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Sunday, 20 May 2012

मोहब्बत की हदें और सरहदें


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मोहब्बत की हदें और सरहदें

By संजय द्विवेदी 19/05/2012 14:37:00
राष्ट्रपति फ्रैंकोस ओलांद अपनी प्रेमिका के साथराष्ट्रपति फ्रैंकोस ओलांद अपनी प्रेमिका के साथ
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फ्रांस के राष्ट्रपति भवन में अपनी प्रेमिका के साथ नए राष्ट्रपति फ्रांकोस ओलांद के रहने की खबर वहां के समाज में बहुत अप्रत्याशित नहीं है। फ्रांस के लोगों को इस बात की बहुत परवाह नहीं है कि नैतिकता को वे इस तरह से देखें। उनके लिए शायद वफादारी बहुत बड़ा सवाल न हो। वहां के पूर्व राष्ट्रपति सरकोजी भी इस मामले में ज्यादा ईमानदार दिखते हैं कि वे अपने प्रेम को स्वीकार करते हैं अपनी प्रेमिका कार्ला ब्रूनी के साथ शादी कर लेते हैं। जबकि बहुत से समाज या उनकी राजनीति इतनी उदार नहीं है कि इन घटनाओं को आसानी से पचा जाए।
समाज में जारी पाखंड पर्वः
अमरीका जैसे समाज में भी नैतिकता के उच्च मापदंडों की नेताओं से अपेक्षा की जाती है। नेताओं की बीबियां किसी भी राजनैतिक अभियान का एक प्रमुख चेहरा होती हैं। शायद इससे यह संदेश जाता हो कि एक हंसते-खेलते परिवार का मुखिया शायद देश ठीक से चला सके। दुनिया के अनेक समाज इस तरह के पाखंड के साथ ही जीते हैं। समाज जैसा भी जीवन जी रहा हो, वह अपने नायकों से उच्च नैतिक मापदंडों की अपेक्षा करता है। सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार और व्यभिचार ऐसे ही पाखंडों से पैदा होते हैं। नारायणदत्त तिवारी के साथ पितृत्व के सवाल पर लड़ रहे रोहित शेखर या भोपाल की शेहला मसूद- जाहिदा और ध्रुवनारायण कथा हो या फिर अभिषेक मनु सिंघवी की कहानी। सब हमारे सार्वजनिक जीवन के द्वंद को उजागर करते हैं। नेता भी तो समाज का ही हिस्सा है। जब पूरा समाज पाखंड पर्व में डूबा हो तो सच्चा प्यार इस बाजार में दुर्लभ ही है। हालांकि हिंदुस्तानी समाज, राज कर रहे नेतृत्व को अपने से अलग मानकर चलता है। उसने कभी अपनी नैतिकताएं राज करने वालों लोंगों पर नहीं थोपीं और मानकर चला कि उन्हें भोग करने, ज्यादा सुख से जीने और थोड़ा अलग करने का हक है। राजाओं की भोग-विलास की कथाएं, नवाबों के हरम, रईसों के शौक पर पलते कोठों से लेकर रखैलों का सारा खेल इस समाज ने देखा है और खामोश रहा है।

नेताओं की रूमानियतः
आज जबकि समाज जीवन में बहुत खुलापन आ गया है तो इस तरह की चर्चाएं बहुत जल्दी आम हो जाती हैं किंतु पूर्व में भी ऐसे किस्से लगातार कहे और सुने गए। प्रेम की कथाएं हिंदुस्तानियों के बहुविवाहों के चलते दबी पड़ी रहीं और अब वे लगातार दूसरी तरह से कही जा रही हैं। हमारे नेतृत्व में बैठे नेताओं की रूमानियत चर्चा में रही है। किंतु रूमानियत, मोहब्बत और प्रेम की ये कथाएं अलग-अलग तरीके से विश्लेषित किए जाने की मांग करती हैं। एक कहानी में प्यार सच्चा हो सकता है। किंतु ज्यादातर कहानियों में पुरूष एक शिकारी सरीखा नजर आता है, उसके लिए महिलाएं एक ट्राफी सरीखी हैं। सत्ता, अधिकार और पैसा , ज्यादा औरतों का उपयोग करने की मानसिकता को बढ़ाता हैं। अभिषेक मनु सिंधवी और बिल क्लिंटन जैसी कथाओं से इसे समझा जा सकता है, इसमें स्त्री का प्यार सहज नहीं है। वह उपयोग हो रही है, सेक्स में साथ है किंतु उसमें प्यार नहीं है। इसमें कुछ पाने की आकांक्षा छिपी हुयी है। पुरूष दाता की भूमिका में है, वह स्त्री को सड़क से उठाकर शिखर पर बिठा सकता है। यह स्त्री का एक अलग तरह का संधर्ष है, जिसके माध्यम से वह जल्दी व ज्यादा पाना चाहती है। उप्र के मंत्री रहे अमरमणि त्रिपाठी- कवियत्री मधुमिता शुक्ला की कहानी, पत्रकार शिवानी भटनागर जैसी तमाम कहानियां हमें बताती हैं स्त्री किस तरह शिकार हो रही है, या शिकार की जा रही है। स्त्री और पुरूष के बीच बन रहे ये रिश्ते भले सहमति से बन रहे हैं किंतु दोनों पक्षों में गैरबराबरी बहुत प्रकट है। इन कहानियां में प्यार नहीं है, पर रिश्तों की हदें तोड़कर जान लेती कहानियां जरूर हैं। स्त्री यहां भी एक शिकार है। शिकारी पुरूष हो या उसकी पत्नी या प्रेमिका, किंतु जान तो औरत की जा रही है। सत्ता और अधिकार से जुड़े पुरूषों के ये हरम निरंतर विस्तार पा रहे हैं। सत्ता का नशा और औरतें जमाने से साथ-साथ चली हैं। 'जर-जोरू और जमीन' जैसे मुहावरे हमें यही बताते हैं। निश्चित ही अपने घरों में पोर्न देखते लोगों पर आप आपत्ति नहीं कर सकते पर जब यही सत्ता के मदांध लोग विधानसभा में पोर्न फिल्में देख रहे हों तो इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। जनता की जेब से जाने वाले धन से चल रही विधायिका में आप ऐसा कैसे कर सकते हैं, जो समय आपने संसद या विधानसभा में जनता के सवालों पर संवाद पर के लिए दिया है, वहां ऐसी हरकतें हमारी राजनीति के प्रति दया जगाती हैं।

निजी जीवन में झांकते कैमरेः
निश्चत ही निजी जीवन में झांकना और फेसबुकिया चरित्रहनन संवाद से सहमति नहीं जताई जा सकती। निजता के सम्मान के सवाल अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं किंतु हमें यह तो स्वीकारना ही होगा कि बाजार, राजनीति और सत्ता मदमस्त होकर स्त्री की शुचिता का अपहरण करने में लगी है। दुखद है कि सत्ता और राजनीति की इस आकांक्षा को औरतों ने भी पहचान लिया है और वे इसका इस्तेमाल करने में, जल्दी और ज्यादा पाने की कोशिश में कई बार सफल हो जाती हैं तो कई बार अपनी जान तक गवां बैठती हैं। सत्ता पूरब की हो पश्चिम की वह अपने चरित्र में ही भ्रष्ट और व्यभिचारी होती है। आशिकमिजाज ताकतवर नेता और अधिकारी कथित प्रेम में पगलाई स्त्रियों के साथ जो कर रहे हैं वह बात चिंता में डालती है।

बाजार के केंद्र में स्त्रीः
भारतीय संदर्भ में हम देखें तो पूरी व्यवस्था और बाजार के केंद्र में भारतीय स्त्री है और उद्देश्य उसकी शुचिता का उपहरण । सेक्स सांस्कृतिक विनिमय की पहली सीढ़ी है। शायद इसीलिए जब कोई भी हमलावर किसी भी जातीय अस्मिता पर हमला बोलता है तो निशाने पर सबसे पहले उसकी औरतें होती हैं । यह बाजारवाद अब भारतीय अस्मिता के अपहरण में लगा है-निशाना भारतीय औरतें हैं। स्त्री आज के समय में वह घर और बाहर दोनों स्थानों अपेक्षित आदर प्राप्त कर रही है। वह समाज को नए नजरिये से देख रही है। उसका आकलन कर रही है और अपने लिए निरंतर नए क्षितिज खोल रही है। ऐसी सार्मथ्यशाली स्त्री को शिखर छूने के अवसर देने के बजाए हम उसे बाजार के जाल में फंसा रहे हैं। वह अपनी निजता और सौंदर्यबोध के साथ जीने की स्थितियां और आदर समाज जीवन में प्राप्त कर सके हमें इसका प्रयास करना चाहिए। हमारे समाज में स्त्रियों के प्रति धारणा निरंतर बदल रही है। वह नए-नए सोपानों का स्पर्श कर रही है। माता-पिता की सोच भी बदल रही है वे अपनी बच्चियों के बेहतर विकास के लिए तमाम जतन कर रहे हैं। स्त्री सही मायने में इस दौर में ज्यादा शक्तिशाली होकर उभरी है। किंतु बाजार हर जगह शिकार तलाश ही लेता है। वह औरत की शक्ति का बाजारीकरण करना चाहता है। हमें देखना होगा कि भारतीय स्त्री पर मुग्ध बाजार उसकी शक्ति तो बने किंतु उसका शोषण न कर सके। आज में मीडियामय और विज्ञापनी बाजार में औरत के लिए हर कदम पर खतरे हैं। पल-पल पर उसके लिए बाजार सजे हैं। देह के भी, रूप के भी, प्रतिभा के भी, कलंक के भी। हद तो यह कि कलंक भी पब्लिसिटी के काम आ रहे हैं। क्योंकि यह समय कह रहा है कि दाग अच्छे हैं। बाजार इसी तरह से हमें रिझा रहा है और बोली लगा रहा है। ऐसे कठिन समय में हमें स्त्रियों को बाजार, राजनीति, सत्ता के प्रलोभनों को समझना होगा। सत्ता और बाजार के हरम सजे पड़े हैं, उससे बचना और अपनी इयत्ता को बचाए रखना ही भारतीय स्त्री को मुक्त करेगा और सम्मानित भी।