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Saturday, 29 June 2013

{ खबरों में मारे जाते हैं जो लोग,वे मेरे कोई नहीं होते!

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खबरों में मारे जाते हैं जो लोग,वे मेरे कोई नहीं होते!

पलाश विश्वास

खबरों में मारे जाते हैं जो लोग,वे मेरे कोई नहीं होते।
खबरों में जख्मी होते हैं जो लोग,वे भी मेरे नहीं होते।

बुरी खबरों के लिए असंख्य अखबार अनगिनत चैनल

पृथ्वी में इतनी दुर्घटनाएं क्यों होती हैं आजकल?
बुरी खबरों के इंतजार में रतजगा व्यस्त तमाम लोग
व्यस्त इंटरनेट, सूचना महाविस्फोट

सबकुछसलामत है सुनकर बहुत अच्छा नहीं लगता

जिले बदल गये हैं बहुत दिन हुए दोस्त
प्रांतों की सीमाएं भी बदल गयी हैं
देस सही सलामत हैं,फिर भी बेचैन हैं हम बहुत

गांव तक पहुंचने के लिए सबसे जरुरी है पासपोर्ट

राशनकार्ड से भी नागरिकता तय नहीं होगी अब
मतदाता पहचान पत्र न जाने कब बेकार हो गये

तस्वीरे शिनाख्त नहीं करती चेहरे की
हर वजूद लावारिश है अब मेरे देश में

बायोमेट्रिक डिजिटल हुआ है रंगीन मेरा देश

नदियां बती हैं तो पानी भी लाल होना चाहिए
आबोहवा में में सुधार के लिए लाशें होना बहुत जरुरी है दोस्त
इंसान को लाश बनाने का हर सामान  बहुत जरुरी है दोस्त

हवाओं में बारुद न हो तो सब बेमजा समझिये दोस्त
एक्शन और स्पेशल असर अब लाइव चाहिए दोस्त
मल्ची मीडिया फोर जी स्पेक्टर्म बहुत जरुरी है दोस्त

घात लगाकर कहीं बैठा न हो आतंक
और आतंकर के खिलाफ जंग भी न हो तो मुश्किल है बहुत
आंतरिक सुरक्षा खतरे में न हो और देश हो सुरक्षित

तो बंदुकों से लेकर एटम बम की वर्दियां कैसी दोस्त
सरकारों को बहुत परेशान करती न्यायपालिका दोस्त
नरसंहार की संस्कृति नहीं कैसी राजनीति दोस्त

बयानों में दर्ज नहीं होते बेदखल अनाथ गांवों के आंसू

बलात्कृत फसलें क्या बोलेंगी किसी के खिलाफ
अपने ही लोगों की मौत का जायजा लेते लोग
पीठ में घोंपा न हो कोई छुरातो मजा क्या है जीने में

खबरों में मारे जानते हैं जो लोग, वे मारे कोई नहीं होते।
खबरों में जख्मी होते हैं जो लोग वेभी कोई नहीं होते।

हादसे अब दहशत पैदा नहीं करते तनिक

मृतकों के आंकड़ों में खिलती हैं सुर्खियां
अब नफरत नहीं होती सामूहिक बलात्कारों से दोस्त

गरीबी रेखा के नीचे हैं निनानब्वे फीसद लोग
अबाध पूंजी प्रवाह सकुशल है दोस्त
सकुशल है कालाधन काले हाथों में दोस्त

सारा जोर है इस वक्त जनसंख्या नियंत्रण पर

जनसंख्या के सफाये पर जश्न मनाइये दोस्तों
आपदा उत्सव पर भी जश्न मनाइये दोस्तों

राजनीति और अर्थव्यवस्था पर काबिज सफेदपोश अमानुष

अब भेड़िये की मुस्कान सबसे बेहतरीन रचना है
सौंदर्यबोध कलाकौशल और तकनीक वीभत्सता है
जीते जी हैवान बन गये हैं लोग

बौद्धिक गुलामी से शुरु होती है तरक्की की सीढ़ियां, दोस्तों

लहूलुहान खबरों के खंडहर में आत्मरतिमग्न
अपनी जमात के ही सारे प्रतिबद्ध सितारे

चमगादड़पंख फड़फड़ा रहे हैं बहुत
पीपल के पेड़ों से बेदखल ब्रह्मराक्षस
चौराहे बंद गलियों में तब्दील,अंधेरे में कैद हम

बेकार प्रक्षेपास्त्र सी दिनचर्या है दोस्तों

सूरज को पीठ पर ढोते हुए टहलना
मरे पर वार करना फैशन मौसम है दोस्तों
जलवायु बदल गया है,खतरे में हिमालय दोस्तों

लिहाजा

खबरों में मारे जाते हैं जो लोग,वे मेरे कोई नहीं होते
खबरों में जख्मी होते हैं,जो लोग वे भी मेरे कोई नहीं होते

(मूल कविता का पुनर्पाठ, मूल कविता साक्षात्कार,सितंबर,2000 में प्रकाशित)

प्रक्षेपक

खबरों में मारे जाते हैं जो लोग,वे मेरे कोई नहीं होते
खबरों में जख्मी होते हैं,जो लोग वे भी मेरे कोई नहीं होते

उत्तराखंड त्रासदी में मारे गए लोगों के अंतिम संस्कार में देरी की वजह कुछ उभरते मतभेदों को बताया जा रहा है। खराब मौसम की वजह से सामूहिक अंतिम संस्कार मंगलवार को भी नहीं हो पाया था और बुधवार को भी मौसम अनुकूल नहीं होने की वजह से इस प्रक्रिया में देरी हुई। वहीं, खबरों के मुताबिक राज्य सरकार चाहती है कि सेना अंतिम संस्कार के कामकाज में भी मदद करे जबकि सेना का कहना है कि उनका काम सिर्फ राहत और बचाव कार्य तक ही है और शवों का अंतिम संस्कार उनके कामकाज के दायरे में नहीं आता है।

सूरज को पीठ पर ढोते हुए टहलना
मरे पर वार करना फैशन मौसम है दोस्तों
जलवायु बदल गया है,खतरे में हिमालय दोस्तों
बकौल ताराचंद्र त्रिपाठी: एक मित्र ने इस तबाही के लिए चारधाम यात्रा को जिम्मेदार माना है. मेरे विचार से इस तबाही के लिए चारधाम यात्रा कत्तई जिम्मेदार नहीं है. जिम्मेदार हैं तो पिछली सरकारों और उनके लगुए भगुए नेता. कच्ची उमर के पहाड़ की छाती को विस्फोटों छलनी करने वाले, यूपी हो या उल्टाखंड किसी ने भी हिमालय की पीड़ा पर ध्यान नहीं दिया. नारायण हों, या भगोना, सब ने निश्शंक हो कर उसे लूटा है. उसकी गोद में पले हम सब लोगों ने अपने पितरों की वनों और पर्वतों को भी जीवन्त मान कर उनसे अपनी जरूरत भर की सामग्री लेना छोड़ कर उसे बेतहासा लूटना आरंभ कर दिया. जहाँ लंगूर और बन्दर भी सावधानी से उछलते कूदते थे, वहाँ हमारे बड़े बडे ट्रकों और अर्थ मूवरों ने धिरकना आरम्भ कर दिया. माटी को सहारा देने वाली झाड़ियाँ कब की समूल सरे राह बाजार में लुटा दी गयीं. जो मरे, जो पीड़ित हुए, जो आगे चल कर पीढ़ी दर पीढी पीड़ित होंगे. पहाड़ की नहीं समूची गंगा यमुना के दोआबे को आज ही नहीं कल भी हिमालय की बद दुआ को झेलना होगा.

उत्तराखंड सरकार ने इस बात का ऐलान किया है कि वह केदारनाथ मंदिर को फिर से बनवाएगी। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने कहा कि सरकार केदारनाथ मंदिर बनवाएगी। गौर हो कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने केदरनाथ मंदिर बनवाने की पेशकश की थी जिसे बहुगुणा ने ठुकरा दिया है।

गौरतलब हैकि उत्तराखंड में बाढ़ की सबसे ज्यादा विभीषिका झेलने वाले केदारनाथ में मंदिर गर्भगृह और नंदी को छोड़कर कुछ नहीं बचा है । माना जा रहा है कि इस पवित्र धाम को फिर से बसाने में दो से तीन साल लग जाएंगे।

बद्रीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति के अध्यक्ष गणेश घौडियाल के अनुसार मंदिर के भीतर कोई नुकसान नहीं हुआ है। लिंग पूरी तरह सुरक्षित है लेकिन बाहर जमा मलबे का रेत और पानी मंदिर के भीतर घुस गया है। मंदिर के आसपास कुछ नहीं बचा है। मंदिर समिति का कार्यालय, धर्मशालाएं और भंडार गृह सब नष्ट हो गया है।

राहत अभियान खत्म हुआ नहीं अभी
केदरानाथदखल महाभारत शुरु
ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने केदारनाथ के रावल के दावे को सिरे से खारिज कर दिया है। कहा कि रावल को अब केदारनाथ में पूजा नहीं करने दी जाएगी। बदरी-केदार दोनों जगहों के रावलों पर पूजा को लेकर एक ही बात लागू होती है। रावल स्वयं को जगदगुरु बता रहे हैं, लेकिन वे मंदिर समिति के वेतनभोगी कर्मी हैं।

कनखल स्थित शंकराचार्य निवास में ज्योतिषपीठाधीश्वर ने बताया कि केदारनाथ में स्थिति सामान्य की जानी जरूरी है। शवों को वहां से हटाकर उनका सनातन परंपरा के अनुसार अंतिम संस्कार किया जाना चाहिए। उसके बाद केदारनाथ में परंपरा के अनुसार पूजा शुरू होनी चाहिए। केदारनाथ के रावल भीमा शंकर लिंग के उस दावे को शंकराचार्य ने खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने स्वयं को जगदगुरु बताया था। शंकराचार्य ने कहा कि वे वहां के केवल रावल हैं। कौन सा जगदगुरु वेतनभोगी होता है। उन्होंने कहा कि स्वार्थ के लिए रावल उखीमठ में पूजा की बात कह रहे हैं। इसमें व्यावसायिक दृष्टिकोण छिपा हुआ है। केदारनाथ में सिद्ध शिवलिंग है। इसलिए वहां प्राण प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि रावल को अब केदारनाथ में पूजा अर्चना नहीं करने दी जाएगी।

शंकराचार्य ने केदारनाथ भेजा शिष्य, संतों पर असमंजस

शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने केदारनाथ की स्थिति का पता लगाने अपने एक शिष्य को रवाना कर दिया है। शंकराचार्य आश्रम कनखल से दी सूचना के अनुसार आत्मानंद जौलीग्रांट एयरपोर्ट से केदारनाथ जाएंगे। बुधवार दोपहर शंकराचार्य आश्रम से शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद के हवाले से बताया कि आत्मानंद को केदारनाथ की स्थिति से संतों को अवगत कराने के लिए केदारनाथ धाम भेजा है। आगे की रणनीति उनकी ओर से दी गई जानकारी के आधार पर बनाई जाएगी। वहीं संतों के केदारनाथ जाने के लिए मंगलवार को शंकराचार्य ने सरकार को भेजे पत्र का बुधवार शाम तक कोई जवाब नहीं आया है। उधर, जौलीग्रांट एयरपोर्ट रवाना होने से पहले दैनिक जागरण से बातचीत में आत्मानंद से बताया कि वे हेलीकॉप्टर से केदारनाथ जाएंगे। सरकार ने कोई बंदोबस्त न किया तो वे शंकराचार्य के आदेश पर स्वयं के खर्चे पर हेलीकॉप्टर से केदारनाथ जाएंगे।

मंदिर समिति का नौकर बताना गद्दी का अपमान: रावल

गोपेश्वर [चमोली]। केदारनाथ के रावल भीमाशंकर लिंग शिवाचार्य महाराज ने कहा कि मुझे मंदिर समिति का कर्मचारी कहकर शंकराचार्य ने केदारनाथ की परंपरा व गद्दी का अपमान है। मैंने मंदिर समिति से नौकरी के रूप में आज तक कोई भी धन नहीं लिया है।

हैदराबाद से दूरभाष पर जागरण से बातचीत में उन्होंने कहा कि श्री बदरीनाथ में पूजा परंपरा में रावल पुजारी के रूप में होते हैं। वे केरल के नंबूदरी ब्राह्मण होते हैं, जबकि केदारनाथ में रावल गद्दी स्थान पर विराजमान होते हैं। उनसे दीक्षा प्राप्त वीर शैवलिंगायत संप्रदाय के जंगम लोगों में से पांच शिष्यों में से कोई भी एक पूजा करता है। हर वर्ष केदारनाथ की पूजा रावल से दीक्षित शिष्यों में से कोई भी कर सकते हैं। परंपरा के अनुसार केदारनाथ में पूजा करने वाले का ब्रह्मचारी होना जरूरी नहीं है। रावल को ही ब्रह्मचारी, सन्यासी होना जरूरी है। उन्होंने कहा कि केदारनाथ में पूजा परंपरा का ज्ञान केदारघाटी की जनता, विद्वानों को भली भांति पता है। ऐसे में ज्योर्तिपीठ के शंकराचार्य उन्हें मंदिर समिति का नौकर कहकर अपमानित कर रहे हैं। वास्तविकता यह है कि उन्होंने मंदिर समिति से वेतन के रूप में कोई भी धनराशि आज तक नहीं ली है।

शंकराचार्य परंपरा पर बोलते हुए श्री शिवाचार्य महाराज ने कहा कि देश में धर्म की रक्षा के लिए चार आदि गुरु शंकराचार्य ने चार शंकराचार्यो को चार पीठों में बैठाया गया था। वीर शैवलिंगायत संप्रदाय परंपरा में पांच पंचाचार्यो को उस संप्रदाय के लोग जगत गुरु का स्थान देते है। पांच पीठों में से कर्नाटक के रंभापुरी में वीर पीठ, कर्नाटक के उज्जैनी में सधर्म पीठ, उत्तराखंड के ऊखीमठ ओंकारेश्वर मंदिर में हिमवत केदार बैराग्य पीठ, आंध्र प्रदेश के श्री शैल में सूर्य पीठ तथा उत्तर प्रदेश के काशी में ज्ञान पीठ है। इनमें से केदारनाथ के रावल को केदार जगत गुरु के रूप में वीर शैवलिंगायत संप्रदाय में पूजा जाता है। उन्होंने कहा कि भगवान केदारनाथ की विग्रह मूर्ति की पूजा ऊखीमठ में की जा रही है। यह धन कमाने के लिए नहीं बल्कि भगवान की भक्ति का एक माध्यम है। उन्होंने सन्यासी के रूप में न केवल धर्म प्रचार बल्कि पूजा परंपरा के निर्वहन के लिए अपने जीवन के हर क्षण बिताए हैं। शंकराचार्य के केदारनाथ की पूजा में विध्न डालने संबंधी बयान पर रावल ने कहा कि यह कृत्य धर्म और परंपरा के विपरीत होगा और इसे लोग कभी माफ नहीं करेंगे। वे भी अपने जीते जी केदारनाथ की धार्मिक परंपराओं को खंडित नहीं होने देंगे। उन्होंने कहा कि केदारनाथ में मरण शूतक के कारण अभी पूजा संभव नहीं है। जब मंदिर समिति गर्भ गृह व मंदिर की सफाई कर देगी। इसके बाद शुद्धिकरण कर बाबा केदारनाथ की पूजा परंपरा के अनुसार फिर से शुरू होगी।

केदारनाथ में ही हो केदारेश्वर की पूजा: अविमुक्तेश्वरानंद

हरिद्वार। केदारनाथ के रावल पर शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती के साथ ही उनके शिष्यों ने तीखा हमला किया है। शंकराचार्य के प्रतिनिधि शिष्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि केदारनाथ के रावल को परंपरा, व्यवहार व शास्त्र का ज्ञान नहीं है। केदारेश्वर की पूजा ओंकारेश्वर में नहीं हो सकती। उन्होंने कहा कि रावल मरण सूतक की बात कह रहे हैं, लेकिन वे यह बताएं की कौन से मंदिर में मृत्यु होने के बाद पूजा नहीं की जाती। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि जिस मूर्ति को लेकर उखीमठ आने की बात कही जा रही है, उसको लेकर भ्रम फैलाया जा रहा है। वास्तव में कोई पुजारी मूर्ति लेकर आया तब भी वह गलत है। उन्होंने कहा कि माधवाश्रम महाराज आदि शंकराचार्य की समाधि केदारनाथ में न होने का बयान दे रहे हैं। यह शास्त्रों में की बातों के विरुद्ध है।

तो बंदुकों से लेकर एटम बम की वर्दियां कैसी दोस्त
सरकारों को बहुत परेशान करती न्यायपालिका दोस्त
नरसंहार की संस्कृति नहीं कैसी राजनीति दोस्त

कांग्रेस ने मंगलवार को राहुल गांधी के बाढ़ प्रभावित उत्तराखंड दौरे को गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के दौरे से अलग करार देते हुए कहा है कि पार्टी उपाध्यक्ष 'फोटो सेशन' के लिए नहीं गए थे।

उधर, गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की कांग्रेस की ओर से की जा रही आलोचनाओं और राहुल गांधी की यात्रा का स्वागत किए जाने पर खिन्नता जताते हुए भाजपा ने आज कहा कि कम से कम ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर राजनीति से बचना चाहिए। पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने यहां कहा कि जहां तक उत्तराखंड में आई आपदा का सवाल है, मैं यही कहना चाहूंगा कि किसी भी राजनीतिक दल को इसे लेकर राजनीति नहीं करनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि कोई मुख्यमंत्री या कोई राजनीतिक दल उत्तराखंड में बाढ़ प्रभावितों की सहायता करना चाहता है तो मेरा मानना है कि उस मदद को स्वीकार करना चाहिए, न कि उसे राजनीतिक मुद्दा बना कर उछालना चाहिए। कांग्रेस प्रवक्ता रेणुका चौधरी से संवाददाताओं ने कहा कि मोदी 15,000 लोगों को बचाने का दावा करके 'रैम्बो' बनने का प्रयास कर रहे हैं, जबकि उनका दौरा सिर्फ फोटो खिंचवाने के लिए था।

चमगादड़पंख फड़फड़ा रहे हैं बहुत
पीपल के पेड़ों से बेदखल ब्रह्मराक्षस
चौराहे बंद गलियों में तब्दील,अंधेरे में कैद हम
उत्‍तराखंड में त्रासदी पर अभी तक तो राजनीति ही हो रही थी, लेकिन अब हजारों लोगों के जख्‍मों पर लापरवाही और असंवेदनशीलता का नमक भी छिड़का जा रहा है। ये काम कोई छोटा मोटा नेता नहीं कर रहा है बल्कि देश के सबसे बड़े राजनीतिक घराने और सत्‍तारूढ़ यूपीए सरकार की अघोषित रूप से कमान संभालने वाली सोनिया गांधी और उत्‍तराखंड में कांग्रेस की सरकार के मुख्‍यमंत्री विजय बहगुणा कर रहे हैं। इन पर राजनीति इस कदर हावी है कि ये राहत कार्यों को बढ़ा चढ़ाकर पेश कर रहे हैं और वह भी हंसते हुए। इन्‍हें इस बात की परवाह नहीं कि अपना बखान करने के लिये इन्‍हें बाद में भी समय मिल जाएगा, लेकिन ये लोग तो अपना बखान कर रहे हैं, जबकि हकीकत ये है कि उत्‍तराखंड में न जाने कितने लोग भूख प्‍यास से मर गये और आज भी हजारों लोग वहां पर फंसे हैं।   

अखबारों में छपी मुस्‍कुराती हुई तस्‍वीरें

ये पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब राहत के काम में ढिलाई के आरोपों से घिरी उत्तराखंड सरकार ने छवि सुधारने के लिए अखबारों में दिये। इनमें कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और राज्य के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की मुस्कुराती हुई तस्वीरें छापी गई हैं। इसमें पीएम मनमोहन सिंह की भी तस्वीर है। ये हंसती तस्वीरें लोगों के जख्मों पर नमक छिड़क रही है। उत्तराखंड सरकार ने मुसीबत की घड़ी में साथ रहने की प्रतिज्ञा वाले ये विज्ञापन सोमवार को अखबारों में जारी किए। इसमें आम लोगों तक पहुंचाई गई राहत के बड़े-बड़े दावे किए गए हैं। सेना से आगे सरकार का नाम जोड़ते हुए 83 हजार लोगों को बचाने का दावा किया गया है।

राहत सामग्री रवाना करते हुए भी सोनिया के चेहरे भी थी हंसी

इस विज्ञापन से पहले सोनिया गांधी ने कांग्रेस मुख्‍यालय से 25 ट्रक राहत सामग्री उत्‍तराखंड रवाना की थी। उत्‍तराखंड में त्रासदी के बाद से पहली बार राहुल गांधी इसी कार्यक्रम में नजर आए थे। उत्‍तराखंड में कुदरत के कहर के पूरे आठ दिन बाद। ट्रकों को हरी झंडी दिखाते हुए सोनिया गांधी के चेहरे पर हंसी थी। इस कार्यक्रम में शीला दीक्षित भी मौजूद थीं।

जनसंख्या के सफाये पर जश्न मनाइये दोस्तों
आपदा उत्सव पर भी जश्न मनाइये दोस्तों

16 और 17 जून को जलप्रलय के दौरान रामबाड़ा में कुछ निशान बचा ही नहीं। सबकुछ बर्बाद हो गया। चश्मीदादों के कहना है कि केदारनाथ में तो कुछ दिख भी रहा है लेकिन रामबाड़ा में कुछ भी नहीं दिख रहा है। नक्शे से उसका नामोनिशान मिट चुका है।केदारनाथ के ठीक पास है रामबाड़ा जो सैलानियों में बेहद चर्चित है। सैलानी यहां रुकने के अलावा ट्रैकिंग करना भी पसंद करते है। यहां लगभग 150 दुकाने थी और पांच होटल थे जहां सैलानी ठहरा करते थे। अब यहां कुछ भी नहीं दिखता, सब पानी में बह गए हैं। जब इस इलाके में पानी का सैलाब आया तो धरती से उसकी ऊंचाई 10 फीट थी जिसमें सब कुछ बह गया। यहां अब भी मलवा बिखरा हुआ है। इस मलबे में ना जाने कितनी इंसानी लाशें समेत कई चीजें मिलेंगी लेकिन फिलहाल यहां सबकुछ खौफ में सिमटा हुआ है। यहां सन्नाटा पसरा है,खामोशी है जिसमें बर्बादी का मंजर साफ दिखता है

इलाहाबाद के एक ग्रामीण इलाके में गंगा नदी से छह शव बरामद किए गए हैं। पुलिस ने इस आशंका को खारिज नहीं किया है कि ये शव उत्तराखंड में बह गए श्रद्धालुओं के हो सकते हैं। पुलिस प्रवक्ता उमाशंकर शुक्ला ने बताया कि मांडा थाना क्षेत्र में ग्रामीणों ने गंगा नदी में शव बहते हुए देखे और फिर पुलिस को सूचित किया। पुलिस ने स्थानीय और गोताखोरों की मदद से शव बाहर निकाले।

खराब मौसम की वजह से रेस्क्यू ऑपरेशन बाधित होने से अभी भी उत्तराखंड के अलग-अलग पहाड़ी क्षेत्रों में करीब पांच हजार लोग फंसे पड़े है। हालांकि सरकारी सूत्र कह रहे हैं कि राहत कार्य अगले 48 से 72 घंटे में पूरा हो जाएगा, लेकिन कुछ ऐसे गांव भी हैं जो पूरी तरह से संपर्क मार्ग से कटे हुए हैं। इन गांवों में अभी तक कोई राहत व बचाव दल नहीं पहुंच पाया है। एक अनुमान के मुताबिक उत्तराखंड में अभी भी करीब 5 हजार लोग फंसे हुए हैं और 400 लोग आधिकारिक रूप से लापता हैं।

कई शवों को कीड़ों ने खाया : सूबे की आपदा में बड़ी संख्या में क्षत-विक्षत शव को लेकर भी प्रशासन के हाथ-पांव फूल रहे हैं। सैकड़ों की संख्या में ऐसे शव हैं, जिनकी पहचान नहीं हो पाई है। कई शव ऐसे हैं, जिन्हें कीड़ों ने खा लिया है। कुछ शव पूरी तरह से सड़ गए हैं। इनका डीएनए लेने में भी सरकार को दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है। महामारी की आशंका से भी सरकार परेशान है। जरूरत के मुताबिक डॉक्टर उपलब्ध नहीं हैं।
रोजी-रोटी के संकट की चिंता : स्थानीय लोगों ने सरकार के सामने सबसे बड़ी चिंता तुरंत नुकसान के अलावा रोजी-रोटी के संकट पर भी जताई है। आपदा राहत मंत्री यशपाल आर्य के मुताबिक यहां के हजारों लोगों की रोजी-रोटी पर्यटन पर आधारित है। ऐसे में इनकी आजीविका का ध्यान सरकार को देना होगा।
अब भी सब जगह खाना नहीं : प्रदेश के कई इलाकों में आपदा के कई दिन बाद भी खाना नहीं पहुंच पाया है। सरकार ने बुधवार को फिर भरोसा दिलाया कि अगले तीन दिन में किसी भी प्रभावित इलाके में खाने की कमी नहीं होगी। हालांकि, सरकार ने अपने स्टॉक में पर्याप्त खाद्यान्न की उपलब्धता का दावा किया है।

मुख्यमंत्री बहुगुणा ने कहा कि राज्यों से जानकारी मंगाई जा रही है कि वहां से कितने लोग उत्तराखंड आए थे। अब तक कितने वापस लौटे, इसके आधार पर ही लापता लोगों की सही संख्या का पता चलेगा। चारों तरफ से हो रही आलोचना के बाद अब मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने सभी जिला अधिकारियों को आपदा राहत का वितरण तुरंत सुनिश्चित कराने का निर्देश दिया है। सभी जिला अधिकारियों से कहा गया है कि वे पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर के नुकसान का आकलन करके अब रीस्टोरेशन का काम भी तुरंत शुरू कर दें। राज्य सरकार के विभिन्न एजेंसियों से तालमेल की कमी अखर रही है। सरकार को सूबे में काम कर रही सभी एजेंसियों से पूरी रिपोर्ट नहीं मिल रही है। सेना व अर्धसैनिक बलों में तालमेल नहीं है।