आणविक ऊर्जा विभाग कहता आया है कि देश के पास इतना यूरेनियम है कि अगले तीस साल तक दस हजार मेगावाट बिजली का उत्पादन किया जा सके। ऐसे में पहले तो हमें अपनी क्षमता बढ़ानी होगी। ऐसा होते ही परमाणु ऊर्जा के लक्ष्य को पाने के करीब हम पहुंच जाएंगे। इसके लिए न तो हमें अमेरिका की दादागीरी को झेलना होगा और न ही परमाणु ईंधन आपूर्तिकर्ता देशों की खुशामद करनी होगी। अगर 2020 तक बीस हजार मेगावाट के लक्ष्य को पाना है तो 13000 मेगावाट अतिरिक्त बिजली की व्यवस्था करनी होगी। ऐसा तब ही संभव है जब अगले बारह सालों में हम चार पफास्ट ब्रीडर रिएक्टर, आठ रिएक्टर 700 मेगावाट के और आयातित रिएक्टरों से छह हजार मेगावाट बिजली का उत्पादन करें। व्यवहारिक तौर पर ऐसा संभव ही नहीं है, चाहे हम कैसा भी करार कर लें। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी 1990 के मध्य से आणविक ऊर्जा की हिस्सेदारी 16 प्रतिशत पर अटकी हुई है। दूसरी तरफ यह बात भी महत्वपूर्ण है कि नाभिकीय बिजलीघरों से बनने वाली बिजली में लागत दुगनी होती है। जिस वजह से यह बेहद महंगी भी है।

क्या अमेरिकी कंपनी को ही ठेका मिलेगा?

अमेरिका का नाभिकीय उद्योग विदेशी आर्डरों के भरोसे ही कायम है। क्योंकि पिछले तीस साल में अमेरिका में कोई भी परमाणु रिएक्टर नहीं लगाया गया है। इसलिए अमेरिका की नजर अब भारत से आने वाले अरबों डालर के आर्डरों की ओर लगी हुई है। 150 अरब डालर के इस समझौते से अमेरिकी कंपनियों का मालामाल होना तय है। अमेरिकी कंपनियों के लिए यह समझौता अपने आर्थिक गतिरोध को तोड़ने के लिए सुनहरा अवसर साबित होने जा रहा है। 16 नवंबर 2006 को अमेरिकी सीनेट ने समझौते को मंजूरी दी। उसी महीने के आखिरी हफ्ते में 250 सदस्यों वाला व्यापारियों का प्रतिनिधिमंडल भारत आया। उसमें जीई एनर्जी, थोरियम पावर, बीएसएक्स टेक्नोलोजिज और कान्वर डायन जैसी कंपनियों के प्रतिनिधि शामिल थे। अमेरिकी थैलीशाहों के मकसद का खुलासा उनके पूर्व रक्षा सचिव विलियम कोहेन के बयान से हो जाता है। उन्होंने कहा है, 'अमेरिकी रक्षा उद्योग ने कांग्रेस के कानून निर्माताओं के पास भारत को परमाणु शक्ति के रूप में मान्यता दिलाने के लिए लाबिंग की है। अब उसे मालदार सैन्य ठेके चाहिए।' इन ठेकों को पाने के लिए लाकहीड मार्टिन, बोईंग, राथेयन, नार्थरोप गु्रमन, हानीवेल और जनरल इलेक्ट्रिक जैसी पचास से ज्यादा कंपनियां भारत में अपना कार्यालय चला रही हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री कोंडलिजा राइस ने कांग्रेस में सापफ-साफ कह भी दिया है कि यह समझौता निजी क्षेत्र को पूरी तरह से दिमाग में रखकर तैयार किया गया है।

परमाणु परीक्षण के बारे में करार में क्या स्थिति हैं?

कोई भी परमाणु परीक्षण बगैर यूरेनियम संवर्धन के हो ही नहीं सकता है। इस समझौते के जरिए भारत के यूरेनियम संवर्धन को प्रतिबंधित किया गया है। हाइड एक्ट के अनुच्छेद 103 में यह स्पष्ट लिखा हुआ है कि इस समझौते का मकसद नाभिकीय अप्रसार संधि में शामिल या उससे बाहर के किसी गैर परमाणु शस्त्र संपन्न राज्य द्वारा परमाणु हथियार बनाने की क्षमता विकसित करने का विरोध करना है। इसके अलावा लिखा गया है कि जब तक बहुपक्षीय प्रतिबंध या संधि लागू न हो तब तक भारत को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया जाए कि वह असुरक्षित नाभिकीय स्थानों पर विखंडनीय पदार्थों का उत्पादन न बढ़ाए। हाइड एक्ट में ही इस बात का उल्लेख किया गया है कि अगर भारत कोई परमाणु परीक्षण करता है तो यह समझौता रद्द हो जाएगा और हमें इस करार के तहत प्राप्त सामग्री और प्रौद्योगिकी वापस करनी पड़ेगी।

करार से अमेरिका का हित कैसे सधेगा?

अमेरिका का मकसद अपने हितों को ध्यान में रखते हुए सैन्य प्रभुत्व जमाना है। इसके लिए वह कई सहयोगियों को जोड़कर हर दिशा में सैन्य गतिविधियों की पूर्ण स्वतंत्रता चाहता है। इस दिशा में वह भारत को प्रमुख रणनीतिक सहयोगी के तौर पर देखता है। ताईवान, उत्तर कोरिया, मानवाधिकार, लोकतंत्र और एटमी प्रसार के मसले पर अमेरिका और चीन में मतभेद है। इसलिए वह चीन को रोकने के लिए इस इलाके में एक शक्ति संतुलन चाहता है। वह एशिया में नाटो जैसा एक नया संगठन चाहता है। जिसके लिए भारत एक उपयुक्त सैन्य सहयोगी दिखाई पड़ता है। ईरान से युध्द होने की स्थिति में अमेरिका उस पर सैन्य कार्रवाई करने के लिए हिंदुस्तानी सरजमीं का इस्तेमाल करना चाहता है। अमेरिकी कांग्रेस में रखी गई एक रिपोर्ट के मुताबिक आने वाले पंद्रह साल के अंदर चीन से उसका एक युध्द संभव है। ऐसा होने पर भारत अमेरिका के लिए चीन पर हमला करने के लिए बेहद उपयुक्त स्थान है।

इस करार के तहत हाइड एक्ट की धारा 109 के जरिए अमेरिका ने यह सुनिश्चित किया है कि परमाणु नि:शस्त्रीकरण के अमेरिकी अभियान में भारत साथ चलने को बाध्य होगा। इस बारे में हर साल अमेरिकी राष्ट्रपति वहां के कांग्रेस में एक रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा, जिसके आधार पर यह तय किया जाएगा कि भारत अमेरिका के मुताबिक काम कर रहा है या नहीं। जाहिर है इससे भारत के निर्णय लेने की क्षमता पर आंच आना तय है।

प्रौद्योगिकी हस्तांतरण का क्या इंतजाम है?

हाइड एक्ट प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर प्रतिबंध लगाता है। साथ ही यह भारत को दोहरे प्रयोग की प्रौद्योगिकी तक पहुंचने से रोकता है। यानी भारत नाभिकीय ईंधन के संपूर्ण चक्र का हकदार नहीं हो सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति हर साल जो रिपोर्ट वहां की कांग्रेस में रखेंगे, अगर उसमें यह पाया जाता है कि भारत इसका पालन नहीं कर रहा तो वह समझौते को रद्द कर देगा। साथ ही वह अन्य देशों पर भी यह दबाव डालेगा कि वे भारत को एटमी ईंधन और प्रौद्योगिकी की सप्लाई बंद कर दें। हम इस सौदे में पफायदे से ज्याद नुकसान में रहेंगे। भारत को न तो आणविक ईंधन और न ही रिएक्टर कम दाम या मुफ्त में मिलेगा। इसे हमें प्रचलित बाजार मूल्य पर ही खरीदना होगा। जो निश्चय ही स्वदेशी परमाणु शक्ति के दाम को बढ़ा देगा। नाभिकीय तकनीक मिलने का दावा भी खोखला है। एक तो यह बहुत देर से आएगा और दूसरी बात यह कि इसकी मात्र बहुत कम होगी।

करार टूटने पर क्या होगा?

अगर करार टूटता है तो भारत को वो सारी मशीनें, औजार और प्रौद्योगिकी वापस करनी होगी जो इस डील के तहत मिलेगा। इसके अलावा हमारे चौदह परमाणु रिएक्टर पर निगरानी जारी रहेगी। वहीं दूसरी तरफ अमेरिका द्वारा करार में किए गए किसी वायदे को तोड़ा जाता है तो ऐसी हालत में क्या होगा, इसका उल्लेख इस समझौते में नहीं किया गया है।