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Saturday 4 February 2012

2जी लाइसेंस रद्द होने से 25,000 नौकरियां खतरे में! सुप्रीम कोर्ट के फैसले से स्पक्ट्रम के १२२ लाइसेंस रद्द हो जाने के बाद विदेशी निवेशक मुआवजे के लिए भरत सरकार के खिलाफ मुकदमा​ ​ ठोंकने की तैयारी में!



2जी लाइसेंस रद्द होने से 25,000 नौकरियां खतरे में! सुप्रीम कोर्ट के फैसले से स्पक्ट्रम के १२२ लाइसेंस रद्द हो जाने के बाद विदेशी निवेशक मुआवजे के लिए  भरत सरका के खिलाफ मुकदमा​ ​ ठोंकने की तैयारी में!

बैंकिंग सेक्टर को भी झटका लगा है, जिसकी साख दर विदेशी रेटिंग संस्थाए घटा रही हैं। पर बैंक इस तथ्य को स्वीकार करने को तैयार नहीं है। ​ देश की सबसे बड़ी ऋणदाता भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के 2जी घोटाले से जुड़े फैसले में जिन कंपनियों के लाइसेंस रद्द किए गए हैं, उन्हें उसने 4500 करोड़ रुपये का कर्ज दिया है। इसके अलावा पंजाब नेशनल बैंक, कॉरपोरेशन बैंक, ओरियंटल बैंक ऑफ कॉमर्स समेत अन्य बैंकों ने भी इन दूरसंचार कंपनियों को ऋण दिए हैं।

मुंबई से एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

सुप्रीम कोर्ट के फैसले से स्पक्ट्रम के १२२ लाइसेंस रद्द हो जाने के बाद विदेशी निवेशक मुआवजे के लिए  भरत सरकार के खिलाफ मुकदमा​ ​ ठोंकने की तैयारी में!

सुप्रीम कोर्ट के फैसले से सकते में आए नए दूरसंचार ऑपरेटरों ने संकेत दिया कि वे न्यायालय में पुनरीक्षा याचिका दायर कर सकते हैं। न्यायालय के 2008 में जारी 122 दूरसंचार लाइसेंस रद्द करने के फैसले पर इन कंपनियों ने आश्चर्य व्यक्त किया है।

लाइसेंस रद्द किए जाने के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का असर जिन दूरसंचार कंपनियों पर पड़ा है, उनके लिए आगे की राह आसान नहीं है क्योंकि पहले से ही बदहाल उनके कारोबार पर अनिश्चितता के बादल गहरा गए हैं। उनके लिए सबसे बड़ी परेशानी यह है कि लाइसेंस शुल्क लौटाने के मसले पर अभी कुछ भी साफ नहीं हुआ है।


इस पर तुर्रा यह कि टेलिकॉम लाइसेंस रद्द होने से सिर्फ टेलिकॉम कंपनियां नहीं बल्कि इन टेलिकॉम कंपनियों में काम कर रहे 25,000 कर्मचारियों के होश उड़ गए हैं। इन कर्मचारियों को अब समझ ही नहीं आ रहा कि 4 महीने बाद इनका क्या होगा। 8 कंपनियां, 11 करोड़ ग्राहक, 25,000 कर्मचारी। जी हां, 122 सर्किल में लाइसेंस रद्द होने के बाद कंपनियों में ग्राहकों के साथ कर्मचारी भी भारी परेशानी में हैं। इन कंपनियों के कर्मचारियों को अब अपनी नौकरी की चिंता सताने लगी है। सबसे ज्यादा चिंतित वो कर्मचारी हैं, जिनकी कंपनी की गाड़ी विदेशी निवेशक के सहारे चल रही है।

यूनिनॉर, एतिसलात डीबी और सिस्टेमा श्याम के कर्मचारियों पर सबसे ज्यादा मार पड़ सकती है। नार्वे की कंपनी टेलीनॉर के सहारे से बनी कंपनी यूनिनॉर में 17,500 कर्मचारी काम करते हैं। इसी तरह रूस की कंपनी सिस्टेमा और श्याम टेली के ज्वाइंट वेंचर से बनी कंपनी सिस्टेमा श्याम में 3,500 कर्मचारी हैं। एतिसलात डीबी के करीब 3,000 कर्मचारी भी अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं। इसके अलावा टाटा टेलि, लूप, वीडियोकॉन, आइडिया और एस टेल में भी बड़ी तादाद में कर्मचारियों की नौकरी पर तलवार लटक रही है।

दूरसंचार मंत्री के पद पर रहते हुए ए. राजा ने कंपनियों को आशय पत्र जमा करने के लिए सिर्फ 45 मिनट का समय दिया। यही नहीं, 1600 करोड़ रुपये की बैंक गारंटी के लिए भी उन्हें कुछ घंटे का ही वक्त मिला। कुछ विश्लेषकों की शिकायत है कि यह फैसला विदेशी निवेशकों के सेंटिमेंट पर नकारात्मक असर डालेगा। लेकिन ऐसा कहने वाले लोग विदेशी निवेशकों को नहीं समझते। जब फैसला आया तब विदेशी निवेशक शेयर बाजार में खरीदारी कर रहे थे।सुप्रीम कोर्ट ने टूजी लाइसेंस रद्द करते हुए फैसले में कहा है कि 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में देश की संपत्ति को खुले हाथों से लुटाया गया। देश के खजाने को कई हजार करोड़ रुपये का नुकसान और जनहित को अनदेखा कर निजी हितों के लिए लाइसेंस दिए गए। दूरसंचार विभाग और पूर्व दूरसंचार मंत्री ए. राजा की ओर से नियमों का उल्लंघन कर मनमानी की गई।

दूरसंचार क्षेत्र के सूत्रों का कहना है कि कई वजहें हैं जिनके चलते मोबाइल टेलीफोन क्षेत्र में कॉल दरें बढ़ने की प्रबल संभावना है। जिन कंपनियों से स्पेक्ट्रम लिए जाएंगे उनमें से कई पहले से ही दूरसंचार क्षेत्र की दिग्गज कंपनियां हैं।


घोटाले से हुए राजस्व का हिसाब नहीं बना है। मुकदमाबाजी का अंजाम क्या होगा, अंदाजा लगाया जा सकता है। इस घोटाले से विदेशी निवेश के नजरिए से भारती य बाजार और भारत सरका को लगे बट्टे की भरपाई होना तो मुश्किल है।यही नहीं, एक मौजूं मसला यह भी है कि गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने 122 टेलीकॉम लाइसेंस इसलिए रद्द कर दिए, क्योंकि इन्हें जारी करते समय नीतियों का ठीक पालन नहीं हुआ और भ्रष्ट मंत्री ने रिश्वत लेकर लाइसेंस बांटे। पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने किसी नीति और उसकी खामियों पर सीधी टिप्पणी की है। कोर्ट ने 'पहले आओ-पहले पाओ' नीति को गलत और घातक करार दिया है। रद्द होने वाले लाइसेंस को लेकर बहुत लोगों को चिंता है, और इसके दूरगामी प्रभाव भी होंगे। इससे न सिर्फ कॉरपोरेट कानून प्रभावित होगा, बल्कि लंबे समय में इसका असर सरकार की नीति और कॉरपोरेट के कामकाज पर भी होगा। यह सर्वविदित है कि सरकारी ठेके और लाइसेंस देने में भ्रष्ट तरीके अपनाए जाते हैं, कानून तोड़े जाते हैं, पक्षपात होता है और आमतौर पर जो कंपनी ज्यादा देती है, उसे ज्यादा मिलता है।

सिस्तेमा-श्याम एमटीएस ब्रांड के तहत मोबाइल सेवा प्रदान करती है और यूनिटेट-टेलीनार संयुक्त उद्यम यूनिनार ब्रांड के तहत सेवा प्रदान करता है। इन कंपनियों ने देश भर में अपनी सेवा मुहैया कराने के लिए भारी निवेश किया है। एसएसटीएल ने एक बयान में कहा कि सिस्तेमा-श्याम अभी भी फैसले की पूरी प्रति का इंतजार कर रही है। कानून का पालन करने वाली कंपनी के तौर पर वह कहना चाहेगी कि उसके पास उपलब्ध न्यायिक समाधनों के जरिए अपने हितों की रक्षा का अधिकार है।

यूनिनार ने इस फैसले पर अचंभा जाहिर करते हुए कहा कि हमें उस गलती की सजा मिली है जो न्यायालय को सरकारी प्रक्रिया में मिली है। तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए राजा ने जनवरी 2008 में 1,651 करोड़ रुपए में 2जी स्पेक्ट्रम के साथ नए लाइसेंस जारी किया था। सरकारी लेखा परीक्षक सीएजी ने कहा था कि इससे सरकारी खजाने को 1.76 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ।

अनुमान है कि इन लाइसेंस के रद्द होने से करीब 500 मेगाहर्टज का 2जी स्पेक्ट्रम खाली होगा, जिसकी नीलामी सरकार कर सकती है।

प्रमुख दूरसंचार सेवा प्रदाता आइडिया सेल्यूलर ने कहा कि कंपनी सिर्फ इसलिए इस मामले में फंस गई कि उसे जनवरी 2008 में लाइसेंस मिला, जबकि आवेदन 18 महीने पहले किया था।

नार्वे की टेलीनार ने कहा कि हमें उम्मीद है कि सरकार कुछ सही कदम उठाएगी, जिससे हमारे कानूनी निवेश प्रभावित नहीं होगा। यूनिनार में टेलीनार की बहुलांश हिस्सेदारी है। सिस्तेमा-श्याम ने लाइसेंस खरीदने और सेवाएं शुरू करने पर अब तक 12,500 करोड़ रुपए का निवेश करने का दावा किया है।

जीएसएम परिचालकों के संगठन सीओएआई ने कहा कि वह उच्चतम न्यायालय के फैसले का सम्मान करता है। साथ ही यह भी जरूरी है कि सरकार इस क्षेत्र में हुए भारी निवेश के प्रति संवेदनशील रहे, हमें उम्मीद है कि संबद्ध पक्षों के हितों को ध्यान में रखकर सरकार संतुलित रवैया अपनाएगी।


बैंकिंग सेक्टर को भी झटका लगा है, जिसकी साख दर विदेशी रेटिंग संस्थाए घटा रही हैं। पर बैंक इस तथ्य को स्वीकार करने को तैयार नहीं है। ​ देश की सबसे बड़ी ऋणदाता भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के 2जी घोटाले से जुड़े फैसले में जिन कंपनियों के लाइसेंस रद्द किए गए हैं, उन्हें उसने 4500 करोड़ रुपये का कर्ज दिया है। इसके अलावा पंजाब नेशनल बैंक, कॉरपोरेशन बैंक, ओरियंटल बैंक ऑफ कॉमर्स समेत अन्य बैंकों ने भी इन दूरसंचार कंपनियों को ऋण दिए हैं।

​भारतीय अर्थ व्यवस्था की जो गंगाई पुताई इस घोटाले से हो चुकी है, उसे आम नागरिकों के लिए थ्री डी चश्मे से देखना भी मुश्किल है। इसे सरकारी आफिसरान बखूबी जानते हैं और सरकार की गिरती साख बचाने के मकसद से हैरतअंगेज करतब दिखा रहे हैं। मसलन 11 टेलिकॉम कंपनियों के 122 2जी लाइसेंस रद्द होने के बावजूद बैंक परेशान नहीं हैं। जबकि, स्पेक्ट्रम के लिए कई बैंकों ने टेलिकॉम कंपनियों को कर्ज दिए हुए हैं।

बैंकों का मानना है कि कंपनियों द्वारा भरी गई 2जी स्पेक्ट्रम फीस वापस मिलने से उनके कर्ज नहीं डूबेंगे। सूत्रों के मुताबिक सरकार कंपनियों को 9000 करोड़ रुपये का रीफंड देना होगा।

स्टेट बैंक ऑफ इंडिया का कहना है कि बैंक के फंडेड एक्सपोजर का 30 फीसदी हिस्सा टेलिकॉम कंपनियों को दिए गए कर्ज का है। एसबीआई का कुल फंड बेस्ड एक्सपोजर 1100 करोड़ रुपये का है।

एसबीआई को उम्मीद है कि 2जी लाइसेंस रद्द हुई कई कंपनियां स्पेक्ट्रम के लिए फिर से बोली लगाएंगी।

पंजाब नेशनल बैंक ने माना है कि 2008 में जिन कंपनियों को 2जी लाइसेंस दिया गया था, उनसें से ज्यादातर कंपनियों को बैंक ने कर्ज दिया हुआ है। बैंक को उम्मीद है कि सरकार फीस रीफंड करेगी, जिससे कंपनियां अपने कर्ज चुका पाएंगी।

इंडियन ओवरसीज बैंक का कहना है कि लाइसेंस रद्द होने का बैंक की लोनबुक पर असर नहीं होगा। बैंक ने टेलिकॉम कंपनियों को करीब 2000 करोड़ रुपये के कर्ज दिए हुए हैं।



भारत के दूरसंचार क्षेत्र नियामक ने समूचे 22 सर्किलों में 2जी बैंड वायुतरंगों का आवंटन नीलामी के आधार पर किए जाने पर जोर देते हुए शुक्रवार को परामर्श पूर्व पत्र जारी किया।

नियामक ने सभी शेयर धारकों को 15 फरवरी तक अपनी टिप्पणियां देने को कहा।

भारतीय दूरसंचार नियमन प्राधिकरण (ट्राई) ने यह कदम तब उठाया है जब एक दिन पूर्व सर्वोच्च न्यायालय ने 122 दूरसंचार लाइसेंस रद्द कर दिए और 2जी स्पेक्ट्रम की नीलामी कराने का निर्देश दिया।

सर्वोच्च न्यायालय ने गुरुवार को ट्राई द्वारा पूर्व में अपनाई गई सभी प्रक्रियाओं की निंदा की और कहा कि इसके द्वारा की गई सिफारिशों को लागू किए जाने से दूरसंचार विभाग 1999 में तय की गई राष्ट्रीय दूरसंचार नीति के लक्ष्य से भटक गया।


सर्वोच्च न्यायालय ने इसके बाद ट्राई को निर्देश दिया कि वह लाइसेंसों की स्वीकृति तथा नीलामी के जरिए 22 सेवा क्षेत्रों में 2जी बैंड के आवंटन के लिए फिर से संस्तुतियां दे।

इस बीच, ट्राई के अध्यक्ष जे.एस. सरमा ने एक टीवी चैनल से कहा कि इस क्षेत्र के लिए पहले बेहतर दिन थे। उन्होंने कहा कि उन्हें इस बात की खुशी है कि सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि स्पेक्ट्रम की नीलामी होगी।

उन्होंने यह भी कहा कि ट्राई स्पेक्ट्रम के उदारीकरण की अवधारणा पर विचार कर रहा है।

गौरतलब है कि विदेशी पूंजी भारत सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है, जिसके लिए आर्थिक सुधार तेजी से लागू किए जा रहे हैं और तमाम वित्तीय कायदे कानून बदले जा रहे हैं। इस समूचे बंदोबस्त को सुप्रीम कोर्ट के फैसले से करारा झटका लगा है।जबकि हकीकत यह है कि महंगाई दर में गिरावट और भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा दरों में कटौती का संकेत देने के कारण विदेशीसंस्थागत निवेशकों (एफआईआई) के बीच जनवरी माह में लिवाली का माहौल रहा।भारत सरकार ने अब उन विदेशी निवेशकों को भारतीय शेयर बाजार में सीधे निवेश की मंजूरी देने का फैसला किया है, जो अब तक ऐसा नहीं कर सकते थे।


जानकारों के मुताबिक इन कंपनियों की किस्मत का फैसला अब 4 महीने बाद होगा। अगर ये कंपनियां 2जी लाइसेंस नीलामी में रद्द हुए लाइसेंस को फिर हासिल करती हैं तभी इन कर्मचारियों की नौकरी बच पाएगी। लेकिन इसके पहले भी कई सवाल उठते हैं।

सबसे पहला सवाल ये कि क्या इन कंपनियों की जेब में अब इतना दम बचा है कि ये लाइसेंस की दौड़ में शामिल हो सकें। अगर इन कंपनियों ने लाइसेंस हासिल कर भी लिए तो क्या इन कंपनियों में इतनी हिम्मत बचेगी कि ये इतने कर्मचारियों को नौकरी दे सकें। अगर नहीं, तो दूसरी टेलीकॉम कंपनियों में इन कर्मचारियों का क्या भविष्य होगा, ये सारे सवाल सुप्रीम कोर्ट के गुरुवार के फैसले के बाद टेलीकॉम कर्मचारियों को डराने लगे हैं।

निवेशकों के नजरिए से पिछला साल भारतीय बाजारों के लिए बहुत खराब रहा। लेकिन, इसके बाद विदेशी पेंशन फंडों, निवेशकों और ट्रस्टों के लिए सीधे निवेश का रास्ता खोलकर भारत ने एक बेहद सकारात्मक कदम उठाया है। भारत में एक आकर्षक निवेश डेस्टिनेशन बनने की तमाम संभावना मौजूद है। यहां पहले से ही इक्विटी एवं डेट बाजार में विदेशी निवेशक खासे सक्रिय हैं। भारत सरकार द्वारा विदेशी निवेश की प्रक्रिया आसान करने का यह कदम स्वागतयोग्य है।


कुछ घरेलू कारणों और कुछ अंतरराष्ट्रीय आर्थिक वजहों से भारत में विदेशी संस्थागत निवेश में भारी कमी आई है, हालांकि अब भी भारतीय अर्थव्यवस्था में निवेश को घाटे का सौदा नहीं माना जा रहा है। इसका प्रमाण यह है कि पिछले साल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में 36 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। 2011 कई तरह से आर्थिक मोर्चे पर एक मुश्किल साल रहा है, लेकिन साल के अंत होते-होते बेहतर आर्थिक संकेत दिखाई दे रहे हैं। सबसे बड़ी राहत की बात खाद्यान्न महंगाई का कम होना है। लगातार ऊंची महंगाई की दर निवेशकों के लिए सबसे ज्यादा आशंकित करने वाला कारण है।

अब तक सिर्फ विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) के जरिये ही विदेशी निवेश भारतीय शेयर बाजार में आ सकता था। पात्र विदेशी निवेशक (क्यूएफआई) सिर्फ म्यूचुअल फंड के जरिये निवेश कर सकते थे। अब सरकार ने इन्हें सीधे निवेश की इजाजत देकर भारतीय शेयर बाजार में निवेश का एक और रास्ता खोल दिया है।

सरकार संभवत: नए साल की शुरुआत ऐसे किसी बड़े फैसले से करना चाहती थी, जिससे भारत में निवेश के लिए उत्साह बढ़े। इस फैसले से तुरंत विदेशी निवेश बढ़ेगा ऐसा तो नहीं लगता, लेकिन एक बार विदेशी निवेश के आ जाने के बाद यह स्वाभाविक और तार्किक कदम है।

भारतीय शेयर बाजार इन दिनों बहुत अच्छे दौर से नहीं गुजर रहा है, इसलिए इस बात की खास संभावना नहीं है कि व्यक्तिगत निवेशक या पेंशन फंड जैसे क्यूएफआई भारतीय बाजार के प्रति उत्साह जताएं, लेकिन दूरगामी दृष्टि से इस फैसले से फायदा हो सकता है। एक महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसे निवेशक एफआईआई की तरह तुरंत-तुरंत खरीदने-बेचने के कारोबार में नहीं होते, वे स्थिर और दूरगामी नजरिये से निवेश करते हैं, इसलिए बाजार में इनकी वजह से ज्यादा स्थिरता आएगी।

एफआईआई पिछले दिनों लगातार भारतीय शेयर बाजार में बिकवाली का माहौल बनाए हुए हैं, जिसकी वजह से बाजार में अस्थिरता बनी हुई है। इसकी एक वजह तो यह है कि यूरोप व अमेरिका में आर्थिक हालात ठीक नहीं हैं और निवेशकों को घाटा पूरा करने के लिए नकदी की जरूरत है या वे अनिश्चय के माहौल में नकदी रखना ज्यादा सुरक्षित मानते हैं।

एफआईआई के निवेश पर ज्यादा भरोसा करने का यह भी एक नुकसान है कि वे तेजी से बाजार से निकल सकते हैं, शेयर बेच सकते हैं और इससे बाजार में अचानक गिरावट आ सकती है। एफआईआई के निवेश को स्थिर व सुरक्षित नहीं माना जा सकता। इसके मुकाबले क्यूएफआई का निवेश बाजार की अस्थिरता कम करने में सहयोग देगा।




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